देश की राजनीति का दोगला और देशद्रोही चरित्र

सत्ता स्वार्थों की राजनीति की देश में इस समय तूती बोल रही है । नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर राजनीतिक दलों ने देश में आग लगा रखी है । सत्ता की प्राप्ति के लिए उतावले कुछ विपक्षी दल बिना इस बात की परवाह किए इस कार्य को करते चले जा रहे हैं कि इसका परिणाम देश के टूटने में भी देखा जा सकता है । सरकार का विरोध करना लोकतंत्र में प्रत्येक राजनीतिक दल का अधिकार है , परंतु सरकार का विरोध करते – करते देश का विरोधी हो जाना तो देशद्रोह से कम नहीं है । बहुत बड़े पैमाने पर देश में सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाई जा चुकी है और सारे राजनीतिक दल उपद्रव और आगजनी की इन घटनाओं को देख – देखकर इसलिए खुश हो रहे हैं कि इससे उनका ‘वोट बैंक’ मजबूत होता जा रहा है। लगता है – ” हर शाख पर उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा ?”

जितने भर भी आंदोलनकारी देश में आंदोलन कर रहे हैं , उनमें से अधिकांश को यह पता नहीं है कि वह किस बात को लेकर आंदोलनरत हैं ? अधिकांश स्थानों पर यह भी देखने को मिला है कि बाहरी तत्वों ने आकर शरारत आरंभ की और आग लगाकर वह किसी न किसी प्रकार से निकल भागने में सफल हो गए हैं । इससे पता चलता है कि शत्रु किस प्रकृति का है और उसका उद्देश्य किस प्रकार देश में आग लगा देना हो गया है ? – यद्यपि यह सच है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम से किसी भी तरीके से भारत के मुसलमानों के हित प्रभावित नहीं होते हैं । परंतु इसके उपरांत भी उन्हें भ्रमित किया जा रहा है । जिससे कि देश में सुव्यवस्था और स्थिरता देती जान पड़ रही मोदी सरकार को अस्थिर किया जा सके । देश के विपक्षी दल कुछ इस तरह प्रचारित कर रहे हैं , मानो इस कानून से देश के अल्पसंख्यकों की भारी क्षति होने जा रही है । राजनीति का दुष्चरित्र सड़कों पर नंगा नाच रहा है । राजनीतिज्ञ अपने खूनी चेहरे को जनता से छिपाए अपने घरों में बैठे हैं और वहीं से बैठकर सारे आपराधिक षड्यंत्र और तंत्र को संचालित कर रहे हैं। जिसे देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि राणा सांगा का साथ न देकर विदेशी बाबर का साथ देने वाले तत्कालीन हिंदू राजाओं या राजनीतिज्ञों का दुष्चरित्र आज भी हमारे राजनीतिज्ञों के सर चढ़कर बोल रहा है। हम अपनी आंखों से देख रहे हैं कि 1947 में विभाजन की मांग करने वाले अपने नए ‘अवतार ‘ में किस प्रकार देश के माहौल को बिगाड़ने के गंभीर षडयंत्रों में लगे हुए हैं ?

राजनीतिक दल और देश के राजनीतिज्ञ ही छात्रों के कंधे पर राजनीति की बंदूक रखकर अपना स्वार्थ साध रहे हैं। यद्यपि वे कुल मिलाकर देश और समाज का ही अहित कर रहे हैं।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि देश का कोई भी राजनीतिक दल नहीं है जिसने समय-समय पर पड़ोसी देशों में प्रताड़ित किए गए अल्पसंख्यक हिंदुओं को भारतीय नागरिकता देने की पक्षधरता न की हो। कांग्रेस के मनमोहन सिंह जिस समय नेता प्रतिपक्ष थे , उस समय उन्होंने स्वयं इस संबंध में कानून लाने की वकालत की थी , जिसे आज कांग्रेस या तो भूल रही है यह भूलने का नाटक कर रही है। यहां तक कि अब तो डॉक्टर मनमोहन सिंह का भी सुर बदल गया है। इस मसले पर वे भी केवल राजनीति कर रहे हैं।

हमारे देश के बारे में यह भी सच है कि पिछले एक दशक के हिंसक आंदोलनों के पीछे राजनीतिक दलों का ही हाथ रहा है। कभी वे जातीय तो कभी धार्मिक मसले को आगे रखकर जनता को भड़काते देखे गए हैं । इसी प्रकार कभी भाषा तो कभी आरक्षण के सवाल पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते नजर आए हैं। आपको याद होगा कि गत वर्ष पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में उस वक्त हिंसा भड़क उठी थी जब राज्य सरकार ने पहाड़ी क्षेत्रों के स्कूलों में बांग्ला भाषा पढ़ाने की अनिवार्यता सुनिश्चित की थी। पहाड़ी लोगों ने इसका विरोध किया और आरोप लगाया कि उनके मौलिक अधिकारों एवं रीति-परंपराओं के साथ राज्य सरकार खिलवाड़ कर रही है। उनकी इस प्रकार की भावनाओं ने लोगों को विरोध के लिए इस सीमा तक उकसा दिया कि शीध्र ही यह आंदोलन गोरखालैंड राज्य की मांग में परिवर्तित हो गया। इस हिंसक आंदोलन को चरम पर पहुंचाने में राजनीतिक दलों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। परिणामस्वरूप इस हिंसक आंदोलन में देश के हजारों करोड़ रुपए स्वाहा हो गये। इसी तरह गत वर्ष हरियाणा में जाट आंदोलन का रक्तरंजित चेहरा सामने आया । उससे न केवल हरियाणवी समाज की एकता व भाईचारा नष्ट हुआ अपितु राज्य की अर्थव्यवस्था को भी भारी हानि पहुंची।

हरियाणा के जाट आंदोलनकारियों ने हिंसा का रास्ता अपनाकर अपने विरोधियों की दुकानों, मकानों व वाहनों को आग के हवाले कर दिया। इस आंदोलन में ढ़ाई दर्जन से अधिक लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग बुरी तरह घायल हुए। एसोचैम की मानें तो उस हिंसक आंदोलन में तकरीबन 30 हजार करोड़ रुपए से अधिक की राष्ट्रीय संपत्ति जलकर स्वाहा हो गई थी। यदि यह धनराशि राज्य के विकास में लगी होती तो राज्य का भला हुआ होता। उस उस समय देखा गया कि आंदोलनकारियों ने रास्ता जाम करने के लिए हजारों मूल्यवान पेड़ों को काटकर पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचाया।

इसी तरह गत वर्ष गुजरात के पाटीदारों ने आरक्षण की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन किया , जिससे निजी व सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा। इस हिंसक आंदोलन में 3500 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ। सबसे ज्यादा नुकसान गोल्ड, माॅल, रेस्त्रां और पेट्रोलियम इंडस्ट्री को हुआ। गत वर्ष ही आंध्रपदेश के कापू समुदाय के लोगों ने भी आरक्षण की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन किया जिससे अर्थव्यवस्थ को भारी नुकसान पहुंचा। पिछले वर्ष ही मध्यप्रदेश राज्य में किसानों ने अपने उत्पादन में मूल्य वृद्धि को लेकर आंदोलन किया और धीरे-धीरे यह आंदोलन हिंसा में बदल गया जिससे कई किसानों की जान गयी। तोड़-फोड़ के दौरान हजारों करोड़ रुपए की संपत्ति का भी नुकसान हुआ। देश के अन्य हिस्सो में भी आए दिन इस तरह के आंदोलन होते रहते हैं , जिससे न केवल जनजीवन बाधित होता है अपितु हिंसा से देश की सार्वजनिक संपत्ति को भी भारी क्षति उठानी पड़ती है ।

गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने आंदोलन के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने और हिंसा करने वालों के विरुद्ध कड़ा कदम उठाने का निर्देश दिया सरकारों को दिया था और कहा था कि आंदोलन से जुड़े राजनीतिक दलों और संगठनों को इस क्षति की भरपाई करनी होगी। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी गुजरात में हुए पाटीदार आंदोलन के नेतृत्वकर्ता हार्दिक पटेल की याचिका की सुनवाई के समय की थी। न्यायालय ने यह भी कहा था कि सरकार सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की जवाबदेही तय करने के मानक सुनिश्चित करने के साथ-साथ ऐसी गतिविधियों में सम्मिलित लोगों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए दिशा-निर्देश भी जारी करे । यह एक विडंबना है कि सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी फटकार के बाद भी हिंसक आंदोलनों का क्रम जारी है। लगता है सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाना और देश की प्रगति को बाधित करना हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है ।राजनीतिक दल हिंसक आंदोलनों को भड़काने-उकसाने से बाज नहीं आ रहे हैं। आंदोलन की उग्रता और हिंसक गतिविधयों को देखते हुए समझना कठिन नहीं कि राजनैतिक दलों का मकसद येनकेनप्रकारेण सत्ता प्राप्त करना है। परन्तु उन्हें समझना होगा कि उनके ऐसे कृत्यों से देश का भला होने वाला नहीं है।

राहुल गांधी जैसे जिन नेताओं ने देश विभाजन की जिम्मेदारी सावरकर जैसे राष्ट्रवादी लोगों के ऊपर डालने का प्रयास किया है और इस बात का शोर मचाया है कि यह देश गांधी की अहिंसा के कारण आजाद हुआ , वही अब राष्ट्रद्रोहियों का साथ दे रहे हैं और गांधी की अहिंसा में विश्वास न रखकर देश में हिंसा का माहौल तैयार कर रहे हैं । जिससे उनका दोगला चरित्र स्पष्ट होता है।

1945 में जिन 95% मुसलमानों ने मुस्लिम लीग को सांप्रदायिक आधार पर अपना वोट इसलिए दिया था कि वह देश का बंटवारा चाहती थी उसी मानसिकता के लोगों को साथ लेकर कांग्रेस अब अपना स्वार्थ सिद्ध करने पर उतारू है। वास्तव में मुस्लिम लीग के समर्थक इन मुसलमानों का कांग्रेस ने अपने निहित स्वार्थ में पहले दिन से इसी प्रकार प्रयोग किया है । यह दुर्भाग्य की बात है कि 72 वर्ष पश्चात भी देश का मुसलमान कांग्रेस के चरित्र को समझ नहीं पाया है। कम से कम अब तो यह बात स्पष्ट हो ही जानी चाहिए कि देश का बंटवारा किन लोगों ने किया और किस लिए करवाया था ? इस तथ्य को समझ कर ही हम देश की वर्तमान परिस्थितियों को संभाल पाएंगे और भविष्य को सुरक्षित व संरक्षित कर पाएंगे। सरकार विरोधी होते – होते देशद्रोही हो जाने की प्रक्रिया पर रोक लगाने का अब समय आ गया है, समान नागरिक संहिता लागू करने से भी पहले मोदी सरकार को अब इस दिशा में ठोस कदम उठाना चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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