गुरुकुल पौंधा विद्वत सम्मान समारोह आयोजित : आर्य शिक्षा प्रणाली मानव निर्माण का आधार है : आचार्या डॉक्टर सुकामा

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।
गुरुकुल पौन्धा में आयोजित तीन दिवसीय गुरुकुल महोत्सव के समापन दिवस रविवार दिनांक 10-11-2019 को अपरान्ह 1.00 बजे से मानव सेवा प्रतिष्ठान की ओर से ‘‘सम्मान समारोह” का आयोजन किया गया जिसमें आर्यजगत के अनेक विद्वानों को निःस्वार्थ भाव से आर्यसमाज की सेवा करने के लिये सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के आरम्भ में कन्या गुरुकुल नरेला की 4 छात्राओं ने एक सामूहिक कविता का पाठ किया। कविता के बोल थे ‘बुझी ज्योति जो जीवन की उसे फिर से जला आये।’ इसके बाद गुरुकुल कांगड़ी के छात्र अभिनव ने एक गीत प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘बीहड़ वन में विचर रहा था सच्चे शिव का मतवाला, छोड़ दिया था टंकारा।’ गुरुकुल पौंधा के संस्थापक स्वामी प्रणवानन्द जी मंच पर उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन कर रहे मानव सेवा प्रतिष्ठान के प्रधान श्री चन्द्र देव शास्त्री जी ने उन्हें कार्यक्रम की अध्यक्षता करने का प्रस्ताव किया जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। हालैण्ड से पधारी श्रीमती कीर्ति अवतार जी को मंच पर आने का निवेदन किया गया। संचालक महोदय ने बताया कि गुरुकुल चोटीपुरा की आचार्या डा. सुकामा जी ने अपने गुरुकुल में अनेक विदुषी देवियों को उत्पन्न किया है। इसके लिए उनका अभिनन्दन किया गया। गुरुकुल की एक छात्रा विद्योतमा ने महामृत्युंजय मन्त्र का पाठ व उसके अर्थ का गान प्रस्तुत किया। इसके बाद उन्होंने एक गीत प्रस्तुत किया जिसकी पंक्तियां थी ‘आज उलझन में उलझी है दुनिया, कोई सुलझाने वाला नहीं है। पथ से भटकाने वाले अनेकों पथ पे लाने वाला कोई नहीं है।।’ इस भजन के बाद पाणिनी कन्या गुरुकुल महाविद्यालय, वाराणसी की कन्याओं ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया।

मानव सेवा प्रतिष्ठान के यशस्वी संस्थापक श्री रामपाल शास्त्री जी ने प्रतिष्ठान का परिचय प्रस्तुत करते हुए बताया कि 21 वर्ष पहले स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी के आशीर्वाद और श्री सोमदेव आदि मित्रों के सहयोग से गुरुकुल गौतमनगर, दिल्ली में मन्थन कर सामाजिक कार्यों में अपना योगदान करने की योजना बनाई थी। श्री रामपाल शास्त्री सन् 1989 में दूसरी बार हालैण्ड की यात्रा पर गये थे। वहां उन्होंने लोगों के सामने मानव सेवा से जुड़ी अपनी योजना को प्रस्तुत किया था। उन्होंने ईसाईयों व मुसलमानों के मत प्रचार व उनके द्वारा छल, बल व प्रलोभन से धर्मान्तरण की घटनाओं का विवरण अपने विदेशी मित्रों को देकर उनसे निर्धन व असहाय बच्चों की शिक्षा का प्रबन्ध करने में सहयोग करने का अनुरोध किया था। विदेशी मित्रों ने उनसे कहा था कि वह कोई संस्था बनाये जिससे वह उन्हें आर्थिक सहयोग कर सकें। सन् 1998 में संस्था बनी और उसने काम करना आरम्भ किया। आरम्भ में पांच छात्रों की शिक्षा व अध्ययन में सहयोग किया गया। श्री रामपाल शास्त्री जी 40 बार यूरोप के अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। वहां वह लोगों के घरों में यज्ञ कराते हैं। लोग दक्षिणा देते हुए उन्हें कहते हैं कि कोई सेवा बतायें? इसके उत्तर में वह निर्धन बच्चों की शिक्षा में सहयोग करने सहित धर्म प्रचार कार्यों में कर्तव्य की भावना से कार्य कर रहे विद्वानों के सम्मान के लिये आर्थिक सहयोग देने का अनुरोध करते हैं। वर्तमान में आप 125 बच्चों के अध्ययन व पढ़ाई की व्यवस्था कर रहे हैं। सन् 2001 में ऋषिभक्त पं. बलदेव तिवारी जी का देहावसान हुआ। उनके पुत्रों ने शास्त्री जी को योग्य सेवा बताने को कहा? वह अपने पिता की स्मृति में कोई ऐसा कार्य करना चाहते थे जिससे उनकी स्मृति बनी रहे। शास्त्री जी ने उन्हें प्रतिवर्ष एक विद्वान का सम्मान करने के लिये उस पर होने वाले व्यय को वहन करने का सुझाव दिया। उस सुझाव को स्वीकार कर लिया गया। इसके 2 वर्ष बाद उनकी माता जी का भी देहावसान हो गया। पुनः उनकी सन्तानों ने शास्त्री जी से निवेदन किया और इस अवसर पर भी एक अतिरिक्त विद्वान का सम्मान करने के कार्य में पूर्ण सहयोग करने का उन्होंने वचन दिया जिसको वह अद्यावधि निभा रहे हैं।

श्री रामपाल शास्त्री जी ने बताया कि गुरुकुल चोटीपुरा की संचालिका डा. सुकामा जी के पिता श्री राजेन्द्र देव जी एक सामाजिक कार्यकर्ता थे। उन्होंने यशस्वी जीवन व्यतीत किया। उनका परिवार दो विद्वानों के सम्मान के लिये सहयोग देते हैं। श्री रामपाल शास्त्री जी ने अनेक सहयोगियो का इसी प्रकार से परिचय दिया। श्री रामपाल शास्त्री जी स्वयं भी इस कार्य में अपनी ओर से सहयोग प्रदान करते हैं। मंच पर आसीन दानी प्रवृति के ऋषिभक्त ठा. विक्रम सिंह जी को उन्होंने बताया कि उन्होंने उनसे प्रेरणा प्राप्त कर इन कार्यों को आरम्भ किया है। शास्त्री जी ने बताया कि डा. सुमेधा एवं डा. सुकामा बहिन जी ने गुरुकुल चोटीपुरा को सफलता की ऊंचाईयों पर पहुंचाया है। शास्त्री जी हालैण्ड से आयी बहिन श्रीमती कीर्ति अवतार जी का परिचय भी दिया। उनकी सामाजिक सेवाओं को स्मरण कर उनका सम्मान किया गया। सम्मान में उनको ओ३म् का पट्टा एवं एक शाल ओढ़ाया गया। इसके बाद बहिन डा. सुमेधा जी का स्वागत किया गया। उनका सम्मान तीन बहिनों के द्वारा किया गया। उनको भी ओ३म् का पट्टा एवं एक शाल भेंट किया गया। ठा. विक्रम सिंह जी ने भी उनका ओ३म् के पट्टे के द्वारा सम्मान किया। इसके बाद प्रतिष्ठान द्वारा पूर्व निर्धारित विद्वानों के सम्मान का कार्यक्रम आरम्भ किया गया। सम्मानित होने वाले सभी विद्वानों को ओ३म् का पट्टा तथा शाल देकर सम्मान किया गया। सभी विद्वानों को अभिनन्दन पत्र और पुरस्कार धनराशि भी प्रदान की गई। चित्रकारों ने सभी सम्मानित किये गये विद्वानों के प्रतिष्ठान के अधिकारियों के साथ सामूहिक चित्र भी लिये। सम्मानित विदुषियों एवं विद्वानों के नाम इस प्रकार हैंः

1- डा. सुकामा जी, गुरुकुल चोटीपुरा, मुरादाबाद।
2- आचार्य वेदनिष्ठ जी, हरियाणा।
3- डा. सोमदेव शास्त्री, वैदिक मिशन, मुम्बई।
4- आचार्या सविता आर्य जी, कन्या गुरुकुल, नरेला।
5- श्री मनमोहन कुमार आर्य, आर्य-लेखक, देहरादून।
6- श्री माम चन्द पथिक जी, आर्य भजनोपदेशक।
7- पं. वेदवसु शास्त्री, पुरोहित, देहरादून।
8- आचार्य शरदचन्द्र आर्य जी।
9- आचार्य चन्द्रकला जी।
10- आचार्या सीमा जी।
11- आचार्या डा. प्रीति वेदविमर्शिनी, पाणिनी कन्या महाविद्यालय, काशी।
12- स्वामी नारदानन्द सरस्वती जी, बरगढ़, उड़ीसा।

आचार्या डा. सुकामा जी ने कहा कि शिक्षा एक यज्ञ है। समाज को यह पुष्पित एवं पल्लिवित करता है। उन्होंने कहा कि मानव सेवा प्रतिष्ठान प्रशंसनीय कार्य कर रहा है। हम मानवता के पालन करने वाले बनें। आर्ष शिक्षा व इसका संवर्धन करना मानव निर्माण का आधार है। गुरुकुलों के छात्रों की प्रतियोगितायें आयोजित कर उन्हें उत्साहित करना और उनका सम्मान करना भी प्रशंसनीय कार्य हैं। सम्मानीय बन्धु श्री रामपाल शास्त्री जी ने 21 वर्ष पहले पांच बच्चों की शिक्षा का प्रबन्ध कर कार्य आरम्भ किया था। वह इस कार्य को करके विदेशी बन्धुओं को भी इस यज्ञीय कार्य से जोड़ रहे हैं। बहिन आचार्या सुकामा जी ने आह्वान किया कि माता-पिता अपनी सन्तानों को दिव्य सन्तान बनावें। दिव्य सन्तान बनाने का आधार गुरुकुलीय आर्ष शिक्षा प्रणाली है। महर्षि दयानन्द ने पठन पाठन की आर्ष शिक्षा का उल्लेख करके हमारा मार्गदर्शन किया है। आर्ष शिक्षा को प्राप्त कर हम आगे बढ़े। हम वेदों के अनुरूप देव व दिव्य जन बन कर वेदों को सार्थक करें। आपने श्री रामपाल शास्त्री जी से जुड़े अपने पुराने संस्मरण भी सुनाये जब वह गुरुकुल गौतमनगर में पढ़ते भी थे और अतिथि विद्वानों की सेवा भी करते थे। आज हमारे इन बन्धु रामपाल शास्त्री जी का कार्य अति विस्तृत हो गया है। उन्होंने सम्मानित किये जाने के लिये प्रतिष्ठान एवं सभी बन्धुओं का धन्यवाद किया। गुरुकुल पौंधा के प्राचार्य डा. धनंजय एवं शिवालिक गुरुकुल के संचालक श्री नायब सिंह जी को भी ओ३म् के पट्टे से सम्मानित किया गया।

अपने सम्बोधन में गुरुकुल चोटीपुरा की आचार्या डा. सुमेधा जी ने कहा कि यह सम्मान दिवस एक प्रेरणा देने वाला दिवस भी है। उन्होंने स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी के व्यक्तित्व एवं कार्यों की प्रशंसा की। उन्होंने अनेक गुरुकुलों का संचालन कर अनेक विद्वान आर्यसमाज को दिये हैं। बहिन सुमेधा जी ने श्री रामपाल शास्त्री जी के कार्यों की भी प्रशंसा की। उन्होंने मानव सेवा प्रतिष्ठान द्वारा विद्वानों के सम्मान सहित छात्रों के उत्साहवर्धन के कार्यों के लिये प्रतिष्ठान के सभी अधिकारियों व सहयोगियों की प्रशंसा की। बहिन जी ने कहा कि विद्या का मनुष्य के जीवन में सर्वाधिक महत्व है। उन्होंने यह भी कहा कि विद्या प्राप्त कर मनुष्य विनयशील बनता है। विनय से पात्रता आती है। धन भी पात्रता से प्राप्त होता है। इन सबका परिणाम सुख होता है। आचार्या जी ने कहा जब तक विद्या हमारे जीवन में उतरेगी नहीं और यह व्रत से नहीं जुड़ेगी, वह हमारे लिए हितकर नहीं होगी। मानव सेवा प्रतिष्ठान ने विद्वानों के सम्मान के माध्यम से विद्या को बढ़ावा दिया है। उन्होंने पुनः कहा कि विद्या को व्रत से जोड़ें। आचार्य रामपाल शास्त्री जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का उल्लेख कर उन्होंने कहा कि वह जो कार्य कर पाये हैं उसका कारण उनका ‘विद्या ददाति विनयं’ शास्त्रीय वचन को अपने जीवन में साकार रूप देना है। कार्यक्रम में आचार्या सुमेधा जी का भी सम्मान किया गया।

क्रार्यक्रम में सम्मानित आर्यसमाज के शीर्ष विद्वान डा. सोमदेव शास्त्री, मुम्बई ने अपने सम्बोधन में कहा कि मानव शरीर में अग्नि, वायु आदि सभी देवताओं ने प्रवेश किया हुआ है। इस दृष्टि से मानव शरीर देवताओं का नगर है। आचार्य डा. सोमदेव जी ने वेदों के सन्देश मनुर्भव की चर्चा की। उन्होंने कहा कि मनुष्य बनने वा मानवता से सम्पन्न होने के लिये विद्या की आवश्यकता है। विद्या प्राप्त करके हमारे जीवन में नम्रता, पात्रता और धन आदि प्राप्त होते हैं। डा. सोमदेव शास्त्री ने श्री रामपाल शास्त्री जी की विनयशीलता के गुण तथा सेवा कार्यों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि श्री रामपाल शास्त्री जी विद्वानों के सम्मान के साथ साथ छात्र-छात्राओं के प्रोत्साहन का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि जिस देश में विद्वानों व पात्र व्यक्तियों का सम्मान होता है वहां सब प्रकार से सुख होते हैं व उन्नति होती है। उन्होंने बतया कि रामपाल शास्त्री गुरुकुल गौतमनगर दिल्ली के स्नातक हैं। उन्होंने एक गीत की पंक्तियां भी प्रस्तुत की जिसमें कहा गया है कि ‘आयेंगे अरब से सन्देश जिसमें कहा होगा कि वहां गुरुकुल का एक ब्रह्मचारी हलचल मचा रहा है।’ आचार्य सोमनाथ शास्त्री जी ने कहा कि श्री रामपाल शास्त्री जी विदेशों में वैदिक धर्म व संस्कृति का प्रचार करने के साथ वहां स्वधर्म के अनुयायियों से भारत के लोगों के लिये सहयोग प्राप्त करने का प्रशंसनीय कार्य रहे हैं। डा. सोमदेव शास्त्री जी ने सभी विद्वानों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की। उन्होंने सबका धन्यवाद किया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि मानव सेवा प्रतिष्ठान आगे भी सेवा के कार्यों को जारी रखेगा। आचार्य जी ने यह भी कहा कि सेवा का कार्य करना कठिन होता है।

मानव सेवा प्रतिष्ठान के मंत्री श्री कंवर सिंह जी ने अपने सम्बोधन में कहा कि हमें महाविद्यालय में अध्ययन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जो स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी की देन है। हरियाणावासी होकर भी हम आज बन्दूक की जगह लेखनी से काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विद्या सब धनों में प्रधान है। श्रोताओं को उन्होंने कहा कि आप जितना सहयोग करेंगे हमारी संस्था उतनी अधिक उन्नति करेगी। इसके बाद कार्यक्रम में उपस्थित श्री सन्दीप सिंह जी का संस्था के प्रधान श्री चन्द्रदेव शास्त्री जी ने ओ३म् के पट्टे से सम्मान किया। पाणिनी कन्या महाविद्यालय, वाराणसी की आचार्या डा. प्रीति वेदविमर्शनी जी ने अपने सम्बोधन में श्री रामपाल शास्त्री जी के गुणों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि विद्या को व्यवहार में आना चाहिये। विद्या का प्रचार व प्रसार भी हमें करना है। सब दानों में विद्या का दान श्रेष्ठ है। उन्होंने सम्मानित करने के लिये मानव सेवा प्रतिष्ठान का धन्यवाद किया।

ठाकुर विक्रम सिंह जी ने अपने सम्बोधन में अपनी हालैण्ड यात्रा के संस्मरण सुनाये। उन्होंने कहा कि वह हालैण्ड में जिस व्यक्ति से मिलते थे वह पूछता था कि क्या मैं श्री रामपाल शास्त्री को जानता हूं? यह प्रश्न सुनकर मैं आश्चर्य में पड़ गया था क्योंकि मेरा उनसे परिचय नहीं था। ठाकुर विक्रम सिंह जी ने अपने शब्दों में श्री रामपाल शास्त्री जी को चमत्कारी जीव बताया। उन्होंने श्रोताओं को कहा कि श्री रामपाल शास्त्री जी को स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी का आशीर्वाद प्राप्त है। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर कहा कि हमारे उपदेशकों की कई बार यह अवस्था भी देखी गई है कि उनके पास एक रुपया भी नहीं होता। ठाकुर विक्रम सिंह जी भी आर्यसमाज के वेद के उपदेशक रहे हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने आर्य उप प्रतिनिधि सभा, मुरादाबाद में उपदेशक का काम किया है। मुरादाबाद के चोटीपुरां गुरुकुल में बहिन डा. सुमेधा जी द्वारा किये गये परिश्रम की चर्चा कर उन्होंने उनकी प्रशंसा की। उन्होंने आगे कहा कि स्वामी प्रणवानन्द जी ने अनेक गुरुकुलों को स्थापित व संचालित कर ऋषि दयानन्द का ऋण अदा किया है। उन्होंने बताया कि काशी में काशी शास्त्रार्थ संबंधी महासम्मेलन महाशय धर्मपाल जी के आर्थिक सहयोग से सम्पन्न किया जा सका है। यदि वह सहयोग न करते तो यह सम्मेलन नहीं हो सकता था। विद्वान वक्ता ने कहा कि उनका तन, मन व धन विद्या के प्रचार प्रसार के लिये है। श्री विक्रम सिंह जी ने गाय की चर्चा भी की और उसके दुःखों का मार्मिक शब्दों में वर्णन किया। उन्होंने लोगों को अपने धन को उत्तम व श्रेष्ठ कार्यों में लगाने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि हम लोग यज्ञशाला पर तो 1 से 5 करोड़ रुपया व्यय कर देते हैं परन्तु वहां यज्ञ करने के लिये कोई व्यक्ति नहीं होता। इस स्थिति पर उन्होंने दुःख जताया और सभी यज्ञशालाओं में प्रतिदिन दोनों समय यज्ञ करने की प्रेरणा की। उन्होंने यह भी कहा कि अग्निहोत्र 100 ग्राम घृत से नहीं अपितु कम से कम 500 ग्राम गोघृत से होना चाहिये। ठाकुर विक्रम सिंह जी ने गुरुकुलों को बढ़ाने की प्रेरणा की। इसी से वैदिक धर्म की रक्षा होगी और कठिन व जटिल प्रश्नों का समाधान निकलेगा। कार्यक्रम में दोहा के एशियन खेलों में रजत पदक प्राप्त गुरुकुल के स्नातक श्री दीपक कुमार का सन् 2020 में जापान में आयोजित ओलम्पिक खेलों में चयन के लिये प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उनका भी सम्मान किया गया।

सम्मान समारोह की अध्यक्षता कर रहे स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी ने अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में कहा कि अग्निहोत्र करने से मनुष्य बढ़ता है। उन्होंने कहा कि प्रातः काल का सूरज उदय होकर आकाश में चढ़ता है। स्वामी प्रणवानन्द जी ने मानव सेवा संस्थान के संस्थापक श्री रामपाल शास्त्री जी की ईमानदारी की प्रशंसा की। उन्होंने मानव सेवा संस्थान प्रतिष्ठान को अनेक शुभ कार्यों को करने के लिये बधाई दी। स्वामी जी ने बताया कि श्री रामपाल शास्त्री जी ने अपनी सहधर्मिणी उषा जी को भी अपने सेवा कार्यों में जोड़ रखा है। स्वामी जी ने उनकी भी प्रशंसा की और उन दोनों ऋषिभक्तों को अपना आशीर्वाद दिया। मानव सेवा प्रतिष्ठान के प्रधान श्री चन्द्रदेव शास्त्री ने अपने सम्बोधन में मंच पर उपस्थित अनेक गुरुकुलों की वेद विदुषी आचार्यायों को गार्गी एवं मैत्रेयी की उपमा दी। उन्होंने कहा कि यदि छात्रवृत्ति का प्रचलन न होता तो गुरुकुल कांगड़ी के विद्वतप्रवर आचार्य पं. बुद्धदेव विद्यालंकार जैसे विद्वान न मिलते। आचार्य धनंजय जी ने मानव सेवा प्रतिष्ठान को अपना सम्मान समारोह गुरुकुल पौंधा में आयोजित करने के लिये धन्यवाद दिया। आचार्य जी ने कहा कि हमारा जो सम्मान करता है उसके प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिये। उनसे प्रेरणा लेकर हमें भी उन जैसे कामों को करना चाहिये। आचार्य धनंजय जी ने कर्म-फल सिद्धान्त की चर्चा भी की। उन्होंने गुरुकुल पौंधा के स्नातक श्री दीपक कुमार का उल्लेख कर बताया कि उसने गुरुकुल में अध्ययन करते हुए कठोर परिश्रम करके निशानेबाजी सीखी थी। उनको दोहा के एशियन खेलों में रजत पदक प्राप्त होने से हमारे गुरुकुल के यश में वृद्धि हुई है। उन्होंने बताया कि दीपक कुमार जी का जापान में सन् 2020 में आयोजित ओलम्पिक खेलों में चयन हुआ है। यह हमारे लिये गौरव की बात है। शान्ति पाठ के साथ इस सत्र का समापन किया गया। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

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