प्लास्टिक मुक्त भारत : सरकार की एक अच्छी पहल

आगामी 2 अक्टूबर से भारत सरकार देश में प्लास्टिक से बनी वस्तुओं के विरुद्ध एक जोरदार अभियान आरंभ करने जा रही है । इसके अंतर्गत सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग बंद करने का आवाहन किया जा रहा है । वास्तव में सरकार का यह निर्णय बहुत ही सराहनीय है । भारत जैसे देश में प्रत्येक व्यक्ति प्रतिवर्ष 11 किलो प्लास्टिक की वस्तुओं का उपयोग कर रहा है। यद्यपि विश्व में यह आंकड़ा 28 किलो प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष का है । परंतु भारत की जनसंख्या को देखते हुए यदि यहां का एक व्यक्ति 11 किलो प्रतिवर्ष प्लास्टिक प्रयोग कर रहा है तो इसका अभिप्राय भी यह है कि हम सब अपने मरने की स्वयं ही तैयारी कर रहे हैं ।

हम भारतवासियों के लिए विदेशी लोगों का अंधानुकरण करना बड़ी सहज सी बात है । हम विकृत विदेशी परंपराओं को शीघ्र पकड़ने का प्रयास करते हैं । इसी प्रकार विकृत विदेशी उत्पादों या तकनीक को भी शीघ्र अपनाने का प्रयास करते हैं। हमने अपनी खेती का भारी विनाश केवल इसलिए कर लिया है कि आस्ट्रेलिया जैसे देशों में प्रतिबंधित रासायनिक खादों को हम अपनी खेती में प्रयोग कर रहे हैं । इसी प्रकार अपनी शिक्षा का नाश हमने इसलिए कर लिया है कि अनैतिकता का प्रचार-प्रसार करने वाली पश्चिमी शिक्षा पद्धति हमको रास आती रही है और यही स्थिति बहुत से विदेशी उत्पादों या वस्तुओं को लेकर भी है , जिनमें प्लास्टिक के उत्पादों को प्रमुखता से स्थान दिया जा सकता है ।

हमने अपने अनेकों लोगों को बेरोजगार कर दिया और अब देश में बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़ों पर टीवी चैनल और समाचार पत्रों और अन्य समाचार माध्यमों में हम नित्य प्रति अनेकों लेख पढ़ते रहते हैं । चर्चा होती देखते रहते हैं । परंतु कोई भी यह नहीं सोचता कि इन बेरोजगारों को पैदा करने वाले भी हम ही हैं । मूर्खता हम ने ही की थी जब हमने जूट और कपड़े से बने थैलों को प्रयोग करना बंद कर प्लास्टिक के थैलों का प्रयोग करना आरंभ किया था । हमारी इसी मूर्खता से अनेकों ऐसे हमारे भाई बहन बेरोजगार हो गए थे जो जूट और कपड़ों के थैले को बनाने का कार्य कर रहे थे ।

हमने अपनी सुविधा को प्राथमिकता दी और प्लास्टिक का अधिक से अधिक प्रयोग बढ़ाते चले गए। हमने अपने ही बीच के बेरोजगार होते बहन भाइयों की ओर नहीं देखा । यह बिल्कुल वैसे ही था जैसे हमने अपने देश के वस्त्र निर्माता जुलाहा समाज के लोगों को बेरोजगार किया । बढ़ई , कुम्हार , लोहार आदि को बेरोजगार किया और उनके द्वारा निर्मित वस्तुओं को न लेकर कंपनियों में निर्मित सामानों को लेना आरंभ किया । आज बड़ी फौज हमारे पास बेरोजगारों की है । उसके लिए हमारे पास कोई समाधान नहीं है । जबकि हमारी वर्ण व्यवस्था में सहज रूप से यह व्यवस्था की गई थी कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए काम और रोजगार होना चाहिए । उस ओर हम जाना नहीं चाहते , क्योंकि हमें विदेश की आयातित मूर्खतापूर्ण तकनीक और ज्ञान इसकी अपेक्षा अच्छा लगता है।

प्लास्टिक के अंधाधुंध प्रयोग से हमारे नगरों , कस्बों , गांवों के नाले बंद हो जाते हैं । जिससे बारिश का पानी उस नाले के माध्यम से बाहर न जाकर सड़कों पर भरता है । उससे सड़कें टूटती है , साथ ही घरों में भी पानी भर जाता है । इसके अतिरिक्त नालियों की या नालों की गंदगी भी सड़कों पर आ जाती है । जिससे अन्य बीमारियां फैलती हैं । इतना ही नहीं प्लास्टिक उत्पादों के द्वारा पानी को रोक देने से पानी एक स्थान पर नालियों में सड़ता रहता है । उसमें कितने ही जीव जंतु मरते , सड़ते , गलते हैं । जिनकी दुर्गंध वातावरण को विषाक्त करती है और बीमारियों को आमंत्रण देती है। इस प्रकार प्लास्टिक की वस्तुओं से अभी तक हम देश की अर्थव्यवस्था को अरबों रुपए की क्षति पहुंचा चुके हैं । यह तब हुआ है जब हमारे भीतर राष्ट्रीय चरित्र का ह्रास हुआ है । हमारे भीतर यह भावना लुप्त हुई है कि — मैं भी समाज के लिए उपयोगी बनूँ और जो गलत परंपराएं हैं , उनका निर्वहन न करूँ ।

हमारे पूर्वज रुके हुए पानी में भी कोई गंदी चीज डालने से परहेज करते थे । उसे धर्म के विरुद्ध मानते थे । धर्म के विरुद्ध मानने से उसे पाप माना जाता था। ऐसा कोई भी कार्य जो रूके पानी में सड़न या दुर्गंध उत्पन्न करे , धर्म विरुद्ध होने से समाज विरोधी मानकर पाप माना जाता था । यह कितनी आदर्श व्यवस्था थी ? हमने आधुनिकता और प्रगतिशीलता के नाम पर अपनी इस आदर्श व्यवस्था को लात मार दी । उसका परिणाम आज हम सब सामूहिक रूप से भुगत रहे हैं। अनेकों जानलेवा बीमारियां हमारी इसी मूर्खता के कारण समाज में फैलती जा रही हैं ।

प्रत्येक शहर व कस्बे में रुके हुए या बहते हुए पानी में भी गंदगी डालने से कोई भी व्यक्ति परहेज नहीं करता । जिससे बाह्य जल प्रदूषण ही नहीं , भूगर्भीय जल के भी प्रदूषित होने का संकट देश के सामने आ खड़ा हुआ है। इतना ही नहीं जब प्लास्टिक से बनी यह वस्तुएं नदियों के माध्यम से समुद्र में जाकर पड़ती हैं तो वहां के पानी को भी प्रदूषित करती हैं और समुद्री किनारों पर अनेकों बीमारियों को आमंत्रित करती हैं। समुद्री जीव प्लास्टिक को खाने की भूल कर जाते हैं। यूनेस्को के अनुसार संसार में प्लास्टिक के दुष्प्रभाव से लगभग 10 करोड समुद्री जीव जंतु प्रतिवर्ष मर रहे हैं ।

वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि प्लास्टिक की विघटन प्रक्रिया लगभग 400 वर्ष की है । इतने काल तक सड़ते सड़ते प्लास्टिक की वस्तुएं अनेकों विषैली गैसों को छोड़ती रहती हैं । उन गैसों के दुष्प्रभाव से हमारी भूमि अनुर्वर और अनुपजाऊ होती जा रही है। जिसका प्रभाव निश्चित रूप से मानव जाति पर पड़ना स्वाभाविक है।

हमें यह भी ज्ञात होना चाहिए कि जब प्लास्टिक से किन्ही वस्तुओं को बनाया जाता है तो उसमें बहुत सारे घातक रसायनों का प्रयोग किया जाता है। यह घातक रसायन हमारे लिए प्राण लेवा होते हैं । जब प्लास्टिक को जलाया जाता है तो इसके ये सारे रसायन हवा में फैल जाते हैं और वायु प्रदूषण का कारण बनते हैं । जिससे श्वास , दमा , फेफड़ों आदि की बीमारियां फैलती हैं । प्लास्टिक को जलाए जाने के समय जो धुंआ उत्पन्न होता है उसमें अधिक देर तक सांस ली जाए तो बहुत सारी बीमारियां पैदा हो जाती हैं । मानव अपने पूरे जीवन में सबसे अधिक प्लास्टिक से ही घिरा रहता है और उसी का अधिक प्रयोग कर रहा है । इससे पता चलता है कि हम अपने आप ही मरने की तैयारी कर रहे हैं।

हमारे यहां पर यज्ञ करने की परंपरा प्राचीन काल से रही है । हमारे ऋषि पूर्वजों ने यज्ञ का इसलिए आविष्कार किया था कि इससे पर्यावरण प्रदूषण शुद्ध होता है । साथ ही धूल , धुंआ और ध्वनि तीनों का प्रदूषण भी समाप्त होता है । आज जब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार प्लास्टिक से मुक्त भारत का निर्माण करने के लिए कृतसंकल्प दिखाई दे रही है तब उसे भारत की याज्ञिक परंपरा को पुनर्जीवित करने की दिशा में भी ठोस और सकारात्मक कार्य करना चाहिए । यज्ञ के समय मंत्रों के शुद्ध उच्चारण के लिए अच्छे ब्रह्मचारी और सन्यासी उत्पन्न करने चाहिए । साथ ही महायज्ञ की परंपरा को घर-घर में जीवित करने के लिए भी एक अभियान चलाना चाहिए । भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समय निश्चित रूप से विश्व नेता की भूमिका निभा रहे हैं और सारा संसार उनकी बात को इस समय ध्यानपूर्वक सुन भी रहा है । इस स्थिति का लाभ उठाने के लिए मोदी जी को भारत की याज्ञिक परंपरा को वैश्विक परंपरा बनाने की दिशा में कदम उठाना चाहिए । उनका ‘ स्वच्छता अभियान ‘ पूरे विश्व के लिए ‘स्वच्छता अभियान ‘ बन जाए – यह तभी संभव हो पाएगा जब हम अपनी याज्ञिक परंपरा को वैश्विक परंपरा बनाने में सफल हो जाएंगे । इसके उपरांत भी हम श्री मोदी की प्लास्टिक मुक्त भारत की योजना का स्वागत करते हैं ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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