vishvguru bharat

भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास (खण्ड -01) वे थमे नहीं, हम थके नहीं (अध्याय – 07)

विश्व को विश्वगुरू भारत ने दिया था राष्ट्र का वैज्ञानिक स्वरूप

  • डॉ राकेश कुमार आर्य

पाठक वृंद ! हमारी इतिहास संबंधी यह शोधपरक श्रृंखला पिछले कई वर्ष से निरंतर प्रकाशित होती रही है। जिसे पाठकों की बहुत अधिक प्रशंसा प्राप्त हुई है। इस श्रृंखला में प्रकाशित हुए सभी लेखों को हमने ‘ भारत के 1235 वर्षीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास’ नामक अपनी 6 खंडों की पुस्तकों में प्रकाशित कराया है। जिससे भारत सरकार द्वारा भी पुरस्कृत किया गया है। अब पाठकों की मांग और रुचि के दृष्टिगत इस श्रृंखला को हम फिर से प्रकाशित कर रहे हैं। -संपादक

डा. संपूर्णानंद का कथन है कि-‘विज्ञान के नाम पर अपनी ज्ञान धरोहर को एकदम खारिज कर दिया जाए यह भी अंधविश्वास का ही एक प्रकार है, क्योंकि सही विज्ञान को परीक्षण के अनंतर ही निष्कर्ष निकालता है। अपनी वैदिक परंपरा तो जांच की परंपरा रही है, उसे जांचें और उस जांच में कुछ त्याज्य पायें तो उसे छोड़ दें यह तो समझ में आता है, पर यह कहां की बुद्घिमानी है कि पूरी की पूरी परंपरा को बेकार घोषित कर दें-नये विचारों, नई विकास पद्घतियों के नाम पर।’
पर भारत में तो यही हो रहा है। हमने कहीं आधुनिकता के नाम पर तो कहीं नये विचारों और नयी विकास पद्घतियों के नाम पर अपनी बुद्घिसंगत परंपराओं को भी विस्मृति के गहन गहवर में डाल दिया।

ऐसे कई लोग हैं जो भारत में राष्ट्र की अवधारणा को ही नकारते हैं। इतिहास के समुचित आंकलन के लिए यह आवश्यक है कि वह जिस भूभाग का परीक्षण, अन्वीक्षण और तथ्यात्मक निरीक्षण कर रहा है, उसमें कोई राष्ट्र नाम का वैज्ञानिक तत्व भी निवास करता है या नही।

राष्ट्र एक आध्यात्मिक विचारधारा है

हमारे संस्कृति निर्माताओं ने बड़ी सूक्ष्मताओं से यह तथ्य स्थापित किया कि जैसे एक जीवात्मा का निवास एक शरीर में होता है और परमात्मा का निवास इस विशाल ब्रह्मांड में है, वैसे ही देश एक शरीर है तो राष्ट्र उसकी आत्मा है। देश भौतिक तत्व है, दृश्यमान है, स्थूल है, दीखता है। जबकि राष्ट्र अदृश्य है, सूक्ष्म है, दीखता नही है। देश सभ्यता है, तो राष्ट्र संस्कृति है। देश भौतिक है तो राष्ट्र एक आध्यात्मिक विचार है। देश को आध्यात्मिक विचार से या सांस्कृतिक मूल्यों से ही महान बनाया जा सकता है। भारत कभी विश्वगुरू था तो केवल अपने उत्तुंग राष्ट्रीय आध्यात्मिक भावों के कारण ही था। भौतिक विकास को हमारे यहां इतिहास के लेखन के योग्य नही माना जाता था।
हमने इतिहास में संस्कृति का और धर्म का ऐसा सम्मिश्रण किया कि इतिहास भी संस्कृति का पर्याय बन गया। रामायण, महाभारत, गीता उपनिषद इत्यादि में जब इतिहास देखा जाता है तो इन सांस्कृतिक ग्रंथों का अमृतरस निचोड़ने पर आनंद ही आनंद आता है।

सुर-असुर संग्राम इतिहास की पहेली

हमारा इतिहास लेखन सदा ‘सत्यमेव जयते’ और ‘शस्त्रमेव जयते’ की परंपरा का उद्घोषक रहा है। हम मौलिक रूप से अहिंसा को धर्म का एक अंग स्वीकार करते हैं, परंतु उस धर्म की भी अपनी सीमाएं हैं। भानुप्रताप शुक्ल लिखते हैं -‘कुछ लोग और विशेषकर छद्म सैकूलरिस्ट इस पर प्रश्न करेंगे या कर सकते हैं कि यदि हिंदू लोक जीवन और हिंदुत्व इतना सर्वव्यापक इतना उदार और इतना सर्वसमावेशक है तो बीच-बीच में दूसरे मतों के साथ उसके टकराव और संघर्ष क्यों होते रहते हैं? यह प्रश्न अनुभव जन्य है तो इसका उत्तर भी अनुभव जन्य ही होगा कि यदि कोई किसी संत, ऋषि या आचार्य के आश्रम पर आक्रमण करके उसका यज्ञ ध्वंस करने का प्रयास करे तो वह ऋषि या आचार्य क्या करे? यदि कोई शांति और मानवता की प्रयोगशाला को तोड़ने लगे, तो उसकी रक्षा की जाए कि नहीं? यदि कोई किसी नारी का शीलहरण करता हो, लोक मर्यादा तोड़ रहा हो, शुचिता को नष्टï और पवित्रता को भ्रष्ट कर रहा हो, लूट मार कर रहा हो तो उसे रोका टोका जाए कि नहीं? यदि नही तो अमानुषी प्रवृत्तियां मानुष जीवन को नष्टï कर देती हैं या कर देंगी, तो क्या होता या क्या होगा? यही है सुर असुर संघर्ष और संग्राम का मूल कारण।’

हम इससे आगे बढ़कर कहते हैं कि भारत की सत्यमेव जयते और शस्त्रमेव जायते की इतिहास परंपरा का रहस्य भी यही है। जो इस रहस्य को समझ लेता है वो जान लेता है कि सुरासुर संग्राम सनातन है और इस संघर्ष के प्रति राष्ट्र को या राष्ट्रवासियों को कभी भी प्रमाद का प्रदर्शन नही करना चाहिए। अतिवादियों या आतंक वादियों के प्रति सदा ही शक्ति प्रदर्शन करना उचित होता है। राष्ट्र ऐसे अतिवादियों के प्रति दृढ़ता दिखाने के लिए संकल्पबद्घ होता है, और यह संकल्पबद्घता जैसे एक व्यक्ति का अपने प्रति अत्याचार करने वाले के विरूद्घ एक हथियार है, वैसे ही राष्ट्र का भी एक हथियार है और एक संस्कार भी है।

राष्ट्र एक सजीव शरीर है

इतिहास की गंगोत्री राष्ट्र है। इतिहास की गंगा कहीं भी जाकर विलीन नही होती है अर्थात उसके लिए कोई हुगली जैसा स्थान नही है जहां गंगा समुद्र में जा मिलती है। इतिहास की गंगा तो राष्ट्र के अतीत की गंगोत्री से उठती है, वर्तमान की छाती पर प्रवाहित होती है और अनंत भविष्य के लिए प्रवाहमान रहने का संदेश देती रहती है।

हमारे परमज्ञानी महामानव ऋषियों ने राष्ट्र को एक सजीव शरीर माना था। जैसे शरीर में शरीर, मन, बुद्घि व आत्मा का समन्वय है, वैसे ही राष्ट्र में व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका होती है। व्यवस्थापिका एक शरीर है, कार्यपालिका मन है, और न्यायपालिका बुद्घि है। जैसे शरीर में शरीर मन व बुद्घि से परे आत्मा होती है जो कि चेतन है, वैसे ही राष्ट्र में व्यवस्थापिका कार्यपालिका और न्यायपालिका से ऊपर राष्ट्रपति होता है। वह राष्ट्र का स्वामी भी है और सबसे बड़ा सेवक भी है।
वेद भी त्रयी विद्या-ज्ञान, कर्म और उपासना है। ज्ञान व्यवस्थापिका के सदस्यों के लिए आवश्यक है वह अपने अपने क्षेत्रों के लोगों की मौलिक समस्याओं, राष्ट्र की आवश्यकताओं व अपेक्षाओं से भली प्रकार परिचित होने चाहिएं। इन ज्ञानशील लोगों से उच्चतर स्थिति कर्मशील लोगों की है, जो कि कार्यपालिका में होते हैं। इसके पश्चात उपासना (ईश्वर के समीप आसनस्थ हो जाना) है। मानो ईश्वर की भांति पूर्णत: न्यायशील होकर न्यायपालिका के कार्यों को पूर्ण करना।

भारत ने इसी परंपरा के बल पर प्राचीन काल में उन्नति की थी और विश्व को राष्ट्र की वैज्ञानिक अवधारणा प्रदान की थी। उसी महान खोज ने भारत को सांस्कृतिक रूप से समृद्घ किया और वह ‘विश्वगुरू’ कहलाया था। भारत का यह सांस्कृतिक समृद्घशाली स्वरूप ही उसका सनातन धर्म है। इस प्रकार धर्म और राष्ट्र भी अन्योन्याश्रित हैं। ये दोनों एक दूसरे के बिना जीवित ही नही रह सकते। स्वामी विवेकानंद हों चाहे स्वामी दयानंद हों या योगी अरविंद जिस जिसने भी भारत के सत्य सनातन धर्म के पुनरूस्थान की या भारत के जागरण की बात कही, उस उसने ही भारत के पुन: विश्वगुरू बनाने का संकल्प लिया। इसीलिए योगी अरविंद ने कहा था-मैं इसे आज पुन: कहता हूं….मैं कभी नही कहता कि राष्ट्रीयता एक जाति, पंथ या एक धार्मिक मत है, मैं कहता हूं कि हमारे लिए सनातन धर्म ही राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद है।

वेद का उपदेश है….

येन देवं सवितारं परि देवा अधारयन्।
तेनेमम ब्रह्मïणस्पते परि राष्ट्राय धत्तन।। (अ. 19 /24/1)

इस मंत्र की व्याख्या करते हुए स्वामी वेदानंद तीर्थ जी अपनी पुस्तक ‘स्वाध्याय संदोह’ में लिखते हैं-कोई सज्जन अपना जन-धन राष्ट्र को अर्पण करने की भावना से राष्ट्ररक्षक के पास आया है और कह रहा है कि इमं…..परि राष्ट्राय धत्तन-इसे राष्ट्र के लिए धारण करो।

कई लोगों का विचार है कि वेद में राष्ट्रनिर्माण की कल्पना है ही नही। ऐसा कहने वाले वेद को देखे बिना ऐसा कहते हैं। वेद में राष्ट्रकल्पना और वह अत्यंत उदात्त तथा ऊंचे दर्जे की है। यजुर्वेद के दशम अध्याय के पहले चार मंत्रों में तो मानो राष्ट्र की मुहारनी ही है। यजुर्वेद 22/22 राष्ट्र में क्या क्या होना चाहिए। इसका संक्षिप्त किंतु प्रांजल वर्णन है। अथर्ववेद के 12वें काण्ड का पहला संपूर्ण सूक्त (वर्ग) मातृभूमि विषयक है। ऋग्वेद का 1/80 सूक्त स्वराज्यपरक है। इन मंत्रों में जो विचारतत्व है वे इतने गंभीर और विमलभावों से भरे हैं कि उनके अनुसार आचरण मानव समाज के सभी दुखों को मिटा सकता है। वेद सदा उत्तम राष्ट्र की भावना का प्रचारक है। यथा-सा नो भूमि स्विार्षि बलम राष्ट्रे दूधातूत्तमे (अ. 12/128) वह हमारी भूमि मातृभूमि उत्तम राष्ट्र में कान्ति तथा शक्ति धारण करे। वेद काव्य है अत: कविता की भाषा में उपदेश करता है। देशवासियों के स्थान में भूमि मातृभूमि से कान्ति और शक्ति धारण करने की प्रार्थना की गयी है। उस कान्ति और शक्ति धारण करने का प्रयोजन उत्तम राष्ट्र है। यदि वेद के उत्तम राष्ट्र के निर्माण के संकल्प को अपनाया जाता तो विश्व में पिछले दो हजार वर्षों से सम्प्रदाय के आधार पर जो रक्तिम क्रांतियां या युद्घ हुए हैं वो ना हुए होते। क्योंकि वेद का राष्ट्रवाद शुद्घ सांस्कृतिक है, आध्यात्मिक है। इसीलिए आज तक भी विश्व शांति की सर्वाधिक सुंदर अवधारणा केवल भारत के पास है।

राष्ट्र निर्माण के लिए क्या अपेक्षित है?

यजुर्वेद (22/22) कहता है –
ओउम्। आ ब्रह्मन ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्य: शूर इषव्योअति व्याधि महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढाअनअवानाशु: सप्ति: पुरन्धि योषा जिष्णु : रथेष्ठा: सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न औषधय: पच्यन्तां योग क्षेमो न: कल्पताम्।

यहां बताया गया है कि कोई भी राष्ट्र तभी समृद्घ हो सकता है जब उसमें ब्रह्मïवेता तत्वदर्शी ब्राह्मïण हो, बौद्घिक संपदा के धनी वैज्ञानिक हों, सकल विज्ञानों की शिक्षा देने वाले महाचार्य्य हों। जहां ऐसे विद्वान लोग या वैज्ञानिक नही होंगे वह राष्ट्र अज्ञान के अंधकार में फंसकर अपनी स्वतंत्रता को ही खो बैठेगा। इसीलिए वेद ने राष्ट्र संचालकों से ये अपेक्षा की है कि प्रामाणिक विद्वानों को सदा प्रोत्साहित करना, उन्हें सदा संरक्षण प्रदान करना। इसी से नये नये आविष्कार होंगे और राष्ट्र समृद्घि को प्राप्त करेगा। अतार्किक और विज्ञान विरूद्घ बातें करने वाले लोग हो सकता है कि विद्या व्यसनी हों, परंतु वे कभी भी राष्ट्र निर्माता नही हो सकते। इसी मंत्र में वेद ने ब्रह्मï शक्ति को यदि राष्ट्र निर्माण के लिए अपेक्षित माना है तो राष्ट्र रक्षा के लिए शस्त्रास्त्र व्यवहार में निपुण शत्रु को कंपा देने वाले महारथी और शूरवीर योद्घाओं के होने की बात भी कही है। राष्ट्र सचमुच शास्त्र और शस्त्र के उचित समन्वय से ही समृद्घ बनता है। इसी प्रकर देश में दुधारू गौओं यातायात के साधनों की-घोड़े, बैल इत्यादि की भरमार होने तथा अन्नादि के होने की बात भी कही है। स्पष्टï है कि राष्ट्र में वैश्य वर्ग भी ऐसा होना चाहिए जो संपन्न हो, समृद्घ हो। स्त्रियां बुद्घिमती हों, सारी शिक्षाओं को ग्रहण करने का उनका अधिकार हो, संतान बलशाली हो, अतिवृष्टिï या अनावृष्टिï कभी ना हो। कभी दुर्भिक्ष ना पड़े। सभी को आजीविका कमाने में किसी प्रकार की बाधा ना हो अर्थात शूद्र वर्ण के लोगों की स्वतंत्रता भी निर्बाध हो, समय पर सारी फसलें पकें।

वेद ने कहीं पर भी शूद्र को दास बनाकर रखने की बात नही की है। शूद्र भी संपन्न हो और उसे भी ब्राह्मïण बनने का अधिकार हो, इसके लिए वेद ने राष्ट्र में प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित की है, और योगक्षेमकारी स्वाधीनता के होने की बात की है। योगक्षेमकारी स्वाधीनता की बात को अथवा इसके अर्थ को अथवा रहस्य को विश्व की कोई भी विचारधारा समझ नही पाई, इसलिए मनुष्य ने मनुष्य को ही अपना दास बनाकर रखना चाहा, जिससे दास प्रथा का चलन आरंभ हुआ और अंत में उपनिवेशवादी व्यवस्था विकसित हुई। जिसने विश्व को महायुद्घों में झोंक दिया। तब इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठी तो यूएनओ जैसी विश्व संस्थाओं का जन्म हुआ। परंतु शोषण तो आज भी जीवित है। स्पष्टï है कि पश्चिमी विचारक आज भी योगक्षेम का अर्थ नही समझ पाए हैं। जिन लोगों ने विश्व में समानता और भाईचारे की ऊंची ऊंची डीगें मारी हैं उन्होंने ही विश्व में दास प्रथा को चलाकर असमानता और शोषण को बढ़ावा दिया है। हमने अपना आदर्श वेद खो दिया तो हम भी राह से भटक गये। भविष्य में राह केवल वेद के सन्मार्ग दर्शन से ही मिलेगी।

मिश्रित संस्कृति कभी नही होती

भारत में मिश्रित संस्कृति की बातें करने वाले भी बहुत हैं। ऐसी उधारी मानसिकता से ग्रस्त इन लोगों ने भारत के इतिहास को भी इसी रूप में लिखने का या प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। परंतु मिश्रित संस्कृति की बातें नितांत भ्रामक और मूर्खतापूर्ण है। क्षितीश वेदालंकर जी लिखते हैं :-
भूभाग तो राष्ट्र का शरीर मात्र है, उसकी आत्मा तो है उसकी संस्कृति। ऋषि दृष्टिï में वह संस्कृति है-वैदिक संस्कृति अर्थात वेद पर आधारित संस्कृति। अन्य राष्ट्रचेत्ता व्यक्ति उसे भारतीय संस्कृति या सम्मिश्र कहते हैं। इनके अनुसार इस देश में केवल आर्य संस्कृति नही अनार्य,मुगल और आंग्ल संस्कृतियों का भी घालमेल है, इसलिए केवल वैदिक संस्कृति या वेद की बात करना अनुचित है, पर मैं इससे असहमत हूं।

मेरा तर्क है-गंगोत्री और गोमुख से निकलने के पश्चात गंगा ज्यों ज्यों आगे बढ़ती है त्यों त्यों उसमें अन्य नदी नाले, कारखानों के उच्छेष और तटवर्ती नगरों के मलमूत्र से भरे गंदे नाले भी गिरते चले जाते हैं। कलकत्ता पहुंचकर तो उसका नाम ही बदल जाता है वहां वह हुगली कहाती है। पर प्रदूषण तो प्रदूषण है। रंगरूप स्वच्छता, तासीर और नाम बदल जाने पर भी वह तब तक गंगा ही रहेगी जब तक गंगोत्री का स्रोत अक्षुण्ण है। इस लिए जिसे हम सम्मिश्र संस्कृति कहते हैं, वह तो प्रदूषण की परिचायक है। असली संस्कृति तो वैदिक संस्कृति है, वही इस भूखण्ड में चैतन्य भरती है।

संस्कृति कहती है कि एक दूसरे के अधिकारों का स्वेच्छया सम्मान करो और चार्तुवर्ण मिलकर राष्ट्र का निर्माण करो। संस्कृति में किसी का तुष्टिïकरण नही है , अपितु सबके अधिकारों का पुष्टिïकरण है, इसलिए राष्ट्र तुष्टिïकरण से दुर्बल होता है और पुष्टिïकरण से सबल होता है। इसी प्रकार संस्कृति में किसी के लिए आरक्षण नही है अपितु सबके लिए समान संरक्षण है। राष्ट्र आरक्षण से दुर्बल और संरक्षण से सबल होता है। सम्मिश्र संस्कृति ने राष्ट्र की चादर को तुष्टिïकरण और आरक्षण के नाम पर टुकड़े टुकड़े कर दिया है, जिससे राष्ट्र दिन प्रतिदिन दुर्बल होता जा रहा है।

जैसे मेरा हाथ मैं नही हूं, मेरा कान मै नही हूं, मेरी आंख मैं नही हूं वैसे ही आरक्षण और तुष्टिïकरण के लिए लड़ रहे विभिन्न सम्प्रदाय राष्ट्र नही होते। राष्ट्र तो हमारी सामूहिक सदिच्छा और सामूहिक अंतश्चेतना का नाम है, जो हमें एक दूसरे के अधिकारों का स्वभावत: सम्मान करने हेतु प्रेरित और बाध्य करती है। दूसरे के अधिकारों को छीनने के लिए आतुर कोई भी इच्छा या चेतना कभी सामूहिक नही हो सकती। हां, वह वर्गीय अथवा अवश्य साम्प्रदायिक हो सकती है। इसलिए जो लोग सामूहिक सदिच्छा को या सामूहिक अन्तश्चेतना को उपेक्षित ओढ़कर अपने अपने अधिकारों के लिए लड़ते झगड़ते हैं और राष्ट्र की मुख्यधारा को बाधित करते हैं वो राष्ट्र्र प्रेमी ना होकर राष्ट्रघाती या आतंकी होते हैं।

क्रमशः

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
ikimisli giriş
grandpashabet giriş
bonus veren siteler
grandpashabet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
betlike giriş
betlike giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
betparibu giriş
restbet giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
betlike giriş
betmarino giriş
betmarino giriş
betmarino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş