विदेशों में भारतीय गिरमिटियों द्वारा विकसित हिन्दी एवं संस्कृति

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दस जनवरी ‘विश्व हिन्दी दिवस’ पर विशेष 

हमारे प्रिय पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी जी ने कभी कहा था, हम भारतीय विश्व में जहाँ भी जाते हैं, अपने साथ एक छोटा सा भारत लेकर जाते हैं। इस गर्वोक्त करने वाली पंक्ति में एक अर्थ यह भी निहित ही है कि, हमारे हृदय में बसा हुआ यह भारत ही हमें विभिन्न विदेशी समाजों के दूध में शक्कर की भाँति घुलने की चिर प्रवृत्ति भी देता है। भारत के हिन्दी भाषी ग्रामीण क्षेत्रों से इन देशों में गए हुए ये गिरमिटिये अपने साथ अपनी कपड़ों की गठरी में श्रीरामचरितमानस, हनुमान चालीसा, सत्यनारायण की कथा, देवी-देवताओं के चित्र मंगलसूत्र, सिंदूर-टिकुली, पाजेब, करधनी, (भले ही वह चाँदी की नहीं बल्कि गोटे की बनी हुई हो) तीज-त्योहार में उपयोग आने वाला सामान आदि सभी कुछ साथ रख लेते थे।

गिरमिटिया मजदूर, अनुबंधित या ठेका मजदूर होता तो कुछ और बात थी, वस्तुतः तो ये गुलाम ही हुआ करते थे। ‘इंडेंचर्ड लेबर’ या गिरमिटिया मजदूर जिन्हें अंग्रेजों ने कभी ‘गोल्डन लैंड’ का मनमोहक स्वप्न दिखाकर, तो कभी डरा-धमकाकर, भयभीत करके, कोर्ट कचहरी, भूमि जब्त कर लेने की धमकी देकर जबरन अपने गुलाम देशों में श्रमिक के रूप में भेजा। इस प्रकार गए हुए ऐसे भारतीय मजदूर जो उन कथित ‘गोल्डन लैंड्स’ में जाकर जीवन अपने देश लौटने का किराया भी नहीं जुटा पाये और बेबस होकर वहीं मर-खप गए। गुयाना, त्रिनिदाद और टोबैगो, सूरीनाम, जमैका, फिजी, मॉरीशस, मलेशिया, फिजी, दक्षिण अफ्रीका के युगांडा, केन्या, तंजानिया जैसे कुछ अन्य देशों में आज इन्हीं भारतीय गिरमिटियों के वंशज अपने श्रम, लगन, ध्यान, देशप्रेम, से भारतीय संस्कृति की ध्वजा फहरा रहें हैं। हमें बड़ा गौरव भान होता है कि इन देशों में ये कभी दीन-हीन रहे ये भारतीय गिरमिटिया मजदूर कितने ही अभावों में रहें हों, कितनी ही भूख से मर-मर गयें हों किंतु अपराधी नहीं बने। गिरमिटिया मजदूरों के वंशजों ने इन देशों में अपने श्रम से अपनी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, नैतिक, राजनैतिक आधारपीठ का निर्माण कर लिया है। उपरोक्त सभी देशों में गए हुए भारतीय गिरमिटिए, वहाँ समरस हो गए हैं। अलगाव या देशविरोधी भाव तो इन्हें छू भी नहीं गया है।

तथाकथित सभ्य अंग्रेजों ने ज्ञात रूप से 1.2 मिलियन और अज्ञात रूप से, न जाने कितने लाख विवश-बेबस भारतीयों को अपने उन्नीस ग़ुलाम देशों में जबरन भेज दिया था। यह मानवता के प्रति कथित ‘जेंटलमैन अंग्रेजों’ का अपराध था। 1917 में बड़े विरोध के बाद ब्रिटिशर्स ने इस अपराध श्रृंखला को रोका था, तब तक लाखों भारतीय परिवार हजारों किमी दूर उन अंग्रेजी कालोनियों से स्वदेश लौटने हेतु तड़प रहे थे।

हमें गर्व है कि निपट अशिक्षित (अंग्रेजी प्रपंची शिक्षा से), विपन्न, साधनहीन भारतीय गिरमिटिया मजदूरों के वंशज, अपनी सामाजिकता के बल पर इन देशों में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मंत्री, गवर्नर, प्रशासक, न्यायाधीश, उद्योगपति, बिजनेस टायकून, कंपनी कार्पोरेटर, साहित्यकार, एकेमेडिशियन्स, प्रेरक संत आदि-आदि के रूप में अपनी छटा बिखेर रहे हैं। हजारों किमी दूर के इन देशों में जहाँ कभी भारतीयता का नाम भी नहीं था वहाँ प्रतिवर्ष सभी भारतीय उत्सव बड़े ही उल्लास व उत्साहपूर्वक मनाये जाते हैं। सबसे बड़ी बात, इन सभी देशों में ‘भारतीय आगमन दिवस’ का आयोजन भी होता है जिसमें उन देशों के सत्ताधीश, राजनयिक, आर्थिक हस्तियां, साहित्यकार, धर्मगुरु आदि उपस्थित रहते हैं।

प्रमुखतः उत्तरप्रदेश, बिहार के ग्रामीण अंचलों से ले जाये गए ये गिरमिटिये अपने साथ अपनी लोक संस्कृति भी ले गए थे। कितने सांस्कृतिक आग्रह, कितने देशज प्रण, कितनी जिजीविषा और कितनी जीवटता रही होगी इन गिरमिटियों में कि गुलामी भरे जीवन में भोजन के स्थान पर अंग्रेजों के कोड़े खाते हुए भी ये इन देशों में अपनी संस्कृति को नहीं भूले हैं। अपने लोकगीत, लोकनृत्य, लोकभाषा, रामचरितमानस, पहनावे, बोली आदि को ये आज लगभग दो सौ वर्षों बाद भी जीवंत बनाए हुए हैं। इन देशों में धान, तमाखू और गन्ने की बुआई-कटाई-दराई करते समय, वैवाहिक प्रसंगों में, त्यौहारों में गाये जाने वाले गीत और कथाएँ आज भी गूँजती रहतीं हैं। घोर आश्चर्य होता है यह जानकर की कि एक विपन्न, प्रताड़ित, उत्पीड़ित भारतीय गिरमिटिया समाज यह सब करने में सफल हो पाया है। गुलामी भी ऐसी थी कि ये विवाह करेंगे या नहीं, करेंगे तो कब करेंगे, विवाह के बाद संतान को जन्म देंगे या नहीं; ये सभी कुछ अंग्रेज ही तय किया करते थे। अंग्रेजों की अनुमति के बिना गर्भधारण करना भी जहाँ अपराध हो वहाँ के उत्पीड़न की स्थिति को सरलता से समझा जा सकता है।

बनारसीदास चतुर्वेदी, गिरिराज जी किशोर के मानक गिरमिटिया साहित्य का तो अपना ही एक उच्च स्थान है ही। गिरमिटियों की व्यथा को व्यक्त करते हुए ही मॉरिशस के लेखक अभिमन्यु अनत ने अपनी ‘लाल पसीना’ में लिखा – ‘‘जिस दिन गोरे सरदारों की ड्यूटी बदली जाती केवल उस दिन ही सारे भारतीय मजदूर खुलकर बातें कर पाते थे।” मॉरिशस के मुनीश्वरलाल चिंतामणि लिखते हैं – “उस आदमी से जाकर कहो कि मेरी हिंदी भाषा ऐसी सुंदर है कि उसने मेरी संस्कृति को अब भी बचाये रखा है।”

बाद में हमारी हिन्दी ने इन देशों की स्थानीय भाषाओं के साथ एक नए प्रकार की बोली, भाषा व रचनाओं का सुंदर नव संसार रचा। इन देशों में बसे हुए उत्तरप्रदेशी, मगही, बिहारी, मैथिली, भोजपुरी बंधु आज भी अपनी भाषा में साहित्य रचते हैं व बोलचाल में प्रासंगिक बनाए हुए हैं। साहित्यकार दीपचंद बिहारी, रामदेव धुरंधर, वेणी माधव, रामखेलावन, भानुमति राजदान, पुजानंद नेमा, केशवदत्त चिंतामणि और राज हीरामन, अभिमन्यु अनत आदि ने गिरमिटिया साहित्य का एक दिव्य संसार रचा है। मॉरिशस के लोकप्रिय रचनाकार अभिमन्यु अनत गिरमिट भोजपुरिया गर्वोक्त होकर कहते हैं – “हम भोजपुरी जानी ला, बोली ला, बूझी ला, त अंग्रेजी में काहे के गिटर-पिटर करी |” आज भी गिरमिटिये बंधु अपने देशज लोकगायन में विरह-गीत, बारह-मासा गीत, ऋतु-गीत, पर्व-त्यौहार गीत मौके-बेमौके गाते-गुनगुनाते रहते हैं। ऐसा ही एक गीत है –

“हमरा से दिलवा तोर के विदेशवा गईल ये राजा जी।
विदेशवा गईल ये राजाजी, निर्मोहिया भईल ये राजाजी।।”

इन पूर्व अंग्रेज औपनिवेशिक देशों में हिन्दी भाषा के संदर्भ में लिखते हुए सोमदत्त बखोरी लिखते हैं –

“भाषा की लड़ाई में ऊँचा किया नाम
अपना और देश का ऊँचा किया नाम अपने पूर्वजों का और उनके देश का”।

इस गिरमिटिया साहित्य के क्रम में ही रघुवीर नारायण ने यह कालजयी बटोहिया लिखा-

सुंदर सुदूर भूमि भारत के देसवा रे,
मोरे प्रान बसे हिमखोह रे बटोहिया,
जाउ जाउ भैया बटोहिया हद देखि आउ,
जहां रिसी चारों वेद गावे रे बटोहिया।

अभिमन्यु अनत लिखते हैं –

आज अचानक हिंद महासागर की लहरों से तैरकर आई
गंगा की स्वर-लहरी को सुन
फिर याद आ गया मुझे
वह काला इतिहास
उसका बिसारा हुआ
वह अनजान अप्रवासी…
बहा-बहाकर लाल पसीना
वह पहला गिरमिटिया इस माटी का बेटा
जो मेरा भी अपना था, तेरा भी अपना।

गिरमिटिया साहित्य के उल्लेख तोताराम सनाढ्य का नाम तो परमावश्यक है। तोताराम जी ने इक्कीस वर्षों पश्चात् फिजी के गिरमिटिया जीवन से मुक्ति होकर, भारत लौटने पर इस अंग्रेजों के इस अत्याचारी काले अध्याय से समूचे भारत को परिचित कराया। उनके लेखन से ही अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संघर्ष में एक अध्याय ‘गिरिमिटिया प्रथा समाप्ति’ जुड़ गया था। जितेंद्र कुमार मित्तल की ‘मॉरिशस देश और निवासी’, मुनिश्वर लाल चिंतामणि की पुस्तक ‘मॉरिशसीय हिंदी’, जोगिंदर सिंह कँवल की पुस्तक ‘सात समुंदर पार’, कृष्णलाल बिहारी की पुस्तक ‘पहला कदम’ भी गिरमिटिया संदर्भ में परिपूर्ण साहित्य है।

विश्व हिन्दी दिवस पर गिरमिटिया साहित्य का उल्लेख केवल साहित्य का नहीं अपितु स्वमेव ही मानवीयता का उल्लेख हो जाता है।

– प्रवीण गुगनानी

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