ईश्वर की सत्ता तर्क और निष्कर्ष

images-39

*
वेद ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखते हुए आस्तिकता का प्रचार करता है । परन्तु संसार में कुछ नास्तिक लोग हैं जो ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करते ।
“न तं विदाथ य इमा, जजानाऽन्यद्युष्माकमन्तरं बभूव ।
नीहारेण प्रावृता जल्प्या चाऽसुतृप उक्थशासश्चयन्ति ।।”
(ऋ० १०/८२/७)
तुम उसको नहीं जानते जो इन सबको उत्पन्न करता है । तुम्हारा अन्तर्यामी तुमसे भिन्न है । परन्तु मनुष्य अज्ञान से ढके हुए होने के कारण वृथा जल्प करते हैं, और बकवादी प्राण-मात्र की तृप्ति में लगे रहते हैं ।
प्रथम, हम तर्क और सृष्टि-क्रम के आधार पर ईश्वर की सत्ता को सिद्ध करने का प्रयत्न करेगें ।
संसार और संसार के जितने पदार्थ हैं, वे परमाणुओं के संयोग से बने हैं, इस तथ्य को नास्तिक भी स्वीकार करता है । ये परमाणु संयुक्त कैसे हुए ? नास्तिक कहता है कि ये परमाणु अपने-आप संयुक्त हुए । परन्तु परमाणुओं का संयोग अपने-आप नहीं हो सकता । संयोग करने वाली इस शक्ति का ही नाम परमात्मा है ।
जैसे सृष्टि और सृष्टि के पदार्थों के निर्माण के लिए परमाणुओं का संयोग होता है, वैसे ही वियोग भी होता है । परमाणुओं का यह वियोग अपने-आप नहीं होता । इन परमाणुओं के वियोग करने वाला भी परमात्मा ही है ।
जड़ और बुद्धिशून्य परमाणुओं में अपने-आप संयोग अथवा वियोग कैसे हो हो सकता है ? इन जड़ परमाणुओं में इतना विवेक कैसे उत्पन्न हुआ कि उन्होंने अपने-आप को विभिन्न पदार्थों में परिवर्तित कर लिया ?
यदि यह कहा जाए कि प्रकृति के नियमों एवं सिद्धान्तों से ही संसार की रचना हो जाती है, तो प्रश्न यह है कि जड़ प्रकृति में नियम और सिद्धान्त किसने लागू किये ? नियमों के पीछे कोई-न-कोई नियामक तो होता है । इन नियमों और सिद्धान्तों के स्थापित करने वाली सत्ता का ही नाम परमेश्वर है ।
संसार की वस्तुएँ एक-दूसरे की पूरक हैं । उदाहरणार्थ―हम दूषित वायु छोड़ते हैं, वह पौधों और वृक्षों के काम आती है, और पौधे एवं वृक्ष जिस वायु को छोड़ते हैं वह मनुष्यों के काम आती है । इस प्रक्रिया के कारण संसार नष्ट होने से बच जाता है ।
किसने वस्तुओं का यह पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित किया है ? वस्तुओं के पारस्परिक सम्बन्ध को स्थापित करने वाली शक्ति का नाम ही ईश्वर है ।
विज्ञान और आस्तिकता में कोई विरोध नहीं । विज्ञान जिन नियमों की खोज करता है, उन नियमों को स्थापित करने वाली ज्ञानवान सत्ता का नाम ही तो ईश्वर है ।
यदि विकास के कारण ही सृष्टि-रचना को माना जाये तो विकास का कारण कौन है ?
डार्विन के पितृ-नियम, अर्थात् एक वस्तु से उसी के समान वस्तु का उत्पन्न होना, परिवर्तन का नियम अर्थात् उपयोग तथा अनुपयोग के कारण वस्तुओं में परिवर्तन, अधिक उत्पत्ति का नियम और योग्यतम की विजय यदि इन चारों नियमों को भी सत्य माना जाये, तो प्रश्न यह है कि नियमों को स्थापित करने वाला कौन है ?
वैज्ञानिक, धातुओं का आविष्कार तो करता है, परन्तु उनका निर्माण नहीं करता । उनका निर्माण करने वाली कोई और शक्ति है, जिसे परमात्मा कहते हैं ।
इसी प्रकार वैज्ञानिक, सृष्टि में विद्यमान नियमों की खोज करता है, वह नियमों का निर्माता नहीं है । इन नियमों का निर्माता एवं स्थापितकर्त्ता परमात्मा है ।
संसार में सोना, चाँदी, लोहा, सीसा, कांस्य, पीतल आदि अनेक धातुएँ पाई जाती है । हीरे, मोती आदि अनेक बहुमूल्य रत्न पाए जाते हैं | ये सब ईश्वर के द्वारा बनाये गये हैं, किसी मनुष्य के द्वारा नहीं बनाये गये ।
इस ब्रह्माण्ड की असीम वायु, अनन्त जल, पृथिवी, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र ये सब किसी महान सत्ता का परिचय दे रहे हैं ।
आस्तिक इसी महान् सत्ता को ईश्वर के नाम से पुकारता है ।
फल-फूल, वनस्पतियों और ओषधियों के संसार को देखकर भी मनुष्य को बहुत आश्चर्य होता है । गुलाब के पौधे वा नीम की पत्तियाँ देखने में कितनी सुन्दर लगती है । उनके किनारे बिना मशीन के एक-जैसे कटे होते हैं । गुलाब के फूल में सुन्दर रंग, मधुर मोहक सुगन्ध और उसके अन्दर इत्र का प्रवेश, ये किसी बुद्धिमान् कारीगर की कारीगरी को दिखा रहे हैं ।
अनार की अद्भुत रचना देखिये । ऊपर कठोर छिलका, छिलके के अन्दर झिल्ली, झिल्ली के अन्दर दानों का एक निश्चित क्रम में फँसा होना, दानों में सुमधुर रस का भरा होना, उन रसभरे दानों में छोटी-सी गुठली और गुठली में सम्पूर्ण वृक्ष को उत्पन्न करने की शक्ति ।
वट का विशाल वृक्ष और सरसों के बीज में एक विशाल वृक्ष का समाविष्ट होना, ये सब उस अद्भुत रचयिता को ही सिद्ध करते हैं ।
चींटी से लेकर हाथी तक जीव-जन्तुओं की शरीर-रचना, वन्य-जन्तुओं के आकार और विभिन्न पक्षियों और कीट-पतंगों की रचना ये सब किसके कारण है ? क्या जड़ प्रकृति में इतनी सूझ-बूझ है कि वह विभिन्न आकृतियों का सृजन कर दे ? ये विभिन्न शरीर-रचनाएँ परमपिता परमात्मा की ओर संकेत कर रही है ।
इस समय धरती पर पाँच अरब मनुष्य निवास करते हैं । सृष्टि के रचयिता की अद्भुत कारीगरी देखिये कि एक मनुष्य की आकृति दूसरे मनुष्य से नहीं मिलती है ।
इस संसार की विशालता भी आश्चर्यकारी है । ऐसा कहते हैं कि पृथ्वी की परिधि २५ हजार मील है । पाँच-छ: फुट लम्बे शरीरवाले मनुष्य के लिए यह परिधि आश्चर्यजनक है ।
पर्वत की विशालता भी कुछ कम आश्चर्यकारी नहीं, पत्थरों की एक विशाल राशि, जिसके आगे मनुष्य तुच्छ प्रतीत होता है । समुद्र की विशालता को लीजिये । कितनी अथाह-जलराशि होती है ।
सूर्य पृथिवी से १३ लाख गुणा बड़ा है । पृथिवी की परिधि आश्चर्यकारी है, परन्तु पृथिवी से १३ लाख गुणा बड़ा सूर्य विशालता की दृष्टि से क्या कम विस्मयकारी है ? और फिर सूर्य के समान ब्रहाण्ड में करोड़ों सूर्य हैं । क्या यह संसार किसी अद्भुत रचयिता की ओर संकेत नहीं कर रहा है ?
जहाँ संसार की विशालता आश्चर्यकारी है, वहाँ सृष्टि की सूक्ष्मता भी कम विस्मयकारी नहीं । बड़े-से-बड़े हाथी को देखकर जहाँ आश्चर्य होता है, वहाँ चींटी-जैसे सूक्ष्म प्राणियों को देखकर भी विस्मय होता है । संसार की यह सूक्ष्मता भी किसी रचयिता की ओर संकेत कर रही है ।
कुछ लोग कहते हैं कि यह संसार अकस्मात बना है । कोई भी घटना पूर्व-परामर्श अथवा पूर्व-प्रबन्ध के बिना नहीं होती है ।
किसी स्थान पर दो मनुष्यों का अकस्मात मिलन उनकी इच्छा-शक्ति से प्रेरित होकर किसी उद्देश्य के लिए घर से निकलने का परिणाम है ।
अकस्मात वाद का आश्रय लेकर यदि कोई कहे कि देवनागरी के अक्षरों को उछालते रहने से ‘रामचरित मानस’ की रचना हो जायेगी तो उनकी यह कल्पना असम्भव है । ‘रामचरित मानस’ की रचना के पीछे किसी ज्ञानवान चेतन सत्ता की आवश्यकता है ।
कुछ लोग कहते हैं कि संसार का बनाने वाला कोई नहीं । जो कुछ बनता है, वह प्रकृति से बनता है । प्रश्न यह है कि प्रकृति किसे कहते हैं ? यदि प्रकृति का अर्थ सृष्टिनियमों से है तो सृष्टियों का कोई नियामक चाहिये । कुदरत अरबी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ है ‘सामर्थ्य’ । सामर्थ्य, बिना सामर्थ्यवान के टिक नहीं सकता । सामर्थ्यवान् कोई चेतन सत्ता ही हो सकती है ।
स्वभाववादी, स्वभाव से ही संसार को बना हुआ मानते हैं । परन्तु तथ्य यह है कि यदि परमाणुओं में मिलने का स्वभाव होगा तो वे अलग नहीं होंगे, सदा मिले रहेगें । यदि अलग रहने का स्वभाव है तो परमाणु मिलेंगे नहीं, सृष्टि-रचना नहीं हो पायेगी । यदि मिलने वाले परमाणुओं की प्रबलता होगी तो वे सृष्टि को कभी बिगड़ने नहीं देगें । यदि अलग-अलग रहने वाले परमाणुओं की प्रबलता होगी तो सृष्टि कभी नहीं बन पायेगी । यदि बराबर होंगे तो सृष्टि न बन पायेगी, न बिगड़ेगी ।
जैनी ऐसी शंका करते हैं कि ईश्वर तो क्रियाशून्य है, अत: वह जगत को नहीं बना सकता । वे इस यथार्थ को भूल जाते हैं कि क्रिया की आवश्यकता एकदेशीय कर्त्ता को पड़़ती है । जो परमात्मा सर्वदेशी है, उसे क्रिया की आवश्यकता ही नहीं होती । वह सर्वव्यापक होने से ही संसार की रचना करने में समर्थ होता है | जैसे शरीर में आत्मा के स्थित होने के कारण शरीर सब प्रकार की चेष्टाएँ करता है ।
जब परमात्मा आनन्दस्वरुप है, तो वह आनन्द छोड़ जगत के प्रपंच में क्यों फँसता है ? यह बात निर्मूल है क्योंकि, प्रपंच में फँसने की बात एकदेशी पर लागू होती है, सर्वदेशी पर नहीं ।
(“वैदिक धर्म का स्वरुप” पुस्तक से, लेखक- प्रा० रामविचार”)

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
meritking giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
norabahis giriş
pokerklas giriş
pokerklas giriş
meybet
meybet
hititbet giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino
vdcasino
meritbet giriş
meritbet giriş
vaycasino giriş
piabellacasino giriş
piabellacasino giriş
norabahis giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
pokerklas
pokerklas
norabahis giriş
vdcasino
vdcasino
pokerklas
pokerklas
hititbet giriş
Pokerklas giriş
pokerklas
pokerklas
hititbet
hititbet
betnano giriş
betasus giriş
pokerklas
pokerklas giriş
betpark giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betpark giriş
betorder
betorder
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
hititbet
timebet
timebet
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vdcasino giriş
pokerklas giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpas giriş
betpas giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
norabahis giriş
norabahis
norabahis giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betpark
betpark
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
meybet
meybet
vdcasino
vdcasino
extrabet giriş
extrabet giriş
extrabet giriş
extrabet giriş
meybet
meybet
betcio giriş
betcio giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
timebet
norabahis giriş
norabahis giriş
meybet
meybet
harbiwin giriş
harbiwin giriş
betnano giriş
interbahis giriş
interbahis giriş
norabahis giriş
norabahis
favorisen giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
meybet