बाजार में खड़ा हूं। एक चित्रकार की दुकान है। एक चित्र पर मेरी दृष्टिï बरबस जम गयी। मैंने पूछा यह चित्र किसका है? तो दुकानदार मुस्कराया और बोला क्या आप यह भी नही जानते? यह शंकर का चित्र है। इन्हें सारी दुनिया जानती है। मैंने दुकानदार से पूछा-अरे भोले भाई शंकर कहते किसे हैं? वह बोला आप कैसी बातें करते हैं ये तो हमारे आराध्य देव हैं। मैंने कहा कि मैं भी ऐसे व्यक्ति की पूजा करूंगा किंतु पहले मेरी शंकाएं दूर करो। इसके मस्तिष्क पर गंगा क्यों है? इसका गला नीला क्यों है? इसके हाथ में त्रिशंकु क्यों है? और हाथ में डमरू क्यों है? इसके गले में नागराज क्यों है? वह चित्रकार (दुकानदार) जिसने वह शंकर का चित्र बनाया था अपनी ही कृति के संबंध में उठे प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाया। आखिर निरूत्तर हो गया। दुकानदार जैसे बहुत व्यक्ति हैं जिन्हें शंकर का अर्थ पता नहीं है। उसके चित्र में जो विभिन्न प्रतीक हैं उनके बारे में भी बहुत कम लोग जानते हैं। आओ इन पर विचार करें। कवियों और लेखकों ने अपने अपने ढंग से इनका बड़ा सुंदर और मर्मस्पर्शी वर्णन किया है। सबसे पहले इस बात का विचार करें कि शंकर कहते किसे हैं? शंकर वह है जो परिवार में, राष्टï्र में संसार में शांति लाए, समृद्घि लाये। वह उस परिवार का, राष्टï्र का और यहां तक कि समस्त संसार का शंकर होता है। बशर्ते कि उसकी व्यवस्था ऐसी हो जो परिवार, राष्टï्र और संसार में सुख शांति की वर्षा करे। ऐसा व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में शंकर है। पहला प्रतीक है उसकी जटाओं में बहने वाली गंगा। जिसे लेकर समाज में बहुत सी भ्रांतियां हैं। किवदंती है कि शंकर की जटाओं से गंगा निकली है। यह मात्र कल्पना है वास्तव में ऐसा नहीं है। उसकी जटाओं में गंगा का प्रवाहित होना इस बात का प्रतीक है कि वही व्यक्ति शंकर हो सकता है जिसके मस्तिष्क में ज्ञान की गंगा बहती हो। जिस प्रकार गंगा का पानी निर्मल और पवित्र है उसी प्रकार उसके मस्तिष्क में उपजे ज्ञान से प्रदत्त व्यवस्था निर्मल हो पवित्र हो उसमें अन्याय अथवा पक्षपात का धब्बा कहीं नहीं हो। जिस प्रकार गंगा का जल अपना ऊंचा स्थान छोडक़र नीचे खड्डे में गिरने में संकोच नहंी करता यह उसकी बलिदान की भावना को दर्शाता है यही गुण उस व्यक्ति में होना चाहिए जो शंकर बनना चाहता है। साथ ही यह शंकर गंगा का जल अपनी मूक भाषा में कहता है कि गंगा का जल जब तक आगे नहंी चलता तब तक वह खड्डे के जल स्तर को अपने समान नहीं कर लेता। अर्थात उसकी व्यवस्था में समानता होनी चाहिए ऊंच नीच, अपना पराया, जाति, धर्म क्षेत्र नहीं होना चाहिए। इससे बड़ा समाज वाद का उदाहरण कोई हो नहीं सकता।
वैसे तो भारतवर्ष में बहुत सी नदियां बहती हैं किंतु शंकर की जटाओं में गंगा को ही प्रतीक क्यों चुना? इसका भी एक विशेष कारण है। यह शंकर की सहिष्णुता का परिचायक है क्योंकि जितने नदी, नाले गंगा में पड़ते हैं इतने और किसी नदी में नहीं पड़ते। वह किसी से मुख नहीं मोड़ती अपितु सबको साथ लेकर अपने गले से लगाकर समुद्र में समाहित हो जाती है। वास्तव में शंकर की जटाओं में बहने वाली गंगा जिन दिव्य गुणों की प्रतीक है उन्हीं के कारण शंकर का व्यक्तित्व अद्वितीय है। अभिनंदनीय है और वंदनीय है।
दूसरा प्रतीक है चंद्रमा। जो शीतलता का परिचायक है। अर्थात शंकर उसे कहते हैं जिसे के मस्तिष्क में प्रेम, सहयोग, स्नेह, सहचर्य, दय, करूणा और उदारता के शीतल भाव हों अपने क्रोध की उष्णता को चंद्रमा की तरह शीतल बना दे। फूलों में सुगंध और औषधियों में रस चंद्रमा ही पैदा करता है। अत: ऐसा व्यक्ति ही शंकर हो सकता है, जिसके मस्तिष्क में चंद्रमा जैसी शीतलता और प्रत्येक हृदय को सरस और सुगंधित करने की क्षमता हो।
तीसरा नेत्र प्रतीक है विवेक का। आगे बढऩे से पहले यह बताना आवश्यक होगा कि विवेक और ज्ञान में क्या अंतर है। ज्ञान अर्जित होता है जबकि विवेक स्वचिंतन से उत्पन्न होता है। जैसे टाइप सीखना मात्र ज्ञान है। किंतु टाइप मशीन जिसने बनायी यह उस व्यक्ति का विवेक है। ठीक इसी प्रकार समस्या अथवा परिस्थिति को ज्ञान लेना मात्र ज्ञान है किंतु उसकी गहराई में जाकर देखना और निदान करना यह केवल तीसरा नेत्र (विवेक) ही कर सकता है। अत: शंकर का तीसरा नेत्र मानव को सूक्ष्मदर्शी व दूरदर्शी होने की प्रेरणा देता है।
नीलकंठ भी शंकर को कहा गया जो प्रतीक है तिरस्कार का अपमान और उपेक्षा की कड़वाहट के विष का। दूसरे शब्दों में इस बात को हम इस प्रकार कह सकते हैं जो व्यक्ति अपने परिवार की कड़वाहट को पीकर जीता है वह उस परिवार का शंकर है और जो व्यक्ति समाज, राष्टï्र तथा संसार की कड़वाहट को पीकर जीता है वह उस समाज, राष्टï्र और संसार का शंकर होता है। जैसे रोम में सुकरात ने सच्चाई के लिए जहर पीया किंतु अपने मार्ग से विचलित नहीं हुआ। सुकरात संसार का पहला व्यक्ति था जिसने यह कहा था कि पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ चक्कर लगाती है जबकि तत्कालीन पोप कहते थे कि सूर्य पृथ्वी के चारों तरफ चक्कर लगाता है। सुकरात की बात को धर्म के ठेकेदार पोपों ने इसे धर्म के विरूद्घ खुला विद्रोह बताया उसे जेल में डाल दिया गया एक बार नहीं अनेक बार उससे पूछा गया कि यदि तुम अपनी बात से पीछे हट जाओ तो तुम्हें रिहा किया जा सकता है यहां तक कि उसके शिष्य प्लेटो ने भी आग्रह किया किंतु सुकरात ने अपने शिष्य से पूछा अरे प्लेटो यदि मैं बच भी जाऊं तो क्या फिर मरना नहीं पड़ेगा। उसके शिष्य ने उत्तर दिया गुरूवर मरना तो फिर भी पड़ेगा परंतु……सुकरात ने हंसकर कहा वत्स! बीच में परंतु क्यों लगाता है यदि मुझे मरना ही है तो सच के लिए मरने दें। यह कहकर हंसते हंसते जहर का वह प्याला ले लिया जो राजा ने सुकरात के लिए भेजा था। शाश्वत सत्य के लिए वह महान आत्मा सुकरात अपना बलिदान दे गया। मौत की नींद सो गया किंतु संसार का शंकर बन गया।
उसकी सच्चाई और बलिदान पर आज के वैज्ञानिक नतमस्तक होते हैं। संक्षेप में यही कह सकते हें कि जो गरल पीकर बदले में अमृत बांटताा है वही व्यक्ति शंकर बनने की योग्यता रखता है। शंकर के गले में लिपटा हुआ सर्प इस बात का प्रतीक है अपने कातिल से अर्थात अपने शत्रु से भी प्यार करना। यह कहना आसान है किंतु व्यवहार में लाना आम व्यक्ति के वश की बात नहीं ऐसा उदाहरण संसार में बिरला ही मिलता है। भारतवर्ष में आर्य समाज के युग प्रवर्तक ऋषि दयानंद को यह गौरव प्राप्त हुआ जिन्होंने अपने हत्यारे जगन्नाथ को 500 रूपये देकर नेपाल भेज दिया। चाहते तो इस प्रकार का अवसर महात्मा गांधी भी प्राप्त कर सकते थे। विभाजन के समय गांधी जी ने अनशन करके पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपये दिलवाये थे। इस बात से कु्रद्घ होकर एक पंजाबी भाई ने उन पर कातिलाना हमला किया किंतु वह असफल रहा और गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। इस घटना के दसवें दिन बाद नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को गोली मार दी। यदि गांधी जी चाहते तो अपनी हत्या का असफल प्रयास करने वाले को बचा सकते थे क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार गांधी जी की जेब में थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। गांधी जी इतनी हिम्मत और उदारता नहीं दिखा पाये और अवसर को चूक गये। किसी ने ठीक ही कहा है कि यश प्रभु जिसे देना चाहते हैं उसे ही मिलता है। यहां महात्मा गांधी ऋषि दयानंद से पीछे रह गये। ऋषिवर की आत्मा बहुत ही महान थी। संसार उन्हें समझ नहीं पाया किसी उर्दू के शायर ने ठीक ही कहा :-
हजारों वर्ष नर्गिस अपनी बेनूरी पर रोती है।
बड़ी मुश्किल से होता है,
चमन में दीदार पैदा।।
ऋषि दयानंद के जीवन की एक नहीं अनेक घटनाएं ऐसी हैं जिनसे हृदय रोमांचित और प्रफुल्लित होता है। उनकी महान आत्मा अपने आप में एक दर्शन थी, संस्था थी, एक आंदोलन थी जो चपला की तरह चमक कर संसार के लोगों को एक नयी ज्योति दे गयी। यदि दूसरे शब्दों में यह कहा जाए कि मूल शंकर वास्तव में मूलशंकर था तो अतिश्याक्ति न होगी। उनके मस्तिष्क में ज्ञान की गंगा थी बुहिद पुण्य में रत थी, प्रखर और कुशाग्र थी उन्होंने अपने विवेक के तर्कों से विरोधियों को परास्त किया, निरूत्तर किया। ऐसे एक नहीं अनेकों उदाहरण हैं।
उनके मस्तिष्क में चंद्रमा की शीतलता थी क्रोध नियंत्रण में था।
तीसरा नेत्र विवेक भी इतना दीप्तिमान था कि अज्ञान अविद्या और पाखण्ड का कोहरा देखते ही देखते ऐसे उड़ गया जैसे तेज हवा में रूई का फोया उड़ जाता है। ऋषिवर को कई बार जहर दिया किंतु अपने कातिलों को फिर भ्ी क्षमा कर दिया। समाज की कड़वाहट के जहर को पीते और अमृत बांटते रहे।
निष्कर्ष यह है कि शंकर के दिव्य गुणों के आधार पर यदि किसी व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया जाए तो वह देवात्मा ऋषि दयानंद की होगी।

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