श्रावणी पर्व : ज्ञान प्राप्ति और स्वास्थ्य रक्षा का स्वर्णिम अवसर है ‘श्रावणी पर्व’*

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डॉ डी के गर्ग
भाग-१

श्रावणी पर्व का भारतीय समाज में विशेष महत्व है। मनुस्मृति में इस दिन को उपाकर्म करने का दिन कहा गया है। श्रावणी पूर्णिमा एक मास के आध्यात्मिक ज्ञान रूपी यज्ञ की पूर्णाहुति है। इस श्रावणी उपाकर्म के अंतर्गत वेदों के श्रवण-मनन का विशेष महत्व है। इस पर्व में वैदिक ज्ञान व संस्कृति के संवर्धन एवं उन्नयन का रहस्य विद्यमान है।प्राचीन काल में लोग श्रावण मास में वर्षा के कारण अवकाश रखते थे तथा घरों पर रहकर वैदिक शास्त्रों का श्रवण किया करते करते थे। अपने आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ाते थे।
भारत वर्षा बहुल तथा कृषि प्रधान देश है। यहां की जनता आषाढ़ और श्रावण में कृषि के कार्यों में विशेषतः व्यस्त रहती है। श्रावणी (सावनी) शस्य की जुताई और बुवाई आषाढ़ से प्राश्रम्भ होकर श्रावण के अन्त तक समाप्त हो जाती है। इस समय श्रावण पूर्णिमा पर ग्रामीण जनता कृषि के कार्यों से निवृत्ति पाकर तथा भावी शस्य के आगमन से आशान्वित होकर चित्त की शान्ति और अवकाश लाभ करती है। क्षत्रियवर्ग भी इस समय दिग्विजय यात्रा से विरत हो जाता है। वैश्य भी व्यापार, यात्रा, वाणिज्य और कृषि से विश्राम पाते हैं। इसलिए इस दीर्घ अवकाश-काल में विशेष रूप से वेद के पारायण और प्रवचन में जनता प्रवृत्त होती थी। उधर ऋषि-मुनियों, संन्यासी और महात्मा लोग भी वर्षा के कारण अरण्य और वनस्थली को छोड़कर ग्रामों के निकट आकर अपना चातुर्मास्य (चैमासा) बिताते थे। श्रद्धालु श्रोता और वेदाध्यायी लोग उनके पास रहकर ज्ञान श्रवण और वेद पाठ से अपने समय को सफल बनाते थे और ऋषियों के इस प्रिय कार्य से ऋषियों का तर्पण मनाते थे। जिस दिन से इस विशेष वेद पारायण का उपक्रम (प्रारम्भ) किया जाता था, उस को उपाकर्म कहते थे। और यह श्रावण शुदि पूर्णिमा वा श्रावण शुदि पंचमी को होता था। ऋषियों का तृप्तिकारक होने के कारण पीछे से उपाकर्म का नाम ऋषितर्पण भी पड़ गया।
प्राचीन काल में गुरुकुलों में इसी दिन से शिक्षण सत्र का आरंभ होता था। इस दिन छात्र गुरुकुल में प्रवेश लेते थे जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ, उन्हें यज्ञोपवीत दिया जाता था।
श्रावणी पर्व के तीन लाभ है–
आध्यात्मिक पक्ष-
श्रावण शब्द का भावार्थ होता है जिसमें सुना जाये। अब सुना किसे जाता है। संसार में सबसे अधिक महत्वपूर्ण ईश्वरीय ज्ञान वेद है। इसलिए इस मास में वेदों को सुना जाता है। हमारे वैज्ञानिक सोच रखने वाले ऋषियों ने वेदों के स्वाध्याय, चिंतन, मनन एवं आचरण के लिए अनुकूल माना है । इसलिए श्रावणी पर्व को प्रचलित किया। वेदों के स्वाध्याय एवं आचरण से मनुष्य अपनी आध्यात्मिक उन्नति करे। यही श्रावणी पर्व का आध्यात्मिक प्रयोजन है।
वैज्ञानिक पक्ष-
श्रावण में वर्षा के कारण कीट, पतंगे से लेकर वायरस, बैक्टीरिया सभी का प्रकोप होता हैं। इससे अनेक बीमारियां फैलती है। प्राचीन काल से अग्निहोत्र के माध्यम से बिमारियों को रोका जाता था। श्रावण मास में वेदों के स्वाध्याय के साथ साथ दैनिक अग्निहोत्र का विशेष प्रावधान किया जाता है। यज्ञ में कीट नाशक औषधि डाली जाती है जिसका धुँवा कीटनाशक और सुगन्धि पुष्टिवर्धक होती है। इसीलिए इस माह वेद परायण यज्ञ का विशेष महत्व है और श्रावणी पर्व का वैज्ञानिक पक्ष पर्यावरण रक्षा के रूप में प्रचलित है।
सामाजिक पक्ष-
श्रावण मास में वर्षा के कारण सन्यासी, वानप्रस्थी आदि वन त्यागकर नगर के समीप स्थानों पर आकर वास करते है। सब वर्ण के लोग इस चौमासे के दौरान विश्राम करते हैं अर्थात्‌ सब के कार्यक्षेत्र में शान्ति होती है। व्यवसाय में भी शिथिलता होती है तथा इस काल में कृषियों को भी अवकाश रहता है और संन्यासियों के लिए भी बारिश के मौसम में गृहस्थियों के पास जाने का सुअवसर प्राप्त होता है।गृहस्थ आश्रम का पालन करने वाले लोग अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए महात्माओं का सत्संग करने के लिए उनके पास जाते है। हैं। श्रवण पर्व का सामाजिक पक्ष ज्ञानी मनुष्यों द्वारा समाज को दिशा-निर्देशन एवं धर्म भावना को समृद्ध करना है।

सावन में होने वाली बीमारिया और अंधविस्वास:
संस्कृत में धार्मिक साहित्यानुसार हरि शब्द सूर्य, चन्द्रमा, वायु, विष्णु आदि अनेक अर्थो में प्रयुक्त है। हरिशयन का तात्पर्य इन चार माह में बादल और वर्षा के कारण सूर्य-चन्द्रमा का तेज क्षीण हो जाना उनके शयन का ही द्योतक होता है। इस समय में पित्त स्वरूप अग्नि की गति शांत हो जाने के कारण शरीरगत शक्ति क्षीण या सो जाती है। आधुनिक युग में वैज्ञानिकों ने भी खोजा है कि कि चातुर्मास्य में (मुख्यतः वर्षा ऋतु में) विविध प्रकार के कीटाणु अर्थात सूक्ष्म रोग जंतु उत्पन्न हो जाते हैं, जल की बहुलता और सूर्य-तेज का भूमि पर अति अल्प प्राप्त होना ही इनका कारण है। इस मौसम में शरीर के सारे दोषों का बैलेंस बिगड़ जाता है। आपकी पाचन अग्नि भी कमजोर होती है, साथ ही इम्यूनिटी भी कमजोर हो जाती है। वर्षा ऋतु में वात दोष भी बढ़ जाता है। बरसात में आमतौर पर नजर आने वाली बीमारियों में शामिल है स्किन एलर्जी, डेंगू फीवर, मलेरिया और फ्लू इन्फेक्शन । इन समस्याओं से उभरना बहुत ज्यादा कठिन है। यह सभी समस्याएं स्वास्थ्य को लंबे समय तक और गंभीर रूप से प्रभावित कर देती हैं।
इस माह में होने वाले असाध्य /साध्य रोग और उनके उपचार के लिए पाखंड भी अपने सीमा पार कर गया है और अज्ञान जनता इनके चंगुल में फसकर भटकती रहती है । मैंने विस्तार से इन सभी अंधविस्वासो का अध्ययन किया और पाया की ये सभी ठग विद्या का हिस्सा है और अवैज्ञानिक है ,प्रामाणिक नहीं है। कुछ अंधविस्वास आपके सामने है जो पण्डे /तांत्रिक/ज्योतिषी लोग बताते है।
१ पुराण के अनुसार, सावन के महीने में भगवान शिव और माता पार्वती पृथ्वी में निवास करते हैं। इसलिए कहा जाता है कि सावन के महाने में शिवलिंग की पूजा करने से जीवन में सुख एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है और सभी तरह की मनोकामनाएं जल्दी ही पूरी हो जाती है।भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाने से एक करोड़ कन्यादान के बराबर फल मिलता है। बेलपत्र और जल से भगवान शिव का मस्तिष्क शीतल रहता है।भक्तों को आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है. बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.
2.सावन के महीने में पड़ने वाले सोमवार के दिन शिवलिंग पर अनार के जूस से अभिषेक करें. इससे घर में चलने वाली आर्थिक तंगी से छुटकारा मिलेगा.
3.अगर आपके घर में कोई अक्सर बीमार रहता है तो सावन के महीने में रोजाना पानी में काले तिल मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक करें.
4.अगर आपके जीवन में दिक्कतें आ रही हैं या बनते हुए काम बिगड़ रहे हैं तो पत्नी को साथ मिलकर भगवान शिव और माता पार्वती को चावल से बनाई गई खीर चढ़ाएं.
5.श्रावण मास में हर मंगलवार को शिव पूजा (विशेषतः रुद्राभिषेक तथा महामृत्युंजय का जप) करने से रोगों का जल्दी निवारण होता है। याद रखें रोग निवारक पूजा में कनेर के पुष्प शिवजी को अवश्य अर्पित करें
6.किसी भी रोग से पूर्णत: मुक्ति के लिये श्रावण मास के प्रथम सोमवर से प्रत्येक सोमवार को शिव जी को कपूर युक्त जल से अभिषेक करें. अभिषेक करते समय महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जाप करें। इस मंत्र जाप श्रावण मास के पश्चात भी पूरे वर्ष भर करते रहें. अवश्य स्वास्थ्य लाभ होगा.
7.श्रावण मास में हर गुरूवार को विशेष पूजा करने से आयु में वृद्धि होती है।
8. कुशोदक जल से अभिषेक करने से असाध्य रोग शांत होते हैं
9.दूध से अभिषेक करने से शुगर रोग (मधुमेह) रोग की शांति होती है
10.भगवान शिव के मृत्यंजय मंत्र “ॐ जूं सः” के दस हजार जप करते हुए घी की धारा से शिवलिंग का अभिषेक किया जाए तो मधुमेह (डाइबिटीज) रोग दूर होता है.
11.गाय के घी से अभिषेक करने से आरोग्य लाभ होता है
12.जो व्यक्ति हरी दूर्वा से भगवान शिव का पूजन करता है उसे दीर्घायु प्राप्त होती है . लंबी या लाइलाज बीमारी से तंग हैं तो पंचमुखी शिवलिंग पर तीर्थ का जल अर्पित करने से रोगमुक्त होंगे।
13.ज्वर(बुखार) से पीडि़त होने पर भगवान शिव को जल चढ़ाने से तुरंत लाभ मिलता है।
14.नपुंसक व्यक्ति अगर घी से भगवान शिव का अभिषेक करे व ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो उसकी समस्या का निदान हो जाता है और उसे पुरुषत्व की प्राप्ति होती है।
15.किसी अच्छे ज्योतिषी से अपनी कुंडली का विश्लेषण कराकर ये पता करे लें की आपके रोग का कारण कौन सा ग्रह है। उसके पश्च्यात उस ग्रह से सम्बन्धित तुला दान उस ग्रह के दिन/नक्षत्र वाले दिन करें। साथ में शिव रुद्राभिषेक करें तथा महामृत्युंजय जप का जप करें अथवा कराएं।

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