पीओके को भारत के साथ मिलाने का सही समय

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धारा 370 हटाए जाने के पश्चात अब पी0ओ0के0 को लेने की बारी है। इस संदर्भ में रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह का यह बयान कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को वापस लेने में भारत को कोई कठिनाई इसलिए नहीं आएगी क्योंकि इसकी मांग स्वयं ही इस क्षेत्र की जनता करेगी , बहुत ही महत्वपूर्ण है। देश के रक्षामंत्री का यह कथन पूर्णतया सही है, क्योंकि इस समय पी0ओ0के0 की जनता पाकिस्तानी सेना की बर्बरता से दु:खी हो चुकी है और वह भारत के साथ मिलने को आतुर है। इस संबंध में हमें यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि कश्मीर के महाराजा हरीसिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को जब देश के साथ अपनी रियासत का विलय किया था तो उस समय संपूर्ण जम्मू कश्मीर रियासत का ही विलय किया गया था। उस दृष्टिकोण से राजा के द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के उपरांत से सारी जम्मू कश्मीर रियासत के भू-भाग पर केवल भारत का ही कब्जा कानूनी रूप से हो गया था । इस दृष्टिकोण से विचार करने पर यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि यदि कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत और पाकिस्तान में से चाहे किसी ने भी उठाया, वह अनुचित ही था।
यही कारण रहा कि पिछले 75 वर्ष में पाकिस्तान में कश्मीर के मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चाहे जितनी बार उठाया हो, उसे हर बार मुंह की खानी पड़ी । अंतरराष्ट्रीय कानूनों के विशेषज्ञों ने भी कभी भारत के विरोध में जाकर अपनी राय नहीं दी। क्योंकि वे जानते थे कि पी0ओ0के0 पर पाकिस्तान का नहीं बल्कि हिंदुस्तान का अधिकार है। पाकिस्तान ने पी0ओ0के0 को अत्याचारों के बल पर अपने पास रखने का असफल प्रयास किया है। उसने अपनी सेना के माध्यम से वहां के निवासियों पर अत्याचार करवाएं हैं। इसके अतिरिक्त भारत को डराने धमकाने के लिए पाकिस्तान ने अपनी जनता को दाने – दाने के लिए तरसाकर अपने राष्ट्रीय बजट का बड़ा भाग हथियारों पर खर्च किया है। इसके उपरांत भी वह पी0ओ0के0 की जनता का मन नहीं बदल पाया। भौगोलिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक कारणों से पी0ओ0के0 की जनता अपने आपको भारतीय नागरिक कहलवाने के लिए पहले दिन से लालायित रही है।
जब 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरिसिंह ने भारत के साथ जम्मू कश्मीर रियासत के विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे तो उन हस्ताक्षरों की भी उतनी ही कीमत थी, जितनी अन्य रियासतों के शासकों के हस्ताक्षरों की कीमत थी। कहने का अभिप्राय है कि वह विलय पत्र पूर्णतया एक वैधानिक और संवैधानिक दस्तावेज था। जिसके महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अंतर्गत यदि यह संभव है कि किसी देश के भूभाग और उसके निवासियों पर कोई दूसरा देश अवैधानिक रूप से कब्जा करके उन नागरिकों पर अत्याचार करता है तो उसे ऐसे अत्याचारों और जबरन किए गए अध्यासन के लिए दंडित किया जा सकता है , तब ऐसी परिस्थितियों में इस प्रकार के कानून का सहारा लेकर भारत को पाकिस्तान के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में कार्यवाही करनी चाहिए। वर्तमान युग में भी यदि किसी देश के भू-भाग और उसके निवासियों पर कोई दूसरा देश 75 वर्ष तक अवैधानिक अध्यासन करने में सफल होता है और बर्बर अत्याचार करता है तथा सारा अंतरराष्ट्रीय जगत उसके इस प्रकार के जबरन अध्यासन और अत्याचारों पर मौन रहता है तो इससे अधिक शर्मनाक कोई बात नहीं हो सकती।
भारत ने साहसिक निर्णय लेकर 5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर के लिए भारत के संविधान में स्थापित की गई विशेष धारा 370 को निरस्त करके सारे अंतरराष्ट्रीय जगत को यह संकेत दे दिया था कि अब वह अपने सम्मान की रक्षा के लिए उठ खड़ा हुआ है। किसी भी दबाव के अंतर्गत अब उस पर किसी धारा की आड़ में कोई अंतरराष्ट्रीय एजेंसी, संस्था या संगठन या कोई भी बाहरी शक्ति अपना प्रभाव नहीं दिखा सकती । हम अपनी अस्मिता, राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा के लिए सब कुछ करने को तैयार हैं। पाकिस्तान आरंभ से ही भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह कह कर घेरता रहा है कि उसने ही कश्मीर समस्या का अंतरराष्ट्रीयकरण करते हुए उसे संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्तुत किया था। पर अब पाकिस्तान के इस प्रकार के दावे या कथन का भी कोई औचित्य नहीं रह गया है। इस संदर्भ में हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि 1972 में बांग्लादेश निर्माण के पश्चात हमारे देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ जब शिमला समझौता किया था तो उस समय पाकिस्तान के अपने समकक्ष जुल्फिकार अली भुट्टो से यह स्पष्ट लिखित वचन लिया था कि कश्मीर समेत भारत पाकिस्तान के बीच जितने भी विवादास्पद मुद्दे हैं उन सबका फैसला पारस्परिक वार्तालाप द्वारा शांतिपूर्ण ढंग से किया जाएगा।’
ऐसी परिस्थितियों में हमारे देश के वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पूरे देश की आवाज बनकर जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय जगत को यह स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि अब भारत पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर ही रहेगा , उसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। सारा देश अपने रक्षा मंत्री के साथ है। सभी देशवासी अपनी प्राचीन परंपरा का निर्वाह करते हुए किसी भी बाहरी शत्रु के लिए एक होकर सामना करने को तैयार हैं।
इस समय यूक्रेन और रूस के युद्ध का उल्लेख करना भी उचित होगा। रूस – यूक्रेन में जाकर युद्ध जीतकर भी बुरी तरह पराजित हो गया है। जिसका स्पष्ट कारण यह है कि रूस ने हथियारों के माध्यम से जिस प्रकार भारी हानि उठाई है, उससे वह विश्व शक्तियों के मध्य कमजोर पड़ा है। जो बाईडेन युद्ध से दूर रहकर भी अपने शत्रु को कड़ा सबक सिखाने में सफल रहे हैं। जो बाईडेन यह भली प्रकार जानते थे कि रूस एक सीमा तक ही अपने हथियारों का विनाश कर सकता है। दूसरे सारे यूक्रेन को समाप्त करने के लिए वह कभी कार्रवाई नहीं करेगा। क्योंकि पराजित यूक्रेन को यदि वह अपने साथ मिलाता है तो फिर उसके नवनिर्माण पर भी उसी को पैसा खर्च करना पड़ेगा। यह कितनी बेतुकी बात होगी कि पहले किसी देश को उजाड़ो और फिर अपने आप ही उसको बसाने के लिए पैसा खर्च करो? यूक्रेन युद्ध में रूस एक सीमा तक अपने हथियार नष्ट कर सकता था, क्योंकि उसे यह भी डर सताता रहा कि यदि वह हथियारविहीन हो गया तो उसके शत्रु उसे जीने नहीं देंगे। तब रूस के इतिहास के सबसे बड़े विलेन के रूप में पुतिन अपने आप ही स्थापित हो जाते।
इस बात को हम यहां केवल इस संदर्भ में कह रहे हैं कि अब वह समय बीत गया है जब कश्मीर के मामले को लेकर पाकिस्तान के साथ मिलकर चीन भारत के साथ युद्ध कर सकता था। वर्तमान परिस्थितियों में पाकिस्तान ने यदि पाक अधिकृत कश्मीर को लेने की भारत की कार्यवाही का विरोध किया तो उसे अकेले ही लड़ना पड़ेगा। उसे बचाने के लिए चीन भी उसका साथ देने से पहले दस बार सोचेगा। क्योंकि चीन यूक्रेन में फंसे हुए रूस के हश्र को देख चुका है। इस अनुकूल परिस्थिति का भारत सरकार को यथाशीघ्र लाभ उठाना चाहिए और शत्रु से अपने भूभाग को छीनकर वहां के लोगों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। समय की अनुकूलता का लाभ उठाना राजनीति का सबसे बड़ा दांव होता है। सारे देश की अपेक्षा है कि प्रधानमंत्री मोदी पी0ओ0के0 को भारत के साथ मिलाकर भारतीय जनमानस की भावनाओं का सम्मान करें।

डॉ राकेश कुमार आर्य
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं। )

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