महर्षि दयानंद कृत सत्यार्थ प्रकाश और पंचकोश की अवधारणा

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सत्यार्थ प्रकाश के नवम समुल्लास में महर्षि दयानंद ने लिखा है कि सत पुरुषों के संग से विवेक अर्थात सत्य सत्य धर्म- अधर्म कर्तव्य -अकर्तव्य का निश्चय अवश्य करें,पृथक पृथक जानें । जीव पंचकोश का विवेचन करें। पृथम कोष जो पृथ्वी से लेकर अस्थिपर्यंत का समुदाय पृथ्वीमय है उसको अन्नमय कोष कहते हैं ।”प्राण” अर्थात जो भीतर से बाहर जाता है।”अपान “जो बाहर से भीतर आता , “समान” जो नाभिस्थ होकर सर्वत्र शरीर में पहुंचता, “उदान ” जिससे कंठस्थ खींचा जाता और बल- पराक्रम होता , “व्यान” जिससे सब शरीर में चेष्टा आदि कर्म जीव करता है। ये पांच प्राण दूसरे वाले प्राणमय कोष में रहने वाले होते हैं।
तीसरा मनोमय कोष होता है जिसमें मन के साथ अहंकार ,वाक पाद, पाणी, गुदा और उपस्थ कर्मेंद्रियां हैं।
चौथा कोश विज्ञानमय कोष होता है जिसमें बुद्धि, चित् , श्रोत्र, त्वचा ,नेत्र ,जिह्वा और नासिका,पांच ज्ञानेंद्रियां, जिनसे जीव ज्ञान आदि व्यवहार करता है , विद्यमान रहती हैं।
पांचवा आनंदमय कोश जिसमें प्रीति, प्रसन्नता ,न्यून आनंद, अधिक आनंद और आधार कारण रूप प्रकृति है ।
ये पांच कोश प्रत्येक मनुष्य के अंदर होते हैं।
इन्हीं कोषों के कारण मनुष्य सब प्रकार के कर्म ,उपासना और ज्ञान आदि व्यवहारों को करता है। तीन अवस्था एक जागृत ,दूसरी स्वप्न और तीसरी सुषुप्ति अवस्था होती है। इसलिए तीन शरीर होते हैं एक स्थूल जो दिखता है, दूसरा पांच प्राण, पांच ज्ञानेंद्रिय ,पांच सूक्ष्म भूत, और अहंकार,मन तथा बुद्धि इन 18 तत्वों का समुदाय सूक्ष्म शरीर कहा जाता है ।
यह सूक्ष्म शरीर जन्म मरण आदि में भी जीव के साथ रहता है ।इस के दो भेद हैं। एक भौतिक अर्थात जो सूक्ष्म भूतों के अंशों से बना है। दूसरा स्वाभाविक जो जीव के स्वभाव गुणरूप है। जिसे ए अभौतिक शरीर भी कह सकते हैं। परंतु यह दूसरा वाला अभौतिक शरीर मुक्ति में भी जीव के साथ रहता है। इसी से जीव मुक्ति में सुख को भोगता है। तीसरा कारण शरीर जिसमें सुषुप्ति अर्थात गहन निद्रा होती है। वह प्रकृति रूप होने से सर्वत्र विभु और सब जीवो के लिए एक है। तीन शरीरों के अतिरिक्त एक चौथे शरीर की विवेचना सत्यार्थ प्रकाश में और की है। वह चौथा शरीर तुरिया बताया गया है।
(जबकि तुरिया शरीर नहीं है बल्कि अवस्था है। जैसे जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति ,तुरिया चार अवस्थाएं कुल होती है) चौथी अवस्था जिसमें समाधि से परमात्मा के आनंद रूप में मगन जीव होते हैं ।इसी समाधि संस्कार जन्य शुद्ध शरीर का पराक्रम मुक्ति में भी यथावत सहायक रहता है ।इन सब कोष अवस्थाओं से जीव पृथक है। क्योंकि जब मृत्यु होती है तब सब कोई कहते हैं कि जीव निकल गया। यही जीव सबका प्रेरक, सबका धर्ता , सीमित साक्षी, कर्ता,भोक्ता कहा जाता है।
महात्मा नारायण स्वामी कृत योग रहस्य नामक पुस्तक के पृष्ठ संख्या 48 व 49 पर निम्न प्रकार उल्लेख मिलता है।
मनोमय कोष, प्राणमय व मनोमय कोषों को विज्ञानमय तथा आनंदमय कोष से पृथक करता है। विज्ञानमय कोष मानो एक दीवार है ,जो दोनों को प्रथक
प्रथक रखती है ।पहले 3 कोषों अन्नमय, प्राणमय और मनोमय तक समाप्त हो जाते हैं। विज्ञानमय कोष बुद्धि से संबंधित है और उसके आगे कारण शरीर आनंदमय कोष है जिसका संबंध केवल ईश्वर उपासना से है। योग का काम यह है कि ऐसा वातावरण पैदा कर दें जिससे लहर पहले तीन कोषों की ओर से उठती हुई उन्हें बुद्धि की जागृति के कारण बनाते हुए आनंदमय कोष ग्रहण कर ले। प्रारंभिक अवस्था में अभ्यासी के लिए योग का काम यह है कि उसके हृदय में ईश्वर का व उच्च प्रेम पैदा करके जो सांसारिक वासना और प्रलोभनों से सर्वथा प्रथक हो और मानस सरोवर में ऐसी लहर पैदा करने का कारण बन जाए जो इंद्रियों की ओर जाने वाली न हो किंतु अपने भीतर बुद्धि की ओर चलने वाली हो ।इस लहर के द्वारा इच्छा वासनाओं की दुनिया मनोमय कोष का संबंध आनंद और मेल के जगत(आनंदमय कोष) के साथ जुड़ जाता है। यह लहर अंत में आनंदमय कोष में जाकर समाप्त हो जाती है ।अपने समाप्ति के साथ ही बहिर्मुखी वृत्ति को भी समाप्त कर देती है। यही योग का अंतिम ध्येय हुआ करता है।
इसलिए आवश्यक है कि प्रत्येक अंतः करण अपनी सीमा में रहकर ही काम करें,व समस्त अंतः करण आत्मा की बहिर्मुखी वृत्ति का रोक देना योग का अंतिम उद्देश्य है।योग का यही कार्य पंचकोषों के एक दूसरे विभाग के द्वारा उपरोक्त वर्णित किया गया है।
इसीलिए पतंजलि मुनी द्वारा योग की परिभाषा करते समय यह लिखा है “योगस्य चित्तवृत्ति निरोध:” है।
देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट चेयरमैन उगता भारत समाचार पत्र,
चल भाष 98 1183 83 17 ग्रेटर नोएडा

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