हिन्दू और दुर्बल होती मुगल सत्ता के साथ आ धमके अंग्रेज

पुन: मेवाड़ की ओर
अब हम एक बार पुन: राजस्थान के मेवाड़ के उस गौरवशाली राजवंश की ओर चलते हैं जिसकी गौरव गाथाओं को सुन-सुनकर प्रत्येक भारतवासी के हृदय में देशभक्ति मचलने लगती है। जी हां, हमारा संकेत महाराणा राजवंश की ओर ही है। जिसके राणा प्रताप के विषय में 1913 ई. में अपनी पत्रिका के विमोचन के समय गणेश शंकर विद्यार्थी ने लिखा था-”संसार के किसी भी देश में यदि तू होता तो तेरी पूजा होती और तेरे नाम पर लोग अपने आपको न्यौछावर करते। अमेरिका में होता तो वाशिंगटन या लिंकन से तेरी किसी तरह पूजा कम न होती, इंग्लैंड में होता तो वेलिंगटन या नेलशन को तेरे आगे झुकना पड़ता, फ्रांस में जॉन ऑफ आर्क तेरी टक्कर में गिनी जाती और इटली तुझे मैजिनी के मुकाबले रखती।”
राणा राजसिंह और उसके पुत्र भीमसिंह के विषय में
इसी वंश में 1681 ई. में मेवाड़ की गौरवपूर्ण विरासत का उत्तराधिकारी राणा राजसिंह का लडक़ा जयसिंह बना।
राणा राजसिंह ने कई विवाह किये थे और उसका यह एक चारित्रिक दोष भी था कि वह विलासी और व्यभिचारी बहुत था। इसलिए वह अपने पूर्वजों की भांति एक पराक्रमी शासक नहीं था। उसका बड़ा लडक़ा भीम था, जो कि उसकी मृत्यु के पश्चात मेवाड़ का शासक बनना चाहिए था। परंतु उसका लगाव अपनी दूसरी रानी से उत्पन्न लडक़े जयसिंह में था। अत: राणा अपने उत्तराधिकारी के रूप में जयसिंह को ही देखना चाहता था। परंतु वंश परंपरा और सरदारों के भय से ऐसा करने से राणा को संकोच हो रहा था। तब उसने अपनी योजना को फलीभूत करने के लिए एक युक्ति निकाल ली।
राणा ने एक दिन अपने बड़े पुत्र भीमसिंह को अपने कक्ष में एकांत में बुलाया और उसे एक तलवार देकर कहा कि इस तलवार से तुम अपने छोटे भाई जयसिंह का वध कर दो, क्योंकि उसके जीवित रहने से मेवाड़ राज्य में अवांछित उत्पात होने सम्भावित हैं।
राणा का आशय समझने में भीमसिंह को तनिक भी विलंब नहीं हुआ। उसने पिता से कह दिया कि पिताजी-”मैं आपका आशय समझ गया हूं। आप सफल मनोरथ हों, इसलिए मैं स्वयं आपका राज्य छोडक़र चला जाता हूं। मैंने सिंहासन पर अपना अधिकार इसी क्षण से त्याग दिया है और राज्य का अधिकार अपने भाई को देता हूं। मैं आज के पश्चात आपके राज्य का पानी भी ग्रहण नहीं करूंगा।”
भीमसिंह पहुंचा बहादुरशाह के पास
अपने पिता से ऐसा वचन देकर भीमसिंह अपने कुछ विश्वसनीय लोगों को साथ लेकर राज्य से निकल गया और अपनी प्रतिज्ञानुसार भूखा-प्यास रहकर किसी प्रकार बादशाह के बेटे बहादुरशाह के पास पहुंच गया। बादशाह औरंगजेब ने समय को झट पहचान लिया और अवसर का लाभ उठाने के लिए बादशाह ने भीमसिंह को तीन हजार की सेना का सरदार बना दिया। इतना ही नहीं, उसे अपने राज्य के 12 जिले भी दे दिये जिससे उसका जीवन निर्वाह भली प्रकार हो सके।
राणा के नैतिक पतन ने किया देश का नुकसान
इस घटना का उल्लेख हमने यहां जान बूझकर किया है। क्योंकि इस घटना से हमें ज्ञात होता है कि हमारे शासकों का जब-जब नैतिक पतन हुआ, तब -तब उसके ऐसे ही घातक परिणाम आये। यह नैतिक पतन का रोग हमारे लिए बड़ा घातक सिद्घ हुआ और हम कई मोर्चों पर जीतते हुए हार गये। यद्यपि इस महारोग को हमारे कई इतिहासकारों ने यह मानकर उपेक्षित कर दिया है कि किसी शासक के व्यक्तिगत जीवन में हमें नही झांकना चाहिए। पर राणा राजसिंह के व्यक्तिगत जीवन का हमारे राष्ट्रीय जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा? यह तो इस घटना के फलितार्थ से स्पष्ट हो जाएगा।
स्वाभिमानी भीमसिंह
राणा का लडक़ा भीमसिंह था स्वाभिमानी। किसी दिन कोई बात किसी मुगल अधिकारी ने ऐसी कह दी जो भीमसिंह के स्वाभिमान को घायल कर गयी। जिस पर उस स्वाभिमानी वीर का उस मुगल अधिकारी से वाद विवाद हो गया, तो बादशाह ने भीमसिंह को सिंधु नदी के पार भेज दिया। वहीं पर भीमसिंह की मृत्यु हो गयी।
भीमसिंह के अपने पास आ जाने से प्रसन्न बादशाह ने मेवाड़ को दुर्बल करने के अनेकों प्रयास किये। जिससे राणा राजसिंह ने औरंगजेब के साथ संधि करना उचित समझा। संधि का प्रारूप तैयार हो गया परंतु संधि पत्र पर हस्ताक्षर से पूर्व ही राणा का देहांत हो गया।
औरंगजेब और जयसिंह के मध्य हो गयी संधि
राणा राजसिंह की मेवाड़ पर औरंगजेब ने एक विशाल सेना के साथ आक्रमण किया था-जिसका सामना राणा राजसिंह नहीं कर पाया था। परंतु इतना अवश्य था कि अरावली पर्वत श्रंखलाओं में राणा की सेना ने औरंगजेब की सेना को छठी का दूध स्मरण करा दिया था। इस युद्घ में राणा के पुत्र जयसिंह ने बादशाही सेना के सेनापति दिलेर खां और शाहजादा अजीम के साथ बड़ी उदारता दिखाई थी।
फलस्वरूप जो संधि राणा राजसिंह के मध्य न हो सकी थी वह राणा जयसिंह के साथ की गयी।
कर्नल टॉड लिखते हैं-”दिलेर खां जयसिंह की उस उदारता को भूला न था। संधि के समय उदयपुर में मेवाड़ और दिल्ली राज्यों के बहुत से आदमियों का जमाव हुआ था। उसमें दस हजार सैनिक सवारों के और चालीस हजार पैदल सिपाहियों के अतिरिक्त अरावली पर्वत पर रहने वाले अगणित संख्या में भील और दूसरी लड़ाकू जातियों के लोग एकत्रित हुए थे। इस प्रकार एक लाख से अधिक एकत्रित जनसमूह ने राणा जयसिंह की जय-जयकार के नारे लगाने आरंभ किये। उस समय शाहजादा अजीम के मन में भय उत्पन्न हुआ परंतु दिलेर खां के मन में जयसिंह की ओर से किसी प्रकार की आशंका नहीं थी, संधि का काम समाप्त हुआ। मेवाड़ राज्य की ओर से बादशाह को तीन जिले दिये गये और यह तय हुआ कि संधि के पश्चात राणा जयसिंह को लाल रंग के डेरे और छत्र का प्रयोग करने का अधिकार नहीं रहेगा।”
…….और राणा चल निकला देशभक्ति की राह पर
दिलेर खां ने राणा जयसिंह को अपने प्रभाव में ले लिया था, उसने जाते समय राणा से संधि की शर्तों का मन से पालन करने का निवेदन किया। राणा दिलेर खां की अपने प्रति आत्मीयता से प्रभावित था उसने भी दिलेर खां को आश्वस्त किया कि वह संधि के प्रति पूर्णत: निष्ठावान रहेगा। परंतु मुगलों के आक्रमणों से राणा को मुक्ति नहीं मिली, उसे एक के पश्चात एक कई मुगल आक्रमणों का सामना करना पड़ा। फलस्वरूप राणा को फिर अपने हाथों में मुगलों के विरूद्घ तलवार उठानी पड़ी। कर्नल टॉड का कथन है कि-”राणा को मुगलों से अनेकों युद्घ करने पड़े। राणा ने स्वाभिमान को बेचकर कोई समझौता करना उचित नहीं माना था और ना ही वह किसी प्रकार से हिंदू समाज को कोई ऐसा संकेत देना चाहता था, जिससे ऐसा लगे कि राणा आलस्य और प्रमाद के वशीभूत होकर या पराक्रमहीन होकर हिंदू अस्मिता से खिलवाड़ करना चाहता है। राणा को अनेकों कष्टों का सामना करना पड़ा, आर्थिक हानि उठानी पड़ी, पहाड़ों में जीवन यापन करना पड़ा, परंतु मुगलों से ऐसी किसी संधि को नहीं माना जो उसके स्वयं के और हिंदू समाज के सम्मान के विपरीत हो।”
राणा वंश की दुर्बलताएं
हमारे लिए उचित होगा कि मेवाड़ के इस महान राणा वंश के राणा राजाओं की उन दुर्बलताओं पर भी विचार किया जाए-जिनके कारण इस राजवंश के साथ-साथ हिंदू समाज को भी भारी क्षति उठानी पड़ी। यह सच है कि भारत चाहे अपनी अस्मिता की रक्षार्थ जितना संघर्ष कर रहा था-पर उसे क्षति भी उठानी पड़ रही थी। समाज और राजनीति में बहुत सी ऐसी बातें घुस गयीं थी जो वेद विरूद्घ और विज्ञान विरूद्घ थीं।
राजाओं का चरित्र बल पतनोन्मुखी हो चला था। कई-कई विवाह करने की परंपरा उनमें मुस्लिम शासकों की देखा -देखी बढ़ी, जिससे संतानों में परस्पर वाद-विवाद, कलह-कटुता और संघर्षों का क्रम चल निकला। महाराणाओं के इस वंश में कई राजाओं ने कई-कई विवाह किये-ये स्वाभाविक है कि कई विवाहों में से राजा किसी एक रानी से ही अधिक प्रेम करता था और जिस रानी से अधिक प्रेम करता था उसी की संतान भी उसे अधिक प्रिय होती थी। यह खेल मुगल दरबारों में होता था, जिससे उत्तराधिकार के झगड़े उत्पन्न होते थे। पर यह रोग राणा वंश में देखा गया। राजसिंह ने कई विवाह किये तो उसका परिणाम भी भोगा। उससे पूर्व भी जिस राणा ने ऐसा किया उसी ने उसका कटुफल चखा। अब जयसिंह ने भी यही किया। उसके रणिवास में भी कई राणियां थीं। जिनमें से एक कमला देवी नाम की राणी थी, जिससे वह अधिक प्रेम करता था।
उसके प्रेम में पागल होकर राणा एक बार अपना राजपाट छोडक़र जयपुर के किसी अज्ञात स्थान पर जाकर रहने लगा। उसका राज्य राणा के लडक़े अमरसिंह ने अपने मंत्री के संरक्षण में चलाना आरंभ कर दिया। परंतु शीघ्र ही अमरसिंह उच्छं्रखल हो गया तो मंत्री से उसका टकराव बढ़ गया। तब राणा जयसिंह को पुन: राज्य कार्य संभालने के लिए लौटना पड़ा। परंतु तब तक बहुत विलंब हो चुका था।
राणा के आगमन की बात सुनकर अमरसिंह अपने ननिहाल बंूदी से दस हजार की सेना ले आया। राणा जयसिंह के प्रमादी और विलासी जीवन के कारण उसके दरबारी भी उसके साथ नहीं थे। ऐसी विस्फोटक परिस्थितियों में राणा ने मेवाड़ को छोड़ देना ही उचित समझा और वह जंगलों की ओर चला गया। वहां से भी राणा ने अमरसिंह को कुछ प्रभावशाली लोगों की सहायता से समझाने का प्रयास किया। परंतु सारे प्रयास व्यर्थ रखे। सन 1700 ई. में राणा जयसिंह की मृत्यु हो गयी। तब उसका लडक़ा अमरसिंह मेवाड़ का शासक बना।
राणा जयसिंह का जीवन और उसकी ऊर्जा का बड़ा भाग व्यर्थ की बातों में बीत गया। जीवनबोध से वह अनभिज्ञ रहा। संभवत: मानव की इस अधोगामी स्थिति से उसे बचाने के लिए ही हमारे महान पूर्वजों ने एक ‘पत्नी धर्म’ और उसमें भी संयमित-संतुलित जीवनचर्या को मानव कल्याण के लिए उचित माना था। उन्होंने इसे मानव जीवन के लिए और उसके कल्याण के लिए एक अनिवार्य साधना के रूप में स्थान दिया। जीवन का यह सत्य है कि वह जितना तपा-तपाया और सधा -सधाया होगा, उतना ही उसका कल्याण होगा। जितना वह कामाग्नि से जलता होगा उतना ही क्रोधाग्नि भयंकर लपटें उसका सर्वनाश करने को आतुर होंगी और जहां ये दोनों अग्नियां होंगी वहां केवल सर्वनाश का सन्नाटा होगा। आज का संसार ब्रह्मचर्य के सूर्य की ओर देखना तक नहीं चाहता और इसीलिए अशांत है। बस, यही कारण था कि मेवाड़ का महान राणा वंश भी समय के अनुसार अधोगामी हो चला।
अमरसिंह की योग्यता और राव गोपाल सिंह
अमरसिंह ने योग्यता का परिचय अपने पिता के जीवन काल में ही दे दिया था। उसके गद्दी पर बैठने के कुछ कालोपरांत उसने मुगल दरबार में चल रहे उत्तराधिकार के युद्घ में भाग लेना आरंभ किया और शाह आलम के साथ स्वयं को जोड़ लिया।
जिस समय मेवाड़ पर अमरसिंह शासन कर रहा था, उसी समय चम्बल नदी के किनारे बसे रामपुर के क्षेत्र का सामंत राजा रावगोपाल था। उसके लडक़े का नाम रतनसिंह था। जिसने अपने पिता के विरूद्घ विद्रोह कर दिया था। विद्रोही पुत्र के विरूद्घ पिता ने मुगल बादशाह के यहां एक मुकद्दमा भी योजित कर दिया था। रतनसिंह को औरंगजेब ने अपना संरक्षण दिया तो वह मुसलमान हो गया। जिससे प्रसन्न होकर औरंगजेब ने भी उसके विरूद्घ राव गोपाल द्वारा डाले गये मुकदमे को निरस्त कर दिया। बादशाह ने नवमुस्लिम रतनसिंह का नाम राजमुस्लिम खां रख दिया और उसके पिता का सारा राज्य भी उसी को दे दिया। जिससे राव गोपाल रूष्ट होकर राणा अमरसिंह के पास मेवाड़ पहुंचा। राणा ने उसे शरण दी। पर राणा के इस आचरण से औरंगजेब रूष्ट हो गया।
काफिर का काफिर से अंत करा दिया बादशाह ने
राणा ने राव गोपाल की सहायता के लिए एक सेना भेजी। परंतु उस सेना को राजमुस्लिम खां ने परास्त कर दिया। राजमुस्लिम खां की इस विजय से बादशाह औरंगजेब को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसके हृदय ने उसे स्वयं को ही साधुवाद दिया कि वह काफिर को काफिर से भिड़ाकर काफिर का ही विनाश करने में कितना सफल रहा है।
मारवाड़ के राजा से असन्तुष्ट होकर हिंदू वीर दुर्गादास राठौड़ एक बार उदयपुर आया था। तब राणा अमरसिंह ने उसका बड़ा आदरभाव किया था। कर्नल टॉड हमें बताते हैं कि राणा अमरसिंह ने दुर्गादास के जीवन निर्वाह के लिए पांच सौ रूपये प्रतिदिन देने की व्यवस्था कर दी थी। दुर्गादास जैसे शूरवीरों का कोई लाभ उदयपुर को मिलने के पहले ही शाहआलम बहादुरशाह की मृत्यु हो गयी। राज्य के विरोधियों के द्वारा सन 1712 ई. में बादशाह शाहआलम को विष देकर उसके प्राणों का अंत कर दिया गया।
बादशाह शाह आलम चरित्रवान व्यक्ति था। लेकिन उसको अपने पिता के अपराधों का फल भोगना पड़ा। औरंगजेब के अत्याचारों से मुगल साम्राज्य में बहुत अशांति पैदा हो गयी और चारों ओर अधीनस्थ राजाओं ने स्वतंत्र होने के लिए विद्रोह कर रखा था।
राजस्थान में मस्जिदों के अस्तित्व नष्ट होने लगे
कर्नल टाड कहते हैं कि-”….बहुत दिनों से मुगल शासकों के अत्याचारों को सहते हुए राजपूत जिस शांति और संतोष से काम ले रहे थे वह अब कायम न रह सकी। इधर मुगल राज्य में सैयद बंधुओं की जो मनमानी चल रही थी, उसने राजपूतों को खुलकर विद्रोह करने का निमंत्रण दे दिया। राजस्थान में स्थान-स्थान पर मंदिरों को तोडक़र मस्जिदें बनवायी गयी थीं और उन मस्जिदों में मुगल लोग दीवानी और फौजदारी के मुकदमे निपटाते थे। मौहम्मद साहब के आदेशों का प्रचार होता था। राजस्थान की इन परिस्थितियों को सहन करने के लिए राजपूत लोग अब तैयार न थे। उन्होंने मुल्ला और काजी लोगों के विरूद्घ वातावरण उत्पन्न किया। उसका फल यह हुआ कि राजस्थान में मस्जिदों के अस्तित्व नष्ट होने लगे। इसके पहले मुस्लिम शासकों ने ंिहन्दुओं के समस्त अधिकारों को छीनकर मुसलमानों को दे दिया था। इन दिनों में राजपूतों ने और विशेष रूप से राठौरों ने उन अधिकारों को मुसलमानों के हाथों से छीन लिया। मारवाड़ के राजा अजीतसिंह ने इन दिनों में मुगलों को अपने यहां पूर्ण रूप से पराजित किया और उनके मारवाड़ से निकाल दिया। उदयपुर में जो संधि हुई थी उसके अनुसार तीनों राजाओं ने सांभर झील को अपने-अपने राज्यों की सीमा मान लिया, और उससे होने वाली आय को तीनों परस्पर बांट लेते थे।”
फर्रूखसियर का बादशाह बनना
इधर अब दिल्ली पर फर्रूखसियर का शासन आरंभ हुआ। वह एक नाममात्र का बादशाह न रहकर स्वयं को किसी काम का दिखाना चाहता था। इसलिए मुगल दरबार में बढ़ते सैय्यद बंधुओं के प्रभाव से वह स्वयं को मुक्त करना चाहता था। जिससे कि वह एक शक्ति संपन्न बादशाह के रूप में शासन चला सके। फर्रूखसियर के शासनकाल में राजपूतों की शक्ति को कुचलने का निर्णय लिया गया। पंरतु बादशाह राजपूतों को न कुचलकर अपने आस्तीन के सांपों (सैय्यद बंधुओं को) को कुचलवाना चाहता था। इसलिए जब उसका सेनापति अरीरूल उमरा मारवाड़ के शासक अजीतसिंह से संघर्षरत था तब उसने अजीतसिंह के लिए एक गोपनीय पत्र लिखा। जिसमें उसने अपने सेनापति को ही अच्छा पाठ पढ़ाने का अनुरोध अजीतसिंह से किया। वह सोचता था कि अजीतसिंह उसके सेनापति का खात्मा यदि कर देता है तो उसका लाभ उसे दिल्ली में मिलेगा। पर उसकी योजना फलीभूत न हो सकी और उसका पत्र लिखना भी निरर्थक ही सिद्घ हुआ। क्योंकि अजीत सिंह ने मुगल सेनापति से संधि कर ली। इतना ही नहीं अजीतसिंह ने अपनी कन्या का विवाह बादशाह से करने का मुगल सेनापति का प्रस्ताव भी मान लिया।
कर्नल टॉड का कथन है-”इस विवाह के होने के कुछ दिन पहले फर्रूखसियर की पीठ में एक फोड़ा निकला। वह धीरे-धीरे बढ़ गया। हकीमों और जर्राहों की बहुत चिकित्सा के उपरांत भी उसमें कुछ लाभ न पहुंचा। एक ओर बादशाह को उस फोड़े का कष्ट था जो दिन पर दिन भयानक होता जा रहा था और दूसरी ओर उसके विवाह के जो दिन निकट आ रहे थे। इलाज कराते-कराते और कुछ दिन बीत गये। विवाह का जो दिन नियत हुआ था वह दिन भी निकल गया। लेकिन बादशाह का फोड़ा ठीक न हुआ।”
इसी समय बढ़त बनाने लगी ईस्ट इण्डिया कंपनी
उन दिनों में ईस्ट इण्डिया कंपनी भारत में व्यवसाय करने के लिए आयी थी और उस कंपनी के अंग्रेज सूरत में मौजूद थे। उन अंग्रेजों में हेमिल्टन नामक एक डाक्टर भी था। उसने जब बादशाह को बीमार सुना तो वह उसे देखने गया। फोड़े की हालत देखकर उसने घबराये हुए बादशाह को अनेक प्रकार की बातें समझायीं और अपनी चिकित्सा करने का उसने इरादा प्रकट किया। बादशाह की आज्ञा पाकर उस अंग्रेज डॉक्टर ने फोड़े की चिकित्सा आरंभ की। उसके इलाज से थोड़े ही दिनों में फोड़ा अच्छा हो गया। स्वस्थ होने पर बादशाह ने डॉक्टर हेमिल्टन को पुरस्कार देने का इरादा किया। बादशाह के इस इरादे को सुनकर डॉक्टर हेमिल्टन ने कहा कि-”मुझे इस चिकित्सा के बदले बादशाह का लिखा हुआ वह फरमान मिलना चाहिए जिससे हमारी कंपनी को इस राज्य में रहने का अधिकार मिले और हमारे देश इंग्लैंड से आने वाले सामान पर जो चुंगी ली जाती है, वह माफ कर दी जाए।”
बादशाह ने एक क्षण में ही डॉक्टर हेमिल्टन की मांगों को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार 1612 ई. में सर टॉमस रो ने जिस मुगल बादशाह जहांगीर को एक हुक्का देकर इस देश में अपनी कंपनी का राज्य खड़ा करने की नींव रखी थी उस घटना के सही एक सौ वर्ष पश्चात डॉक्टर हेमिल्टन के प्रयास से उस नींव पर एक भव्य भवन बनना आरंभ हो गया। यह अलग बात है कि भारतवासियों के लिए यह भवन कष्टकारी सिद्घ हुआ, पर डॉक्टर हेमिल्टन तो अपने मनोरथ में सफल हो ही गया।
1716 ई. में अमरसिंह की मृत्यु हो गयी तो उसके पश्चात मेवाड़ की गद्दी पर संग्राम सिंह द्वितीय बैठा। इसी प्रकार दिल्ली भी शीघ्र ही फर्रूखसियर के हाथों से निकल गयी। इस काल में देश में कोई सार्वभौम सत्ता न थी सर्वत्र अपनी-अपनी सत्ता स्थापित करने का संघर्ष था। उस संघर्ष का लाभ लेने के लिए अंग्रेजों ने भी स्वयं को एक पक्ष के रूप में प्रस्तुत कर दिया। जिस पर हम आगे चलकर प्रकाश डालेंगे।

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