जीवित माता पिता की प्रतिदिन सेवा करना ही सच्चा श्राद्ध ..मुनि पुरुषोत्तम वानप्रस्थ

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महरौनी (ललितपुर) । महर्षि दयानंद सरस्वती योग संस्थान आर्यसमाज महरौनी जिला ललितपुर के तत्वावधान में आर्यरत्न शिक्षक लखन लाल आर्य के संयोजकत्व में आयोजित वैदिक धर्म के मर्म को युवा पीढ़ी को परिचित कराने हेतु पिछले लमभग दो वर्षों से अनवरत चल रहे आर्यों का महाकुंभ कार्यक्रम में दिनांक 8 सितम्बर 2022 को “हमारे पितर और सामाजिक भ्रांतियां” विषय पर आर्य समाज महरौनी के संस्थापक/पुरोहित/प्रधान मुनि पुरुषोत्तम वानप्रस्थ (पंडित पुरुषोत्तम नारायण दुबे आर्य) ने कहा कि आज अधिकांश जन मानस में वेदों,शास्त्रों,उपनिषद आदि के पढ़ने पढ़ाने की रुचि न रहने से मानव समाज सत्य सनातन वैदिक धर्म के यथार्थ स्वरूप को भुला बैठा हैं परिणाम स्वरूप भूत प्रेत, गंडे ताबीज दिशा शूल,जन्म कुंडली गंगा गया आदि में पितरों के नाम पर अस्थि विसर्जन श्राद्ध तर्पण जैसे अनुपयोगी कर्म करने में लगा । जबकि हमारे समस्त धर्म ग्रंथों में जीवित दादा दादी माता पिता आचार्य आदि को पितर कहा हैं। जैसे निरुक्त में कहा हैं जो अन्न विद्या सुशिक्षा आदि से पालन पोषण और रक्षा करते हैं वे पितर कहलाते हैं। यजुर्वेद में महर्षि दयानंद कहते हैं जो अनेक विधाओं के जानने वाले पितर अर्थात ज्ञानी जन हैं वे हमारे घरों में आकर हमें उत्तम उपदेश दें। महर्षि मनु कहते है गृहस्थ्य जन अन्न जल दूध फल आदि से अपने पितर अर्थात माता पिता आदि बुजुर्गो से अत्यंत प्रेम के साथ प्रतिदिन श्राद्ध अर्थात श्रद्धा वा तर्पण यानी उनकी तृप्ति करें। ऋग्वेद के कहा हैं माता पिता ईश्वर से कामना करते हैं कि हे! परमात्मन हमारे बुढ़ापे में जब तक हमारे पुत्र पितर न बन जावे तब तक आप हमारी आयु को नष्ट मत करें। यहां पुत्रो को पितर अर्थात नाती पोते वाले होने को कहा हैं ।
यही गीता अध्याय 1/26में कहा अर्जुन ने युद्ध क्षेत्र में खड़े हुए पितृ अर्थात पितामह आचार्य मामा भ्राता आदि को देखा। इन सब प्रमाणों को देखकर भी हम मरे हुए लोगो के नाम पर उनकी आत्मा की शांति के लिए गंगा में अस्थि विसर्जन उनके नाम पर बड़े बड़े भोज कराते हैं जबकि शास्त्र कहते है कि जीवात्मा शरीर जिसको हम सब मिलकर जला देते हैं इसको छोड़ते ही तुरंत ईश्वर की व्यवस्था से उस मार्ग पर चला जाता हैं जैसा उसने कर्म किया होता हैं। हमने स्वर्ग नर्क की भी झूठी कल्पना कर ली। जबकि ये सब हमारे घरों में ही हैं । एक बात और भी है जीव शरीर के रहते तक ही हमारा हैं इसके उपरांत उससे हमारा कोई रिश्ता नहीं रहता। आओ हम सब इस पर विचार करें और जीवित पितरों अर्थात माता पिता आदि की सेवा सुश्रुवा से उन्हें सब दिन के लिए उन्हे प्रसन्न रखें यही हमारा उनके प्रति सच्चा श्राद्ध हैं। अर्थात जीवित माता पिता की सेवा करना ही सच्चा श्राद्ध वा तर्पण हैं।

कार्यक्रम की शुरुआत कमला हंस,,दया आर्या, चंद्रकांता आर्य अदिति आर्या ने सुंदर भजनों की प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
इस कार्यक्रम में प्रो. डॉ व्यास नंदन शास्त्री वैदिक बिहार,प्रेम सचदेवा दिल्ली,विवेकानंद प्रजापति शिक्षक,अवधेश प्रताप सिंह बैंस,बलराम सेन एड ललितपुर,शिशुपाल सेन शिक्षक,अनिल नरूला दिल्ली,देश- विदेश के सैकड़ों लोग जुड़कर लाभ उठा रहे हैं और युवा पीढ़ी को विशेष संदेश प्राप्त हो रहा है ताकि उनका जीवन वेदों की ओर लौटकर वैदिक धर्म को समझने में सक्षम हो सके।

कार्यक्रम का संचालन आर्यरत्न
शिक्षक लखनलाल आर्य ने किया और पं. पुरुषोत्तम मुनि वानप्रस्थ ने आभार प्रकट किया।

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