भाजपा का जुआ: मोदी के बदले बेदी

किरन बेदी का नाम भाजपा ने ज्यों ही दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर उछाला, मेरी तत्काल प्रतिक्रिया यही थी कि भाजपा ने एक बड़ा जुआ खेल लिया है। यह बात मैंने जज के तौर पर रजत शर्मा की अदालत में भी कह दी। लेकिन अब जबकि मतदान के लिए सिर्फ तीन दिन बचे हैं, दिल्ली की हवा बदली-बदली नजर आ रही है। पहले लग रहा था कि ‘आम आदमी पार्टी’ का जादू इस बार चलने वाला नहीं है लेकिन जब से किरन बेदी सामने आई हैं, सारी शतरंज ही उलट गई है। पिछले एक सप्ताह से मैं बाहर था। अब दिल्ली आने पर जिससे भी बात होती है, वही कहता है कि हम ‘आप’ को वोट देंगे। लगभग सभी जनमत सर्वेक्षण भी यही कह रहे हैं कि ‘आप’ को स्पष्ट बहुमत मिलेगा।

तो पिछले तीन-चार हफ्ते में ऐसा क्या हुआ, जिससे दिल्ली के लोगों का दिमाग पलटा खा गया है? यदि सचमुच भाजपा हार गई तो क्या होगा? किरन बेदी की वजह से नरेंद्र मोदी के सिक्के का पानी उतर गया है। नरेंद्र मोदी के नाम पर यदि दूसरे प्रांतों में अब भी वोट मिल रहे हैं तो दिल्ली में भी क्यों नहीं मिलते? मोदी से लोगों का मोह-भंग शुरु हो गया है लेकिन अभी भी उन्हें आशा है कि यह सरकार कुछ न कुछ तो जरुर करेगी। भाजपा नेताओं की कैसी मति मारी गई कि उन्होंने मोदी के बदले बेदी को खड़ा कर दिया। उस बेदी को, जो अरविंद केजरीवाल की न. 3 या न. 4 थी। अरविंद, प्रशांत, मनीष और किरन! मोदी के मुकाबले केजरीवाल पासंग भी नहीं हैं लेकिन केजरीवाल के मुकाबले किरन बेदी क्या है?

सचमुच केजरीवाल की छवि चमकाने में भाजपा के इस कदम ने जबर्दस्त योगदान किया है। केजरीवाल को भाजपा के महान रणनीतिकार अमित शाह का आभार मानना चाहिए। भाजपा ने बेदी को सिर पर चढ़ाकर अपने दिल्ली के सारे नेताओं और कार्यकर्ताओं को नीचे पटक मारा है। वे लोग बेमन से मैदान में हाथ-पांव मार रहे हैं। मोदी को अपना पूरा जोर लगाना पड़ रहा है। अब भी भाजपा हार गई तो यह किरन बेदी की नहीं, नरेंद्र मोदी की हार होगी।

भाजपा की हताशा इसी से प्रकट होती है कि उसने केजरीवाल के खिलाफ अपने तरकस का हर तीर खाली कर दिया है। हवाला का आरोप, जातिवाद, विज्ञापनों में फूहड़ भाषा का प्रयोग और इस स्थानीय चुनावों में प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष से लेकर मंत्रियों और सांसदों को झोंक कर भाजपा क्या सिद्ध कर रही है? क्या यह नहीं कि उसका दम फूल गया है? दुर्भाग्य यह है कि यह चुनाव न तो किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर लड़ा जा रहा है और न ही किन्हीं सिद्धांतों पर। इसीलिए इसका स्तर रोज नीचे गिरता चला जा रहा है। पता नहीं, अगले दो दिन में किन-किन आरोपों और प्रत्योरोपों की बौछार होगी? भाजपा ने एक संप्रदाय-विशेष, क्षेत्र-विशेष और जाति-विशेष को तो अपने से अलग कर ही लिया है। अब जो कंकाल उसके तहखाने से निकलेंगे, वे पता नहीं क्या-क्या नुकसान करेंगे? मुझे यह डर पहले दिन से लग रहा था कि कहीं यह जुआ भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर मंहगा न पड़ जाए?

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