पूजनीय प्रभु हमारे भाव उज्ज्वल कीजिए

पूजनीय प्रभो हमारे… अध्याय 1,

जब हम किसी भी शुभ अवसर पर या नित्य प्रति दैनिक यज्ञ करते हैं तो उस अवसर पर हम यह प्रार्थना अवश्य बोलते हैं :–

पूजनीय प्रभो हमारे, भाव उज्ज्वल कीजिये ।

छोड़ देवें छल कपट को, मानसिक बल दीजिये ।। 1।।

वेद की बोलें ऋचाएं, सत्य को धारण करें ।

हर्ष में हो मग्न सारे, शोक-सागर से तरें ।। 2 ।।

अश्व्मेधादिक रचायें, यज्ञ पर-उपकार को ।

धर्मं- मर्यादा चलाकर, लाभ दें संसार को || ३||

नित्य श्रद्धा-भक्ति से, यज्ञादि हम करते रहें |

रोग-पीड़ित विश्व के, संताप सब हरतें रहें ।। 4।।

भावना मिट जायें मन से, पाप अत्याचार की ।

कामनाएं पूर्ण होवें, यज्ञ से नर-नारि की ।। 5 ।।

लाभकारी हो हवन, हर जीवधारी के लिए ।

वायु जल सर्वत्र हों, शुभ गंध को धारण किये ।। 6।।

स्वार्थ-भाव मिटे हमारा, प्रेम-पथ विस्तार हो ।

‘इदं न मम’ का सार्थक, प्रत्येक में वयवहार हो ।। 7।।

प्रेमरस में मग्न होकर, वंदना हम कर रहे ।

‘नाथ’ करुणारूप ! करुणा, आपकी सब पर रहे ।।8 ।।

इस अध्याय में हम “पूजनीय प्रभु ! हमारे भाव उज्ज्वल कीजिए ” – प्रार्थना की इस प्रथम पंक्ति पर ही अपना चिंतन प्रस्तुत करेंगे । प्रार्थना की इस पंक्ति में मानो साधक अपने ईश्वर से कह रहा है कि अपने हृदय की आसुरी प्रवृत्तियों के साथ युद्घ में विजय पाने के लिए हे प्रभो ! हम में सात्विक वृत्तियां जागृत हों। क्षमा, सरलता, स्थिरता, निर्भयता, अहंकार शून्यता इत्यादि शुभ भावनाएं हमारी संपत्ति हों। हमारे शरीर स्वस्थ तथा परिपुष्ट हों। मन सूक्ष्म तथा उन्नत हों , जीवात्मा पवित्र तथा सुंदर हों , तुम्हारे संस्पर्श से हमारी सारी शक्तियां विकसित हों। हृदय दया तथा सहानुभूति से भरा रहे। हमारी वाणी में मिठास हो तथा दृष्टि में प्यार हो। विद्या तथा ज्ञान से हम परिपूर्ण हों। हमारा व्यक्तित्व महान तथा विशाल हो।

हे प्रभो! अपने आशीर्वादों की वर्षा करो, दीनातिदीनों के मध्य में विचरने वाले तुम्हारे चरणारविन्दों में हमारा जीवन समर्पित हो। इसे अपनी सेवा में लेकर हमें कृतार्थ करें। प्रात:काल की शुभबेला में हम आपके द्वार पर आये हैं, आपके बताये वेद मार्ग पर चलते हुए मोक्ष की ओर अग्रसर होते रहें, यही प्रार्थना है, इसे स्वीकार करो! स्वीकार करो!! स्वीकार करो!!! ओ३म् शांति: शांति: शांति:।

उपरोक्त प्रार्थना के शब्द जब किसी ईश्वरभक्त के हृदय से निकले होंगे तो निश्चय ही उस समय उस पर उस परमपिता परमेश्वर की कृपा की अमृतमयी वर्षा हो रही होगी। वह तृप्त हो गया होगा, उसकी वाणी मौन हो गयी होगी, उस समय केवल उसका हृदय ही परमपिता परमेश्वर से संवाद स्थापित कर रहा होगा। इसी को आनंद कहते हैं, और इसी को गूंगे व्यक्ति द्वारा गुड़ खाने की स्थिति कहा जाता है, जिसके मिठास को केवल वह गूंगा व्यक्ति ही जानता है, अन्य कोई नही। वह ईश्वर हमारे लिए पूज्यनीय है ही इसलिए कि उसके सान्निध्य को पाकर हमारा हृदय उसके आनंद की अनुभूति में डूब जाता है।

उस समय आनंद के अतिरिक्त अन्य कोई विषय न रहने से हमारे जीवन के वे क्षण हमारे लिए अनमोल बन जाते हैं और हम कह उठते हैं-‘हे सकल जगत के उत्पत्तिकर्त्ता परमात्मन ! इस अमृत बेला में आपकी कृपा और प्रेरणा से आपको श्रद्घा से नमस्कार करते हुए हम उपासना करते हैं कि हे दीनबंधु ! सर्वत्र आपकी पवित्र ज्योति जगमगा रही है। सूर्य, चंद्र, सितारे आपके प्रकाश से इस भूमंडल को प्रकाशित कर रहे हैं। भगवन ! आप हमारी सदा रक्षा करते हैं। आप एकरस हैं, आप दया के भंडार हैं, दयालु भी हैं, और न्यायकारी भी हैं। आप सब प्राणिमात्र को उनके कर्मों के अनुसार गति प्रदान करते हैं, हम आपको संसार के कार्य में फंसकर भूल जाते हैं, परंतु आप हमारा, कभी त्याग नही करते हो । हम यही प्रार्थना करते हैं कि मन, कर्म, वाणी से किसी को दुख न दें, हमारे संपूर्ण दुर्गुण एवं व्यसनों और दुखों को आप दूर करें और कल्याणकारक गुण-कर्म और शुभ विचार हमें प्राप्त करायें। हमारी वाणी में मिठास हो, हमारे आचार तथा विचार शुद्घ हों, हमारा सारा परिवार आपका बनकर रहे। आप हम सबको मेधाबुद्घि प्रदान करें, और दीर्घायु तक शुभ मार्ग पर हम चलते रहें, हम सुखी जीवन व्यतीत करें, हमें ऐसा सुंदर, सुव्यवस्थित और संतुलित जीवन व्यवहार और संसार प्रदान करो। हमारे कर्म भी उज्ज्वल और स्वच्छ हों।

सर्वपालक, सर्वपोषक, सारे जगत के रचने वाले पिता ! दुष्ट कर्मों से हमें बचाकर उत्तम बुद्घि और पराक्रम प्रदान कीजिए। हमको केवल आपका सहारा है, आपका आश्रय है, आपका संरक्षण है। हमारी कर्मेन्द्रियाँ तथा ज्ञानेन्द्रियां शुभ देखें और शुभ मार्ग पर चलें, शुभ सोचें तथा निष्काम भाव से प्राणीमात्र की सेवा करते हुए अंत में आपकी ज्योति को प्राप्त हों, संसार के सारे बंधनों से मुक्त होकर वास्तविक मुक्ति वा मोक्ष के अधिकारी हों।

परमेश्वर को हृदय सौंप दो

जब हम परमपिता परमेश्वर की गोद में बैठें तो उससे अपना सीधा और सरल संवाद स्थापित करें। ऐसा अनुभव करें कि जैसे हम अपने पिता की शरण में आकर उससे उसका आश्रय या संरक्षण मांग रहे हैं और मां की गोद जैसी अविचल शांति का अनुभव कर रहे हैं। वहां कोई न हो, केवल मैं और मेरा पिता हो। कोई मध्यस्थ न हो, कोई बिचौलिया न हो। न कोई मूर्ति हो और न कोई अन्य ऐसा माध्यम हो जो मेरे और उनके बीच में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न करे। सीधा हृदय से निकलने वाला संवाद हो, हृदय की बात हो। वेद, ज्ञान हमारे रोम-रोम में तू बसा हो पर वह भी प्यारे पिता और हमारे बीच में कोई दीवार न बन जाए। मेरे आनंद में किसी प्रकार की औपचारिकता का खलल डालने वाला कोई न बन जाए। मैं अपनी मां से सीधे बात करूं। उसमें शब्दों की बनावट या किसी प्रकार की दिखावट या अनावश्यक शब्दाडंबर की सजावट ना हो। क्योंकि वह दयालु मेरे हृदय के सरल शब्दों को बड़े ध्यान से सुनता है, और यह सत्य है कि मैं उससे जो कुछ मांगता हूं वह उसे हर स्थिति में और हर परिस्थिति में पूर्ण करता है। इसीलिए वह पूजनीय है कि वह दयालु है, वह कृपालु है, वह हृदय से निकली हुई हर प्रार्थना को सुनता है, और अपने भक्त की झोली को भरकर ही उसे अपने दर से उठाता है। जो सच्चे हृदय से उसे पूजनीय प्रभो का ध्यान करते हैं उनके भावों में उज्ज्वलता का प्राकट्य होने लगता है, उनके शब्दों में सरलता, हृदय में पवित्रता और कर्म में शुचिता का प्रदर्शन स्पष्ट दीखने लगता है।

मेरा संवाद जब परमपिता परमात्मा से चले तो मैं उसके समक्ष आनंदविभोर हो कह उठूं-

मधुमन्मे निष्क्रमणं मधुमन्मे परायणम्।

वाचावदामि मधुमद् भूयासं मधु सदृश।

(अथर्ववेद 1-34-3)

अर्थात हे परमात्मन देव @ आपकी कृपा से मेरी कार्यनिवृत्ति माधुर्य से युक्त हो। जब मैं अल्प समय के लिए विराम लूं, तथा मैं अपने कर्तव्यों को पूर्ण कर सकूं तब कोई भी चिंता, व्यथा, पश्चाताप अपूर्ण अभिलाषा मेरे हृदय में शेष न रहें। कोई व्यग्रता या कड़वाहट शेष न रह जाए। ”

किसी भी प्रकार की व्यग्रता या कड़वाहट हृदय में यदि शेष रह जाती है तो वह मानसिक शांति को भंग करती है और हमें चैन से नही रहने देती है, इसलिए यहां वेद का ऋषि परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करते हुए यही मांग रहा है कि मेरे हृदय में किसी प्रकार की कोई चिंता, व्यथा, पश्चाताप अपूर्ण अभिलाषा, व्यग्रता या कड़वाहट शेष न रह जाए।

हे भगवन ! आपकी कृपा से मेरी कार्य में प्रवृत्ति भी माधुर्य से युक्त हो, मैं बुरे भावों को धारण न करूं। बुरे कार्यों का आचरण न करूं। दुष्ट मनोरथों को लेकर किसी भी कार्य में मैं प्रवृत्त न होऊं। अपने साधनों तथा अपनी योग्यता का सदुपयोग करते हुए निरंतर आपकी दया और कृपा का पात्र बना रहूं। आपकी दया और कृपा का सदा आकांक्षी रहूं और मेरे जो भी कार्य संपन्न हों उन सबकी सफलता का श्रेय सहज भाव से आपकी दया और कृपा को देता रहूं ।

हे प्रभो! मेरी वाणी सत्य और माधुर्य से युक्त हो। आपकी कल्याणकारी वेदवाणी का पठन पाठन, श्रवण, मनन, निदिध्यासन, साक्षात्कार और उपदेश करने की मेरी माधुर्यमय शक्ति व सामर्थ्य उत्तरोत्तर बढ़ती रहे। मेरी स्मृतियां माधुर्य से युक्त हों। संकल्प और विकल्प मधुर हों।

भावना में भावुकता न हो

हे दयानिधे! मेरा जीवन शुद्घ पवित्र, उन्नत और पूर्ण स्वस्थ हो। मेरा व्यक्तित्व आकर्षक, स्निग्ध, सौम्य और मधुर हो। मेरे अंत:करण में राग और द्वेष की भट्टी न जले। काम और क्रोध के बवंडर मेरे अंतस्तल में न उठें। अहंकार और प्रलोभन मुझे पथभ्रष्ट न करें।

हे भगवन! आपके प्रेमी, आस्तिक पुरूषों और परोपकारी महात्माओं की संगति में रहकर मैं उत्साहपूर्वक अपने कर्तव्य का पालन कर सकूं, ऐसी शक्ति सामर्थ्य , साधन, यजन और भजन मुझे दीजिए।

सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए और इसी भाव से ओत-प्रोत रहकर मैं अपने जीवन को सफल बना सकूं। जीवन के परमलक्ष्य को पा सकूं ऐसा अनुपम साहस और उत्साह मेरे हृदय में हर क्षण भरा रहे।

हे दीनानाथ ! मुझे मधुरता प्रदान करो। निर्दोषता प्रदान करो। निर्भयता प्रदान करो। हे देवों के देव! सबके स्वामिन ! हे घटघट के वासिन ! मुझे मोक्ष प्रदान करो। मधुर बना दो। मधुमय बना दो। हे मेरे प्रियतम! तुझ सा बन जाऊं। हे मधुमय! मैं भी मधुमय बन जाऊं। ’’

ईश्वर हमारे हृदय से निकली ऐसी प्रार्थनाओं को सुनता है, और इतनी शीघ्रता से सुनता है कि इधर आप कहना आरंभ करो और उधर अपने आचार विचार, व्यवहार कार्यशैली और जीवन में एक मनोहारी परिवर्तन होता अनुभव करो।

कितना दयालु है मेरा दाता कि अपने पास कुछ नही रखता। सवाया करके हमें ही लौटा देता है। इसीलिए वह यज्ञरूप है। जैसे यज्ञ में हम जो कुछ भी समर्पित करते हैं, उसे यज्ञ अपना बनाकर अपने पास नही रखता, अपितु उसे हमारी ओर से संसार के कल्याण हेतु सवाया ही नही हजारों गुना अधिक करके लोक-कल्याण के लिए लौटा देता है। वैसे ही हमारा परमपिता परमात्मा है, जो हमारी प्रार्थनाओं को हमें ही लौटा देता है। वह हमारी प्रार्थनाओं से हमें ही संपन्न करता है, हमें ही प्रसन्न करता है, हमें ही समृद्घ करता है और हमें ही उन्नत करता है। हमारी प्रार्थना की भावना यज्ञमयी हो जाए तो उस यज्ञरूप प्रभु का यही स्वरूप हमारे रोम-रोम में अपना प्रकाश भरने लगता है। हमारा रोम-रोम पुलकित हो उठता है और हम कह उठते हैं-

‘‘जिधर देखता हूं

उधर तू ही तू है,

कि हर शै में आता

नजर तू ही तू है।’’

प्रार्थना में भावना में संयोग अति आवश्यक है। क्योंकि-

‘‘भावना में भाव ना हो

भावना ही क्या रही।

भावना तो भाव ना-ना

से सदा होती सही।।’’

हम भावना से भावुकता को दूर रखें। यदि हमने भावना में भावुकता का सम्मिश्रण कर दिया तो अनर्थ हो जाएगा। सर्वत्र अनिष्ट ही अनिष्ट दिखाई देगा। रावण अपनी बहन सूपनखा द्वारा यह बताये जाने पर कि राम ने उसका विवाह प्रस्ताव नही माना है और इस प्रकार उसने मेरा तो अपमान किया ही है साथ ही आप जैसे प्रतापी शासक का भी अपमान (अर्थात नाक काट दी है) किया है, भावना में भावुकता का सम्मिश्रण कर गया , जिससे उसका विवेक मर गया। परिणाम क्या आया, यह बताने की आवश्यकता नही है।

भावना से भावुकता का मिलन होना ही अभावना का जन्म होता है। रावण के साथ जो कुछ हुआ वह उसकी अभावना ही थी। ऐसा साधक या भक्त कहीं जड़ को चेतन मान लेता है तो कहीं चेतन को जड़ मान लेने की भूल कर बैठता है। जड़मूर्ति में चेतन परमेश्वर की भावना करना ऐसी ही भावुकता का परिणाम होता है। यह भावना नही अभावना है। जो जैसा है, उसे वैसा ही मानना या जानना ही सच्ची भावना है। ऐसी सच्ची भावना तभी बनती है जब हमारी प्रार्थना निष्कपट, सरल और पवित्र होती है, और जब हमारी प्रार्थना में ‘स्व’ के स्थान पर ‘पर’ कल्याण की कामनाएं बलवती हो उठती हैं।

भावना राष्ट्रीय हो

जब व्यक्ति ऐसी कामनाओं और प्रार्थनाओं के वशीभूत होकर कार्य करने लगता है तब वह ‘राष्ट्रीय’ हो जाता है। राष्ट्रीय होने का अभिप्राय किसी प्रकार से राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो जाना नही है, अपितु राष्ट्रीय होने का अर्थ है सर्वमंगल कामनाओं से भर जाना और सर्वोत्थान के लिए कार्य करना। अपनी सोच में या अपनी भावना में या अपनी कृति में किसी जाति को, किसी संप्रदाय को या किसी क्षेत्र विशेष को प्राथमिकता न देना ही राष्ट्रीय हो जाना है। यदि राष्ट्रीय स्तर पर किसी की प्रसिद्घि हो जाना ही राष्ट्रीय होने का प्रमाण होती तो ऐसे बहुत से डकैत, अपराधी या आतंकी हो गये हैं या वर्तमान में हैं जिन्हें देश ही नही विश्व भी जानता है, पर उन्हें कोई राष्ट्रीय नही कहता। यहां तक कि उन्हें कोई सामाजिक भी नही कहता। इसके विपरीत उन्हें या तो राष्ट्रद्रोही कहा जाता है या समाजद्रोही कहा जाता है। कारण कि उनकी भावना पवित्र नही है, उनकी भावना में नीचता है, निम्नता है, वह यज्ञरूप प्रभो के उपासक नही हैं। वह यज्ञरूप प्रभो के याज्ञिक स्वरूप को नही ध्याते, नही भजते और नही जपते।

हमारे यहां अश्वमेध यज्ञ की परंपरा इसीलिए रही है कि व्यक्ति जब राष्ट्र, जाति और देश के लिए अपने आप से राष्ट्र को महान समझकर राष्ट्रहित में सर्वस्व समर्पण की भावना से भर जाए, ओत-प्रोत हो जाए तब वह अश्वमेध यज्ञ करने का पात्र बनता है। इसी लिए कहा गया है-‘‘राष्ट्रं वै अश्वमेध:’’ इस प्रकार राष्ट्रीय होने का अभिप्राय है याज्ञिक होना और याज्ञिक होने का अर्थ है-यज्ञरूप प्रभु का उपासक होना। जैसे उस परमपिता-परमेश्वर के सारे भण्डार इस विशाल जगत के लिए हैं, इसके प्राणधारियों के लिए हैं, वैसे ही राष्ट्रीय व्यक्ति के पास या किसी यज्ञ पुरूष के पास जो कुछ भी होता है वह राष्ट्र के लिए होता है। भारत में कितने ही सम्राट हो गये हैं, जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ किये और अपना सर्वस्व राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया।

इस प्रकार हमारे पूर्वजों ने यज्ञ को राष्ट्रीय बनाकर जीवन जिया। यज्ञ के अनुरूप अपनी भावनाएं बनायीं और अपने पास अपना कुछ न समझकर जो कुछ भी था उसे लोककल्याण के लिए समर्पित कर दिया। इसका कारण यही था कि हम यज्ञमय थे और अपना सर्वस्व प्राणिमात्र के लिए होम करने वाले प्रभो के उपासक थे। जैसा हमारा प्रभु था, या दाता था वैसी ही हमारी भावनाएं थीं। यह था हमारे यज्ञ का आधार और यह थी हमारी प्रार्थना की ऊंचाई।

जब भक्त प्रार्थना की इस ऊंचाई को अनुभव कर लेता है या उसे स्पर्श कर लेता है तब वह कह उठता है :-

‘ओ३म् तच्चक्षुर्देवहितम् पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम् शरद: शतं जीवेम् शरद: शतं श्रणुयाम् शरद: शतं प्रब्रवाम् शरद: शतमदीना: स्याम् शरद: शतं भूयश्च शरद: शतात्।।’

(यजु. 36/24)

यहां भक्त कह रहा है कि हे स्वप्रकाश स्वरूप प्रकाशमान सर्वेश्वर ! आप सबके दृष्टा सब को देखने वाले और जानने वाले देवों के परम हितकारक तथा पथ प्रदर्शक हैं। सृष्टि से पूर्व वर्तमान तथा प्रलय के अनंतर भी वर्तमान रहने वाले विज्ञानस्वरूप आप अनादि रूप से सब कालों में विद्यमान हैं। प्राणिमात्र को ऊपर उठाने वाली तथा उनकी उन्नति में सहायक शक्तियों को बीज रूप में आपने स्वकृपा से, सबको प्रदान कर रखा है। हे प्रभु ऐसी कृपा करो कि आपके सहाय व स्वपुरूषार्थ से हम इन शक्तियों का जीवन पर्यन्त सदुपयोग करते रहें।

आपकी ही कृपा से हम आपके आनंदमय स्वरूप का ध्यान शतायु पर्यंत करते रहें। हमारी देखने, परखने, अनुभव करने तथा ज्ञान वर्धन करने वाली समस्त शक्तियां निरंतर विकसित होती रहें, अपने जीवन को हम सौ वर्षों तक जीवंत अर्थात कार्यकुशल बनाये रखें। कानों से और वाणी से आप ही का वेद ज्ञान हम सौ वर्ष पर्यंत सुनें तथा सुनाते रहें। आपकी ही सामीप्यता हर समय अनुभव करते हुए सौ वर्ष तक अदीनतापूर्वक जीवनयापन हम करते रहें। कभी भी किसी के पराधीन न हों। आपकी कृपा से यदि सौ वर्ष से भी अधिक आयु हमको प्राप्त हो तो भी हम आपकी छत्र छाया में ही स्वाधीनता पूर्वक विचरें। आपके दर्शन में मग्न हमारी आत्मा सदा (शांत) रहे यही हमारी आपसे बारंबार प्रार्थना है।

वेद का ऋषि केवल सौ वर्ष तक जीने की इच्छा नहीं कर रहा , अपितु वह साफ कह रहा है कि सौ वर्ष से भी अधिक वर्ष तक हम अपनी इन कर्मेंद्रियों और ज्ञानेंद्रियों से सफलतापूर्वक कार्य संपादन करते रहें। जब इंद्रियां व्यसनों में फंस जाती हैं तो मनुष्य के मनुष्यत्व को पटक – पटक कर मारती हैं और उसका सर्वनाश कर डालती हैं । वेद का ऋषि व्यक्ति को ऐसी दुर्दशा से बचाने के लिए यहां पर यह प्रार्थना कर रहा है कि हमारी प्रत्येक ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रीय में ऐसी शक्ति व सामर्थ्य प्रदान करो जो हमें उन्नत जीवन जीने में सहायता प्रदान करने वाली हो।

तब इंद्रियां भी वश में हो जाती हैं

कर्मेद्रियां और ज्ञानेंद्रियां तभी हमारे नियंत्रण में रह सकती हैं जब भावों में उज्जवलता होगी। यदि भावों की उज्ज्वलता समाप्त हो गई तो ज्ञानेंद्रियां और कर्मेद्रियां स्वयं ही पथभ्रष्ट हो जाएंगी । क्योंकि ज्ञानेंद्रियों और कर्मेद्रियों का संबंध सूक्ष्म रूप से हमारे भावों के सूक्ष्म जगत से है । यदि भावों का सूक्ष्म जगत बिगड़ जाता है तो कर्मेद्रियां और ज्ञानेंद्रियां अपने आप बिगड़ जाती हैं । क्योंकि यह सब मन के द्वारा संचालित होती हैं और मन भावों से संचालित होता है। यही कारण है कि हमारे ऋषि लोगों ने भावों की उज्ज्वलता को अधिक महत्वपूर्ण माना है । उन्होंने इस विज्ञान को समझा और गहराई से अनुभव किया कि भावों की उज्ज्वलता से ही बाहर का संसार बनता है । इसलिए इस प्रार्थना की प्रथम पंक्ति अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है । इस पर जितना ही अधिक चिंतन मनन किया जाएगा , उतना ही यह हमारे जीवन पर सार्थक और सकारात्मक प्रभाव डालने में सक्षम व सफल होगी।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: