हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज

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शिवाजी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी दीप्ति से भारत का समकालीन इतिहास आज भी दीप्तिमान है । शिवाजी एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनके नाम से आज भी इस देश के युवा प्रेरणा लेते हैं । ऐसे महानायक को कुछ षड्यंत्रकारी इतिहासकारों ने बहुत ही संकीर्ण दृष्टिकोण से देखने का राष्ट्रघाती प्रयास किया है । जिस कारण इस महानायक का संपूर्ण व्यक्तित्व भारतीय इतिहास में वह स्थान नहीं प्राप्त कर पाया है जिसका वह पात्र था । 
भारत के स्वाधीनता के दीर्घकालिक संघर्ष को शिवाजी महाराज के पुरुषार्थ ने जितनी ऊंचाई दी उतनी किसी अन्य महापुरुष के महान कार्यों से उसे ऊंचाई नहीं मिल पाई । यह अकेले शिवाजी थे , जिन्होंने 1674 में जिस मराठा साम्राज्य की स्थापना विदेशी मुगलों को भारत से भगाने के संकल्प के साथ की थी , वह साम्राज्य भारत में 2800000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैल गया था । 2800000 वर्ग किलोमीटर का यह क्षेत्रफल आज के 3200000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैले हुए भारतवर्ष से मात्र 400000 वर्ग किलोमीटर ही छोटा था । 
अतः पाठक अनुमान लगा लें कि हम जिस महानायक के बारे में अब यहां बात करने लगे हैं उस महानायक के महान प्रयासों से यह भारतवर्ष 1947 में मिली तथाकथित आजादी से बहुत पहले स्वाधीन हो चुका था । यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि इतिहासकारों ने और स्वयं हमने इस महानायक के प्रयास को भारतीय स्वाधीनता का आंदोलन स्थापित नहीं किया या माना नहीं । जिसका परिणाम यह निकला कि हम अपने स्वर्णिम इतिहास से और अपने महानायकों के उल्लेखनीय कार्यों से वंचित होकर रह गए ।
शिवाजी महाराज के जीवन पर यदि निष्पक्ष होकर चिंतन और विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि वह भारत में भारतीयता के अनुकूल उसी राजनीतिक सिद्धांत के आधार पर उसी राजनीतिक प्रणाली को स्थापित कर देना चाहते थे जो भारत के लोगों के मौलिक अधिकारों की हितचिंतक तो हो ही साथ ही वह मानवता की भी हित चिंतक हो । वह चाहते थे कि राजा और शासक वर्ग प्रजाहितचिंतक हो और प्रजा के मौलिक अधिकारों का शोषण करने के विरुद्ध हो । उनका उद्देश्य था कि राज्य शासन ऐसे लोगों के हाथों में जाए जो जनता के मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले हों । यही कारण रहा कि वह उपनिवेशवादी और साम्राज्यवाद व्यवस्था को उखाड़ फेंक कर भारत के प्राचीन ऋषियों के द्वारा स्थापित की गई प्रजा हित चिंतक शासन प्रणाली को भारत में लागू करना चाहते थे । 
ऐसे ही एक महान योद्धा और रणनीतिकार थे – छत्रपति शिवाजी महाराज । इस पुस्तक के पहले अध्याय में हम शिवाजी महाराज के उन महान कार्यों पर प्रकाश डालेंगे जिनके कारण वह छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से हमारे देश के राष्ट्रवादी लोगों के हृदय में आज तक राज करते हैं और आज भी इस देश के करोड़ों लोगों को उस शासन व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं जो लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में या तो असफल हो गई हो या लोगों की मौलिक आवश्यकताओं को पूरा करने में अपने आप को अक्षम अनुभव कर रही हो ।
शिवाजी जी ने कई वर्षों तक मुगलों के साथ युद्ध किया था । सन 1674 ई. में वह ऐतिहासिक पल आए थे जब रायगढ महाराष्ट्र में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक किया गया था, तब से उन्हें छत्रपति की उपाधि प्रदान की गयी थीं । इनका पूरा नाम शिवाजी राजे भोसलें था और छत्रपति इनको उपाधि में मिली थी । उनका संकल्प था कि मैं अपने देश के लोगों को प्रजा के प्रति समर्पित और उत्तरदाई शासन प्रदान करूंगा । मैं हर संभव प्रयास करूंगा कि अपने देशवासियों के मौलिक अधिकारों का हनन करने वाली प्रत्येक राजनीतिक सत्ता और विशेषकर विदेशी सत्ता को भारत से उखाड़ फेंकूँगा । जिससे कि मेरे देशवासियों का सम्मान सुरक्षित रह सके और वह अपने आप को स्वतंत्र अनुभव कर सकें । यही कारण था कि शिवाजी महाराज ने अपनी सेना, सुसंगठित प्रशासन इकाईयों की सहायता से एक योग्य एवं प्रगतिशील प्रशासन प्रदान किया था । 
कुछ लोगों ने शिवाजी पर एक साम्राज्यवादी शासक होने का आरोप लगाया है । ऐसे इतिहासकारों की संकीर्ण मानसिकता का हमें पर्दाफाश करना चाहिए । यदि शिवाजी साम्राज्यवादी शासक होते तो वह प्रजा के प्रति उत्तरदायी शासन की स्थापना कभी नहीं करते । न ही कभी भारत के प्राचीन राजनीतिक सिद्धांतों के अनुकूल प्रजा हितचिंतक शासन प्रणाली का चिंतन करते और दूसरी बात यह भी कि यदि शिवाजी महाराज साम्राज्यवादी शासक होते तो वह अपने बाद की आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक भी कभी नहीं बनते।
शिवाजी महाराज ने भारतीय समाज के प्राचीन हिन्दू राजनैतिक प्रथाओं और मराठी एवं संस्कृत को राजाओं की भाषा शैली बनाया था । कुछ शत्रु मानसिकता के इतिहासकारों ने शिवाजी की इस बात के लिए आलोचना की है कि उन्होंने अपने शासन को प्राचीन हिंदू प्रथाओं के अनुकूल चलाने का प्रयास किया । ऐसे अज्ञानी इतिहासकारों के भ्रमजाल से हमें अपने आप को बचाना चाहिए । हमें यह मानना और जानना चाहिए कि भारत की प्राचीन वैदिक शासन प्रणाली में कहीं भी सांप्रदायिक संकीर्णता नहीं मिलती । यही कारण रहा कि शिवाजी महाराज ने अपने शासनकाल में किसी भी मुस्लिम के विरुद्ध इस आधार पर कोई अत्याचार नहीं किया कि वह उसकी प्रजा में रहकर किसी विपरीत धर्म को अपनाता है ? 
शिवाजी महाराज अपने शासनकाल में बहुत ही नीति निपुण प्रजावत्सल और प्रजा के हित चिंतन में लगे रहने वाले राजा थे । वह साम्राज्यवादी शक्तियों के विरोधी थे और उन आततायी लोगों का विनाश कर देना चाहते थे जो भारत को और भारत के लोगों को अपने शासन के अधीन रख कर उन पर अत्याचार करना अपना मौलिक धर्म समझते थे । यही कारण रहा कि लोगों ने शिवाजी महाराज के जीवन चरित्र से शिक्षा लेते हुए भारत की आजादी में अपना रक्त तक बहा दिया था ।

शिवाजी महाराज का आरम्भिक जीवन :

हमारे इस इतिहासनायक और भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महान सेनापति शिवाजी महाराज का जन्म 19 फ़रवरी 1630 ( कुछ लोगों का मानना है कि शिवाजी महाराज का जन्म वर्ष 1627 है ) में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था । इनके पिता का नाम शाहजी भोसलें और माता का नाम जीजाबाई था । जीजाबाई एक महान नारी थीं । जिन के भीतर देशभक्ति और अपने देश के प्रति समर्पित होने का भाव कूट-कूट कर भरा था । माता जीजाबाई के यह संस्कार कालांतर में उनके पुत्र शिवाजी के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए । जिनसे प्रेरित होकर शिवाजी ने अपना जीवन देश , धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया ।
शिवाजी का जन्म स्थल शिवनेरी दुर्ग पुणे के पास है । शिवाजी का अधिक जीवन अपनी माता जीजाबाई के साथ बीता था । शिवाजी महाराज बचपन से ही अपनी माता के विचारों से प्रेरित हो चुके थे । जिसके कारण उनके भीतर बौद्धिक चातुर्य कूट-कूट कर भर गया था । विपरीत परिस्थितियों में कैसे अपने आप को शत्रु की चालों से बचा लेना है और कैसे अपनी रक्षा करते हुए अपने लोगों की भी रक्षा करनी है ? – ऐसा उन्होंने बचपन से ही सीखना आरंभ कर दिया था । शिवाजी ने बचपन से ही युद्ध कला और राजनीति की शिक्षा प्राप्त कर ली थी । 
भोसलें एक मराठी क्षत्रिय हिन्दू राजपूत की एक जाति हैं । कुछ लोगों का यह भी मानना है कि गुर्जर जाति में मिलने वाला बैसला गोत्र इसी भोंसले का अपभ्रंश है । शिवाजी के पिता भी बहुत साहसी और शूरवीर थे । यद्यपि कुछ परिस्थितियां ऐसी रहीं कि शिवाजी अपने पिता से अधिक कहीं अपनी माता जीजाबाई से अधिक प्रेरित रहे। शिवाजी महाराज के लालन-पालन और शिक्षा में उनके माता और पिता का बहुत ही अधिक योगदान रहा है । उनकी माता जीजाबाई शिवाजी को बचपन से ही युद्ध की कहानियां तथा उस युग की घटनाओं को बताती थीं । विशेष रूप से जीजाबाई उन्हें रामायण और महाभारत की प्रमुख कहानियाँ सुनाती थी । जिन्हें सुनकर शिवाजी के ऊपर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा था । मां चाहती थी कि शिवाजी बड़े होकर एक स्वतंत्र राज्य की नींव रखें , वह चाहती थीं कि उनकी कोख से पैदा हुआ शिवा बड़ा होकर किलों को जीतने वाला महान और शूरवीर शासक बने और देश के भीतर चल रही क्रूर राजशाही को उखाड़कर प्रजा के प्रति उत्तरदायी शासन की नींव रखने में सक्षम और सफल हो ।
शिवाजी महाराज का विवाह 14 मई 1640 में सईबाई निम्बलाकर के साथ हुआ था ।

शिवाजी महाराज का सैनिक वर्चस्व :

हिंदी में एक कहावत है कि ” होनहार बिरवान के होत चिकने पात “। कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं कि ” सपने वही सही होते हैं जो व्यक्ति को सोने नहीं देते ।” बात दोनों अपनी जगह सही हैं। इनका मूल अर्थ है कि जो लोग प्रतिभा संपन्न होते हैं , उनकी प्रतिभा उन्हें ऊपर उठने के लिए और बड़ा कुछ करने के लिए सदैव प्रेरित करती रहती है । एक लेखक इसलिए लेख नहीं लिखता कि उसे लेख लिखना है , अपितु वह इसलिए लेख लिखता है कि उसके भीतर की प्रतिभा उसे लेख लिखने के लिए प्रेरित करती है । वह बीमार होता है तो भी वह उसे लेख के लिए उठा लेती है , वह किसी विपरीत परिस्थिति में भी फंसा होता है ,तो भी वह उसे लिखने के लिए कहती रहती है कि लिख , लिख और अच्छा लिख। यही स्थिति किसी कवि की होती है। जब वह अपनी मां के वियोग में तड़प रहा होता है , तो भी उसके भीतर छिपी हुई उसकी प्रतिभा उसे लिखने के लिए प्रेरित करती है और जब वह कहीं पुरस्कृत हो रहा होता है तो भी उसकी प्रतिभा उसे लिखने के लिए प्रेरित करती है । अंतर केवल इतना होता है कि जब मां के वियोग में कवि वेदनाग्रस्त होता है तो लेखनी वेदना में विलीन हो जाती है ,और जब कहीं पुरस्कृत हो रहा होता है तो वही लेखनी वेद में विलीन हो जाती है । यही कारण है कि कवि कभी वेदना के स्वर निकालता है तो कभी वह वेद के गीत गाकर अपनी मस्ती प्रकट करता है । यही किसी शूरवीर साहसी सेनानायक की स्थिति होती है । वह बचपन से ही ऐसे सपने देखने लगता है , अर्थात उसकी प्रतिभा उसे ऊंचा उठने और महान कार्य के माध्यम से समाज में अपना स्थान बनाने के लिए प्रेरित करती रहती है। 
शिवाजी के साथ भी अब कुछ ऐसा ही होने लगा था । बालक शिवाजी ने जब किशोरावस्था की दहलीज पर अपने कदम रखे तो उसकी प्रतिभा भी उसे ऊंचा उड़ने के लिए प्रेरित करने लगी ।सन 1640 और 1641 के समय बीजापुर महाराष्ट्र पर विदेशियों और राजाओं के आक्रमण हो रहे थे । शिवाजी महाराज मावलों को बीजापुर के विरुद्ध इकट्ठा करने लगे । मावल राज्य में सभी जाति के लोग निवास करते हैं, कालांतर में शिवाजी महाराज ने इन मावलो को एक साथ परस्पर मिलाया और मावला नाम दिया । इन मावलों ने कई सारे दुर्ग और महलों का निर्माण करवाया था ।
इन मावलो ने शिवाजी महाराज का जीवन भर हर विपरीत परिस्थिति में साथ दिया । बीजापुर उस समय पारस्परिक संघर्ष और मुगलों के युद्ध से पीड़ित था । जिस कारण उस समय के बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने बहुत से दुर्गो से अपनी सेना हटाकर उन्हें स्थानीय शासकों के हाथों में सौप दिया था ।
तभी अचानक बीजापुर के सुल्तान बीमार पड़ गए थे । इसी स्थिति का लाभ उठाकर बीजापुर के कई दुर्गों पर शिवाजी महाराज ने अपना अधिकार जमा लिया था । शिवाजी ने बीजापुर के दुर्गों को हथियाने की नीति अपनायी और पहला दुर्ग तोरण के दुर्ग को अपने नियंत्रण में ले लिया था । इस प्रकार शिवाजी ने अपने भविष्य का संकेत तोरण दुर्ग को जीत कर दे दिया कि वह किसी किले का किलेदार बनकर किसी किले के स्वामी को शीश झुकाना नहीं चाहता , अपितु इसके विपरीत वह अनेकों दुर्गों का स्वामी बनकर अनेकों क्रूर बादशाहो और राजाओं को अपने सामने झुका देखने में ही आनंद अनुभव करता है। 

शिवाजी महाराज का किलों पर अधिकार :

शिवाजी अपने बौद्धिक चातुर्य और कूटनीतिक दृष्टिकोण के लिए भी इतिहास में जाने जाते हैं । उन्होंने जीवन भर कितने ही अवसरों पर अपनी बौद्धिक क्षमताओं का अनेकों बार प्रदर्शन किया । तोरण दुर्ग को जीतकर उन्होंने न केवल अपनी बौद्धिक चतुरता का प्रदर्शन किया , अपितु उसके पश्चात उन्होंने अपने कूटनीतिक विवेक का भी प्रयोग किया ।
तोरण का दुर्ग पूना (पुणे) में हैं । शिवाजी महाराज ने सुल्तान आदिलशाह के पास अपना एक दूत भेजकर समाचार भिजवाया कि यदिआपको अपना किला वापिस चाहिए तो इसके लिए आपको हमें बड़ी भारी धनराशि चुकानी होगी । यदि आप में एक बड़ी धनराशि इस दुर्ग के बदले में हमें दे देते हैं तो हम आपको आपका विजित क्षेत्र भी लौटा देंगे। शिवाजी महाराज ने अपनी कूटनीतिक क्षमताओं का प्रदर्शन करते हुए आदिलशाह के दरबारियों को पहले से ही खरीद लिया था ।
वास्तव में आदिल शाह को ऐसा कोई आभास नहीं था कि उसके पड़ोस से एक छोटा सा बालक उठेगा और वह भविष्य के एक हिंदू साम्राज्य की स्थापना का श्री गणेश उसी के एक किले को जीतकर कर देगा। अतः शिवाजी जी के इस प्रकार के साम्राज्य विस्तार की नीति की भनक जब आदिलशाह को लगी तो वह देखता ही रह गया । 
अपनी अपरिमित संकल्पशक्ति को साथ लेकर उठे शिवाजी नाम के इस बालक का सामना करने का साहस आदिलशाह के भीतर नहीं हो पाया । इसी से पता चलता है कि शिवाजी बचपन से ही कितने शूरवीर और साहसी थे ? – उनका संकल्प राष्ट्रभक्ति के लिए था , देशभक्ति के लिए था और अपने देशवासियों के लिए था । उनकी नीति व नियत सभी बहुत स्पष्ट थे । यही कारण था कि ईश्वर की अनुकंपा उनका साथ दे रही थी । यही कारण है कि आदिलशाह जैसा शासक उनका सामना करने के लिए नहीं आया। उसने शाहजी राजे को अपने पुत्र को नियंत्रण में रखने के लिये कहा । लेकिन शिवाजी महाराज ने अपने पिता की चिन्ता किये बिना अपने पिता के क्षेत्र का प्रबन्ध अपने हाथों में ले लिया और आदिलशाह को लगान देना भी बंद कर दिया था ।
शिवाजी के लिए यह बहुत ही शुभ संयोग रहा कि उनका सामना पहली बार आदिलशाह जैसे दुर्बल शासक से हुआ । जिसने उनकी बढ़ती शक्ति का उचित प्रतिरोध नहीं किया । इस कारण शिवाजी का मनोबल बढ़ गया और वह जिस दिशा में जिस उद्देश्य के साथ आगे बढ़ना चाहते थे , उसमें निरापद आगे बढ़ने लगे।
वे 1647 ई. तक चाकन से लेकर निरा तक के भू-भाग के भी स्वामी बन चुके थे । अब शिवाजी महाराज ने पहाड़ी क्षेत्रों से मैदानी क्षेत्रों की ओर चलना आरम्भ कर दिया था । शिवाजी जी ने अपनी शक्ति का विस्तार करते हुए और अपने महान उद्देश्य में सफलता के कीर्तिमान स्थापित करते हुए कोंकण और कोंकण के 9 अन्य दुर्गों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था । शिवाजी महाराज को अपने जीवन में कई देशी और कई विदेशियों राजाओं के साथ-साथ युद्ध करना पड़ा था , जिनमें सफल भी हुए थे । 

शाहजी की बंदी और युद्ध बंद करने की घोषणा:

बीजापुर के सुल्तान के लिए सांप – नेवले की स्थिति हो गई थी । वह शिवाजी से युद्ध नहीं कर सकता था , पर शिवाजी जिस प्रकार अपनी शक्ति का विस्तार करते जा रहे थे , वह भी उसके लिए असहनीय स्थिति बन चुकी थी । अतः उसने शिवाजी को नियंत्रण में रखने के लिए एक युक्ति का सहारा लिया । वास्तव में वह युक्ति उसकी दुर्बलता का प्रतीक थी । इससे पता चलता है कि वह शिवाजी का सीधे सामना करने से बचता था या कहिए कि शिवाजी का सीधा सामना करने से घबराता था । तब उसने सोचा कि क्यों न शिवाजी के पिता को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाए और उस स्थिति का मनोवैज्ञानिक दबाव शिवाजी पर डालकर शिवाजी को इस बात के लिए बाध्य किया जाए कि वह आदिल शाह को भविष्य में किसी प्रकार से उत्पीड़ित नहीं करेगा ? 
अपनी इस योजना को सिरे चढ़ाने के लिए बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने शिवाजी महाराज के पिता को बंदी बनाने का आदेश दे दिया । शिवाजी के पिता शाहजी उस समय कर्नाटक राज्य में थे । सुल्तान आदिलशाह के गुप्तचरों ने उनका वहां पर जाकर सावधानी से पीछा किया और एक दिन घात लगाकर शाह जी को गिरफ्तार कर लिया । सुल्तान आदिलशाह इसी स्थिति की प्रतीक्षा में था । वह चाहता था कि किसी प्रकार शाहजी उसकी जेल में लाकर डाल दिए जाएं , तो वह शिवाजी से अपनी शर्त मनवाने के लिए उन्हें बाध्य करे । उसने ऐसा ही किया भी । फलस्वरूप उनके पिता को एक शर्त पर रिहा किया गया कि शिवाजी महाराज बीजापुर के किले पर आक्रमण नहीं करेगा । ऐसी शर्त को मनवा कर आदिलशाह को मानो जीवनामृत ही मिल गया था । अब वह इस बात से निश्चिंत हो गया था कि शिवाजी उसके राज्य पर भविष्य में कोई आक्रमण नहीं करेंगे । सुल्तान के इस कार्य को हमारे कुछ इतिहासकारों ने इस प्रकार प्रदर्शित करने का प्रयास किया है कि जैसे उसने बड़े प्यार से और अपनी ओर से अत्यधिक उदारता दिखाते हुए शिवाजी को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वह शांतिपूर्वक उसे शासन करने दे , परंतु यदि इसको एक इतिहासकार के दृष्टिकोण से और तत्कालीन परिस्थितियों में अपने आप को निरपेक्ष भाव से खड़ा होकर देखा जाए या देखने का प्रयास किया जाए तो सुल्तान आदिलशाह शिवाजी के बढ़ते हुए वर्चस्व और सैनिक शक्ति से आतंकित था । बस , यही वह स्थिति है जो शिवाजी को बचपन से ही किसी महान शासक के गुणों से भर देती है । जिससे पता चलता है कि शिवाजी बचपन से ही उन राजकीय गुणों से भरे हुए थे जो उन्हें भविष्य के एक महान साम्राज्य का संस्थापक बनाने जा रहे थे । 
शिवाजी महाराज ने जब अपने पिता को आदिलशाह से उपरोक्त शर्त को मानकर रिहा करा लिया तो अपने कर्तव्य का पालन करते हुए उन्होंने भी अगले 5 वर्षों तक कोई युद्ध नहीं किया और तब शिवाजी अपनी विशाल सेना को सुद्रढ़ करने में लगे रहे । 

शिवाजी महाराज का राज्य विस्तार :

यदि शिवाजी को आदिल शाह की शर्तों को मान लेने के पश्चात इस प्रकार स्थापित किया जाए कि वह इसके पश्चात निष्क्रिय हो गए या इस भय से ग्रस्त होकर शांत रहने लगे कि कहीं आदिलशाह उनके साथ कोई ऐसी ही घटना पुनः न कर दे , तो यह इतिहास के इस महानायक का आकलन करने में हमारी ओर से की जाने वाली भारी चूक होगी ।शाहजी की रिहाई के समय जो शर्ते लागू की गई थीं , उन शर्तो का शिवाजी ने पालन तो किया ,परंतु बीजापुर के दक्षिणी क्षेत्रों में अपनी शक्ति को बढ़ाने में ध्यान लगा दिया था । यद्यपि शिवाजी की इस योजना को क्रियान्वित होने में जावली नामक राज्य बीच में बाधा बना हुआ था । उस समय यह राज्य वर्तमान के सतारा महाराष्ट्र के उत्तर और पश्चिम के कृष्णा नदी के पास था । कुछ समय बाद शिवाजी ने जावली पर युद्ध किया और जावली के राजा के पुत्रों ने शिवाजी के साथ युद्ध किया । इस युद्ध में शिवाजी ने उन दोनों पुत्रों को बंदी बना लिया था और किले की सारी संपति को अपने नियंत्रण में ले लिया था। इसी मध्य कई मावल शिवाजी के साथ आकर मिल गए थे । 

डॉ राकेश कुमार आर्य

(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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