ममता बनाम चौधरी में उलझी बंगाल की राजनीति

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कहा जाता है कि राजनीति में कभी कोई किसी का स्थाई शत्रु या मित्र नहीं होता। यहां लोगों के संबंध पानी के बुलबुले के समान होते हैं । जब तक किसी के साथ रहकर स्वार्थ पूरे हो रहे होते हैं तब तक वह मित्र होता है पर जैसे ही राजनीतिक स्वार्थ पूरे हो जाते हैं तो कल का मित्र आज का शत्रु बन जाता है। यदि बात पश्चिम बंगाल की करें तो यहां पर अपनी हठधर्मिता और राजनीतिक छिछोरेपन के लिए प्रसिद्ध रहीं ममता बनर्जी इस समय कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी के साथ वाकयुद्ध में उलझी हुई हैं। पार्टी आलाकमान के निर्देशों को नजरअंदाज पर अधीर रंजन चौधरी भी इस समय
बगावती तेवरों में दिखाई दे रहे हैं। अधीर रंजन चौधरी पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष हैं और लोकसभा में पांच बार पार्टी के सदस्य रह चुके हैं। पिछले 10 वर्ष से वह लोकसभा में केंद्र की मोदी सरकार को कांग्रेस की ओर से हर संभव घेरने का प्रयास करते देखे जाते रहे हैं। ऐसे में अब उनके भीतर यह भाव है कि उन्हें पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी यदि उपेक्षित किया जाएगा तो उनके लिए स्थान कहां रहेगा ? यही कारण है कि श्री चौधरी इस समय अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री खड़गे के विरुद्ध भी मोर्चा खोदते हुए दिखाई दे रहे हैं। श्री खड़गे इस बात के लिए जाने जाते हैं कि वह अति आत्मविश्वास में कुछ भी बोल जाते हैं। यद्यपि उनका राजनीतिक अनुभव और उनकी अवस्था यह नहीं कहती कि वह असंतुलित भाषा का प्रयोग करें। कांग्रेस के अनेक नेता हैं जिनकी दृष्टि में श्री खड़गे अध्यक्ष होकर भी ‘उधारी शक्ति’ के आधार पर काम कर रहे हैं, वास्तविक शक्ति आज भी सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास है। अभी कुछ दिन पहले श्री मल्लिकार्जुन खड़गे ने मीडियाकर्मियों से लखनऊ में कह दिया था कि चुनाव के बाद सरकार गठन के लिए उठाए जाने वाले कदमों का फैसला अधीर रंजन चौधरी नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि इसका निर्णय पार्टी आलाकमान करेगा।
ममता बनर्जी भी असंतुलित भाषा बोलने की आदी रही हैं। उन्होंने राजनीति में रहकर चाहे जो भी उपलब्धि प्राप्त की हो पर अपनी अक्खड़ जुबान के कारण उन्होंने मित्र कम शत्रु अधिक पैदा किये हैं। उनका मानना है कि पश्चिम बंगाल की कांग्रेस की ईकाई बीजेपी के साथ मिलकर काम कर रही है। इस प्रकार की ओछी और छिछोरी बातों का राजनीति में कोई स्थान नहीं होता और विशेष रूप से तब तो कतई नहीं जब कुछ राजनीतिक दल एक गठबंधन के अधीन होकर देश का सबसे बड़ा चुनाव लड़ रहे हों। पर अपवादों को छोड़कर भारतीय राजनीतिज्ञों के बारे में यह सच है कि वर्तमान समय में इनमें से बहुत कम ऐसे हैं जिनके भीतर राजनीतिक धैर्य सदा बना रहता हो। राजनीतिक स्वार्थ के लिए कौओं की भांति लड़ने वाले ये लोग जनता में अपनी अनर्गल प्रलाप करने वाली जुबान के कारण ही चर्चा में रहते हैं। इनमें से कोई भी लोकप्रिय नहीं होता। यद्यपि यह लोकप्रिय दिखाई देते हैं। उनकी कथित लोकप्रियता का कारण केवल एक होता है कि उनके सामने कोई सक्षम ,प्रबुद्ध, विद्वान, गंभीर और राष्ट्रभक्त व्यक्ति खड़ा नहीं होता। चोरों के बाजार में सब चोर हों तो वहां पर किसको आप लोकप्रिय कहेंगे?
ममता बनर्जी के अतीत को कौन नहीं जानता? उन्होंने अपने राजनीतिक स्वार्थ को साधने के लिए किस-किस को धोखा नहीं दिया ? या किस-किस के साथ मित्रता नहीं की ? यह भी किसी से छुपा नहीं है। सब कुछ स्पष्ट होने के उपरांत भी कांग्रेस का आलाकमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रति यदि नरम दृष्टिकोण अपनाने की सोच रहा है तो इसका दर्द पार्टी के बड़े नेता श्री चौधरी को होना स्वाभाविक है। वह अपने नेताओं के ममता बनर्जी के प्रति अपनाए जा रहे दृष्टिकोण से कतई भी सहमत नहीं हैं। श्री चौधरी ममता बनर्जी के चाल, चरित्र और चेहरे से पूर्णतया परिचित हैं। वे जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के साथ चलने से पार्टी के भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है ? इसके उपरांत भी पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व उनसे सहमत नहीं है तो इसे कांग्रेस का अपने पैरों पर अपने आप कुल्हाड़ी मारने वाला कदम ही माना जाना चाहिए। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व का यह वैचारिक खोखलापन ही है कि वह पश्चिम बंगाल में तो अपने आप दफन हो जाना चाहती ही है, उसने उत्तर प्रदेश में भी सपा के सामने नतमस्तक होकर जिस प्रकार अपने लिए 80 में से केवल 17 सीटें लेकर संतोष कर लिया है वह भी उसका आत्मघाती कदम है।
ममता बनर्जी जानती हैं कि कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व इस समय किस प्रकार के द्वंद्व में फंसा हुआ है ? वह कांग्रेस के आलाकमान की मानसिकता को समझ कर उस पर दबाव बना रही हैं कि वह अपने नेता अधीर रंजन चौधरी के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर रहा है। यद्यपि श्री खड़गे ने अधीर रंजन के इस बयान पर आपत्ति जताते हुए उन्हें फटकार लगाई थी कि ममता बनर्जी भाजपा के साथ जा रही हैं। स्थानीय कांग्रेस के नेता अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के पोस्टर पर भी कालिमा फेर चुके हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि स्थानीय स्तर पर कांग्रेस का कार्यकर्ता अपने राष्ट्रीय नेतृत्व से किस कदर बगावत की स्थिति में आ चुका है ? अपने प्रति स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं की इस प्रकार की सोच को देखकर जो खड़गे अधीर रंजन को सुधारने चले थे वह स्वयं ही सुधर गए। अपने द्वारा की गई गलती की क्षतिपूर्ति करते हुए उन्होंने अपने पहले बयान के दो दिन बाद ही कह दिया कि अधीर रंजन हमारे ‘लड़ाकू सिपाही’ हैं।
‘इंडिया’ गठबंधन यदि सत्ता में नहीं आता है तो इसका चुनाव के बाद बिखर जाना निश्चित है। जैसे ही चुनावी वैतरणी पार कर ली जाएगी, इंडिया गठबंधन के सभी सहयोगी उसी नाव में छेद करते हुए दिखाई देंगे, जिसमें बैठकर ये नदी पार कर रहे थे। देश के विपक्ष की इस प्रकार की मानसिकता को देखकर ही लोगों का इन पर विश्वास समाप्त हो गया है। अधीर रंजन की यह बात सही है कि ममता बनर्जी एक विश्वसनीय राजनीतिक सहयोगी कभी नहीं हो सकतीं? वह सत्ता स्वार्थ के लिए आज साथ हैं पर चुनाव के पश्चात वह तुरंत सभी साथियों को लात मार कर दूर चली जाएंगी। कांग्रेस के अध्यक्ष सहित बड़े नेताओं को अपने प्रांतीय अध्यक्ष की चिन्ता पर विचार अवश्य करना चाहिए?
इस बात को कांग्रेस के लिए कभी भी उचित नहीं माना जा सकता कि वह इस समय केवल मोदी को केंद्र की सत्ता से हटाने के उद्देश्य से प्रेरित होकर अपने राष्ट्रीय अस्तित्व को स्वयं ही विस्मृत करती जा रही है। पार्टी यदि आज भी अपने आप में सुधार करने के लिए आत्म चिंतन करे और नीतियों में आई हुई बुराइयों को दूर कर जनमानस के बीच नई ऊर्जा नहीं सोच के साथ उतरे तो लोग उसे भी सत्ता सौंपने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करेंगे। इस बात में भी दो राय नहीं है कि अधीर रंजन चौधरी भी कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति से ही प्रेरित हैं और वह कांग्रेस की परंपरागत हिंदू विरोधी राजनीति से अलग जाकर कुछ कर पाएंगे ? या कुछ करने की सोच रखते हैं ? ऐसा संकेत भी उन्होंने कोई नहीं दिया है। वह परंपरागत लीक पर ही चलते रहेंगे। वैसे भी उनके लिए पश्चिम बंगाल में भाजपा की तर्ज पर कोई संगठन खड़ा करना और फिर ममता का हिंसक विरोध झेलना संभव नहीं है। उनके लिए पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी मुस्लिम तुष्टिकरण करना आवश्यक होगा। ऐसे में कहा जा सकता है कि कांग्रेस का टूटना तो वर्तमान परिस्थितियों में संभव नहीं है, पर चुनाव के तुरंत पश्चात कांग्रेस और ममता बनर्जी के बीच जंग तेज हो जाएगी। जिसमें पार्टी अपने नेता अधीर रंजन के साथ खड़ी दिखाई देगी।

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं। )

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