नए विमर्श को जन्म देते लोकसभा चुनाव

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ललित गर्ग-
लोकसभा चुनाव में चुनावी मैदान सज गया है, सभी राजनीतिक दलों में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला हमेशा की तरह परवान चढ़ने लगा है। राजनीति में स्वच्छता, नैतिकता एवं मूल्यों की स्थापना के तमाम दावों के अनैतिकता, दल-बदल, आरोप-प्रत्यारोप की हिंसक मानसिकता पसरी है। राजनेता दलबदल की ताल ठोक रहे हैं। दलबदलुओं को टिकट देने में कोई दल पीछे नहीं रहा, क्योंकि सवाल, येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने तक जो सीमित रह गया है। सिद्धांतों और राजनीतिक मूल्यों की परवाह कम ही लोगों को रह गई है। चुनावी राजनीति देश के माहौल में कड़वाहट घोलने का काम भी कर रही है। स्वस्थ एवं मूल्यपरक राजनीति को किनारे किया जा रहा है। राजनीति पूरी तरह से जातिवाद, बाहुबल और धनबल तक सिमट गई है। हालत यह है कि अब तक राजनीति दलों ने जिन प्रत्याशियों को उतारा है, उनमें आधे से अधिक दलबदलू, अपराधी अथवा दागी हैं। ऐसे में राजनीति के स्तर में सुधार की उम्मीद आखिर कौन, किससे करे? इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की चुप्पी तो समझ में आती है, लेकिन चुनाव आयोग की खामोशी समझ से परे है।
लोकसभा चुनाव नेतृत्व चयन का ऐतिहासिक एवं महत्वपूर्ण अवसर है, इस अवसर पर लाओत्जु ताओ ते चिंग की पुस्तक‘‘द ताओ ऑफ लीडरशिप’’ राजनीति एवं राजनेताओं के लिये एक रोशनी है। यह एक अद्भुत, अद्वितीय एवं अप्रतिम कृति हैं जो नये युग के लिए नेतृत्व की रचनात्मक व्यूह रचना प्रस्तुत करती है। आज जबकि देश और दुनिया में सर्वत्र नेतृत्व के प्रश्न पर एक घना अंधेरा छाया हुआ है, निराशा और दायित्वहीनता की चरम पराकाष्ठा ने राजनीति एवं नेतृत्व को जटिल दौर में लाकर खड़ा कर दिया है। समाज और राष्ट्र के समुचे परिदृश्य पर जब हम दृष्टि डालते हैं तो हमें जिन विषम और जटिल परिस्थितियों से रू-ब-रू होना पड़ता है, उन विषम हालातों के बीच ठीक से राह दिखाने वाला कोई नेतृत्व नजर नहीं आता।
यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए कि लोकतंत्र धुंधलका सब देख रहे हैं, लेकिन खामोशी के साथ। शायद सबकी अपनी-अपनी मजबूरियां हैं। मतदाता की मजबूरी यह है कि आखिर उसे मैदान में डटे उम्मीदवारों में से ही एक को चुनना है। इस देश ने महंगाई, बेरोजगारी, महिला अपराध, गरीबी, साम्प्रदायिकता के खिलाफ भी जनता को सड़कों पर उतरते देखा है लेकिन राजनीति में टकराव, अपराध, देश-विरोध और हिंसा की राजनीति के खिलाफ कभी कोई आंदोलन नहीं हुआ। चुनाव आयोग की अपनी सीमाएं हो सकती हैं, लेकिन जेल में बैठे-बैठे लोग चुनाव लड़ भी लेते हैं और जीत भी जाते हैं। खलनायक नायक बनने लगे हैं। चुनाव लड़ने के लिए अधिकतम खर्च की सीमा सरेआम ध्वस्त होती है, लेकिन आयोग कुछ कर नहीं पाता। चुनाव प्रचार के दौरान अपशब्दों का उच्चारण-गालीगलोच खुल्लम-खुल्ला होता है, लेकिन आयोग नोटिस देकर ही अपने दायित्व से मुक्त हो जाता है। मतदाताओं के वोट खरीदने के लिए उन्हें सरेआम पैसे ही नहीं शराब तक बांटी जाती है, लेकिन किसी उम्मीदवार के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। जनता राजनीति के गिरते स्तर से त्रस्त तो है, लेकिन उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाती। इन लोकसभा चुनाव में यह चुप्पी टूटनी चाहिए और आजादी के अमृतकाल को अमृममय बनाने वाला नेतृत्व सामने आना चाहिए। ऐसा नेतृत्व जो देश को अग्रणी आर्थिक महाशक्ति के रूप में ले जाये एवं विकास की स्वर्णिम गाथा को गढ़े।
एक सफल, सार्थक, समर्थ एवं चरित्रसम्पन्न विपक्षी नेतृत्व की आवश्यकता हर दौर में रही है, लेकिन आज यह ज्यादा तीव्रता से महसूस की जा रही है। विपक्षी नेतृत्व कैसा हो, उसका अपना साथियों के साथ-साथ सत्तापक्ष के साथ कैसा सलूक हो? उसमंे क्या हो, क्या न हो? वह क्या करे, क्यों करे, कब करे, कैसे करे? इत्यादि कुछ जटिल एवं गंभीर प्रश्न हैं जिनके जवाब ढ़ूंढ़े बिना हम एक सक्षम विपक्षी नेतृत्व को उजागर नहीं कर सकते। इन प्रश्नों के उत्तरों की कसौटी पर ही हमें आने वाले सत्ता पक्ष एवं विपक्ष के नेतृत्व को कसना होगा। जिस नेतृत्व के पास इन प्रश्नों के उत्तर होंगे, जो समयज्ञ होगा, सहिष्णु होगा, तटस्थ होगा, दूरदर्शी होगा, निःस्वार्थी होगा, वैसा ही नेतृत्व जिस राष्ट्र को प्राप्त होगा, उसकी प्रगति को संसार की कोई शक्ति बाधित नहीं कर सकेगी। ऐसा ही नेतृत्व नया इतिहास बना सकेगा और भावी पीढ़ी को उन्नत दिशाओं की ओर अग्रसर कर सकेगा। आज चुनाव प्रचार में जिस तरह की आरोप-प्रत्यारोप की हिंसक संस्कृति पनपी है, एक दूसरे पर जूते-चप्पल फेंके जाते है, पत्थर से हमला किया जाता है, छोटी-छोटी बातों पर अभद्र शब्दों का व्यवहार, हो-हल्ला, छींटाकशी और हंगामा आदि घटनाएं ऐसी है जो नेतृत्व को धुंधलाती है।
नेतृत्व को लेकर लोगों की मानसिकता में बहुत बदलाव आया है, आज योग्य नेतृत्व की प्यासी परिस्थितियां तो हैं, लेकिन बदकिस्मती से अपेक्षित नेतृत्व नहीं हैं। जलाशय है, जल नहीं है। नगर है, नागरिक नहीं है। भूख है, रोटी नहीं है-ऐसे में हमें सोचना होगा कि क्या नेतृत्व की इस अप्रत्याशित रिक्तता को भरा जा सकता है? क्या राष्ट्र के सामने आज जो भयावह एवं विकट संकट और दुविधा है उससे छुटकारा मिल सकता है? हालही में नेतृत्व के प्रश्न पर एक करारा व्यंग्य पढ़ा था-‘देश और ट्रेन में यही अंतर है कि ट्रेन को लापरवाही से नहीं चलाया जा सकता।’ यानी देश के संचालन में की गई लापरवाही तो क्षम्य हैं पर ट्रेन के पटरी से उतरने में की गई लापरवाही क्षम्य नहीं, क्योंकि इसके साथ आदमी की जिंदगी का सवाल जुड़ा है। मगर हम यह न भूलें कि देश का नेतृत्व अपने सिद्धांतों और आदर्शों की पटरी से जिस दिन उतर गया तो पूरी इन्सानियत एवं राष्ट्रीयता की बरबादी का सवाल उठ खड़ा होगा।
आज देश में लोकतांत्रिक, सांस्कृतिक, नैतिक जीवन-मूल्यों के मानक बदल गये हैं न्याय, कानून और व्यवस्था के उद्देश्य अब नई व्याख्या देने लगे हैं। चरित्र हासिए पर आ गया, सत्ता केन्द्र में आ खड़ी हुई। ऐसे समय में कुर्सी पाने की दौड़ में लोग जिम्मेदारियां नहीं बांटते, चरित्र बांटने लगते हैं और जिस देश का चरित्र बिकाऊ हो जाता है उसकी आत्मा को फिर कैसे जिन्दा रखा जाए, चिन्तनीय प्रश्न उठा खड़ा हुआ है। आज कौन अपने दायित्व के प्रति जिम्मेदार है? कौन नीतियों के प्रति ईमानदार है? इस संदर्भ में आचार्य तुलसी का कथन यथार्थ का उद्घाटन करता है कि ‘‘ऐसा लगता है कि राजनीतिज्ञ का अर्थ देश में सुव्यवस्था बनाए रखना नहीं, अपनी सत्ता और कुर्सी बनाए रखना है। राजनीतिज्ञ का अर्थ उस नीतिनिपुण व्यक्तित्व से नहीं, जो हर कीमत पर राष्ट्र की प्रगति, विकास-विस्तार और समृद्धि को सर्वोपरि महत्व दें, किन्तु उस विदूषक-विशारद व्यक्तित्व से है, जो राष्ट्र के विकास और समृद्धि को अवनति के गर्त में फेंककर भी अपनी कुर्सी को सर्वाेपरि महत्व देता है।’’ राजनैतिक लोगों से महात्मा बनने की उम्मीद तो नहीं की जा सकती, पर वे पशुता पर उतर आएं, यह ठीक नहीं है।
वर्तमान विपक्षी नेतृत्व की सबसे बड़ी विसंगति और विषमता यह है कि वह परदोषदर्शी है, जो सत्तापक्ष की अच्छाई में भी बुराई देखने वाले हैं। यह नेतृत्व कुटिल है, मायाबी है, नेता नहीं, अभिनेता है, असली पात्र नहीं, विदूषक की भूमिका निभाने वाला है। यह नेतृत्व सत्ता- प्राप्ति के लिये कुछ भी करने से बाज नहीं आता, यहां तक जिस जनता के कंधों पर बैठकर सत्ता तक पहुंचने के लिये जैसी राजनीति यह कर रहा है, घोषणा-पत्रों में जनता को ठगने एवं लुभाने के जो प्रयास हो रहे हैं, वे एक तरह से जनता की पीठ में भी सबसे पहले छुरा भोंकते हुए प्रतीत होते हैं। इससे भी अधिक घातक है इस नेतृत्व का असंयमी, अपराधी और चरित्रहीन होना, जो सत्ता पर काबिज होने के लिये राष्ट्र से भी अधिक महत्व अपने परिवार को देता है। देश से भी अधिक महत्व अपनी जाति और सम्प्रदाय को देता है। चुनाव जीतना जिनके लिये सेवा का साधन नहीं, विलास का साधन है। नेतृत्व का चेहरा साफ-सुथरा बने, इसके लिये अपेक्षित है कि इस क्षेत्र में आने वाले व्यक्तियों के चरित्र का परीक्षण हो। आई-क्यू टेस्ट की तरह करेक्टर टेस्ट की कोई नई प्रविधि प्रयोग में लाई जाये तो यह लोकसभा चुनाव का संग्राम अधिक सार्थक होगा।

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