मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम पर न्यायालय का निर्णय

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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने प्रदेश में चल रहे मदरसा अधिनियम को निरस्त कर अपना ऐतिहासिक निर्णय देते हुए संविधान के पंथनिरपेक्ष स्वरुप की रक्षा करने का सराहनीय और उत्तम प्रयास किया है। न्यायालय ने अपने इस ऐतिहासिक निर्णय में ‘उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2004’ को धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के प्रति उल्लंघनकारी करार देते हुए ‘असंवैधानिक’ घोषित कर दिया है।
माननीय उच्च न्यायालय के इस निर्णय ने सांप्रदायिक आधार पर तुष्टिकरण की राजनीति की पोल खोल दी है और यह स्पष्ट कर दिया है कि इस प्रकार की राजनीति देश के लिए कितनी घातक है। न्यायालय के निर्णय ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि जब राजनीति अपने निहित हितों के लिए जब अपने धर्म को त्याग कर काम करती है तो वह अनेक प्रकार की सामाजिक विसंगतियों को प्रोत्साहित करते हुए नागरिकों के मध्य ईर्ष्या, द्वेष और घृणा के भावों को बढ़ाने का काम करने लगती है।
20 वर्ष पहले इस अधिनियम को प्रदेश के तत्कालीन मुख्य-मंत्री मुलायम सिंह यादव ने लागू किया था। निश्चित रूप से इस अधिनियम के लागू होने से भारत के संविधान के पंथ निरपेक्ष संविधान की भावना का हनन हुआ था। जब राजनीति अपने धर्म से पथभ्रष्ट हो जाती है तो वह संविधानिक संस्थानों या सिद्धांतों को कुछ नहीं समझती। संविधान की हत्या करना उन राजनीतिज्ञों के लिए कोई बड़ी बात नहीं होती जो अपने तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए सोचते हैं और राष्ट्रीय हितों से जिनका कोई संबंध नहीं होता। ऐसे राजनीतिज्ञों को केवल सत्ता चाहिए और सत्ता के लिए वह कहां तक जा सकते हैं ? यह मदरसा अधिनियम उसी का एक प्रमाण है।
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की खंडपीठ ने मदरसा शिक्षा अधिनियम को ‘अधिकारातीत’ करार दिया है। निश्चित रूप से न्यायालय के इस शब्द अर्थात ‘अधिकारातीत’ से यह स्पष्ट हो जाता है कि मुलायम सिंह यादव की सरकार उस समय जो कुछ भी कर रही थी, वह अपने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर कर रही थी। माननीय न्यायालय ने इस शब्द की व्याख्या करते हुए अपनी विद्वत्ता और संविधान के प्रति अपनी गहन निष्ठा का परिचय दिया है। भारत का संविधान यह स्पष्ट करता है कि राज्य नागरिकों के मध्य उनके संप्रदाय, जाति और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा तो फिर मुस्लिमों के लिए अलग शिक्षा नीति लागू करना या उनके लिए अधिनियम बना देना राज्य की नियत को असंवैधानिक घोषित करने के लिए पर्याप्त है। इस तथ्य को माननीय न्यायालय ने अपने द्वारा पारित किए गए इस निर्णय के माध्यम से पूर्णतया स्पष्ट कर दिया है।
तुष्टिकरण की राजनीति बेशर्म तो हो सकती है पर इतनी निर्मम नहीं हो सकती कि वह देश के संविधान को ही कुचल दे। पर हमारे देश में सब कुछ संभव है। उसी के चलते मुलायम सिंह यादव ने देश के बहुसंख्यक समाज की उपेक्षा करते हुए और संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए उपरोक्त अधिनियम को पारित करवाया। जिसे अब माननीय न्यायालय द्वारा गैर संवैधानिक घोषित कर निरस्त करना उन राजनीतिक लोगों के लिए बहुत बड़ा सबक है जो अपने राजनीतिक हितों के लिए काम करने के लिए जाने जाते हैं।
आज केवल इतने से ही संतोष करने की आवश्यकता नहीं है कि माननीय उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने इस विभाजनकारी अधिनियम को निरस्त कर दिया है, बल्कि यह भी देखने की आवश्यकता है कि 20 वर्ष की अवधि के दौरान इस अधिनियम के दुरुपयोग से राज्य के सरकारी कोष को कितना घाटा हुआ ? इसके साथ-साथ इस अधिनियम के लागू होने से प्रदेश में सामाजिक स्तर पर लोगों के बीच दूरी और घृणा को पैदा करने में सरकार प्रायोजित संस्थानों ने कितना सहयोग दिया ? हमारे देश में यह व्यवस्था भी होनी चाहिए कि यदि सरकार द्वारा संचालित या प्रायोजित संस्थानों द्वारा लोगों के बीच दूरी और घृणा को पैदा करने की गतिविधियां होती पाई जाती हैं तो जिस पार्टी की सरकार के द्वारा ऐसा किया गया, उसी से क्षतिपूर्ति थी जमा करानी चाहिए।
इलाहाबाद कुछ न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार को यह निर्देश भी दिया गया है कि वह एक योजना बनाकर राज्य के विभिन्न मदरसों में पढ़ रहे छात्र-छात्राओं को औपचारिक शिक्षा प्रणाली में सम्मिलित करने का काम करे, जिससे उनके भविष्य को चौपट होने से बचाया जा सके। इस संदर्भ में हमें यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि अनेक प्रगतिशील मुसलमान भी यह स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि मदरसा शिक्षा प्रणाली उनके बच्चों का भविष्य चौपट कर रही है। जिसे आज के वैज्ञानिक युग में अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। जब मदरसों में किसी संप्रदाय विशेष की सांप्रदायिक शिक्षा को दिया जाएगा तो बदायूं जैसी घटनाओं को होने से कोई रोक नहीं सकता। जब शिक्षा में पूर्वाग्रह और दुराग्रह प्रवेश कर जाते हैं तो शिक्षा के जहर के माध्यम से यह जहर बच्चों की मानसिकता को विकृत करता है। जिसका परिणाम बदायूं जैसी घटना में देखा जाता है। ऐसी परिस्थिति में शिक्षा ही समाज के लिए विनाशकारी हो जाती है। अब तनिक कल्पना कीजिए कि ऐसी विनाशकारी शिक्षा को जो सरकार लाती है या जो सरकार का नेता लेकर आता है, वह समाज के लिए कितना विनाशकारी हो सकता है ? क्या अब भी यह बताने की आवश्यकता है कि शिक्षा का मौलिक सिद्धांत मानवतावाद पर आधारित होना चाहिए?
हम सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में लगभग 25 हजार मदरसे हैं। इनमें 16500 मदरसे उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड से मान्यता प्राप्त हैं, उनमें से 560 मदरसों को सरकार से अनुदान मिलता है। इसके अलावा राज्य में साढ़े आठ हजार गैर मान्यता प्राप्त मदरसे हैं। ये सारे के सारे मदरसे प्रदेश में सांप्रदायिक शिक्षा देने का काम कर रहे थे। आज के वैज्ञानिक युग में जब बच्चों को कंप्यूटर की आवश्यकता है तब सांप्रदायिकता की बढ़ावा देकर लोगों के बीच सांप्रदायिक विद्वेष खाई को बढ़ाने वाली यह शिक्षा समाज में विष घोल रही थी।
जहां तक प्रदेश में संस्कृत शिक्षा परिषद की बात है तो संस्कृत एक ऐसी भाषा है जो मानव मानव के बीच प्रेम का प्रसार करती है। इसका मौलिक चिंतन ही मानवतावाद है। संस्कृत वैमनस्य को बढ़ाती नहीं है बल्कि मिटाती है। संस्कृत संस्कृति का निर्माण करती है, जबकि यह अधिनियम अपसंस्कृति को बढ़ावा दे रहा था। वैसे भी संस्कृत को बढ़ावा देने की बात हमारे संविधान के प्रावधानों के अनुकूल है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं। )

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