रामोत्सव रोकने कोर्ट जाने वालों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए

13_01_2024-ram_lalla_mandir

कहनी है इक बात हमें “राम भक्त” दीवानों से, संभल के रहना अपने घर में, छुपे हुए मक्कारों से,
सुभाष चन्द्र

राम विरोधियों को शायद नहीं मालूम कि नरेंद्र मोदी स्वयं एक तपस्वी हैं। याद करो, जब 7 नवंबर 1966 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार ने गौ हत्या का विरोध कर रहे पार्लियामेंट स्ट्रीट पर निहत्ते साधु-संतो पर गोलियां चलवाकर उनके खून की होली खेले जाने से पार्लियामेंट स्ट्रीट खून से लाल होने और साधु-संतों की बिछ रही लाशों पर, श्री कृपालु जी महाराज ने कहा था, “जिस तरह हम निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेली जा रही है, इंदिरा गाँधी देखना कांग्रेस को समाप्त करने हिमालय से आधुनिक वेश-भूषा में एक तपस्वी आएगा”, प्रमाण सर्वविदित है कि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से जिस सनातन को पिछली सरकारों द्वारा कलंकित करने का प्रयास किया जा रहा था, अपने मूल अस्तित्व में आना शुरू हो चूका है, जिसकी चमक से सनातन विरोधियों की नींद, रोटी और पानी पीना कष्टमय हो रहा है। और जब केवल शंखनाथ होने पर सनातन विरोधियों का ये हाल है, कल्पना करिए इन विरोधियों का उस समय का क्या हाल होगा, जब शिशु सनातन अपने यौवन पर आएगा।

इन सनातन विरोधियों को शायद नहीं मालूम कि अभी एक और तपस्वी का आना शेष है। जब इस तपस्वी का आगमन होगा, इन सनातन विरोधियों का क्या होगा, परमपिता कल्याण करे। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के प्रमुख आशुतोष महाराज की गहन समाधि को दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। संस्थान के अनुसार 29 जनवरी, 2014 को महाराज ने गहन समाधि ली थी। उसके बाद से संस्थान की तरफ से महाराज के शरीर को कड़ी सुरक्षा में रखा गया है।
पंजाब के काले दौर में महाराज ने 1983 में जालंधर के नूरमहल में दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की नींव रखी थी। महाराज से प्रभावित होने वालों की संख्या लगातार बढ़ती रही और कुछ ही सालों में उनके लाखों अनुयायी हो गए। 1991 में उन्होंने संस्थान का आधिकारिक पंजीकरण दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के नाम से करवाया। इसके बाद उनके रोजाना व साप्ताहिक तथा मासिक प्रवचनों को सुनने के लिए भीड़ उमडऩे लगी। उस दौर में पंजाब आतंकवाद से जूझ रहा था।

लेखक
भारत ही नहीं जब विश्व भर में राम भक्त “महा दीपावली” पर्व मनाने की तैयारी कर रहे हैं, तब गाज़ियाबाद का एक सनकी भोला दास इलाहाबाद हाई कोर्ट जाता है दकियानूसी बातें और शंकराचार्यों के बेतुके बयानों को लेकर मांग करने के लिए कि श्री राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा रोक दो, मोदी योगी को उस समारोह में जाने का संवैधानिक अधिकार नहीं है।
भोला दास की याचिका को दायर किया All India Lawyers Union (AILU) के अध्यक्ष नरोत्तम शुक्ला ने वह भी प्राण प्रतिष्ठा होने के 5 दिन पहले जबकि 22 जनवरी की तारीख कई महीने पहले अक्टूबर, 2023 में ही नियत कर दी गई थी। जाहिर है यह याचिका एक Public Stunt से ज्यादा और कुछ नहीं थी जिसे दायर करने के लिए शंकराचार्यों के कंधों का सहारा भी लिया गया।

जहां विपक्ष एक के बाद एक कुतर्क दे रहा है श्री राम मंदिर के विरोध में, वहां ऐसी याचिका दायर करना बताता है कि किस तरह “राम के दुश्मन” अपने घरों के झरोखों से झाँक रहे हैं और “राम भक्तो” को ऐसे “राम द्रोही” गद्दारों से संभल कर रहने की जरूरत है।

अब बहुत हो गया, विपक्ष ने अपने मन की बहुत कर ली, मंदिर बहिष्कार का पूरा खेल खेल लिया और इसलिए अब समय आ गया है ऐसे दलों और उनके नेताओं का पूर्ण सामाजिक बहिष्कार किया जाए। ऐसा बहिष्कार सबसे पहले याचिका दायर करने वाले भोला दास और उसके वकील नरोत्तम शुक्ला का होना चाहिए। इलाहाबाद हाई कोर्ट बार को नरोत्तम शुक्ला को उसके बहिष्कार में पूरा सहयोग करना चाहिए।

आज इलाहाबाद हाई कोर्ट के कार्यवाहक Chief Justice मनोज गुप्ता की पीठ ने भोला दास की याचिका पर तुरंत सुनवाई से इंकार कर दिया।

शंकराचार्यों के प्राण प्रतिष्ठा को सनातन प्रक्रिया के खिलाफ कहने मात्र से प्राण प्रतिष्ठा कैसे रोक सकते हैं? शंकराचार्यों का यह कहना बेमानी है निर्माणाधीन मंदिर में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो सकती। ऐसा विचार उनके मन में कभी सोमनाथ मंदिर में हुई प्राण प्रतिष्ठा के समय क्यों नहीं आया जबकि सोमनाथ मंदिर का निर्माण प्राण प्रतिष्ठा के 14 वर्ष बाद पूरा हुआ था। क्या उस समय इसलिए नहीं बोले क्योंकि तब प्राण प्रतिष्ठा करने वाला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं था और प्राण प्रतिष्ठा के विरोध में स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू खड़ा था?

कल पूरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने कहा है कि मोदी से कोई द्वेष नहीं है, हम केवल शास्त्र की बात कर रहे हैं। माननीय शंकराचार्य जी, मोदी से ही तो द्वेष है जो आप में सही और गलत समझने की शक्ति भी ख़त्म हो गई है। एक विद्वान आप जैसा कुछ कहता है तो दूसरा विद्वान श्री श्री रविशंकर भी कह रहा है कि भगवान राम ने भी रामेश्वरम में शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कर दी थी जबकि मंदिर तो वर्षों बाद बना था। तो क्या आप शंकराचार्य जी भगवान राम पर भी दोष लगा देंगे। श्री श्री रवि शंकर के अनुसार रामेश्वरम के अलावा मदुरै और तिरुपति बालाजी मंदिर में भी ऐसा ही हुआ था।

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