पाखंड और आर्य समाज के पुरोहित, भाग 1

IMG-20231229-WA0002

अपने स्थापना काल से ही आर्य समाज ने प्रत्येक प्रकार के पाखंड का पुरजोर विरोध किया है। हमारे देश में समाज को जिन ब्राह्मणों ने अपनी मूर्खतापूर्ण बातों से भ्रमित कर पाखंडों में फंसाया उन्हें आर्य समाज ने प्रारंभ से ही नकारा। यही कारण रहा कि आर्य समाज की पहचान एक ऐसी पवित्र क्रांतिकारी संस्था के रूप में बनी जो समाज को जड़ता और पाखंडवाद से मुक्ति दिलाने का काम करती है । तनिक याद कीजिए , हमारे देश में एक समय वह भी था जब कोई पंडित पुजारी किसी मृतक व्यक्ति के पश्चात जब उसके घर में जाकर यज्ञ हवन करता था तो वह मृतक व्यक्ति के परिवार के लोगों को अनेक प्रकार से डराया बहकाया करता था। यहां तक कि मृत व्यक्ति के लिए वह लड्डू ,खीर आदि के भोग लिया करता था। उसके पेट में जगह न होने के कारण कई बार वह नाटक करता था कि अभी आपका दादा-पिता , माता या दादी आदि लड्डू आदि को ग्रहण नहीं कर रहे हैं। इसलिए अभी कोई लड्डू या खीर आदि का ग्रास नहीं लिया जा सकता। लोग उस पाखंडी को झूला झुलाते रहते थे। जब उसके पेट में भूख लगती तो वह मुंह खोलता, तब लोग यह सोचकर शीघ्रता से लड्डू आदि दिया करते कि अब हमारे मृत संबंधी को यह भोग सीधा पहुंच जाएगा। स्वामी दयानंद जी महाराज आए तो इस प्रकार की अनेक प्रकार की पाखंडी बातों का उन्होंने समाज से उन्मूलन किया।

पाखंडी जंजाल में, फंसा हुआ था देश।
दयानंद ने आनकर, काटे सकल क्लेश।।

जब इस प्रकार की पाखंड पूर्ण बातें समाज में फैली हुई थीं तो उसमें जनसाधारण का उतना दोष नहीं था, जितना उस पाखंडी ब्राह्मण वर्ग का दोष था, जिसने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए लोगों की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का इस प्रकार का प्रबंध किया था। उसने लोगों की धार्मिक आस्था को अपने लिए जीविकोपार्जन का एक अच्छा माध्यम बनाया । उस समय के इस पाखंडी ब्राह्मण वर्ग के भीतर यह भावना आ गई थी कि समाज का शेष वर्ग पूर्णतया अनपढ़ ही रहे तो अच्छा है। क्योंकि उसके अनपढ़ रहने से ही उसके स्वार्थ की पूर्ति होना संभव था। सारा समाज जड़ता में बंध चुका था। तब स्वामी दयानंद जी का आगमन किसी देवता से कम नहीं था। उन्होंने इस सारे पाखंड के विरुद्ध आवाज बुलंद की और लोगों को झकझोर पर जगाने का काम किया। स्वामी जी ने सभी देशवासियों को बताया कि ये पाखंडी लोग किस प्रकार उनका मूर्ख बना रहे हैं ? जिस ओर ये पाखंडी लोग मेरे देशवासियों को ले जा रहे हैं , सच्चाई वह नहीं है, बल्कि सच्चाई कुछ दूसरी है। उस सच्चाई की ओर बढ़ने का आवाहन करते समय हुए स्वामी दयानंद जी महाराज ने लोगों को बताया कि तुम्हें वेद मार्ग की सच्चाई की ओर चलना चाहिए।

वेद मार्ग के सत्य को, करो सभी स्वीकार।
दयालु की दया मांगिए , होगा बेड़ा पार।।

पहली दूसरी पीढ़ी के आर्य विद्वानों के पाखंड विरोधी भाषणों और व्याख्यानों का जनता पर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ा। इसका कारण यह था कि उन आर्य विद्वानों की भाषा बड़ी सरल होती थी। उनकी बातों में तर्क होता था और लोगों को वेदों की ओर लौटने की उनकी प्रबल प्रेरणा भी बड़ी बलवती होती थी। लोगों से सीधे संवाद स्थापित करना और मूर्ति पूजक लोगों के बीच जाकर पहले उन्हें बड़े प्यार से मूर्ति पूजा की निस्सारता को समझाना , उनके कुछ ऐसे उपाय होते थे, जिससे लोग सहज रूप में उनकी ओर आकर्षित होते थे।
धीरे-धीरे इस स्थिति में परिवर्तन होने लगा।

पौराणिक पंडितों का पाखंड

जब हमारे देश में पौराणिक पंडितों का पूरा वर्चस्व स्थापित था तब वह कई प्रकार से अपने यजमान को लूटने का प्रबंध कर लेते थे। कई प्रकार के अंधविश्वासों और भूत प्रेत आदि की कहानियों को सुनाकर वे लोग यजमान लोगों से विभिन्न उपायों से धन ऐंठने का काम करते थे। आर्य समाज ने जब इस दिशा में आगे बढ़ना आरंभ किया तो कुछ देर व्यवस्था बहुत अच्छी चली पर धीरे-धीरे स्थिति में परिवर्तन आने लगा। आज की स्थिति यह है कि जब कोई यजमान हमारे किसी पौराणिक पुरोहित को सीधी उंगली से घी नहीं निकालने देता है अर्थात उन्हें अच्छी दक्षिणा नहीं देता है तो वे भी पौराणिक पंडितों की भांति धन ऐंठने के कुछ उपायों को हाथ में लेने लगे हैं।
यज्ञ के समय यजमान के माध्यम से गोदान कराना, मंदिर के लिए दान लेना या गुरु के लिए दान लेना या किसी और इसी प्रकार के बहाने से लोगों से धन ऐंठना आज भी पौराणिक पंडितों की विशिष्टता है। थोड़े से अर्थ परिवर्तन के साथ आज कुछ इसी प्रकार की परंपराओं को आर्य समाज के आचार्य / पुरोहित भी अपनाते जा रहे हैं। आर्य समाज की स्थापना के पश्चात प्रारंभ में आर्यजनों ने अपने आर्य विद्वानों का स्वागत सत्कार करना अपना धर्म माना। कई आज भी ऐसे सज्जन हैं जो अपने घर आए आर्य विद्वान की भरपूर सेवा सम्मान करते हैं, दान दक्षिणा भी देते हैं । आर्य समाज की स्थापना के कुछ काल पश्चात तक यह स्थिति दो बातों पर टिकी रही – एक तो उस समय आर्य विद्वान किसी प्रकार का लोभ लालच करके किसी के घर में यज्ञ करने नहीं जाते थे। अतः उन्हें जो भी कुछ वहां से मिलता था, उसे वह सहज रूप में स्वीकार कर जेब में रखे चले आते थे। इसके अतिरिक्त घर गृहस्थ वाले लोग भी अपने अतिथि विद्वान को अपनी सामर्थ्य से अधिक देने का प्रयास करते थे। दोनों ओर से इस प्रकार के पवित्र भाव के चलते व्यवस्था बनी रही।

बदल गया आदर्श हमारा, बदल गया आचार।
बदल गए विचार हमारे , बदल गया व्यवहार।।

आज परिस्थितियां बहुत कुछ बदल गई हैं। समाज में जिस प्रकार भौतिकवाद की हवा चली है, उसके चलते अनेक आर्य विद्वानों की आवश्यकताएं भी बढ़ गई हैं । माना कि अधिकांश विद्वान किसी प्रकार का लोभ लालच आज भी नहीं रखते परंतु जिनके घर परिवार में बच्चे हैं, उनकी पढ़ाई – लिखाई के खर्चे तो उनके लिए जी का जंजाल बन गए हैं । उनमें से कई ऐसे भी हैं जो धन के लालच के वशीभूत होकर यज्ञ आदि करने के काम में लगे हुए हैं। उधर बहुत से यजमानों की स्थिति ही इस समय बहुत कुछ अधिक खर्च करने की नहीं रही है। इसका कारण यह है कि वह भी भौतिकवाद की चकाचौंध में परेशान हैं। किसी के परिवार वाले दान दक्षिणा नहीं देना चाहते तो कोई स्वयं ही देने में अपने आपको असमर्थ पाता है। ऐसी स्थितियों में आर्य समाज की मान्य और आदर्श परंपराएं बड़ी तेजी से लुप्त होती जा रही हैं । इसी का परिणाम है कि कई आर्य विद्वानों ने भी यज्ञ के समय कलावा बांधना, थाली में रखे हुए चावलों और चंदन से या हल्दी से लोगों का तिलक करना , थाली को सब लोगों के सामने घुमाना और इस अपेक्षा से घुमाना कि सभी लोग तिलक लगवाते जाएं और इसमें पैसा डालते जाएं, जैसी कुछ विकृतियां आती जा रही हैं। कुल मिलाकर आर्य समाज के विद्वानों का इस समय पौराणिकरण हो रहा है।

परिवर्तन भारी हुआ, चल रहा लगातार।
पुराण धर्म अपना रहे, ऋषि के पहरेदार।।

पौराणिक लोगों के पंडितों के बारे में आर्य समाज के विद्वान अक्सर कहा करते थे कि वे लोग बहुत शीघ्रता से यज्ञ को संपन्न कर डालते हैं । उनके मंत्रों में किसी प्रकार का तारतम्य नहीं होता और ना ही वह यज्ञ की सही प्रक्रिया को जानते हैं । यदि जानते भी हैं तो उसे सही ढंग से लागू नहीं करते हैं। इनमें से अधिकांश पंडित ऐसे होते हैं जो एक-एक दिन में कई – कई यज्ञ करते हैं और वहां से मनमानी दक्षिणा लेते हैं। जब वह किसी एक घर में यज्ञ कर रहे होते हैं तो उनका मन उस समय दूसरे परिवार में होने वाले यज्ञ में पड़ा रहता है और जब दूसरे घर में जाकर यज्ञ कर रहे होते हैं तो वहां जाकर तीसरे परिवार में उनका मन जाकर उछल कूद मचाने लगता है। इस सारी प्रक्रिया से सबसे अधिक यजमान लोग प्रभावित होते हैं। जिनके यहां पर यज्ञ को पंडित जी ने करने के उपरांत भी सही ढंग से नहीं किया। आर्य समाज ने इस प्रकार की प्रवृत्ति को दोषपूर्ण माना और इसका विरोध किया । जबकि आज के आर्य विद्वान भी इसी प्रकार का कार्य निष्पादित करते देखे जाते हैं। उन्हें एक यज्ञ के बाद दूसरे यज्ञ की चिंता रहती है। यही कारण है कि वह शीघ्रता से यज्ञ की सारी क्रिया को पूर्ण करने का प्रयास करते हैं। कई ऐसे पंडित भी हैं जो आर्य समाज का विद्वान होने के कारण यज्ञ कुंड अपने साथ रखते हैं। जब वह एक घर में यज्ञ करके आगे चलने की तैयारी करते हैं तो उस यज्ञ कुंड में सुलगती हुई आग को वह इधर-उधर डालकर जल्दी निकलने का प्रयास करते हैं। यह प्रक्रिया पूर्णतया दोषपूर्ण, अनैतिक और वेद विरुद्ध है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
( लेखक की “एक क्रांतिकारी संगठन आर्य समाज” नामक पुस्तक से)

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
betnano giriş
betnano giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betebet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
pusulabet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
betnano giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betparibu giriş
betlike giriş
parmabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
parmabet giriş
betlike giriş
vaycasino giriş
betparibu giriş
klasbahis giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
parmabet giriş