महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की वास्तविक जन्म तिथि (२० सितंबर १८२५ ई०)*

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ज्योतिष का विद्यार्थी होने के नाते मेरे संज्ञान में यह बात आई है कि महर्षि जी की जन्म तिथि पर अब तक जितने भी विद्वानों ने कार्य किया है वे सब के सब पञ्चाङ्ग के उपयोग की यथावत जानकारी के अभाव में सही निर्णय तक नहीं पहुंच पाए हैं। गलती सबसे हुई है और वह यह कि महर्षि द्वारा स्वयं लिखित रूप से प्रस्तुत कथन, “जन्म संवत् १८८१ और स्थान दक्षिण गुजरात प्रान्त देश काठियावाड़ का मजोकठा देश मोर्वी का राज्य….” और पं० ज्वालादत्त शर्मा जी के कथन कि “दक्षिणे देशवर्ये” के सन्दर्भ पूर्वक जन्म संवत् का ही यथावत संज्ञान नहीं ले पाए। महर्षि की जन्म तिथि के निर्धारण में यही मूल एवं मुख्य गलती रही है, ऐसा मेरा मानना है।

मैं, २६ अगस्त १८७९ ई. के भाद्रपद शुक्ल नवमी संवत् १९३६ को, #१ महर्षि के द्वारा कर्नल ऑल्काट महोदय के लिए लिखे गए जन्म चरित्र और ज्वालादत्त जी के श्लोक ‘क्षोणीभाहीन्दुभिरभिहुते (क्षोणी=पृथ्वी १, इभ=हाथी=दिग्गज ८, अहि=सर्प ८, इन्दु=चन्द्र १ अर्थात १८८१) वैक्रमे वत्सरे (विक्रम संवत् में) य: (‘जो’ यानी स्वामी दयानन्द सरस्वती)
प्रादुर्भूतो (जन्मे) द्विजवरकुले (ब्राह्मण कुल में) दक्षिणे देशवर्ये (एक श्रेष्ठ दक्षिण देश में, यहां पर कार्तिकीय विक्रम संवत् का सन्दर्भ भी बनता है)। मूलेनासो ( मूल नक्षत्र में जन्म लेने से मूल शब्द में इनको) शङ्करापरेण (शङ्कर ) जोड़कर (यानी मूल शङ्कर नाम दिया गया) ख्यातिं प्रापत् प्रथमवयसि प्रीतिदां सज्जनानाम्’।।
(सज्जन -सत्पुरुषों को प्रीति दायक नाम दिया गया।)। इस श्लोक को प्रमाण मानते हुए महर्षि का गृह त्याग संवत् १९०३ के लगते में तो हुआ था किन्तु गुजरात में तब के लिए यानी गृह त्याग के लिए डा० ज्वलन्त कुमार शास्त्री जी द्वारा मान्य ‘अप्रैल १८४६’ में ‘संवत् १९०३’ था ही नहीं। अस्तु महर्षि जी के द्वारा कही गई संवत् १९०३ के आरम्भ में गृह त्याग की बात तभी सही हो सकती है जब उसको कार्तिक शुक्ल पक्ष यानी २१.१०.१८४६ से कार्तिक पूर्णिमा यानी ३.११.१८४६ के बीच के काल से जोड़ कर लिया जाए।

इस प्रकार महर्षि दयानन्द सरस्वती की प्रामाणिक जन्म तिथि नामक पुस्तक के पृष्ठ ७१ पर जो यह सहमति व्यक्त है कि स्वामी जी ने वस्तुतः चैत्र शुक्ल पक्ष १९०३ विक्रमी में अर्थात १८४६ ईस्वी के अप्रैल मास में ही गृहत्याग कर दिया था, यह बात शतप्रतिशत गलत है। साथ ही पुस्तक के इसी पृष्ठ पर कहा गया है कि भाद्र मास में जन्म मानने पर स्वामी जी का गृहत्याग संवत् १९०२ में मानना होगा, यह कथन भी उतना ही, यानी शत प्रतिशत गलत है।

वास्तव में भाद्र शुक्ल नवमी संवत् १८८१ का जन्म लेने पर संवत् १९०२ के दिनाङ्क ३१ अगस्त १८४६ को ही महर्षि का २१वां वर्ष पूर्ण हो जाने का हिसाब बनता है और लगभग ५१ दिनों के बाद ही कार्तिकादि संवत् १९०३ शुरू हो गया था। इस तथ्य का स्पष्ट निष्कर्ष यह है कि उनकी २२वीं जन्मतिथि यानी २१ वर्ष की पूर्ति सोमवार,३१.०८.१८४६ को होती है। इस प्रकार स्पष्ट हुआ कि फाल्गुन मासान्तर्गत उनका जन्म होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

पुस्तक के पृष्ठ ७० पर कहा गया है,”अतः उनके २१वें वर्ष की समाप्ति संवत् १९०२ और गृह त्याग का संवत् १९०३ में लगभग डेढ़ डेढ़ मास का अन्तर होना चाहिए।” अन्तर की बात सही है किन्तु १९०३ विक्रमी (कार्तिकीय) शुक्ल पक्ष का आरम्भ हुआ है न कि चैत्रीय शुक्ल पक्ष का।

ज्ञातव्य है कि महर्षि की २२ वर्ष तक की सभी घटनाओं का दिनांक केवल और केवल कार्तिकीय विक्रम संवत् के अनुसार लेना उचित, उचित ही नहीं बहुत आवश्यक भी है। इसका उल्लंघन कोई भी नहीं कर सकता। अज्ञात काल से गुजरात में कार्तिकीय विक्रम संवत् चलता आया है और यह स्थिति आज भी ऐसी ही चालू है।

हमारे यशस्वी प्रधानमन्त्री जी, आदरणीय नरेंद्र मोदी जी की जन्मतिथि दि० १७.०९.१९५० के साथ भी यही स्थिति है। यह तिथि भाद्रपद शुक्ल षष्ठी संवत् २००६ शक संवत १८७१, कार्तिकीय संवत् के अनुसार ही होती है, न कि चैत्रादि विक्रम संवत् के अनुसार संवत् २००७।

समग्र भारत में घटनाओं के दिनाङ्कन स्थानीय परम्परानुसार ही चलते आये है। जहां जन्म होता है वहीं के अनुसार होता है, भले ही बाद में हम कहीं पर भी क्यों न रह रहे हों। उदाहरण के लिए उत्तराखण्ड में गते की परम्परा है। मेरा स्वयं का जन्म आषाढ़ इतवार ११ गते, संवत् २००८ का है। अब मैं यदि बाद में किसी वर्ष स्वेडन में होंऊं या इण्डोनेशिया में और वहां मुझसे मेरी जन्मतिथि पूछी जाए तो तब भी मैं आषाढ़ के इतवार, ११ गते, संवत् २००८ के अनुसार ही कहूंगा और वह उत्तराखण्ड की परम्परा के अनुसार पारम्परिक निरयन सौर मास की गते से जुड़ी तिथि के अनुसार ही समझी जाएगी।

वस्तुतः उक्त पुस्तक के प्रारम्भिक पृष्ठ में ही कहीं पर लिख दिया गया कि ऋषि अपने आत्मचरित्र में सर्वत्र विक्रम संवत् का ही प्रयोग करते हैं। चैत्रीय यानी चैत्र शुक्ल पक्ष से शुरू होने वाला संवत् हो या कार्तिकीय याने कार्तिक शुक्ल पक्ष से शुरू होने वाला संवत् हो, परन्तु होते तो दोनों ही संवत् विक्रम संवत् ही हैं। गुजरात या महर्षि की जन्म तिथि के सन्दर्भ से इसे विक्रम कार्तिकीय कहा जाना आवश्यक है।

ऐसा लगता है कि डॉ० शास्त्री जी ने महर्षि की जन्म तिथि के बारे में सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के द्वारा पहले से ही ले लिए गए निर्णय को सम्पुष्ट मात्र किया है। पुस्तक के पृष्ठ १५ पर सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के तात्कालिक प्रधान स्वामी आनन्द बोध जी ने डॉक्टर शास्त्री से जो कुछ कहा वह सब इस बात में प्रमाण है। इस अर्थ में ‘महर्षि दयानन्द सरस्वती की प्रामाणिक जन्म तिथि’ नामक उनकी पुस्तक, एक समायोजन प्रयास है है, अनुसन्धान नहीं।

समायोजन का यह भाव तब और भी स्पष्ट हो जाता है जब उनके द्वारा इस पुस्तक में प्रायः जब भी शिवरात्रि का उल्लेख किया जाता है तो ‘१४वें वर्ष के आरम्भ में‘ लिखते हुए ही किया गया है। सत्य यह है कि महर्षि कह रहे हैं, “….जब शिवरात्रि आई तब त्रयोदशी के दिन…” इसमें स्पष्ट हो रहा है कि अगर शिवरात्रि १४वें वर्ष के आरम्भ में ही होती तो तब महर्षि ‘जब शिवरात्रि आई तब त्रयोदशी के दिन’ ऐसी भाषा नहीं कह सकते थे। सही यह है कि वह शिवरात्रि जो उनके और हमारे लिए बोधरात्रि बन गई है, वो महर्षि की १४वें वर्ष की शिवरात्रि तो थी किन्तु १४वें वर्ष के ‘आरम्भ की शिवरात्रि’ नहीं थी।

आइए, अब ग्रहचक्र या कुण्डली की बात करें। यह विषय ई० २०१८ ई. की शुरूआत में मेरे विचारार्थ सामने आया था तो स्वयं एक ज्योतिष का विद्यार्थी होने के नाते मेरा ग्रह गणित पर ध्यान जाना स्वाभाविक था और आवश्यक भी। इसी से कुण्डली या होरोस्कोप जो काल गणना का एक बहुत ही प्रामाणिक आलेख होता है, उसकी कल्पना करना शुरू कर दिया। महर्षि के कथन,” …….. तब तक २१वां वर्ष भी पूरा हो गया। जब मैंने निश्चित जाना कि अब विवाह किए बिना कदाचित न छोड़ेंगे फिर गुपचुप संवत् १९०३ के वर्ष घर छोड़कर सन्ध्या के समय भाग उठा…. इत्यादि पढा।

स्पष्ट है कि गुजरात में तात्कालिक संवत् १९०३ के लगते से दो-तीन माह पीछे ही महर्षि जी का जन्म मास हुआ होगा यानी – श्रावण या भाद्रपद या फिर आश्विन में। महर्षि जी की दो कालजयी रचनाओं में भाद्र शुक्ल पक्ष का खास उल्लेख हुआ है। मानवीय मनोविज्ञान का यह एक खास कोण है। इसे हम एक बॉडी लैंग्वेज या लेखक के अपने अव्यक्त आशय की सङ्केत भाषा के रूप में देख लें तो उचित होगा।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव के पक्ष की बात इसी में स्पष्ट है कि महर्षि जी ने सत्यार्थ प्रकाश को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में ही लिखना शुरू किया था। ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका लिखना शुरू करने के मुहूर्त को उन्होंने स्वरचित श्लोक, “कालरामाङ्कचन्द्रे (काल=३, रा=३, अङ्क=९ एवं चन्द्र = १ अर्थात् ३३९१ यानी ‘अङ्कानां वामतो गति:’ के अनुसार १९३३) भाद्रमासे सितेदले प्रतपद्यादित्यवारे (भाद्रपद शुक्ल प्रतिपदा रविवार के दिन ) भाष्यारम्भकृतो मया…” (मेरे द्वारा भाषा आरम्भ किया गया है) के माध्यम से भी स्पष्ट किया है। सत्यार्थ प्रकाश प्रथम संस्करण तो भाद्र शुक्ल की नवमी को ही लिखा बताया जाता है। यह संस्करण मैंने नहीं देखा परन्तु उनका ‘अपना जन्म चरित्र’ भाद्र शुक्ल नवमी संवत् १९३६ तदनुसार २६.८.१८७९ को अपने लेखक से लिखवाकर स्वयं हस्ताक्षर करके उन्होंने कर्नल अल्काट को भिजवाया था, यह प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह है। कुल मिलाकर, हमने पूर्व में कहे श्रावण, भाद्र और आश्विन में से भाद्रमास को कुण्डली परीक्षण के लिए चुना।

भाद्र मास में जब हमने ज्वालादत्त जी के प्रमाण से (मूलेनासो जननविषये शङ्करापरेण) मूल नक्षत्र को टटोला तो यह देखकर हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि उस दिन नवमी भी थी और भाद्र शुक्ल नवमी के साथ मूल नक्षत्र का योग का भी। यह दिन निकला १९/२० सितंबर १८२५ ईस्वी का। अब जब उस दिन के ग्रह विस्थापन को देखा तो धनु राशि में चन्द्रमा, कन्या राशि में सूर्य, बृहस्पति,मंगल और बुध सिंह राशि में, शुक्र कर्क एवं शनि मिथुन राशि में और राहु व केतु क्रमशः वृश्चिक और वृषभ राशि में मिले। मुझे हैरानी तब और भी अधिक हुई जबकि महर्षि कि यह कुण्डली उनकी प्रचलित कुण्डली बन जाती है। इस प्रकार स्वामी जी की जन्मतिथि की स्थिति बहुत ही स्पष्ट हो जाती है और वह है भाद्र शुक्ल नवमी वि० संवत् १८८१ (कार्तिकीय)। इस प्रकार से हमने महर्षि की जन्म तिथि (दि० १९/२० सितंबर, १८२५ ई०) का स्पष्टीकरण गणितीय प्रमाण से भी सिद्ध कर दिया है।

सत्य को स्वीकारने अथवा ठुकराने के लिए आप सब स्वतन्त्र हैं किन्तु मेरा सत्य तो यही है। ओ३म्। शान्ति:।

आचार्य दार्शनेय लोकेश
सम्पादक – श्री मोहन कृति आर्ष पत्रकम् (एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग)


#१ महर्षि का स्वहस्थ लिखित यह जन्म चरित्र पहले पहल परोपकारिणी सभा के संयुक्त मन्त्री डा. भवानी लाल भारतीय ने परोपकारी पत्र के मार्च, १९७५ ई. के अङ्क में प्रकाशित किया था। बाद में इसे उन्होंने पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित किया था। निर्वाण शताब्दी के अवसर पर प्रकाशित दयानन्द ग्रन्थ माला में भी यह प्रकाशित है। प्राप्त जानकारी के अनुसार २०१९ में यह जन्म चरित्र ‘सर्व कल्याण धर्मार्थ न्यास’, पानीपत ने भी महर्षि दयानन्द कृत लघुग्रन्थ संग्रह में प्रकाशित किया है।

👉इस जन्म चरित्र के जो तीन प्रमाण पृष्ठ यहां उल्लिखित हैं उन तीनों को कोई भी महानुभाव मुझसे मांग सकते हैं। सामूहिक ब्रॉडकास्ट लिस्ट में एक साथ भेजना सम्भव नहीं हो रहा है।

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