16 संस्कार और भारतीय संस्कृति ,भाग 3

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5 नामकरण संस्कार

बच्चे के नामकरण संस्कार के बारे में हमारे विद्वानों की मान्यता रही कि नाम सार्थक होने चाहिए। जिससे बच्चे में जीवन भर एक भाव बना रहे कि तुझे अपने नाम को सार्थक करना है । हमारे यहां पर विष्णु , महेश , ब्रहम , ब्रह्मदेव , ज्ञानानन्द , रामानन्द , शिवानन्द जैसे सार्थक नाम रखने की परम्परा रही है । ऐसे नामों पर जातक जब स्वयं अपने विषय में चिंतन करता है तो वह कुछ न कुछ बनने की अवश्य सोचता है । कभी न कभी उसके मन में ऐसा भाव अवश्य आता है कि जैसा तेरा नाम है वैसे ही तेरे कर्म भी होने चाहिए । इसीलिए चरक ने कहा है कि नाम साभिप्राय होनें चाहिएं। नाम से बच्चे का जीवन पथ और जीवन का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए।
नामकरण संस्कार सन्तान के जन्म के दिन से ग्यारहवें दिन या एक सौ एकवें दिन में या दूसरे वर्ष के आरम्भ में जिस दिन जन्म हुआ हो किए जाने की परंपरा रही है । हमारे यहां पर यह भी परंपरा रही है कि बच्चों को प्यार करते समय उसका चुंबन नहीं लिया जाएगा। क्योंकि ऐसा करने से बच्चे को संक्रामक रोग लग सकते हैं । इसके स्थान पर बच्चे की नासिका द्वार को स्पर्श करने या बच्चे को सूंघने की परंपरा रही है।
यदि बालक ने जन्म लिया है तो समाक्षरी अर्थात 2 या 4 अक्षरों वाले नाम को रखना उत्तम समझा जाता है , और यदि बालिका ने जन्म लिया है तो विषम अक्षरी अर्थात 3 या 5 अक्षरों वाले नाम को रखना उचित माना जाता है।

6 — निष्क्रमण संस्कार

जब शिशु 2 या 3 माह का हो जाए तो उसे बाहर की शुद्ध वायु की आवश्यकता होती है । इसे ही निष्क्रमण संस्कार कहा जाता है , अर्थात जब बालक या बालिका अपने जन्म के पश्चात पहली बार घर से बाहर निकले तो उसका निष्क्रमण होता है । इसी को एक संस्कार के रूप में माना और मनाया जाता है ।निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकलना।
गृह्यसूत्रों में यह स्पष्ट किया गया है कि जन्म के बाद तीसरे शुक्ल पक्ष की तृतीया अर्थात् चान्द्रमास की दृष्टि से जन्म के दो माह तीन दिन बाद अथवा जन्म के चौथे माह में इस संस्कार को संपन्न कराया जाना उचित होता है। इस अवसर पर बाहर के लोग नव शिशु का स्वागत और सत्कार करते हैं । आज भी पहली बार घर से बाहर निकले ऐसे शिशु को लोग बहुत लाड – प्यार करते हैं और उसके चिरायु होने की कामना करते हैं । इस प्रकार के भाव और भावना सामाजिक संस्कारों को और समाज के देवत्वीकरण की प्रक्रिया को बलवती करने में बहुत सहायक सिद्ध होते हैं । पहली बार घर से बाहर निकलने के इस पवित्र अवसर पर विधान किया गया है कि माता-पिता को उस दिन यज्ञ करना चाहिए और प्रभु से प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारा बालक या बालिका सदा अनघ अर्थात पापरहित जीवन जिए। क्योंकि आज उसका समाज में पहली बार परिचय या गमन हो रहा है , इसलिए संसार के किसी भी प्राणि के प्रति उसके हृदय में पाप भावना न हो और आजीवन वह पुण्यमयी जीवन जीने का प्रयास करे । ऐसी पवित्र और उत्कृष्ट दिव्य भावनाओं के साथ बालक के माता-पिता को चाहिए कि वह उसे यज्ञ के उपरान्त सूर्य के प्रकाश के दर्शन कराएं। फिर रात्रि में उसे चंद्रमा की भी दर्शन कराएं । इस प्रकार निष्क्रमण संस्कार के समय बालक का परिचय सूर्य , चंद्रमा , सितारे ,नक्षत्र आदि से कराया जाना शास्त्रविहित कर्म है ।
आयुर्वेद के ग्रन्थों में कुमारागार, बालकों के वस्त्र, उसके खिलौने, उसकी रक्षा एवं पालनादि विषयों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है।
क्रमश:

डॉ राकेश कुमार आर्य

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