भारत की नौसेना के बढ़ते कदम …

जब किसी देश के आगे बढ़ते कदमों से दुश्मन का दिल दहलने लगे तब समझो कि वह सचमुच एक ऐसी दिशा पकड़ गया देश बन चुका है जो अब अपने अस्तित्व का एहसास ही नहीं कराता है बल्कि दुश्मनों के अस्तित्व के लिए खतरा भी बन चुका है। निश्चित रूप से भारत आज इसी प्रकार की गति पकड़ चुका है। आज भारत को लेकर विदेशों में कई प्रकार की चर्चाएं होती हैं। कई प्रकार के संपादकीय लिखे जाते हैं। भारत को अब रोकने की नहीं बल्कि उससे मित्रता करने की कोशिशें संसार के बड़े-बड़े देशों की ओर से होती हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था के रूप में भी जिस प्रकार भारत आगे बढ़ रहा है उससे भी हमारे कई शत्रुओं के पैरों की कंपकंपी बंध रही है।
हमारी सेना का मनोबल सारे देश को हौंसला देता है। हमारे कृषकों का परिश्रम सारे देशवासियों को अन्न की सुरक्षा का भरोसा देता है। हमारे मजदूरों की अथक मेहनत हमें एक मेहनती राष्ट्र के रूप में जीने का एहसास कराती है।
इन सब बातों के चलते भारत को इस समय बड़ी सफलता मिली है। विगत 22 नवंबर को हाल ही में बनकर तैयार हुए नौसेना के नवीनतम स्वदेशी युद्धपोत से मिसाइल दागी गई है। दुनिया की सबसे तेज चलने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ‘ब्रह्मोस मिसाइल’ को P15B डेस्ट्रॉयर से छोड़ा गया है। भारतीय नौसेना के लिए ही नहीं बल्कि प्रत्येक भारतवासी के लिए ये गौरव के पल रहे। आज के समय में किसी भी देश की नौसेना उसकी शक्ति का एक प्रमुख अंग होती है। नौसेना का कमजोर होना आज के समय में किसी भी देश को स्वीकार नहीं है। फिर भारत जैसे देश के लिए तो नौसेना की और भी अधिक आवश्यकता और महत्ता हो जाती है। क्योंकि हमारा देश तीन ओर से समुद्र से घिरा हुआ है। आज के वैश्विक परिवेश में समुद्री सीमाओं की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है, जितनी जमीनी सीमाओं की सुरक्षा की आवश्यकता होती है। कभी वह समय हुआ करता था जब भारत की समुद्री सीमाएं प्राकृतिक रूप से अपने आप सुरक्षित होती थीं, पर आज स्थितियां पूर्णतया परिवर्तित हो चुकी हैं। परिवर्तित हुई परिस्थितियों में हम अपनी समुद्री सीमाओं की उपेक्षा नहीं कर सकते। इसलिए इस उपलब्धि को कम करके नहीं आंकना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार नौसेना के नवीनतम स्वदेशी युद्धपोत का डिस्प्लेसमेंट 7400 टन है। यह 535 फीट लंबा युद्धपोत है। यह डीजल-इलेक्ट्रिक युद्धपोत है। अधिकतम स्पीड 56 किलोमीटर प्रति घंटा है। यदि इसे 33 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से चलाएं तो यह 15 हजार किलोमीटर की दूरी तय कर सकता है। 45 दिनों तक समुद्र में रह सकता है। इसमें चार रिजिड बोट्स भी हैं।
इस युद्धपोत पर 48 वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (वीएलएस) है। इसमें एंटी-एयर वॉरफेयर के तौर पर 32 बराक-8 सरफेस-टू-एयर मिसाइल लगी है। इसके अलावा एंटी-सरफेस वॉरफेयर के तौर पर 16 ब्रह्मोस एंटी-शिप मिसाइलें तैनात हैं। इतना ही नहीं इसमें 4 टॉरपीडो ट्यूब्स भी लगे हैं। 2 एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर्स लगे हैं। इस युद्धपोत पर 1 ओटो मेलारा नेवल गन, 4 AK-630M CIWS सिस्टम, 2 रिमोट कंट्रोल्ड गन हैं। इस जहाज पर 2 ध्रुव या सीकिंग हेलिकॉप्टर तैनात हो सकते हैं। साथ ही इस युद्धपोत पर 50 नेवल ऑफिसर और 250 नौसैनिक तैनात हो सकते हैं।
युद्धपोत आईएनएस इम्फाल से निकली ब्रह्मोस मिसाइल के एक्सटेंडेड वर्जन ने ‘बुल्स आई’ पर निशाना लगाया। न्यूज एजेंसी एएनआई ने एक्स पर वीडियो शेयर कर कहा, “इम्फाल (यार्ड 12706), भारतीय नौसेना के नवीनतम स्वदेशी निर्देशित मिसाइल विध्वंसक ने समुद्र में अपनी पहली ब्रह्मोस फायरिंग में ‘बुल्स आई’ स्कोर किया।
स्वदेशी पोत इम्फाल से मिसाइल नष्ट करने में मिली सफलता को रेखांकित करते हुए नौसेना ने कहा, “इससे ‘आत्मनिर्भर भारत’ आह्वान के तहत बढ़ती जहाज निर्माण क्षमता का भी पता चलता है। इम्फाल को अपने बेड़े में शामिल करने का फैसला दिखाता है कि नौसेना स्वदेशी हथियारों और प्लेटफार्मों की सुनिश्चित विश्वसनीयता पर अटूट फोकस कर रही है।”
सचमुच इस समय भारत के लिए प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना प्राथमिकता पर होना चाहिए । जब सारा संसार सांप्रदायिक आधार पर अर्थात इस्लाम और ईसाइयत के दो खेमों में विभाजित हो, उस समय भारत को अपने मित्रों की क्षमताओं पर भरोसा करने की बजाय अपने आप पर भरोसा करके चलने की नितांत आवश्यकता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब भारत ने इतिहास में विपरीत मजहब वाले लोगों का भरोसा कर सही समय पर धोखा खाया है।
अपने देश से भगौड़ा बनकर आया मुहम्मद बिन अलाफी नाम का एक अरबी मुसलमान हमारे सिंध के राजा दाहिर सेन की सेना में अपने अन्य 500 साथियों के साथ सम्मिलित हो गया था। राजा ने शरणागत के ऊपर कृपा दृष्टि करते हुए उसे बड़े पद पर बैठा दिया। जब मोहम्मद बिन कासिम का आक्रमण हुआ तो राजा ने मुहम्मद बिन अलाफी को बुलाकर उसके साथ मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से उत्पन्न हुई परिस्थितियों का सामना करने को लेकर विचार विमर्श किया। तब मुहम्मद बिन अलाफ़ी ने राजा को उत्तर दिया कि ‘महाराज ! मैं आपका ऋणी हूं । मुझ पर आपकी अनेक कृपाएं हैं। परंतु हम मुसलमान हैं और हमारी तलवार अपने मजहबी भाइयों के विरुद्ध नहीं उठेगी। यदि मैं मुसलमान के हाथों मरूंगा तो मेरी मौत एक पवित्र नीच आदमी की होगी और यदि उनको मारूंगा तो दोजख की आग में जलना पड़ेगा। मुझको शांतिपूर्वक यहां से जाने दीजिए।’
सिंधु सम्राट राजा दाहिर सेन शरणागत पर विश्वास करके चल रहे थे। उसने अपने अनेक साथियों के साथ सही समय आने पर धोखा दे दिया। हमें याद रखना चाहिए कि इस प्रकार की सोच आज भी जीवित है और जब भी कोई समय आएगा तो इस प्रकार की सोच के लोग आपके साथ नहीं होंगे। हमारा अभिप्राय आज के वैश्विक परिवेश से है। यह बहुत संभव है कि कोई मुस्लिम देश किसी मुस्लिम देश के विरुद्ध हमें सहायता ना करे, और यह भी संभव है कि कोई ईसाई देश किसी ईसाई देश के विरुद्ध हमारा साथ ना दे। तब हमें अपनी सुरक्षा अपने आप ही मजबूत करनी होगी। निश्चय ही हमारे रक्षा वैज्ञानिक इस बड़ी उपलब्धि के लिए बधाई के पात्र हैं। साथ ही वर्तमान नेतृत्व भी जिस प्रकार सेना को उसकी आवश्यकताओं के अनुरूप आधुनिक हथियार उपलब्ध कराने के प्रति संकल्पित है उसके लिए वह भी बधाई का पात्र है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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