महाभारत की शिक्षाप्रद कहानियां अध्याय – ८ ख विदुला की कहानी

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वीरांगना माता ने संजय से कहा कि “पुत्र ! जो लोग इस संसार में केवल संतान पैदा करने के लिए आते हैं, उन्हें इतिहास में कभी सम्मान नहीं मिलता । दान , तपस्या, सत्यभाषण, विद्या और धनोपाजर्न में जिसके शौर्य का सर्वत्र बखान नहीं होता, वह मनुष्य अपनी माता का पुत्र नहीं, मलमूत्र मात्र है। इसलिए तुझे ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे तू मलमूत्र न कहलाकर पुत्र कहलाने का अधिकारी बने। अपने शास्त्र ज्ञान, तपस्या और पराक्रम से तुझे अपने शत्रुओं को पराजित करने का उपाय खोजना चाहिए। तुझे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि संसार की कोई भी नारी तेरे जैसे पुत्र को जन्म देना अपने लिए कभी भी हर्ष का विषय नहीं मानेगी। तुझे जोर से प्रज्ज्वलित होकर उठना चाहिए और वेगपूर्वक शत्रु पर आक्रमण करने के लिए प्रस्थान करना चाहिए । तेरे भीतर इतना तेज होना चाहिए कि शत्रु उस तेज से अपने आप ही भस्म हो जाए। तुझे ऐसा उपाय खोजना चाहिए, जिससे तू अपने शत्रुओं पर जलती हुई आग की भांति बिखर जाए।”
माता विदुला ने अपने धर्मभ्रष्ट पुत्र संजय को युद्ध के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि “जिस व्यक्ति के भीतर शत्रुओं के प्रति क्षमा भाव होता है वह क्षत्रिय नहीं हो सकता। यदि शत्रु छाती पर उत्पात मचाये और फिर भी कोई क्षत्रिय उसके प्रति क्षमा भाव रखे तो समझो वह अपनी मृत्यु को अपने आप आमंत्रित कर रहा है। संतोष, दया, उद्योग शून्यता और भय – यह सब संपत्ति का नाश कर डालते हैं ।
संजय! पराजय के कारण लोक में इस समय तेरी निंदा हो रही है। लोग तेरा तिरस्कार कर रहे हैं । तुझे अपने आपको इस प्रकार के दोषों से मुक्त करना चाहिए और अपने हृदय को लोहे के समान मजबूत बनाकर काम करना चाहिए। वर्तमान अपमानजनक स्थिति और परिवेश से अपने आप को बाहर निकाल। जो व्यक्ति शत्रुओं के दांत खट्टे कर देता है, वही वास्तव में ‘पुरुष’ कहलाता है। उसका यह पुरुषार्थ ही उसे लोक में सम्मान दिलवाता है। यदि तू इस समय स्त्रियों की भांति भीरुता दिखाएगा तो तेरा ‘पुरुष’ नाम व्यर्थ चला जाएगा। तुझे अपने बाहुबल का अस्त्र लेकर उत्कृष्ट जीवन जीने के लिए उठ खड़ा होना चाहिए। तेरे रहने से सबको संबल मिलना चाहिए, पर यदि तू इस प्रकार घर में आकर छुपेगा तो इससे लोग तेरे ऊपर भरोसा नहीं करेंगे।
संजय ! तुझे यह ध्यान रखना चाहिए कि शूरवीर व्यक्ति वही होता है जो शत्रुओं का नाश करता है। संपूर्ण भूमंडल में विख्यात होने के लिए तुझे शत्रु वध के अपने कर्तव्य धर्म का पालन करना चाहिए। तुझे युद्ध क्षेत्र में जाकर कवचधारी शत्रुओं को ललकारना चाहिए । उनकी सेना का नाश करना चाहिए। घर में बैठकर तुझे अपने यश का नाश करने की अपेक्षा शत्रु नाश पर ध्यान देना चाहिए। मुझे तेरे होने पर तभी गर्व होगा जब तू यहां से निकल कर शत्रुओं का तीव्रता से संहार करेगा और विजयी होकर घर लौटेगा। तू युद्ध क्षेत्र में जा और अपने शत्रुओं को मार। अपने धर्म का पालन कर। युद्ध को ही राज्य प्राप्ति का एकमात्र मार्ग मानकर तुझे इस समय शत्रुओं पर टूट पड़ना चाहिए।”
माता के ऐसे वीरता पूर्ण वचनों को सुनकर भी संजय के भीतर रक्त का संचार नहीं हुआ। उस पर उस समय कायरता सवार हो चुकी थी। तभी तो उसने अपनी मां से कह दिया कि “मां ! तू कितनी कठोर है ? जो अपने इकलौते पुत्र से भी ऐसी निष्ठुरता भरी बातें कर रही है।”
तब माता ने कहा कि “यदि इस समय तुझे मैं युद्ध के लिए प्रेरित नहीं करूंगी तो मेरी ममता व्यर्थ ही सिद्ध होगी। मेरा वात्सल्य गधी के स्नेह के समान शक्तिहीन और पूर्णतया निरर्थक सिद्ध होगा। मैं कदापि नहीं चाहूंगी कि जिस पुत्र ने मेरा दूध पिया है वह इस प्रकार की अपमानजनक स्थिति में आकर मेरे दूध का अपमान करे। वत्स ! तू श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा निन्दित और मूर्खों द्वारा सेवित मार्ग को छोड़ दे और युद्ध क्षेत्र में जाकर युद्ध कर।”
इस पर संजय ने कहा कि “मां ! मेरे पास इस समय ना तो खजाना है और ना सहायता करने वाले सैनिक हैं। फिर मुझे विजय रूप अभीष्ट की सिद्धि कैसे मिलेगी ? ऐसी स्थिति में क्या तुम्हारे पास कोई ऐसा उपाय है जो मुझे युद्ध क्षेत्र में विजय श्री दिला सके।”
पुत्र की इस बात पर माता ने कहा कि “तुम्हें सफलता प्राप्ति का कठोर संकल्प लेकर युद्ध क्षेत्र के लिए प्रस्थान करना चाहिए। यदि तू घर में पड़ा पड़ा “विजय होगी भी कि नहीं” के द्वंद में फंसा रहा तो कभी भी जीत नहीं पाएगा और यदि इसी द्वंद्व भाव को अपनाकर मैदान में उतरा तो भी तेरी पराजय निश्चित है। तुझे विकल्पविहीन संकल्प लेकर युद्ध क्षेत्र में जाना होगा।
विषादरहित होकर उठो और शत्रु का नाश करो।” इसके पश्चात संजय का विवेक लौट आया। तब उसने माता को यह वचन दिया कि “अब मैं या तो शत्रु रूपी जल में डूबे अपने राज्य का उद्धार करूंगा अथवा युद्ध में शत्रुओं का सामना करते हुए अपने प्राण त्याग दूंगा।”
हमारे यहां ऐसी महान माताएं हुआ करती थीं, जो अपने पुत्रों को प्राणों के भय से बाहर निकालकर युद्ध क्षेत्र के लिए प्रस्थान करने के लिए प्रेरित करती थीं। आज माता कुंती के लिए वह क्षण आ गए थे जब वह अपने पुत्रों को युद्ध क्षेत्र के लिए प्रेरित कर रही थी और उन्हें कृष्ण जी के माध्यम से समझा रही थी कि “राष्ट्र रक्षा, धर्म रक्षा और संस्कृति रक्षा के लिए तुम्हें अपने पूर्वजों का मान बढ़ाते हुए इस समय युद्ध क्षेत्र में जाकर शत्रु नाश करने की योजना पर विचार करना चाहिए । यदि आज तुम अपने इस पथ से भ्रष्ट हो गए तो इतिहास तुम्हें अपयश का भागी बनाएगा।”
यही कारण था कि उस समय माता कुंती ने श्री कृष्ण जी के माध्यम से अपने पुत्र भीम और अर्जुन के लिए यह संदेश भिजवा दिया था कि “क्षत्राणियां जिस समय के लिए पुत्र को जन्म देती हैं, उसका यह उपयुक्त अवसर आ गया है।”
धन्य हैं ऐसी माताएं जिनके महान विचारों से राष्ट्र का निर्माण होता है, धर्म की रक्षा होती है और संस्कृति को फलने फूलने का अवसर उपलब्ध होता है। इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है।
डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह कहानी मेरी अभी हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तक “महाभारत की शिक्षाप्रद कहानियां” से ली गई है . मेरी यह पुस्तक ‘जाह्नवी प्रकाशन’ ए 71 विवेक विहार फेस टू दिल्ली 110095 से प्रकाशित हुई है. जिसका मूल्य ₹400 है।)

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