जयपुर नगर में महर्षि दयानन्द लेख संख्या 25*

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लेखक आर्य सागर खारी 🖋️

(महर्षि दयानन्द सरस्वती की 200 वीं जयंती के उपलक्ष्य में 200 लेखों की लेखमाला के क्रम में आर्य जनों अवलोकनार्थ लेख संख्या 25)

जयपुर में महर्षि दयानन्द 4 मास ठहरे, सन 1865 व 1866 के मध्य। जयपुर के पंडितों को शास्त्रार्थ में पराजित करने के पश्चात दूर-दूर से लोग शंका समाधान करने के लिए महर्षि दयानंद के पास आने लगे ।एक दिन महर्षि दयानन्द से मिलने अचरोल रियासत के जागीरदार ठाकुर रणजीत सिंह आए। ठाकुर रणजीत सिंह धार्मिक प्रवृत्ति के सज्जन थे और राधाकृष्ण मत को मानते थे उन्हीं का भजन किया करते थे ।एक दिन वह अपने मित्र ठाकुर हमीर सिंह के साथ किसी मुकदमे के सिलसिले में जयपुर आए थे ।हमीर सिंह जो स्वामी जी के प्रवचनों को सुनकर मूर्ति पूजा से उनका विश्वास उठ गया था ।उन्होंने ठाकुर रणजीत सिंह को मूर्ति पूजा के खंडन के विषय में अवगत कराया जिस पर रणजीत सिंह ने कहा कि फिर हम क्या करें और किसको गुरु माने। ठाकुर हमीर सिंह महर्षि दयानन्द से मिल चुके थे उन्होंने ठाकुर रणजीत सिंह को बताया एक साधु नंदराम मोदी के बाग में ठहरे हुए हैं आप उनसे मिले और उनसे उपदेश ले। ठाकुर हमीर सिंह के सुझाव पर ठाकुर रणजीत सिंह स्वामी दयानंद से मिले प्रथम भेंट में ही स्वामी जी से इतने प्रभावित हुए बग्गी भेज कर पंडित रूपराम जोशी को स्वामी जी को लिवा लाने के लिए भेज दिया ।स्वामी जी निमंत्रण स्वीकार करके पैदल ही ठाकुर साहब से मिलने उनके ठिकाने पर पहुंचे ।वही पर भोजन किया ठाकुर रणजीत सिंह ने बहुत से विषयों में शंका समाधान महर्षि दयानंद से किया। अंत में उसने स्वामी दयानन्द से प्रार्थना की जब तक आप रहे मेरे इसी छोटे से महल में रहे उन्होंने स्वामी जी का बाग से शेष सामान भी वही मंगा लिया ।स्वामी जी चार दिन तो ठाकुर रणजीत सिंह के महलों में रहे उसके रणजीत सिंह के बाग जो बदनपुरा में गंगापोल द्वार के बाहर है वहां स्वामी जी चले गए और कहा हम एकांत में रहना चाहते हैं स्वामी जी ने वहां पर बने पक्के मकानों मैं रहना पसंद नहीं किया ठाकुर रणजीत सिंह ने स्वामी जी की इच्छा के अनुसार एक कच्चा घर छप्पर डलवा कर बारादरी के प्रकार का बनवा दिया। वहा स्वामी जी रहे नगर के शेष विद्यार्थी धार्मिक जन स्वामी जी से मिलने नित्य प्रति आया करते थे ।स्वामी जी मनुस्मृति उपनिषदों आदि का वाचन कथा करते थे।

1 दिन की घटना है हीरालाल माथुर नामक कायस्थ जो भूतपूर्व कामदार था उसकी उम्र 62 वर्ष की थी वह मद्यपान किया करता था ।एक दिन वह मद्य पिए हुए था। वह दिन में भी सुरापान करता था। गंगापुर बाग में आया उसने किसी से पूछा स्वामी दयानंद कहां ठहरे हुए हैं पता मिलने पर वह ठीक उसी स्थान पर पहुंच गया जहां स्वामी जी प्रवचन दे रहे थे। दुर से ही दंडवत कर बैठ गया क्योंकि वह मद्य के नशे में चूर था उसे समय स्वामी जी मनुस्मृति का प्रायश्चित अध्याय बाच रहे थे प्रकरण यह था गौ हत्या, स्वर्ण चोरी ,सुरापान आदि का यह दंड है जब सुरापान का दंड उन्होंने स्वामी जी के मुख से सुना उसका अर्थ उसने समझा तो उसने बहुत खेद माना और अपने अतीत पर पश्चाताप करने लगा इस समय उसकी मन विरक्त हो गया और उसने संकल्प लिया भविष्य में कभी मद्यपान नहीं करूंगा अब वह प्रतिदिन घर से भ्रमण के बहाने बाहर आता और सीधे स्वामी जी की सेवा में सत्संग में उपस्थित हो जाता। हीरालाल कायस्थ ने स्वामी जी के जीवनीकार पंडित लेखराम को बताया मैंने उसी दिन से मांस मदिरा को त्याग दिया उसने बताया स्वामी जी केवल भगवा कोपीन धारण करते थे ।10 उपनिषदों की कथा करते थे उपनिषद ग्रंथ उन्होंने बंबई से मंगवाए थे गीता का भी कुछ-कुछ उपदेश करते थे भाष्य सुनाते थे। मूर्ति पूजा का खंडन करते थे कहते थे परमात्मा तो हृदय में है हृदय में परमात्मा का ध्यान करो मूर्ति पूजा अच्छी नहीं है। स्वामी जी ने वहां अनेकों रईस जागीरदारों को गायत्री का उपदेश दिया था और कहते थे साधारण ब्राह्मण लोग आपको बहकाते हैं। स्वामी जी के सरल गंभीर उपदेशों से जयपुर शहर में क्रांति मच गई थी स्वामी जी ने अनेकों सज्जनों को जनेउ दिया था।

स्वामी जी के उपदेशों से असंख्य पतितो का उद्धार हुआ कितने मुंशीराम कितने अमीचदं और न जाने कितने हीरालाल कायस्थ का काया पलट हो गया था स्वामी जी के उपदेशों को सुनने मात्र से। इतना पावन चरित्र था स्वामी दयानंद सरस्वती का। ऋषि की इस पावन गाथा को हम आगामी लेखों में इसी भांति प्रस्तुत करते रहेंगे।

शेष अगले अंक में!

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