देश का विभाजन और सावरकर, अध्याय 13 ऐसे बनी थी कांग्रेस और सावरकर के बीच दूरी

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ब्रिटिश सरकार द्वारा जब 10 मई 1937 को सावरकर जी की बिना शर्त रिहाई हुई तो उस समय रत्नागिरी कांग्रेस कमेटी ने उनके स्वागत में एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। यह वह दौर था जब कॉन्ग्रेस सावरकर जी जैसे राष्ट्रवादी नेता को अपने साथ खींचकर मिलाने के लिए लालायित थी। उस समय कांग्रेस के लिए सावरकर एक चुंबकीय व्यक्तित्व के स्वामी थे। कांग्रेस की मान्यता थी कि ऐसे व्यक्ति को यदि अपने साथ मिलाया जाएगा तो निश्चय ही कांग्रेस के मंच की शोभा बढ़ेगी। उस कार्यक्रम में 15 मई 1937 को कांग्रेस कमेटी ने सावरकर के हाथों से ही ध्वजारोहण कराया था। तब वह कांग्रेस के लिए ना तो ‘अछूत’ थे और ना ही ‘माफी’ मांगने वाले सावरकर थे। ध्वजारोहण के उपरांत सावरकर जी ने अपने भाषण में कहा था ‘हिंदू ध्वज को उठाने वाले आप इसको कैसे उठा रहे हैं? इस सवाल का जवाब एक ही है और वह यह है कि ‘यह राष्ट्रध्वज है।’ इस ध्वज के तले ही सभी धर्मों के लोगों को समत्व के साथ खड़ा रहना चाहिए। इस ध्वज के नीचे खड़े रहकर भी जो व्यक्ति अपने मन में जातीय और धार्मिक भावना रखेगा, वह पापी होगा। घर में जिस तरह अन्य बातें करने के लिए हम सब स्वतंत्र होते हैं, उसी तरह अन्य समय में मेरे हिंदू होने पर कोई हर्ज नहीं है… इस ध्वज के नीचे हम सब एक होकर राष्ट्रीय स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए जी जान से प्रयास करें।’ (हिंदू राष्ट्रवाद : सावरकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, पृष्ठ 378)

राष्ट्रध्वज और समत्व भाव

अपने इस भाषण में सावरकर जी ने यह स्पष्ट किया कि उन्हें कि कांग्रेस के मंच पर आने में कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते कि हम सब एक सांझा उद्देश्य को सामने रखकर राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए कार्य करें। मैं हिंदू हूं या हिंदुत्व की राजनीति करता हूं यह बात अलग है, लेकिन राष्ट्र के लिए हम सब एक हैं और एक होकर काम करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस का झंडा इस समय सबका झंडा होना है , इस झंडे के नीचे आकर हम एक राष्ट्र के श्रेष्ठ नागरिक बन जाएं । जाति, संप्रदाय, लिंग आदि के सारे भेद मिट जाएं। सावरकर के इस चिंतन को और भी अधिक धार देने की आवश्यकता थी। जब वह समत्व के साथ खड़े होने की बात कर रहे थे तो इसका सीधा अभिप्राय था कि यहां पर कोई भी व्यक्ति संप्रदायिक दृष्टिकोण अपनाकर ना तो खड़ा होगा और ना ही ऐसा चिंतन अपने मन मस्तिष्क में लाएगा। समत्व भाव के प्रति समर्पण दिखाकर सावरकर जी ने स्पष्ट किया कि वह मुस्लिम लीग के या किसी भी मुस्लिम नेता के इस प्रस्ताव का स्वागत ही करेंगे कि वे भारतीयता के साथ समरूप होकर रहने के लिए तैयार हैं। यदि वह ऐसा करते हैं तो यह हम सबके लिए प्रसन्नता की बात होगी।
उस समय सावरकर जी बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में कॉन्ग्रेस के कार्यक्रमों का समर्थन करने का मन बना चुके थे। कांग्रेस को भी उस समय तक सावरकर जी के हिंदुत्व से किसी प्रकार की दुर्गंध नहीं आ रही थी। कांग्रेस जिस प्रकार उस समय सावरकर जी के स्वागत समारोह में लगी हुई थी , उससे पता चलता है कि 1937 तक के सावरकर की कांग्रेस समर्थक थी। कहने का अभिप्राय है कि इससे पहले सावरकर जी ने चाहे कोई भाषण दिया, चाहे कोई पुस्तक लिखी, चाहे कोई कार्यक्रम किया, चाहे किसी अंग्रेज अधिकारी से प्रतिशोध लिया वे सब कुछ कॉन्ग्रेस के लिए सहनीय थे।

कांग्रेस को बताया था मशालवाहक

सावरकर जी भी उस समय तक कांग्रेस को आजादी की मशालवाहक बता रहे थे। उस समय तक सावरकर जी कांग्रेस के दादा भाई नौरोजी, बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी , पंडित जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं की समय-समय पर प्रशंसा करते रहते थे। यदि बात 1920 की करें तो उस समय महात्मा गांधी , वल्लभभाई पटेल और तिलक जैसे कांग्रेसी नेताओं ने सावरकर जी को बिना शर्त रिहा करने की मांग ब्रिटिश शासकों से की थी।
इसके पश्चात कैसे कांग्रेस और सावरकर जी एक दूसरे के लिए उत्तरी – दक्षिणी ध्रुव हो गए ? इस बात का खुलासा वैभव पुरंदरे की पुस्तक से होता है। वैभव पुरंदरे लिखित पुस्तक ‘सावरकर: द ट्रू स्टोरी ऑफ फादर ऑफ हिंदुत्व’ में स्पष्ट किया गया है कि :-
उस समय उत्तर – पश्चिमी सीमांत प्रांत में मुसलमानों द्वारा कुछ हिंदू युवतियों का अपहरण किया गया था। तब कुछ ऐसे नेता निकल कर सामने आए जिन्होंने उन युवतियों को फिर से अपहरणकर्ताओं को देने की बात कही। कांग्रेस के लिए उस समय अपेक्षित था कि वह इस प्रकार की शर्मनाक घटनाओं की निंदा करती और जिन लोगों ने यह निंदनीय कृत्य किया था ,उन्हें सजा देने की बात कहती । पर उसने ऐसा न करके उन स्थानीय नेताओं का समर्थन किया जो उन हिंदू युवतियों को फिर से मुस्लिम अपहरणकर्ताओं को देने की बात कह रहे थे। कांग्रेस के इस प्रकार के आचरण से सावरकर जी को गहरी ठेस पहुंची। वह यह मानकर चल रहे थे कि कांग्रेस ऐसी घटनाओं को हिंदू मुस्लिम एकता के दृष्टिगत तो शर्मनाक मानेगी ही साथ ही वह मानवता के विरुद्ध भी इस प्रकार की घटनाओं को निंदनीय करार देगी।

कांग्रेसियों को बताया राष्ट्रीय हिजड़े

तब दु:खी सावरकर जी ने महाराष्ट्र के मिरज में एक भाषण में उक्त घटना का समर्थन करने वाले कांग्रेसी नेताओं को ‘राष्ट्रीय हिजड़े’ कह दिया। इसके पश्चात सावरकर जी और कांग्रेस के बीच दूरियां बढ़ने लगी। कांग्रेस के नेता महात्मा गांधी एक जिद्दी स्वभाव के महात्मा थे। उनका सदा यह प्रयास रहता था कि वह जो कुछ कह रहे हैं या कर रहे हैं उसे सभी लोग आंख मूंदकर स्वीकार करें। यदि उनकी बात पर कहीं से किसी भी प्रकार की असहमति का स्वर सुनाई देता था तो उसे गांधीजी अपने व्यक्तिगत सम्मान से जोड़कर देखते थे। इस घटना के पश्चात कांग्रेस और सावरकर जी के रास्ते अलग-अलग हो गए। राजभक्त कांग्रेस एक राष्ट्रभक्त की टिप्पणी को सहन नहीं कर पाई। लोकतंत्र का ढोंग रचने वाले कांग्रेसियों को लोकतंत्र में आलोचना कभी रास नहीं आई। सावरकर जी का उपरोक्त कथन और उस पर की गई कांग्रेस की टिप्पणी इसी बात का संकेत है। लोकतंत्र में आलोचना का अभिप्राय सदा निंदा ही नहीं होता है। इसका अभिप्राय होता है कि अपने विरोधी को कुछ कठोर शब्द बोलकर सही रास्ते पर लाया जाए। कांग्रेस को उस समय सावरकर जी के उपरोक्त कथन पर या टिप्पणी पर आत्मचिंतन करना चाहिए था।
कांग्रेस की ओर से जो लोग सावरकर जी का सम्मान करने के कार्यक्रम रख रहे थे ,उन्होंने भी ऐसे कार्यक्रम रद्द कर दिए। उनकी इच्छा थी कि सावरकर जी ने जो कुछ भी कांग्रेसी नेतृत्व के लिए बोला है उसके लिए उन्हें दंडित किया जाना आवश्यक है। इससे पता चलता है कि कांग्रेस के नेता किसी भी मुद्दे को लेकर कितने अधिक पूर्वाग्रहग्रस्त होते रहे हैं ? साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि सावरकर जी कितने स्पष्टवादी थे ? वह किसी भी प्रकार के सम्मान को तब तक स्वीकार नहीं करते थे, जब तक कि सब कुछ ठीक-ठाक ना हो। यदि राष्ट्र और राष्ट्रीय मूल्यों के विरुद्ध कोई भी व्यक्ति उन्हें काम करता दिखाई देता था तो वह चाहे व्यक्ति हो या फिर कोई संस्थागत शक्ति हो, वह दोनों से बराबर टक्कर लेने की ठान लिया करते थे।

‘एक व्यक्ति एक मत’

“हिंदू राष्ट्रवाद: सावरकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” नामक उपरोक्त पुस्तक के पृष्ठ 378- 79 से हमें पता चलता है कि रत्नागिरी में सावरकर के लिए सत्कार समारोह आयोजित किए गए थे। नजरबंदी के दौरान सावरकर को ब्रिटिश सरकार की ओर से केवल ₹60 आजीविका निधि मिलती थी। इससे अनुमान हो जाता है कि उन्होंने अपना जीवन कैसे व्यतीत किया होगा? बिना शर्त रिहाई के बाद रत्नागिरी के नागरिकों ने सावरकर को एक थैली भेंट की थी। ऐसे ही एक समारोह में अपने भविष्य के संबंध में सावरकर ने कहा था – ‘प्रतिकार सहयोग और दबाव जैसे मार्गों से ही हमें स्वतंत्रता के लक्ष्यों को हासिल करना है। ‘एक व्यक्ति एक मत’ के सिद्धांत पर आधारित लोकतंत्र ही स्वराज्य की मूलभूत रूपरेखा है। वही मूलभूत ढांचा है। हां, इन लक्ष्यों को हासिल करने के दौरान हिंदुओं के न्यायिक अधिकारों पर कोई कुठाराघात ना होने पाए, इसके लिए मैं जरूर प्रयत्नों की पराकाष्ठा कर दूंगा। जो भी होगा- चलेगा, मगर मैं हिंदुओं का पक्ष कभी नहीं छोडूंगा। हिंदू विरोधी के रूप में वैभव की सीढ़ियां चढ़ने से भी मैं मना कर दूंगा । उसकी तुलना में हिंदू के रूप में मरना पसंद करूंगा।’
उनके इस भाषण से स्पष्ट होता है कि सावरकर जी को हिंदू हितों पर कुठाराघात किसी भी मूल्य पर सहन नहीं था। ऐसे में यदि कांग्रेस अपहरणकर्ताओं की उपरोक्त घटना का समर्थन करते हुए हिंदू युवतियों को उनकी हवस का शिकार बनने देने के समर्थन में वक्तव्य दे रही थी तो इसे सावरकर जी भला कैसे सहन कर सकते थे? उन्हें कांग्रेस की ओर से मिलने वाले किसी सम्मान या वैभव की आवश्यकता नहीं थी। इसके विपरीत वह चाहते थे कि कांग्रेस जिस प्रकार मुस्लिमों के हितों का समर्थन करती है, उसी प्रकार हिंदुओं के हितों का समर्थन भी करे। जहां तक नारी के सम्मान की बात है तो उसे हिंदू मुस्लिम के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है, वह मातृशक्ति है और मातृशक्ति का सम्मान करना भारत की प्राचीन परंपरा है। यदि कांग्रेस भारत की इस प्राचीन वैदिक हिंदू परंपरा के विरुद्ध आचरण कर रही थी तो यह उसका ‘राष्ट्रीय हिजड़े’ का स्वरूप ही था।

‘लोकशाही स्वराज्य पार्टी’ और सावरकर

उपरोक्त पुस्तक से ही हमें पता चलता है कि सावरकर जी ने 1 अगस्त 1937 को लोकमान्य तिलक की पुण्यतिथि के अवसर पर तिलक की ‘लोकशाही स्वराज्य पार्टी’ में सम्मिलित होने का निर्णय लिया था। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक एक क्रांतिकारी नेता थे। उनकी लोकशाही स्वराज्य पार्टी निश्चित रूप से उनके सपनों को साकार करने के लिए काम कर रही थी। उधर सावरकर जी स्वयं में क्रांति का एक स्रोत थे। स्पष्ट है कि उन्हें अपने अनुकूल पार्टी में जाना ही उचित लगा। यद्यपि इसके कुछ समय पश्चात ही वह हिंदू महासभा में चले गए थे। ‘मैं कांग्रेस पार्टी में क्यों नहीं जाऊंगा ?’ इसका कारण बताते हुए 1937 में सावरकर जी ने कहा था ‘हिंदुत्व के मुद्दे पर कांग्रेस के साथ मेरे मतभेद हैं। मुझे कांग्रेस द्वारा मुसलमानों का अनुनय विनय करना कतई स्वीकार नहीं है। यदि उनके साथ भी सभी लोगों के जैसा ही व्यवहार किया जाता तो मैं कांग्रेस में शामिल हो गया होता । मगर अपने आप से धोखाधड़ी कर कांग्रेस में शामिल होना मुझे उचित नहीं लगता।’
सावरकर जी अंतरात्मा की आवाज पर काम करते थे। इसका अर्थ है कि वे मौलिक रूप में स्वाधीनता के उपासक थे। उन्हें किसी महात्मा या अन्य किसी ऐसे ही बड़े नेता की बात में अपनी अंतरात्मा के विरुद्ध जाकर हां में हां मिलाना पड़े, यह उन्हें स्वीकार नहीं था। इसे वह जमीर का सौदा करना मानते थे । एक स्वाभिमानी सावरकर के लिए जमीर बेचना किसी भी स्थिति में उचित नहीं था। यही कारण था कि सावरकर जी ने हिंदू युवतियों के साथ किए गए व्यवहार को हिंदू अस्मिता से जोड़कर देखा और हिंदू स्वाभिमान के लिए वह उठ खड़े हुए।
उस समय उन्हें अपने व्यक्तिगत सम्मान की कोई इच्छा नहीं थी। उनकी इच्छा थी तो केवल यह थी कि देश में हिंदू स्वाभिमान और नारी अस्मिता पर कोई आंच न आने पाए।

खबर झूठी थी?

वैभव पुरंदरे लिखित उपरोक्त पुस्तक 'सावरकर: द ट्रू स्टोरी ऑफ फादर ऑफ हिंदुत्व' में कहा गया है कि पुणे में सावरकर के स्वागत कार्यक्रम के प्रभारी कांग्रेसी नेता एनवी गाडगिल ने उस समय कांग्रेस के लिए सावरकर जी की कड़ी प्रतिक्रिया के दृष्टिगत स्वागत प्रभारी का पद छोड़ दिया था और कहा था कि सावरकर ने जिस खबर पर कड़ी प्रतिक्रिया दी, वह झूठी थी। पुरंदरे ने अपनी पुस्तक में लिखा कि गाडगिल ने कहा था कि डॉ. खान साहिब के नाम से मशहूर अब्दुल जफ्फार खान ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया था कि लड़कियां अपहरणकर्ताओं को सौंप दी जानी चाहिए। अब्दुल गफ्फार खान सीमांत गांधी के नाम से मशहूर गफ्फार खान के भाई थे। अपने स्पष्टीकरण में गाडगिल ने इतना अवश्य स्वीकार किया था कि ये उनके नाम से छपा ज़रूर था। गाडगिल के इस बयान के बाद रिपोर्टिंग को लेकर सवाल खड़े हुए।

अब बारी कांग्रेस की थी। कांग्रेस के लिए यह बात बहुत ही पीड़ादायक थी कि उन्हें कोई ‘हिंदू नेता’ राष्ट्रीय हिजड़े के सम्मान से नवाजे। अभी कुछ दिन पहले कांग्रेस के तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को पड़ोसी देश पाकिस्तान के एक नेता ने ‘देहाती महिला’ कहा था। कांग्रेस ने जैसे इस बात को सहज रूप में पचा लिया था, वैसे ही वह देश विभाजन के समय या उससे पहले मुस्लिम लीग की ओर से आने वाली ऐसी प्रत्येक टिप्पणी को सहज रूप में पचा लेती थी पर यदि ऐसी ही कोई टिप्पणी किसी हिंदूवादी नेता की ओर से आ जाए तो कांग्रेस के महात्मा भी फट पड़ते थे। इसका कारण केवल यही था कि कांग्रेस के नेता ऊपरी लबादा अवश्य महात्मा का या ऐसी ही किसी बनावटी नैतिकता का पहनते थे , पर भीतर से वे प्रतिशोध की अग्नि से जलते रहते थे। आश्चर्यजनक बात यह थी कि उनकी यह अग्नि मुस्लिमपरस्त नेताओं के सामने ठंडी पड़ जाती थी। आज के कांग्रेसी नेताओं के भीतर भी हम इस कुसंस्कार को यथावत देखते हैं।
उपरोक्त पुस्तक से ही यह स्पष्ट होता है कि गाडगिल के इस कदम के बाद सावरकर का जो भी कार्यक्रम होता, वहां कांग्रेसी काले झंडे लेकर विरोध प्रदर्शन करते। कांग्रेस ने सावरकर की पूर्ण उपेक्षा करनी आरंभ की। उसी का परिणाम निकला कि सावरकर और कांग्रेस के बीच फिर कभी नहीं बनी। सावरकर बाबासाहेब आंबेडकर को छोड़ नेहरू, गांधी और सभी प्रमुख कांग्रेसी नेताओं की समय – समय पर आलोचना करते रहे। उधर, कांग्रेस भी पूरी ताकत से सावरकर के विरोध में खड़ी हुई और सावरकर को धीरे-धीरे भारतीय राजनीति से दरकिनार करती चली गई।
सावरकर जी का हिंदुत्व के प्रति समर्पण और हिंदू अस्मिता के प्रति उनकी वचनबद्धता कांग्रेस को कभी स्वीकार नहीं थी। बस, यही वह कारण है जिसके चलते कांग्रेस उन्हें देश विभाजन का दोषी मानती है और ऐसा कह कर वह अपने पापों को छुपा लेती है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह लेख मेरी नवीन पुस्तक “देश का विभाजन और सावरकर” से लिया गया है। मेरी यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स दिल्ली से प्रकाशित हुई है जिसका मूल्य ₹200 और पृष्ठ संख्या 152 है।)

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