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Dr D K Garg

पौराणिक कथा :सती के पिता दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन उन्होंने अपने दामाद और बेटी को यज्ञ का निमंत्रण नहीं भेजा। फिर भी सती शिवजी से जिद करके अपने पिता के यहां यज्ञ में पहुंच गई। दक्ष ने उसकी उपेक्षा की और शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें कही।सती के लिए अपने पति के विषय में ऐसी बातें बर्दाश्त नहीं कर पाई और इस अपमान की कुंठा के कारण उन्होंने वहीं यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए।
बस यहीं से सती के शक्ति बनने की कहानी शुरू होती है।
सती के दाह से शिव दुखी हो गए उन्होंने यह खबर सुनते ही वीरभद्र को दक्ष का सिर काटने के लिए भेजा। इसके बाद शिव ने तांडव नृत्य किया।शिव के दुखी होने से पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देख कर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े करने शुरू कर दिए। इस तरह सती के शरीर का जो हिस्सा और धारण किए आभूषण जहां-जहां गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आ गए। कथा के अनुसार जब शिवजी का क्रोध शांत हुआ तो उन्होंने दक्ष प्रजापति को मृतसंजीवनी विद्या द्वारा बकरे का सिर लगाकर फिर से जीवित कर दिया।
विश्लेषण :
मर्यादा पुरुषोत्तम राम से लेकर अब तक के अधिकांश महापुरुषों का इतिहास किसी ना किसी रूप में उपलब्ध है।राम को लगभग 10000 वर्ष हो गए जिसका विस्तार से बाल्मीकि ने वर्णन किया।लेकिन दक्ष,सती के विषय के कोई इतिहास नही है,और ये पात्र पुराण के लेखक द्वारा लिए गए काल्पनिक प्रतीत होते है।
ये पूरी गाथा अज्ञानियों की बे-सिर पैर की मनघङत कहानी है,इसका उद्देश्य हिंदू धर्म को पाखंडी , अवैज्ञानिक और अतर्किक सिद्ध करना ज्यादा लगता है।
इस कहानी में कई पात्र है कहानी का उद्देश्य और भावार्थ तो केवल इसका लेखक ही समझ सकता है,जो अब इस दुनियां में नहीं है।और रही बात कथावाचकों की, जो रटी-रटाई मनोरंजक कथा सुनाते है ,वास्तविक सन्देश और सत्यता की परख से उनका कोई लेना देना नहीं।
ये विचारणीय है कि ये सभी विशेष घटनाये उत्तर भारत में ही क्यों हुई है ? बाकी विश्व,बाकी भारत क्यो इन काल्पनिक कथाओं और भगवानों से अछूता है?
इसका कारण ये हो सकता है की अधिकांश कवि और लेखक विशेषकर यही से है और उनको काल्पनिक कथाओं में महारथ हासिल थी।
बहुत ज्यादा विरोधाभास है इस कहानी. ये घटना कब की है , कोई प्रमाण नहीं है ।
इस कहानी में एक सती नाम की महिला ने क्रोध में आकर आत्मदाह कर लिया और देश इसकी भ्रत्सना करने के बजाय पंडो ने सती प्रथा सुरु करवा दी , परिणामस्वरूप हजारो निर्दोष विधवा महिलाये जिन्दा आग में जल गयी।
दूसरा- देवी सती को प्रजापति दक्ष की पुत्री और शंकर की पत्नी बताया गया है ,जबकि इतिहासकार कहते है कि महाराजा शिव की पत्नी का नाम पार्वती और इनके दो पुत्र गणेश और कार्तिकेयन थे।
तीसरे- इसमें लिखा है की शिवजी का क्रोध शांत हुआ तो उन्होंने दक्ष प्रजापति को मृतसंजीवनी विद्या द्वारा बकरे का सिर लगाकर फिर से जीवित कर दिया।
शिव के क्रोध से सम्बंधित कई कहानिया है ,एक में उन्होंने अपने पुत्र गणेश का सर काट दिया और फिर हाथी का सिर उसको लगा दिया ,इस कहानी में शिव ने बकरे का सिर लगा दिया। दोनों कहानियो में पशु हत्या शिव के द्वारा करवा दी है । कैसी नीचता है।

प्रश्न है की क्या उच्च कोटि के विद्वान,भगवान को भी क्रोध और इसके बाद पागलपन आता है? यदि ऐसा है तो ये समझदार ,विद्वान की पहचान नहीं है और ऐसी साहित्य ,कथाएं त्याज्य है, अक्रोध मानव का धर्म है , छमा करना हमारे शाश्त्रो में वीरो का भूषण बताया जाता है –क्षमा वीरस्य भूषणम
कथा में आगे कहा है की शिव दुखी हो गए ,क्या शिव एक साधारण मानव थे जिसको गुस्सा आता है ,पागलपन होता है ,गर्दन काट देते है ,दुखी भी होते है ? फिर कभी बकरे का तो कभी हाथी का सिर मानव को लगा देते है।

वेद में शिव की जो व्याख्या की है उसके अनुसार ईश्वर शिव,निराकर , सृष्टि का रचयिता,कल्याणकारी
और सच्चिदानंद है , वह सर्वदा आनंदमय है। मनुष्य को सुख दुःख होते है क्योकि उसका जन्म कर्म करने के लिए हुआ है। ईश्वर प्रकृति के नियमो के विपरीत कार्य नहीं कर सकता और दूसरा ईश्वर नही बना सकता । परंतु एक कथा में
कथा के अंत में भगवान विष्णु भी आ गए ,और विष्णु के अपने सुदर्शन चक्र के दुरूपयोग द्वारा सती के शरीर के टुकड़े करने शुरू कर दिए। ये योद्धा है या महापुरुष या साक्षात ईश्वर ? इनका कैसा न्याय है ?

आगे कथाकार कहता है की जहां जहां शरीर के टुकड़े हवा में उड़कर गिरे वही शक्तिपीठ की स्थापना हो गई,यानी ये टुकड़े पूरे भारत के सभी राज्यों में ,नेपाल सहित ,पहुंच गए ,स्वत मूर्ति के शक्ल ले ली ,और इसको शक्तिपीठ नाम दे दिया,जिसके दर्शन से मन्नत पूरी होने का विश्वास दिया जाता हैं।

इस प्रकार की अज्ञान भरी कहानियों पर ध्यान ना देकर आर्ष ग्रन्थ पढ़ने चाहिए जो कि पूर्णतया वैज्ञानिक है ,वेदो पर आधारित है। इस उलटी कथानक में की गई तुकबंदी का कोई भावार्थ नहीं हो सकता।
वैसे एक कहानी के द्वारा एक संदेश भी हो सकता है कि कितना भी महान और संपन्न परिवार क्यो ना हो ,सदियों से परिवारों में फूफा (शिव) और फूफी (सती) यानी छोटी से बात पर क्रोध करके उत्सव बिगाड़ने वाले रिश्तेदार हमेशा से हुऐ है,जिसके दुष्परिणाम किसी भी हद तक हो सकते है। क्रोध करने वाले को बाद ने पछताना पड़ता है।

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