कहीं आग तो कहीं पानी, क्या है असल कहानी?

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नरपतदान बारहठ

इस साल दुनिया में कहीं आग बरस रही है तो कहीं पानी काल बन गया है। एक तरफ दिल्ली डूबी तो दूसरी ओर एशिया से लेकर अमेरिका तक फैली हीटवेव लोगों को झुलसा रही है। इटली में तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक है। फ्रांस, ग्रीस और पोलैंड भी गर्मी से उबल रहे हैं। स्कूल, दफ्तर और पब्लिक प्लेसेज बंद हैं, सैकड़ों फ्लाइट्स मुल्तवी हैं। हीट स्ट्रोक और बाढ़ लोगों की जान ले रही है तो अल नीनो का जोखिम अलग बना हुआ है। क्यों बने ऐसे हालात और कैसे निपटे इससे दुनिया, आइए देखते हैं।

क्या दुनिया पहली बार मौसम की ऐसी मार झेल रही है? खासकर पश्चिमी देश?
इसका जवाब हां भी है और नहीं भी। हां इसलिए क्योंकि इस बार बारिश से लेकर गर्मी तक के कई नए रेकॉर्ड बने हैं। मसलन, दिल्ली में दो दिन में इतना पानी बरस गया, जितना पूरी जुलाई में नहीं बरसता। दक्षिण कोरिया में अब तक की सबसे विकराल बाढ़ आई है, जिसमें 40 लोगों की जान जा चुकी है। गर्मी से दक्षिण अमेरिका और अमेरिका मिलाकर दो दर्जन लोगों की मौत हुई है। हाल में आई वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम की ‘ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट’ ने बताया कि दुनिया में करीब 360 करोड़ लोग (यानी लगभग आधी दुनिया) अत्यंत संवेदनशील इलाकों में रह रहे हैं। पिछले हफ्ते जर्नल नेचर में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल हीटवेव के चलते अकेले यूरोप में 61 हजार लोगों की जान गई। इनमें इटली, स्पेन और जर्मनी के लोगों की संख्या सबसे अधिक थी। साइंटिस्टों ने यह भी चिंता जताई है कि 2070 तक धरती का तापमान इतना अधिक बढ़ जाएगा कि यहां रहना तकरीबन असंभव हो जाएगा।

इसकी एक बड़ी वजह दुनिया का एवरेज एयर टेंपरेचर भी है, जो सामान्य रूप से 14°C के आसपास रहना चाहिए। 2016 में इसने 16.92°C का रेकॉर्ड बनाया था, लेकिन इस महीने 3 जुलाई को यह उससे 0.086°C ज्यादा हो गया। फिर 4 जुलाई को यह नए रेकॉर्ड पर पहुंचा और 6 जुलाई को 17.23°C तापमान का रेकॉर्ड बना दिया। हफ्ते भर में इसके इस तरह बढ़ने से कैलिफोर्निया में तापमान 50 डिग्री क्रॉस कर गया है तो पेइचिंग में पिछले हफ्ते भर से तापमान 35 डिग्री पार चल रहा है, जो जुलाई में अमूमन 31 से ऊपर नहीं जाता। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस जुलाई में पृथ्वी पर अधिक तापमान के पुराने सारे रिकॉर्ड टूट चुके हैं। इसका एक कारण जलवायु परिवर्तन तो है ही, लेकिन यही इकलौती वजह नहीं।

तापमान बढ़ने के लिए इंसान दोषी हैं। साइंटिस्टों का कहना है कि तापमान का बढ़ना प्राकृतिक घटनाओं के साथ ही मानवीय गतिविधियों की वजह से भी है क्योंकि जीवाश्म ईंधन से सालाना 40 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हो रहा है। 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार, तापमान पिछले 20 वर्षों में जिस तेजी से बढ़ा है, उतना 118 वर्षों (1901-2018) में कभी नहीं देखा गया। वहीं, कार्बन उत्सर्जन कम करने को लेकर प्रतिबद्धता की कमी है। इसके अलावा अल नीनो भी एक वजह है, जिसके चलते कहीं अतिवृष्टि होती है तो कहीं सूखा पड़ता है। यह भी ध्यान में रखने वाली बात है कि अल नीनो का असर अभी तक पूरी तरह से शुरू नहीं हुआ है। इसका पूरा असर अगस्त 2023 के बाद देखने को मिलेगा।

मुसीबतें अभी और बढ़ेंगी?
विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने आशंका जताई है कि 2023 से 2027 के बीच वैश्विक तापमान और नए रेकॉर्ड बनाएगा। WMO को 66 फीसदी आशंका है कि इन पांच वर्षों में वैश्विक तापमान औद्योगिक काल से पहले की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार कर जाएगा। पेरिस समझौते के बाद भी कार्बन उत्सर्जन में सर्वाधिक योगदान देने वाले चीन, अमेरिका सहित विकसित देशों ने उदासीनता दिखाई है जबकि दूसरे देशों ने भी इस पर दबाव नहीं बनाया है। अल नीनो को तो हम रोक नहीं सकते, मगर दुनिया भर में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन तो कम कर ही सकते हैं।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

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