लैंगिक भेदभाव झेल रहीं गांव की लड़कियां

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सपना कुमारी
मुजफ्फरपुर, बिहार

लैंगिक असमानता हमारे रूढ़िवादी व पुरुषवादी समाज की एक बड़ी और गंभीर बीमारी है. सदियों से यह संकीर्ण सोच हमारे समाज व देश की प्रगति में बाधक बनती रही है. शिक्षा, विज्ञान, टेक्नोलॉजी आदि क्षेत्रों में समाज ने जरूर प्रगति की है, लेकिन सोच के स्तर पर आज भी हम तुलनात्मक रूप से पीछे हैं. शहरी मानसिकता तो कुछ स्मार्ट भी हुई है, लेकिन गांव-ज्वार में आज भी लिंग के आधार पर भेदभाव के मामले सामने आते रहते हैं. पितृसत्तात्मक समाज में आज भी औरतों की आजादी व सम्मान पर पुरुष अहंकार भारी पड़ रहा है. बिहार के ग्रामीण क्षेत्र भी इस तरह की सोच से अछूते नहीं हैं. यहां लड़कियों और लड़कों के बीच न केवल घर और समाज में, बल्कि हर जगह लैंगिक असमानता दिखाई देती है.

घर-गृहस्थी के काम की बात करें या फिर चाहे पढ़ाई-लिखाई की, महिला सदस्यों को घर से बाहर किसी काम के लिए भेजने की बात हो या किसी भी पारिवारिक निर्णय में अपनी राय देने की हो, उसे गौण या पर्दे के पीछे ही रखा जाता है. हर जगह इस तरह की मानसिकता से घर की महिलाएं व किशोरियां जूझती नजर आती हैं. हमारे समाज में किशोरियों एवं औरतों को कमजोर समझने की पुरुषों की मानसिकता कई बार उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करती हैं. कभी-कभी तो उनके द्वारा शाब्दिक और शारीरिक हिंसा का शिकार भी होना पड़ता है. यह हिंसा कभी परंपरा, तो कभी चरित्र के नाम पर की जाती है और इस तरह औरतों के स्वाभिमान को कुचल दिया जाता है. जब किसी के घर बेटा जन्म ले, तो जश्न मनाया जाता है और बेटी जन्म ले, तो पूरे घर में उदासी छा जाती है. लगता है जैसे बहुत बड़ा पहाड़ टूट पड़ा हो. कई बार बेटी को जन्म लेने से पहले ही उसकी भ्रूण हत्या कर दी जाती है. ऐसा नहीं है कि शहरों में लैंगिक हिंसा नहीं होती हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह अधिक दिखाई देता है.

इसका एक उदाहरण बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का धनौती गांव है. जहां लैंगिक असमानता साफ़ नज़र आता है. विशेषकर गांव की निचली जातियों में यह भेदभाव बहुत अधिक है. इस संबंध में गांव की एक 16 वर्षीय किशोरी ममता का कहना है कि ‘घर के कामकाज के दौरान भी हमें लैंगिक भेदभाव झेलना पड़ता है. माता-पिता अपने बेटे-बेटियों के लिए लिंग के आधार पर अलग-अलग काम को निर्धारित कर देते हैं. जबकि लड़कों से कहीं अधिक लड़कियां खेत-खलिहान व मवेशी चराने का काम करती हैं, तो लड़के किचेन के काम में हाथ क्यों नहीं बंटा सकते हैं?’ वह कहती है कि आज के समाज में कहा जाता है कि लड़कियों को बराबर का दर्जा दिया जा रहा है. लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी हमारे गांव व आसपास के क्षेत्रों में, खुद हमारे परिवार में लड़कियों को लैंगिक हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है.

ज़िले के मोतीपुर ब्लॉक की स्नातक की छात्रा कविता कुमारी कहती है कि ‘हमें सुबह कॉलेज जाने से पहले और आने के बाद घर का सारा कामकाज करना पड़ता है. परंतु घर के लड़कों को कभी किसी काम के लिए नहीं बोला जाता है. चाहे हम कितना भी थक के आए हों, लेकिन घर का काम करना ही पड़ता है. घर के पुरुष सदस्य भले बैठे हों, लेकिन वे घर के काम में हाथ नहीं बंटाते हैं.’ उसी गांव की एक 27 वर्षीय गृहिणी प्रियंका देवी कहती हैं कि ‘मेरे पति कहते हैं कि तुम्हें हमारे हिसाब से ही चलना पड़ेगा, ऐसा कहकर वे यह जताते हैं कि औरत पुरुष पर निर्भर होती है.’ प्रियंका की तरह कई अन्य महिलाओं ने भी नाम न बताने की शर्त पर कहा कि “हमारे टोले में कई महिलाएं एवं किशोरियां घरेलू हिंसा से जूझती रहती हैं, लेकिन उनकी हिम्मत नहीं होती है कि वह उस पुरुष के उत्पीड़न का विरोध करे. कभी-कभी तो लगता है कि औरत होना एक सजा है. न पढ़े तो अनपढ़ और जाहिल कहा जाता है और पढ़-लिख कर बाहर जाएं, तो चरित्र पर उंगली उठाई जाती है. इस संबंध में, मुजफ्फरपुर की वरिष्ठ अधिवक्ता संगीता शाही कहती हैं कि ‘मैं पिछले 25 सालों से जिला न्यायालय में वकालत कर रही हूं. ढाई दशकों में कई ऐसे मामले आये, जो लैंगिक असमानता से जुड़े थे. मुझे लगता है कि ऐसे मामलों को बढ़ाने में हमारी संकीर्ण सोच, अंधविश्वास, दहेज प्रथा आदि सामाजिक बुराइयों का बहुत बड़ा हाथ होता है, लेकिन जैसे-जैसे लड़कियां पढ़ रही हैं और आगे बढ़ रही हैं, समाज का नजरिया भी बदल रहा है. मगर पूरी तरह से इस बदलाव में अभी और समय लगेगा.

पिछले दिनों विश्व आर्थिक मंच द्वारा जारी वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक 2023 में भारत को 146 देशों में 127 वां स्थान दिया गया है. भारत ने पिछली रिपोर्ट की तुलना में 1.4 फीसदी अंक एवं आठ स्थान का सुधार किया है. 2022 के सूचकांक में भारत को 146 देशों में 135 वां स्थान एवं 2021 के सूचकांक में 156 देशों की सूची में भारत को 140 वां स्थान दिया गया था. वर्ल्ड इकोनाॅमिक फोरम हर साल कुछ खास मापदंडों यथा- आर्थिक भागीदारी का अवसर, शिक्षा का अवसर, स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता एवं राजनीतिक भागीदारी के आधार पर यह सूचकांक जारी करता है, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की सामाजिक स्थिति का अध्ययन किया जाता है. इस रिपोर्ट में लैंगिक असमानता के जो कारण गिनाए गये हैं, उनमें प्रमुख रुप से महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, साक्षरता दर में कमी, सामाजिक कुरीतियां आदि शामिल हैं. इन आंकड़ों से यह प्रतीत होता है कि भारत में इस मसले पर मामूली सुधार दिख रहा है, लेकिन लक्ष्य अभी भी कोसों दूर है. बालिका शिक्षा में जरूर सुधार हो रहा है, लेकिन सामाजिक रूढ़ियों, कुरीतियों और पुरुषवादी सोच के कारण यहां लैंगिक असमानता में आशातीत सुधार निकट भविष्य में होता नहीं दिख रहा है. (चरखा फीचर)

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