स्कूलों में होते जा रहे हैं हमारे बच्चे असुरक्षित

यह दिल दहला देने वाला कृत्य है कि जयपुर में एक शिक्षक ने दस साल में तकरीबन दो सौ से अधिक बच्चों को अपनी हवस का शिकार बनाया। शिक्षक पर यह भी आरोप है कि वह पीडि़त बच्चों को ब्लैकमेल कर उनसे पैसा भी वसूलता था। स्कूल प्रबंधन की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। जहां उसकी जिम्मेदारी आरोपी शिक्षक के कृत्यों की जानकारी पुलिस को देना था, उसने आरोपी शिक्षक से इस्तीफा लेकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ ली। यह इसलिए भी दुखद है कि जिन शिक्षकों का कर्तव्य बच्चों को सुशिक्षित कर उन्हें योग्य नागरिक बनाना है, वे अपने कुत्सित आचरण से शिक्षा मंदिरों की गरिमा पर कुठारघात कर रहे हैं। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ऐसे लोग पहुंच गए हैं, जो अपनी फूहड़ता, जड़ता, मूल्यहीनता और लंपट चारित्रिक दुर्बलता से शिक्षा मंदिरों की पवित्रता को कलंकित कर रहे हैं।  अभी कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र के बुलढाणा के नानजी कोकरे आदिवासी आश्रमशाला में पढऩे वाली बारह नाबालिग आदिवासी बच्चियां वहां के शिक्षकों और कर्मियों के बलात्कार की शिकार हुईं। बताया गया कि इन पीडि़त बच्चियों में तीन गर्भवती भी थीं और इसका खुलासा तब हुआ जब वे दिवाली की छुट्टियों में घर गईं और पेट में दर्द होने पर उनके अभिभावकों ने उन्हें चिकित्सकों से दिखाया। अच्छी बात यह रही कि पुलिस ने इन बलात्कार के आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया और राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए एसआइटी का गठन कर दिया। मगर यहां सवाल है कि देश के विभिन्न राज्यों के स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र-छात्राओं के साथ हो रहे अमानवीय दुष्कृत्यों पर लगाम कैसे लगे? कैसे भरोसा किया जाए कि भविष्य में ऐसी घटनाएं फिर देश-समाज को शर्मसार नहीं करेंगी?
ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता, जब स्कूलों में बच्चों के साथ अमानवीयता की खबरें अखबारों की सुर्खियां न बनती हैं। कहीं उनके साथ यौन शोषण होता है तो कहीं अनुशासन के नाम पर प्रताडऩा दी जाती है। पिछले साल दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल में एक छात्र के साथ अमानवीय कृत्य कर उसे सेप्टिक टैंक में फेंक दिया गया। दो वर्ष पहले बंगलुरु में एक दसवीं की छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार का मामला उजागर हुआ। कुछ साल पहले इलाहाबाद के राजकीय बालगृह में मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ। इस दुष्कृत्य में वहां नियुक्त कर्मियों की ही संलिप्तता पाई गई। पिछले साल मथुरा में एक शिक्षक द्वारा अपनी शिष्या को डरा-धमका कर कई दिनों तक दुराचार किया गया। ओड़ीशा के भुवनेश्वर में एक शिक्षक दस साल की बच्ची के साथ ज्यादती करते रंगे हाथ पकड़ा गया। एक स्कूल में एक नेत्रहीन बच्चे को एक शिक्षक द्वारा जल्लादों की तरह पीटा गया। सवाल है कि आखिर शिक्षा के मंदिरों में बच्चों के साथ अमानवीय, अमर्यादित और घिनौना व्यवहार कब तक चलेगा? शिक्षा के मंदिर अपनी सकारात्मक भूमिका के प्रति कब सतर्क और संवेदनशील होंगे? क्या ऐसी घटनाएं रेखांकित नहीं करतीं कि हमारे शिक्षा मंदिर बुरी तरह दूषित और संवेदनहीन होते जा रहे हैं? क्या यह रेखांकित नहीं करता है कि स्कूल प्रबंधन शिक्षकों की नियुक्ति में उनके आचरण की जांच-परख नहीं कर रहा है? संभवत: इन्हीं सब कारणों का नतीजा है कि आज शिक्षा मंदिरों से शर्मसार करने वाली घटनाएं समाज को विचलित कर रही हैं। त्रासदी है कि आज के दौर में विद्यालय न तो मंदिर की तरह पवित्र रह गया और न ही गुरु का आचरण आदर्श और प्रेरणा देने लायक।
स्कूल और शिक्षक दोनों गुरु-शिष्य रिश्ते के पारंपरिक संस्कारों को तोड़ कर शिक्षा के मूल्य-प्रतिमानों को आघात पहुंचा रहे हैं। गुरु और शिष्य का पवित्र संवेदनात्मक रिश्ता जो कभी पिता-पुत्र और पिता-पुत्री के तौर पर परिभाषित होता था, वह आज शिक्षा मंदिरों में कलंकित हो रहा है। हालात इस कदर बदतर हो गए हैं कि शिक्षा के मंदिर जहां चरित्र को गढ़ा-बुना जाता है, उदात्त भावनाओं को पंख दिया जाता है, वह आज खुद चरित्र के गहरे संकट से जूझ रहे हैं। पिछले साल महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया कि देश में हर चौथा स्कूली बच्चा यौन शोषण का शिकार हो रहा है। हर ढाई घंटे के दरम्यान एक स्कूली बच्ची को हवस का शिकार बनाया जा रहा है।  यूनिसेफ की रिपोर्ट से भी उद्घाटित हो चुका है कि पैंसठ फीसद बच्चे स्कूलों में यौन शोषण के शिकार हो रहे हैं। इनमें बारह वर्ष से कम उम्र के लगभग 41.17 फीसद, तेरह से चौदह साल के 25.73 फीसद और पंद्रह से अठारह साल के 33.10 फीसद बच्चे शामिल हैं। यह सच्चाई हमारी शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद को हिला देने वाली है। रिपोर्ट पर विश्वास करें तो स्कूलों में बच्चों को जबरन अंग दिखाने के लिए बाध्य किया जाता है। उनके नग्न चित्र लिए जाते हैं। दूषित मनोवृत्ति वाले शिक्षकों द्वारा बच्चों को अश्लील सामग्री दिखाई जाती है। एक दौर था जब गुरुजनों द्वारा बच्चों में राष्ट्रीय संस्कार विकसित करने के लिए राष्ट्रीय महापुरुषों और नायकों के साथ अमर बलिदानियों के किस्से सुनाए जाते थे। इन कहानियों से बच्चों में समाज और राष्ट्र के प्रति निष्ठा और समर्पण का भाव विकसित होता था। लेकिन आज बच्चों में आदर्श भावना का संचार करने वाले खुद आदर्शहीन दिखने लगे हैं।
शिक्षा मंदिरों में अराजक वातावरण के कारण बच्चे स्कूल जाने से कतराने लगे हैं। उनके मन में खौफ पसर रहा है। सवाल है कि ऐसे विकृत माहौल को जन्म देने के लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं? सिर्फ शिक्षक या समाज और संपूर्ण शिक्षा प्रणाली भी? आश्रमशालाओं के छात्रावास सुरक्षित क्यों नहीं रह गए हैं? प्रशासन उसकी सुरक्षा को लेकर गंभीर क्यों नहीं है? सवाल यह भी कि अगर शिक्षा मंदिरों का माहौल इसी तरह अराजक बना रहा तो फिर बच्चों में नैतिकता और संस्कार कैसे पैदा होगा? जब शिक्षा देने वाले ही अनैतिक आचरण का प्रदर्शन करेंगे तो राष्ट्र की थाती बच्चों का चरित्र निर्माण कैसे होगा? पिछले साल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बच्चों के शोषण पर गहरी चिंता जताई थी। आयोग ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा के निमित्त सरकार द्वारा सकारात्मक कोशिश नहीं की जा रही है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की रिपोर्ट में भी आशंका जताई जा चुकी है कि शिक्षण संस्थाओं में बढ़ रहा यौन शोषण समाज को विखंडित कर सकता है। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में 68.88 फीसद मामले छात्र-छात्राओं के शोषण से जुड़े हैं। 
समझा जा सकता है कि जब देश की राजधानी में बच्चों के साथ इस तरह का आचरण हो सकता है, तो फिर दूरदराज क्षेत्रों में बच्चों के साथ क्या होता होगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। स्कूलों में समुचित वातावरण निर्मित करने के उद्देश्य से गत वर्ष राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (एनसीटीइ) ने शिक्षकों के लिए मानक आचार संहिता पेश की। उद्देश्य था- छात्रों को मानसिक और भावनात्मक संरक्षण प्रदान करना। लेकिन जिस तरह शिक्षा के केंद्रों में बच्चों के शारीरिक शोषण की घटनाएं बढ़ रही हैं और शिक्षकों का आचरण घिनौना होता जा रहा है, उससे शिक्षा के सार्थक उद्देश्यों पर ग्रहण लगना तय है। आज जरूरत है कि सरकार और स्कूल प्रबंधन बच्चों के साथ होने वाली ज्यादतियों और अप्रिय घटनाओं को रोकने के लिए ठोस रणनीति तैयार करें और शिक्षकों की नियुक्ति के पहले उनके आचरण-व्यवहार का मनोवैज्ञानिक परीक्षण कराएं। जब शिक्षा स्थली में ही बच्चे सुरक्षित नहीं रहेंगे तो फिर अन्यत्र उनकी शोषण की संभावना से इंकार कैसे किया जा सकता है।

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
ikimisli giriş
grandpashabet giriş
bonus veren siteler
grandpashabet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
betlike giriş
betlike giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
betparibu giriş