तीन तलाक के मुद्दे पर एक ठोस और सकारात्मक पहल करते हुए केन्द्र सरकार ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से चार प्रश्न पूछे हैं। जिनमें पहला है कि क्या ‘तलाक-एक-बिद्दत’ (एक बार में तीन तलाक देना) निकाह, हलाला और बहुविवाह को संविधान के अनुच्छेद 25 (1) (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) में संरक्षण प्राप्त है? दूसरा है-धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार क्या मौलिक अधिकारों के आधीन है, विशेष रूप से तब जबकि भारतीय संविधान नागरिकों के मध्य जाति, संप्रदाय या लिंग के आधार पर विभेद उत्पन्न करने को अनुचित और अतार्किक मानकर उनमें समानता स्थापित करने के लिए व्यक्ति की गरिमा का ध्यान रखता हो। तीसरा प्रश्न है-क्या पर्सनल लॉ को संविधान के अनुच्छेद 13 के अंतर्गत कानून माना जाएगा? और चौथा व अंतिम प्रश्न है कि-क्या तलाक-ए-बिद्दत, निकाह, हलाला और बहुविवाह उन अंतर्राष्ट्रीय संधियों व समझौतों के अंतर्गत सही है जिन पर भारत ने हस्ताक्षर किये हैं?
चारों प्रश्नों पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के सामने विचार किया जा सकता है। हमारा संविधान इस विषय में क्या कहता है या क्या व्यवस्था करता है या उसके अनुच्छेदों या तत्संबंधी प्राविधानों के निहित अर्थ क्या हंै? इस पर यह संविधान पीठ हमारा मार्गदर्शन कर सकती है। निश्चय ही इस संविधान पीठ के निष्कर्षों की सारा देश प्रतीक्षा करेगा कि वह इन सब पर अपनी क्या राय देती है?
हमें इस संबंध में संविधान के अनुच्छेद 21 को भी ध्यान में रखना चाहिए जो कि स्पष्ट कहता है कि ”किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नही।” उच्चतम न्यायालय ने प्रारंभ में यह अभिनिर्धारित किया था कि सक्षम विधानमंडल दैहिक स्वतंत्रता से वंचित करने के लिए प्रक्रिया अभिकथित कर सकता है और न्यायालय इस आधार पर उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते कि वह न्यायपूर्ण, ऋजु या युक्ति युक्त नहीं है। इस मत के अनुसार अनुच्छेद 21 का उद्देश्य विधायी शक्ति पर मर्यादा अधिरोपित करना नहीं है। केवल यही सुनिश्चित करना है कि कार्यपालिका विधिमान्य विधि के प्राधिकार के बिना और उस विधि में अधिकथित प्रक्रिया का कठोरता से पालन किये बिना व्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं छीन पाए। इस संदर्भ में यह देखना अनिवार्य होगा कि किसी मुस्लिम महिला को जब उसकी इच्छा के बिना और उसके किसी अपराध के बिना उसका पति तलाक का कठोर और यातनापूर्ण दण्ड दे देता है तो उसे कितना मानवीय माना जाए? संविधान पीठ को यह भी देखना होगा कि ‘हलाला’ जैसी अपवित्र स्थिति को महिला के शरीर, मन और आत्मा के विरूद्घ किया गया एक अपराध माना जाए या नहीं और यदि यह अपराध है तो इससे मुक्ति के लिए उसे संविधान का यह प्राविधान कितनी सहायता देता है? अब आते हैं अनुच्छेद 14 पर। यह अनुच्छेद व्यवस्था करता है :-”राज्य भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।”
प्रथम दृष्टया ‘विधि के समक्ष समता’ और ‘विधियों का समान संरक्षण’ अभिव्यक्तियां यहां पर ध्यान देने योग्य हैं। विधि के समक्ष समानता को संविधानविदों ने एक नकारात्मक संकल्पना माना है। जिसमें यह माना गया है कि किसी भी व्यक्ति को जन्म या मत के आधार पर कोई विशेषाधिकार नहीं होंगे। स्पष्ट है कि कोई व्यक्ति अपने मत के अनुसार अपने जीवन साथी को उसकी सहमति के बिना और उसके अपराध के बिना तलाक देने से पूर्व ‘प्राकृतिक न्याय’ (अर्थात सबको सुनवाई व साक्ष्य का अवसर देना) के सिद्घांतों का पालन करना अनिवार्य है कि नहीं-यह बात भी तलाक के मुद्दे पर विचार करने वाली संविधान पीठ के लिए विचारणीय होगी। अनुच्छेद 14 यह व्यवस्था करता है कि सभी वर्ग समान रूप से सामान्य विधि के आधीन होंगे।
विधियों का समान संरक्षण अपेक्षात्मक अधिक सकारात्मक संकल्पना है। यह व्यवस्था करता है कि समान परिस्थितियों में समानता का व्यवहार किया जाएगा। माननीय सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि समानता और विधि के समान संरक्षण की धारणा राजनीतिक लोकतंत्र में सामाजिक और आर्थिक न्याय को अपनी परिधि में ले लेती है। अब संविधान पीठ के सामने यह भी प्रश्न होगा कि एक मुस्लिम महिला को अपने सामाजिक अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षा के लिए अनुच्छेद 21 कितना संरक्षण प्रदान करता है?
इंग्लैंड की संविधानिक विधि का प्रत्येक अध्येता यह जानता है कि विधि के समक्ष समता डायसी के विधि सम्मत शासन की संकल्पना का दूसरा उपसिद्घांत है। स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था के सम्यक मूल्यांकन के लिए विधि के समक्ष समता विधि सम्मत शासन की धारणा से परस्पर संबंधित है। इसका अर्थ यह है कि कोई भी व्यक्ति देश की विधि से ऊपर नहीं है और प्रत्येक व्यक्ति चाहे उसकी पंक्ति या प्रतिष्ठा कुछ भी हो सामान्य विधि के आधीन है, साथ ही सामान्य न्यायालयों की अधिकारिता के अंतर्गत है। यह व्यवस्था स्पष्ट करती है कि चाहे कोई ‘राजा’ हो और चाहे कोई ‘रंक’ हो उसे भारत के न्यायालय एक ही कानून से न्याय देंगे। कोई भी व्यक्ति अपने निजी कानून को देश के कानून से ऊपर बताकर अपने को मुक्त नहीं कर सकता और ना ही अपने को कानून की पकड़ से बचा सकता है। ऐसे में मुस्लिम पर्सनल लॉ जो कि ‘आधी आबादी’ के साथ (एक लोकतांत्रिक देश में) अन्याय करने की व्यवस्था करता है, कितना मान्य हो सकता है? यह देखना भी संविधान पीठ का कार्य होगा।
अच्छा हो कि संविधान पीठ इस विषय पर यथाशीघ्र अपना मत प्रकट करे। सारा देश उसके मत की प्रतीक्षा कर रहा है। हमारे देश की न्याय व्यवस्था के लिए एक बात तो माननी ही पड़ेगी कि इसने अपनी निष्पक्षता से विश्व में अपना सम्मानपूर्ण स्थान बनाने में सफलता प्राप्त की है। हम तलाक संबंधी इस प्रकरण में भी अपनी न्यायपालिका से देश के उचित मार्गदर्शन की अपेक्षा करते हैं। प्रत्येक प्रकार के शोषण का विरोध करने वाला संविधान हमारे पास है तो फिर किसी वर्ग को अपने निजी कानूनों से किसी का शोषण करने का अधिकार ही क्यों दिया जाए?

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