महात्मा विदुर का मानना है कि राजा को चाहिए कि वह राजा कहलाने और राजछत्र धारण करने मात्र से ही संतुष्ट रहे, अर्थात राजा का ऐश्वर्य उसका राजा कहलवाना और राजछत्र धारण करना ही है। उसे चाहिए कि राज्य के ऐश्वर्यों को राज्यकर्मचारियों और प्रजा के लिए छोड़ दे, उनमें बांट दे, सब कुछ अकेला हरण करने वाला न बने। एकाकी ऐश्वर्य भोगने वाले राजा के भृत्य उसके शत्रु बन जाते हैं और उसे नष्ट कर देते हैं। 
महात्मा विदुर का आशय स्पष्ट है कि राजा जनता के हितों का रक्षक है, वह भक्षक नहीं है। उसके लिए यही अपेक्षित है कि वह अपने राज्य के ऐश्वर्यों पर अपनी समस्त प्रजा का समान अधिकार माने और यह व्यवस्था कराये कि उन ऐश्वर्यों को भोगने में प्रजा का कोई वर्ग या राज्य का कोई आंचल वंचित न रहने पाये, हर व्यक्ति को उसकी योग्यता और प्रतिभा के अनुरूप राज्यैश्वर्य भोगने का अधिकार हो। इस प्रकार की शासन व्यवस्था ही लोकतांत्रिक होती है-जिसमें राज्यैश्वर्यों पर देश के सभी लोगों का समान अधिकार हो। यदि राजा राज्यैश्वर्यों को स्वयं भोगने लगेगा और दोनों हाथों से उन्हें लूटने लगेगा तो अराजकता व्याप जाएगी और फिर वह अपने राज्य को नष्ट होने से बचा नहीं पाएगा। राज्यैश्वर्यों पर सबका समान अधिकार होने का एक अर्थ यह भी है कि राजा का राजछत्र तो समस्त प्रजा की प्रसन्नता का एक प्रतीक मात्र है, अर्थात वह राजा के सिर पर तभी तक शोभायमान है जब तक उसकी प्रजा प्रसन्नचित है। प्रजा की प्रसन्नता ताज से झांकती है और ताज से राजा शोभित होता है। अत: राजा की शोभा उसका ताज न होकर प्रजा की प्रसन्नता है। लोकतंत्र को भारत में जिन ‘आधुनिक राजाओं’ ने ‘लूटतंत्र’ में परिवर्तित किया है, उन्होंने भारत की प्राचीन राज्य व्यवस्था की नैतिकता और पवित्रता को भंग करने में कोई कमी नही छोड़ी है। इन्होंने अपने आचरण से ऐसा आभास कराया है कि इनका राजछत्र  (ग्राम प्रधान से लेकर सांसद तक) इनके लिए देश को लूटने का एक ‘वैधानिक प्रमाणपत्र’ है। इस ‘वैज्ञानिक प्रमाण पत्र’ को पाने के लिए नेताओं में गांव स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक आपाधापी मची हुई है। तभी तो गांव स्तर पर ग्राम प्रधान बनने के लिए भी लेाग मोटी धनराशि खर्च कर देते हैं। ऐसे लोगों को सत्ता में हिस्सा चाहिए और यदि एक बार ये लोग एक जनप्रतिनिधि बनकर लटकने में सफल हो जाते हैं तो फिर कुबेर के खजाने में इनका हिस्सा अपने आप निश्चित हो जाते हैं। वास्तव में इनका लक्ष्य भी कुबेर के खजाने में अपना हिस्सा निश्चित कराना ही होता है।
ऐसी परिस्थितियों में और ऐसी ही मानसिकता के चलते तमिलनाड़ु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का राजनीति में प्रवेश हुआ। उन्होंने राजछत्र को ही अपना ऐश्वर्य मानने से इंकार कर दिया था-वह कुबेर के खजाने को ही अपना मानकर चलने वाली राजनीतिज्ञ थीं। जयललिता के समय में जब उनका राजनीति में प्रवेश हुआ तभी से उन्होंने ‘कुबेर के खजाने’ को अपने नियंत्रण में ले लिया था। फलस्वरूप उन्होंने अकूत संपदा एकत्र कर ली। आय से अधिक संपत्ति रखने के लिए उन पर मुकदमा चला तो न्यायालय ने उन्हें वास्तव में ही दोषी पाया और उन्हें इस अपराध में सत्ता से उतार कर जेल के सीखचों के पीछे ले जाकर डाल दिया। भारत की न्यायपालिका के इस साहसिक और अभूतपूर्व निर्णय की सर्वत्र प्रशंसा की गयी। अम्मा को जेल की हवा खानी पड़ी और उन्होंने सत्ता के सिंहासन को अपने विश्वसनीय पन्नीरसेल्वम को सौंप दिया। जिससे कि जेल से बाहर आकर उनसे सिंहासन अपने लिए खाली कराने में कोई कठिनाई ना हो। पन्नीरसेल्वम ने ‘भरत’ की भूमिका निभाई और जेल में बैठी जयललिता के आदेशों का और इच्छाओं का पालन करते हुए राज्य भोगते रहे। यद्यपि यह सब कुछ लोकतंत्र की भावनाओं के विपरीत ही था, परंतु पन्नीरसेल्वम ने यह प्रमाणित कर दिया कि इस देश में ‘भरत परंपरा’ आज भी जीवित है। बाद में जयललिता जेल से बाहर आयीं और उन्हें तमिलनाडु के हाईकोर्ट ने पाक साफ होने की चिट थमा दी, तब पन्नीरसेल्वम ने भी ‘ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया’ का आदर्श उपस्थित करते हुए सत्ता सिंहासन जयललिता को सौंप दिया। विधिक समय सीमा के अंदर जयललिता के विरूद्घ भारत के सर्वोच्च न्यायालय में तमिलनाड़ु के उच्च न्यायालय के द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी गयी। जब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित था-तभी जयललिता का देहांत हो गया।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय में लंबित रहे उक्त वाद में जयललिता की पार्टी की वर्तमान महासचिव और जयललिता के जीवनकाल में उनके राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने वाली शशिकला भी एक पार्टी रही हैं। उन्होंने जनता का जनप्रतिनिधि बनकर देश को लूटने का प्रमाण पत्र कभी भी प्राप्त नहीं किया। वह अपनी सहेली और तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री रहीं जयललिता की सत्ता में अवैध हस्तक्षेप करना उसी प्रकार आरंभ किया था जिस प्रकार वह जयललिता के जीवन में अवैध रूप से प्रवेश पाने में सफल हो गयी थीं। उन्होंने कुबेर के खजाने में भी अपना हिस्सा निश्चित कर लिया और महारानी बनकर अवैध रूप से तमिलनाड़ु का शासन चलाने लगीं। इसी समय जयललिता बीमार हो गयीं तो विरोधियों ने उनकी बीमारी के रहस्य को शशिकला के उनके जीवन में ‘अवैध प्रवेश’ से जोडक़र देखने का प्रयास किया।
शशिकला ने जयललिता से ‘मुक्ति’ पाकर सत्ता सिंहासन पन्नीरसेल्वम को दे दिया और इस आशा से दे दिया कि जब समय आएगा तो उनसे सिंहासन अपने लिए खाली करा लिया जाएगा। शशिकला जानती थीं कि सर्वोच्च न्यायालय उनके विरूद्घ भी जा सकता है। अत: उन्हेांने पन्नीरसेल्वम को शीघ्र ही सिंहासन अपने लिए खाली करने का निर्देश दे दिया, पन्नीरसेल्वम ने आदेश का पालन किया और सिंहासन छोड़ दिया। पर उन्हें इस बार सिंहासन छोडऩे में कष्ट हुआ। इधर सर्वोच्च न्यायालय ने शशिकला के अवैध जीवन के अवैध कारनामों पर वैधानिक रोक लगाते हुए उन्हें जेल के सींखचों के पीछे भेज दिया। इस प्रकार एक बहुत बड़े सत्ता-षडय़ंत्र की सर्वोच्च न्यायालय ने ‘भ्रूण हत्या’ कर दी। लोकतंत्र के एक अभिशाप को सर्वोच्च न्यायालय ने सिंहासन पाने की सारी अवैध गतिविधियों से रोककर जेल में उसके वास्तविक स्थान पर पहुंचा दिया। विदुर सही ही तो कह गये कि राज्यैश्वर्यों को अपने लिए भोगने वाले राजा का विनाश हो जाता है।

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