फ्रायड का फ्राड और भारतीय शिक्षा
फ्रायड नाम के विदेशी मनोवैज्ञानिक ने एक शब्द पकड़ लिया ङ्ख्रञ्जष्ट॥ वाच।  इसकी व्याख्या उसने करते हुए कहा कि देखो इसका प्रथम अक्षर ङ्ख कह रहा है कि ‘वाच यौर वर्डस’ अपने शब्दों पर ध्यान दें कि आप क्या कह रहे हैं? इसी प्रकार र से एक्शन ञ्ज से थॉट ष्ट से करैक्टर और ॥ से हैबिट इस व्यक्ति ने काल्पनिक आधार पर बनाये।
उसके अनुसार जब मानव इस प्रकार ‘स्व’ को समझने और पढऩे का प्रयास करेगा तो वह पूर्णता को प्राप्त कर ही लेगा। भारतीय मनीषा में यह पूर्णता मोक्ष से पहले कुछ नहीं है। मानव जन्म की सार्थकता धर्मानुकूल आचरणजनित मुक्ति पद की प्राप्ति करने में मानी गयी है। इसलिए मानव जन्म की उपयोगिता धर्मानुकूल व्यवहार करने में मानी गयी है। अत: महर्षि पतंजलि ने चिर साधना के उपरांत मनुष्य को मनुष्यत्व के परमोद्देश्य की प्राप्ति कराने के लिए ‘अष्टांग योग’ का रास्ता बताया। इसमें उन्होंने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपिरग्रह और ब्रह्मचर्य को यम और शौच, संतोष, तप स्वाध्याय व ईश्वर प्राणिधान ये पांच नियम बताये हैं।
इसके पश्चात उन्होंने आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि को योग की अगली सीढिय़ां बताया है। इन सीढिय़ों के माध्यम से मनुष्य अपने लक्ष्य मोक्ष (पूर्णत्व की प्राप्ति) तक पहुंचता है। हमारे इस ऋषि ने जो रास्ता बताया, उससे ‘फ्रायड’ के ‘फ्राड’ (छल) का भण्डाफोड़ हो जाता है। वह मान्यवर जिस ‘वाच’ की बात करता है वह कुछ अंश तक महर्षि पतंजलि का ‘स्वाध्याय’ शब्द है। स्वाध्याय का अर्थ ‘स्व का अध्ययन’ स्द्गद्यद्घ स्ह्लह्वस्र भी है।
यह शब्द सद्गंरथों का अध्ययन मात्र ही नहीं, अपितु हमारी अंतर्मुखी प्रवृत्ति और अन्तरावलोकन करने की मनोवृत्ति का भी द्योतक है, जो कि स्पष्टत: ‘वाच’ को अपने आप में अंतर्निहित कर लेता है। किंतु फिर भी ऋषि पतंजलि का स्वाध्याय कहीं व्यापक है, क्योंकि वह ‘सैल्फ स्टडी’ और सदग्रंथों के अध्ययन के लिए प्रेरित करता है, जबकि फ्रायड केवल कुछ अर्थों में ‘स्व’ के अध्ययन तक ही सीमित रखता है।
इस पर विचार करें तो ज्ञात होगा कि हमारी अंतर्मुखी वृत्ति को जगाने में सदग्रंथों का अध्ययन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जिसकी ओर फ्रायड ने कोई संकेत नहीं किया। फिर भी दुर्भाग्य का विषय है कि हमारे देश में फ्रायड को पढऩे वाले अधिक हैं जबकि महर्षि पतंजलि को पढऩे वाले यहां बढऩे चाहिए थे। फ्रायड का ‘फ्राड’ सिर चढक़र बोल रहा है। उसका चिंतन ऋषि पतंजलि के चिंतन के चालीसवें भाग के बराबर है, किंतु फिर भी लोग उसके चिंतन के प्रशंसक और दीवाने हैं, महर्षि पतंजलि की महामति के नहीं।
यह दीवानापन हमारे मानसिक दीवालियेपन का प्रतीक है। राजनीतिज्ञों में यहां इतना साहस नहीं कि इसे रोक सकें। बस! यही है भारत का दुर्भाग्य। हमें कुछ इस प्रकार शिक्षित किया गया है कि हम पढ़ लिखकर फ्रायड को समझने का प्रयास करें, पतंजलि को नहीं। 
पतंजलि की बात करना यहां साम्प्रदायिकता हो जाएगी और धर्मनिरपेक्षता के विरूद्घ बात हो जाएगी, इसलिए चिंतन के अधिष्ठाता इस महान ऋषि को तो उपेक्षा के कूड़ेदान में डाल दिया और लोग फ्रायड जैसों को पूजने लग गये।
आज की शिक्षा का स्वाभाविक परिणाम सिर्फ यह निकला है कि ये शिक्षा केवल मनुष्य को साक्षर ही करेगी संस्कारित नहीं। उसका इससे बढक़र परिणाम और आ भी क्या सकता है? ब्रिटिश काल में यह शिक्षा प्रणाली हमें पराधीनता की प्रतीक सी लगती थी सब अपने-अपने धंधों के करने को प्राथमिकता देते थे। वहीं कोई कृषि विश्वविद्यालय नही थे किंतु सभी कृषक भूमि की मिट्टी, जलवायु,  फसल के लिए आवश्यक तापमान, खाद, पानी आदि से भलीभांति परिचित थे। क्योंकि उन्हें यह ज्ञान परंपरा से मिलता आ रहा था। यह ठीक है आज के विज्ञान ने परंपराओं को तोडक़र काश्तकार को आगे बढ़ाया है, प्रति बीघा उपज बढ़ी है, किंतु यह भी सत्य है कि भूमि की उर्वराशक्ति दिन -प्रतिदिन क्षीण होती जा रही है, जिस कारण वह दिन दूर नहीं जब यह भूमि एक दिन अनुर्वर होकर बांझ हो जाएगी, तब क्या होगा?
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)
पुस्तक प्राप्ति का स्थान-अमर स्वामी प्रकाशन 1058 विवेकानंद नगर गाजियाबाद मो. 9910336715

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