सामाजिक संघर्ष में लिप्त लोगों को सही मार्ग पर लाने के लिए कानून बनाया जाता है और उसके माध्यम से उन्हें दंडित किया जाता है। जबकि ‘धर्म में युद्घ’ की स्थिति में लिप्त लोगों को सही मार्ग पर लाने के लिए नीति और विधि का सहारा लिया जाता है। इस नीति में दण्ड की एक अवस्था है। नीति और विधि कानून से कहीं अधिक पवित्र और उत्कृष्ट अवस्था है, जो कि मनुष्य का प्राकृतिक नियमों के अनुसार धीरे-धीरे सुधार करती है, और यदि वह अपनी प्रवृत्ति में सुधार नही लाता है तो धीरे-धीरे उसे वैसे ही समाज की मुख्यधारा से दूर कर देती है जैसे पकने के पश्चात किसी फल को कोई बेल स्वयं ही छोड़ देती है। वास्तव में यह अवस्था बहुत ही उत्तम है। इसे भारत ने विकसित किया और इस व्यवस्था को सफल बनाने के लिए समाज के हर व्यक्ति को अधिकार दिये। यही कारण है कि भारत में अनैतिक और अनुचित कार्यों को करने वाले लोगों को कई बार सामूहिक सामाजिक बहिष्कार तक का दण्ड भी भुगतना पड़ जाता था। इस दण्ड का अभिप्राय था कि समाज की व्यवस्था में और नैतिक व्यवस्था में अवरोध बने किसी भी व्यक्ति को समाज में बने रहने का कोई अधिकार नहीं है, और इसीलिए उसकी अनैतिकता का सारा समाज ही सामूहिक रूप से बहिष्कार करता है। इस प्रकार यह बहिष्कार किसी व्यक्ति का बहिष्कार न होकर अनैतिकता का बहिष्कार होता था।
अब आते हैं-‘युद्घ में धर्म’ की भारत की दूसरी अवधारणा पर। ‘युद्घ में धर्म’ का अभिप्राय है कि युद्घ के समय भी नैतिकता और न्यायसंगत व्यवहार का निष्पादन करना। संसार के अन्य मजहबों व देशों ने युद्घ में सब कुछ उचित माना है, परंतु भारत युद्घ के भी नियम (धर्म) बनाता है और उन्हें युद्घ के समय पालन भी करता है। भारत को ‘विश्वगुरू’ बनाने में इस परम्परा ने भी सहयोग दिया। ‘युद्घ में धर्म’ का अभिप्राय है कि युद्घ में भी हमारी नैतिकता हमारे क्रोध को संयमित और संतुलित रखेगी और हमें क्रूर, अत्याचारी या निर्मम नहीं होने देगी। हम मन्युमान रहेंगे। मन्यु क्रोध की पवित्र और निर्मल न्यायपूर्ण अवस्था है, जिसमें व्यक्ति किसी दोषी को या अपराधी को उसके अपराध के अनुपात में नाप तोलकर दण्ड देता है। यही ईश्वरीय व्यवस्था है। जैसे ईश्वर हमें हमारे कर्मों का उचित से उचित दण्ड देता है-वैसे ही युद्घ में जाने वाले योद्घाओं को उचित से उचित दण्ड ही देना चाहिए। यह धर्म है। भारत ने सदा धर्म युद्घों की ही घोषणा की है। उसने किसी संप्रदाय को मिटाने के लिए या किसी देश को लूटने के लिए युद्घों की घोषणा नहीं की और ना ही अपने ऐसे लक्ष्य में सफल होने के लिए किसी प्रकार के ‘जिहाद’ की ही घोषणा की है।
‘युद्घ में धर्म’ या युद्घ में नियम और नैतिकता को स्थापित करना बहुत बड़ी साधना की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करती है-यह अवधारणा। इसे सिरे चढ़ाने के लिए भारत में हर युद्घ से पूर्व दोनों पक्ष मिल-बैठकर युद्घ के नियम निश्चित करते थे। उसके पश्चात युद्घ क्षेत्र में उन नियमों का पालन करते थे। महाभारत के युद्घ में दोनों पक्षों ने ऐसे दर्जनों नियम बनाये थे -जिनसे युद्घ में धर्म की पुष्टि होती है। इन नियमों में निहत्थे पर हमला न करना, अपने समान बल और अपने समान अस्त्र-शस्त्र वाले से ही युद्घ करना, युद्घ में पीठ दिखाने वालों पर हमला न करना, युद्घ में आत्मसमर्पण करने वालों को प्राणदान देना, युद्घ देखने के लिए आने लोगों से कुछ न कहना, युद्घ में भाग न लेने वालों को कुछ न कहना, युद्घ में महिलाओं, बच्चों व वृद्घों का सम्मान करना, युद्घोपरांत जनसंहार न करना, किन्नरों को प्राणदान देना इत्यादि सम्मिलित थे। भारत ने युद्घ में ऐसे नियमों का सदा पालन किया है। महाभारत के युद्घ में जब इन नियमों की अवहेलना अभिमन्यु जैसे सुकुमार योद्घा को मारकर की गयी तो उसे अत्यंत अशुभ और निंदनीय माना गया, और दुर्योधन की इन्हीं मूर्खताओं ने उसे पराजय का कड़वा फल चखने के लिए विवश किया।
‘युद्घ में धर्म’ की इस पवित्रावस्था को अपनाने वाली संस्कृति ही विश्व की सर्वोत्कृष्ट संस्कृति कही जा सकती है और उसको मानने वाला देश ही ‘विश्वगुरू’ हो सकता है। विशेषत: तब जबकि विश्व के अन्य देशों के लोगों ने या संस्कृतियों ने या देशों ने युद्घ में कोई नियम बनाना तक भी उचित नहीं माना। यही कारण रहा कि उन देशों ने युद्घ के समय हर प्रकार के अनैतिक कार्य का सहारा लिया और शत्रु को परास्त करने के पश्चात जनसंहार तक को भी उचित माना। इतना ही नहीं महिलाओं का शीलभंग करना, उनके सामने उनके दुधमुंहे बच्चों का वध करना व वृद्घों को मारकाट देने की वीभत्स घटनाएं भी कीं। भारत का अपना इतिहास तुर्कों, मुगलों और अंग्रेजों के ऐसे अनेकों जनसंहारों से भरा पड़ा है-जिन्हें देखकर लज्जा को भी लज्जा आ जाएगी। ऐसी हिंसक विचारधारा में विश्वास रखने वाले लोग या देश कभी भी ‘विश्वगुरू’ नहीं बन सकते। क्योंकि उनकी यह विचारधारा उनकी पाशविकता को प्रकट करती है। विश्वगुरू वही बन सकता है-जिसकी विचारधारा उत्कृष्ट हो और जो युद्घ को भी इसलिए लड़े कि एक व्यवस्था को विकृत करने वाले लोग समाप्त किये जा सकें।
भारत युद्घ में धर्म को अपनाकर अपने आप को विश्वगुरू का सबसे प्रबल दावेदार घोषित करता रहा और इसीलिए उसकी व्यवस्था को लोग अपने लिए प्रेरणादायक मानकर उसे अपना गुरू मानते रहे। गुरू का एक कार्य अपने व्यवहार व आचरण को पवित्र और नैतिक बनाकर अपने शिष्यों पर अपने व्यक्तित्व का प्रभाव डालना भी होता है। जिसे भारत ने करके दिखाया। उसकी व्यवस्था का और युद्घ में धर्म की पवित्र चिंतनपूर्ण अवधारणा का विश्व ने लोहा माना, इसीलिए विश्व का भारत ने स्वाभाविक नेतृत्व किया। आज भी हमारी सेना विश्व की सबसे उत्तम सेना इसलिए है कि वह किसी देश की संप्रभुता पर हमला नहीं करती, ना ही किसी देश के नागरिकों का नरसंहार करती है और युद्घ के समय भी नारियों का सम्मान करना वह भली प्रकार जानती है।

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