ऋषि दयानन्द ने ईश्वरोपासना और अग्निहोत्र का सर्वाधिक प्रचार किया”

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ओ३म्

ऋषि दयानन्द के प्रादुर्भाव के समय देश विदेश के लोग ईश्वर की सच्ची उपासना के ज्ञान व विधि से अपरिचित थे। यदि कुछ परिचित थे तो वह योगी व कुछ विद्वान धार्मिकजन ही रहे हो सकते हैं। वह लोग उपासना व अग्निहोत्र यज्ञों का प्रचार न कर उसे अपने तक ही सीमित किये हुए थे। ऋषि दयानन्द ने योग का अभ्यास योग्य गुरुओं से सीखा था। योगाभ्यास व समाधि आदि में प्रवीण होने के बाद वह विद्या प्राप्ति के लिये सन् 1860 में मथुरा में प्रज्ञाचक्षु दण्डीगुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी के सान्निध्य में पहुंचे थे। उन्होंने उनसे लगभग 3 वर्ष तक अष्टाध्यायी-महाभाष्य का अध्ययन कर संस्कृत के आर्ष व्याकरण का तलस्पर्शी ज्ञान प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की थी। स्वामी दयानन्द जी गुरु विरजानन्द जी के अत्यन्त निकट होने के कारण व्याकरण के साथ उनसे शास्त्र चर्चा आदि कर वेद और वैदिक साहित्य के विषय में भी अनेक प्रकार की अलभ्य जानकारियों से युक्त हुए थे। गुरु के पास रहकर सन् 1863 में विद्या पूरी करने के बाद उन्होंने गुरु से विदा ली। विदा लेते समय गुरुदक्षिणा के अवसर पर गुरुजी ने दयानन्द जी को अपना जीवन वेदोद्धार तथा आर्ष विद्या के प्रचार व प्रसार में लगाने की प्रेरणा की थी। वह संसार से अविद्या दूर करने तथा विद्या का प्रचार व प्रसार चाहते थे। स्वामी दयानन्द जी ने गुरुजी की प्रेरणा व आज्ञा को शिरोधार्य किया और और उन्हें दिये अपने वचन को पूरा करने के लिये धर्म प्रचार के कार्यो में लग गये। स्वामी जी मथुरा से आगरा आये और वहां कुछ माह तक निवास करते हुए उपदेश के द्वारा धर्म प्रचार का कार्य करते रहे। उन्होंने सबसे पहली जो पुस्तक लिखी वह उपासना से सम्बन्धित थी जिसका नाम ‘सन्ध्या’ ही था। आपने इसे कई हजार की संख्या में प्रकाशित करवाकर उसका वितरण कराया था। इसके कुछ वर्षों बाद आपने ईश्वर के सत्यस्वरूप का प्रचार करने के साथ ‘पंचमहायज्ञ विधि’ पुस्तक का प्रणयन किया जिसमें सन्ध्या का प्रथम स्थान है। यह संन्ध्या वा ब्रह्मयज्ञ ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानकर उसकी उपासना करने का ग्रन्थ है जिसमें सन्ध्या की पूरी विधि दी गई है।

सन्ध्या ईश्वर का ध्यान करने को कहते हैं। ऋषि दयानन्द ने सन्ध्या का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा है कि जिसमें भली-भांति परमेश्वर का ध्यान किया जाए, वह सन्ध्या है। सन्ध्या के विषय में वह बताते हैं कि रात और दिन के संयोग-समय दोनों समयों में सब मनुष्यों को परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करनी चाहिए। सन्ध्या विषयक आवश्यक निर्देश देते हुए ऋषि कहते हैं कि पहले जल आदि से बाह्य शरीर की शुद्धि करनी चाहिये। दूसरा निर्देश यह है कि राग-द्वेष, असत्यादि के त्याग से भीतर की शुद्धि करनी चाहिए। तीसरा निर्देश है कि कुशा वा हाथ से मार्जन करें। तत्पश्चात शुद्ध देश, पवित्र आसन, जिधर की ओर का वायु हो, उधर को मुख करके नाभि के नीचे से मूलेन्द्रिय को ऊपर संकोच करके, हृदय के वायु को बल से निकाल के यथाशक्ति रोकें। यह एक प्राणायाम हुआ। इसी प्रकार कम-से-कम तीन प्राणायाम करें, नासिका को हाथ से न पकड़ें। इस समय परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना हृदय से करें। उनका अगला निर्देश है कि इससे आत्मा और मन की स्थिति सम्पादन करें। इसके अनन्तर गायत्री मन्त्र से शिखा को बांधकर रक्षा करें ताकि केश इधर-उधर न बिखरें। स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती जी ने सन्ध्या के इन निर्देशों को अपने शब्दों में प्रस्तुत किया है। वह लिखते हैं कि ईश्वर का अच्छी प्रकार ध्यान करना सन्ध्या है। सन्ध्याकत्र्ता को चाहिए कि वह मन्त्रानुसार प्रभु के गुणानुवाद में तन्मय होकर, अपने गुण-कर्म-स्वभाव वैसे ही बनाने के लिए अपने प्रभु से आत्म-निवेदन करे। ईश्वर के गुणों की अनुभूतिपूर्वक किया गया आत्म-निवेदन निश्चय ही लाभदायक होता है। वस्तुतः सन्ध्या उस जगत्पति की आज्ञापालन के लिए शक्ति व पवित्रता प्राप्त करने का प्रयासमात्र है, अतः साधक को चाहिये कि व्यवहारकाल में सन्ध्या में किये गये आत्म-निवेदन के विपरीत आचरण कदापि न करे। वह कहते हैं कि मैं तो यहां तक कहना चाहूंगा कि अगर हमने सन्ध्या को सांसारिक व्यवहारों में नहीं फैलाया तो सांसारिक व्यवहार और विचार हमारी सन्ध्या में फैलकर व्यवधान डालते रहेंगे। इस प्रकार से हमारी सन्ध्या एक औपचारिक दिखावा ही न रह जाय, हमें उसका वांछित लाभ मिलना चाहिये।

सन्ध्या का अर्थ ईश्वर से मिलना, उसकी उपासना करना तथा इससे अपने सभी दुर्गुणों को दूर कर उत्तम गुण, कर्म व स्वभाव को प्राप्त करने की प्रार्थना करने सहित ईश्वर का साक्षात्कार करना भी है। सन्ध्या से इन उद्देश्यों की पूर्ति होती है इसका प्रमाण नियमपूर्वक सन्ध्या करने वाले सद्गुणी साधकों व उपासकों से मिल कर अनुभव किया जा सकता है। स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्याथी, स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती आदि सभी ईश्वर, वेद तथा ऋषि दयानन्दभक्त प्रातः व सायं नित्य सन्ध्या करते थे। इनका जीवन चरित पढ़कर उनके जीवन, व्यवहार तथा कार्यों को देखा व जाना जा सकता है। जहां तक ईश्वर के साक्षात्कार का प्रश्न है, हम समझते हैं कि सत्यार्थप्रकाश पढ़कर ईश्वर के यथार्थस्वरूप का ज्ञान अध्येता को हो जाता है। वेद और सत्यार्थप्रकाश में ईश्वर का जो स्वरूप और गुण, कर्म व स्वभाव वर्णित हैं उनका प्रत्यक्ष ज्ञान सृष्टि में स्पष्ट रूप से होता है। ईश्वर को सृष्टिकर्ता कहा जाता है, इसका साक्षात् ज्ञान भी सृष्टि को देखकर होता है। ईश्वर के अतिरिक्त अन्य कोई सृष्टि का कर्ता नहीं है। ईश्वर को सर्वज्ञ कहा जाता है। सृष्टि में रचना विशेष को देखकर ईश्वर का सर्वज्ञ होना भी प्रत्यक्ष होता है। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप है, इसका ज्ञान भी हम सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के स्वाध्याय तथा अपनी बुद्धि से करते हैं। ईश्वर के वेद व ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों में उल्लिखित सभी गुणों का ज्ञान व प्रत्यक्ष हम अपने विवेक व ऊहा से कर सकते हैं। अतः हमारा स्वाध्याय जितना अधिक होता है, उतना ही हमारा सन्ध्या करने में मन लगता है और हम वेदमन्त्रों के अर्थों का चिन्तन करते हुए ईश्वर के गुणों को मन्त्रों द्वारा बोलकर उनकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना करके उस सर्वव्यापक, एकरस, आनन्द से पूर्ण सत्ता से युक्त हो जाते हैं। इससे हमारी आत्मा दुर्गुणों से मुक्त होने सहित ईश्वर की कृपा व रक्षा हमें प्राप्त होती है। यहां हम यह भी उल्लेख कर दें कि सन्ध्योपासना में ऋषि ने आचमन, इन्द्रियस्पर्श, मार्जन, प्राणायाम, अघमर्षण, मनसा परिक्रमा, उपस्थान सहित समर्पण एवं नमस्कार विधि का उल्लेख करने के साथ उनसे सम्बन्धित मन्त्रों व आप्त वचनों को भी प्रस्तुत किया है। सन्ध्या का एक अंग स्वाध्याय भी है। हमें वेद एवं ऋषियों के ग्रन्थों का अध्ययन करके वेदज्ञान को आत्मसात करना होता है। ऐसा करके मनुष्य का जीवन सद्गणों से युक्त होता है और वह समर्पण मन्त्र के अनुसार धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की ओर आगे बढ़ने के साथ इन्हें प्राप्त भी करता है।

महाभारत काल के समय व उसके बाद ऋषि दयानन्द के समय तक वेद और वैदिक साहित्य के सभी व अधिकांश ग्रन्थ संस्कृत भाषा में थे। संस्कृत से अनभिज्ञ जनसामान्य को वैदिक मान्यताओं व सिद्धान्तों का ज्ञान नहीं था। विद्वान भी संस्कृत के शब्दों के लौकिक आदि असंगत अर्थ करके भी मन्त्रों के अभिप्राय के विपरीत अर्थ करते थे जिससे समाज में अनेक प्रकार की भ्रान्तियां एवं अवैदिक प्रथाओं का प्रचलन हुआ। ऋषि दयानन्द ने वेदों सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि तथा आर्याभिविनय आदि ग्रन्थ लिखकर व उनका प्रचार कर सामान्य हिन्दी पठित लोगों को भी वेद व धर्म की गूढ़ बातों से परिचित कराया। आज आर्यसमाज में प्रायः शत-प्रतिशत लोग सन्ध्या जानते हैं व अधिकांश मनुष्य सन्ध्या करते हैं। ऋषि दयानन्द से पूर्व देश व समाज के लोग इस वैदिक सन्ध्या, इसके मन्त्रों व इनके अर्थों से परिचित नहीं थे। हमें लगता है तब सनातनी केवल मूर्ति पर फूल, पत्ते, जल व अन्न तथा मिष्ठान्न आदि चढ़ाकर व इन पदार्थों को मूर्ति को अर्पित कर इसी को पूजा समझ लेते थे। स्त्री व शूद्र तो वेद मन्त्र सुन व बोल भी नहीं सकते थे। अनुमान है कि पुराणों के हिन्दी अर्थों का प्रकाशन ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के लेखन के बाद उनका अनुकरण कर ही किया गया है। पुराणों के बारे में आर्यसमाज का मत स्पष्ट है कि यह महाभारत काल व महात्मा बुद्ध के जीवन काल के बाद बने हैं। अतः इनकी पुराण संज्ञा नहीं हो सकती। वास्तविक पुराण तो वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ तथा मनुस्मृति आदि ग्रन्थ हैं जिनकी रचना सृष्टि की उत्पत्ति के कुछ वर्षों व शताब्दियों बाद हुई थी। महाभारत युद्ध के बाद अस्तित्व में आई पुराणों की मान्यतायें वेदविरुद्ध होने से स्वीकार नहीं की जा सकती। मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, सामाजिक असमानता आदि तथा इन पुराणों के कारण ही देश को विधर्मियों की दासता और आर्यों को अनेक प्रकार के दुःखों से गुजरना पड़ा।

ऋषि दयानन्द ने संन्ध्या, पंचमहायज्ञविधि व संस्कारविधि ग्रन्थ लिखकर समस्त मनुष्य जाति का महान उपकार किया है। आज हम यदि ईश्वर, जीवात्मा व संसार का सत्यस्वरूप जानते हैं और मनुष्य जीवन के उद्देश्य व ईश्वर की उपासना, अग्निहोत्र-यज्ञ आदि के विषय में जानते हैं तो इसका श्रेय ऋषि दयानन्द सरस्वती जी को है। सत्यार्थप्रकाश में जितने भी विषय हैं उसमें ऋषि दयानन्द ने वेद सहित मानव जाति की सर्वांगीण उन्नति के लिये सभी प्रकार का ज्ञान व वैदिक अनुष्ठानों पर विस्तार से प्रकाश डाला है। देश विदेश में ईश्वर की सत्य उपासना विधि को जानने वाले आर्यसमाज के अनुयायी लाखों लोग हैं। यह अनुभूत तथ्य है कि आर्यसमाज की उपासना पद्धति ही ईश्वर की यथार्थ उपासना पद्धति है। अन्य सभी लोग जो उपासना करते हैं वह या तो पूर्णतः अथवा आंशिक रूप से ही सत्य कही जा सकती है। जिन मतों में ईश्वर का सत्य स्वरूप नहीं है, जो लोग नास्तिक हैं अथवा जो ईश्वर के परस्पर विरोधी साकार-निराकार स्वरूप, अवतारवाद, अनेक जड़ देवताओं की चेतन मानकर उपासना आदि को करते हैं, उनकी उपासना सत्य क्योंकर हो सकती है? महर्षि दयानन्द के आविर्भाव, उनकी पंचमहायज्ञ विधि वा संन्ध्या, अग्निहोत्र यज्ञों सहित वेदभाष्य व सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों से विश्व के कोटि कोटि जनों का उपकार हुआ है। हमें यह भी ज्ञात होना चाहिये कि अग्निहोत्र-यज्ञ करने से वायु की शुद्धि एवं रोगों का निवारण वा रोगों से रक्षा होने सहित हमें इस पुण्य कर्म को करने से जन्म जन्मान्तर में ईश्वर की व्यवस्था से सुख एवं श्रेष्ठ मनुष्य योनि की प्राप्ति होती है। आर्यसमाज के विद्वानों व अनुयायियों को वेद विषयक सभी मान्यताओं का ज्ञान है और दूसरे मत-मतान्तरों का भी ज्ञान है परन्तु दूसरे मतों को वेद की विशेषताओं तथा ऋषि दयानन्द प्रणीत वैदिक संन्ध्या एवं यज्ञ आदि तथा उसके विधि विधानों का ज्ञान नहीं है। ऋषि दयानन्द ने संन्ध्या व अग्निहोत्र पुस्तकों सहित अन्य जितने भी ग्रन्थ लिखे हैं वह अपने व किसी वर्ग विशेष के लिये नहीं लिखे अपितु विश्व के सभी मनुष्यों के उपकार के लिये लिखे हैं। सभी को उनको पढ़ना चाहिये तभी विश्व का उपकार व हित होगा और विश्व में अज्ञान, अन्याय, अभाव, अशान्ति व हिंसा आदि का निवारण होकर सुख व कल्याण का प्रसार होगा। ऋषि दयानन्द ने विश्व के मनुष्यों के उपकार के लिये सन्ध्या आदि ग्रन्थों को लिखने के लिए उनको कोटि कोटि नमन करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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