युग प्रवर्तक थे महर्षि दयानन्द

भारत महापुरूषों की भूमि है। समय समय पर कभी मानव रूप में तो कभी आप्तपुरूषों के रूप में आर्यावत्र्त की इस देवभूमि में अवतरित होकर बहुत सी दिव्य आत्माओं ने सम्पूर्ण मानवता का कल्याण किया।
स्वधर्म, स्वभाषा, स्वराष्ट्र, स्वदेशोन्नति, और स्वसंस्कृति के ध्वजवाहक, समग्रक्रांति के अग्रदूत, ‘कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम्’ अर्थात ‘सारे संसार को आर्य बनाओ’-श्रेष्ठ मानव बनाओ, के प्रवत्र्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती महाराज का जन्म 12 फरवरी 1824 (तदानुसार फाल्गुन कृष्णपक्ष दशमी) को गुजरात के एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इस महापुरूष का जन्म उस समय हुआ जब ईसाई व मुस्लिम शक्तियां भारतीय संस्कृति के दोहन-तिरोहण का कार्य कर रही थीं। उस समय शंकराचार्य के बाद बुराईयों पर चोट करने वाले इस संन्यासी योद्घा का जन्म हुआ। यह महापुरूष निर्भीक, निडर व राष्ट्रीय हितों का क्रांतिदूत बनकर जनमानस में पूजनीय और वंदनीय हो गया। इनके दिव्यगुणों से प्रभावित होकर ‘कांग्रेस का इतिहास’ के लेखक डा. पट्टाभिसीतारमैया ने कहा था कि-‘गांधीजी राष्ट्रपिता हैं पर स्वामी दयानंद राष्ट्रपितामह हैं।’
स्वामी दयानन्द महाराज जी के गुरू ब्रजानन्द ‘दंडी’ ने आपको मानव से महामानव बनाया। वेद और उपनिषदों में शिक्षित-दीक्षित होने के बाद आपने कर्म सिद्घांत, पुर्नजन्म, ब्रह्मचर्य तथा संन्यास को अपने दर्शन के चार स्तंभ बनाया। स्वामी जी ने ही सबसे पहले ‘स्वराज्य’ का नारा दिया। जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया। देश के असंख्य क्रांतिकारी इनसे प्रभावित थे, जिनमें विनायक दामोदर सावरकर, लाला हरदयाल, स्वामी श्रद्घानंद जी महाराज, लाला लाजपतराय इत्यादि प्रमुख थे। स्वामी दयानंद जी ने हिंदी भाषा को ‘आर्य भाषा’ कहा। राष्ट्र के आद्य निर्माता स्वामी जी ने हिन्दू धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर के बारे में गम्भीर चिन्तन किया।
गुरू ब्रजानन्द ने पाणिनीय व्याकरण, पातंजलि योगसूत्र और वेद वेदांग में आपको पारंगत किया। एक बार कुम्भ में ‘पाखण्ड-खण्डिनी’ पताका स्थापित की और अपना देश जागरण का कार्य बड़ी कर्मठता से करना प्रारम्भ किया। महर्षि दयानन्द के भीतर आदर्शवाद की उच्च भावना, यथार्थवादी मार्ग अपनाने की सहज प्रवृत्ति, मातृभूमि की नियति को नई दिशा देने का अदम्य उत्साह, धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक दृष्टि से युगानुकूल चिन्तन करने की तीव्र इच्छा थी। उन्होंने भारतीयता की अलख जगाकर हिन्दू समाज का कायाकल्प करने का भागीरथ और स्तुत्य प्रयास किया। 1875 में 10 अप्रैल (वैदिक सम्वत=हिन्दू नववर्ष) को आपने आर्यसमाज की स्थापना कर शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर संसार के लोगों को इस ओर आकर्षित करने का अभिनन्दनीय प्रयास किया। वेदों की श्रेष्ठता सिद्घ करने के लिए और जनजागरण हेतु भारत भ्रमण किया। स्वामीजी तर्कशक्ति और संस्कृत भाषा के महान पंडित थे। उन्होंने ईसाई और मुस्लिम धर्मग्रन्थों का अध्ययन करके एक साथ तीन मोर्चों पर लड़ाई शुरू की। दो मोर्चे ईसाई व इस्लाम के थे तो तीसरा मोर्चा पौराणिक धर्मी हिन्दुओं से था। उन्होंने तीनों मोर्चों पर एक साथ अपनी सेना को अर्थात अपनी तर्कशक्ति और ज्ञान गाम्भीर्य को शास्त्रार्थ के महा-अस्त्र के साथ मैदान में उतार दिया।
स्वामी जी ने देश में बुद्घिवाद की अनुपम ज्योति जलाई। इसके लिए उन्होंने अनेकों कष्ट उठाये और कलंक व अपमान को भी सहन किया। उन्होंने पौराणिक धर्म की पोंगापंथी पर भी तीव्र प्रहार किया। उन्होंने अपने अमरग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में सभी मतों में व्याप्त बुराईयों का खण्डन किया। स्वामी जी ने सत्य के लिए आजीवन अनवरत अनुसंधान कार्य किया। दिल्ली व पंजाब प्रांत तो उनके विचारों की साधनास्थली सिद्घ हुए। उस समय के समाज में व्याप्त कुरीतियों, कुप्रथाओं व रूढिय़ों पर निर्भीकता से प्रहार किया। इसलिए उन्हें संन्यासी योद्घा के नाम से भी जाना जाता है।
महर्षि दयानन्द ने जन्मना जाति का विरोध किया। तथा कर्म के आधार पर वेदानुकूल वर्ण निर्धारण की बात कही। वे दलितोद्घार के प्रबल समर्थक थे। उनके विचारों में दार्शनिकता थी और ज्ञान-गाम्भीर्य था। वह एक सिद्घहस्त योगी थे। उनका प्राणायाम पर विशेष बल था, उन्होंने स्त्री शिक्षा के लिए प्रभावशाली आन्दोलन चलाया। बाल विवाह और सतीप्रथा का निषेध किया, किंतु विधवा विवाह का समर्थन किया। वह त्रैतवाद के समर्थक थे, सामाजिक पुनर्निमाण में स्वामी जी सभी वर्णों और स्त्रियों की भागीदारी के प्रबल पक्षधर थे। राष्ट्रीय जागरण की दिशा में वे सांस्कृतिक क्रांति के अग्रदूत और आध्यात्मिक पुनरूत्थानवाद के पितामह थे। महर्षि दयानन्द राष्ट्रवादी होने के साथ-साथ राजनैतिक आदर्शवादी भी थे। उन्होंने सदैव न्याय की व्यवस्था, ऋषि प्रणीत ग्रंथों के आधार पर किये जाने का पक्ष लिया।
महर्षि दयानन्द केवल आर्य समाज के संस्थापक और समाज में व्याप्त बुराईयों के निवारक ही नहीं थे-अपितु स्वतन्त्रता का प्रथम उद्घोष करने वाले युग पुरूष भी थे। 1857 की क्रांति की पूरी योजना में स्वामी दयानन्द जी महाराज की सक्रिय और सराहनीय भूमिका रही थी। उस क्रांति के मौलिक सूत्रधार महर्षि दयानन्द ही थे। 1855 में आबू पर्वत से जगह-जगह प्रवचन करते हुए वे हरिद्वार कुम्भ में पहुंचे थे। हरिद्वार में ही एक पहाड़ी के एकान्त में उन्होंने पांच ऐसे व्यक्तियों से वार्ता की थी जो 1857 की क्रांति के कर्णधार बने। ये पांच व्यक्ति थे नाना साहब, अजीमुल्लाखान, बाला साहब, तात्यां टोपे व बाबू कुंवर सिंह। क्रांति को जन-जन तक पहुंचाने के लिए ‘रोटी व कमल’ की इतिहास प्रसिद्घ योजना यहीं बैठकर तैयार की गयी थी। क्रांति के समय स्वामी जी लगातार सभी क्रांतिकारियों के संपर्क में रहे। स्वामीजी के मार्गदर्शन में पूरे देश में साधु संतों ने राष्ट्रवाद का संदेश दिया। वे क्रांति की असफलता से कभी निराश नही हुए। उन्होंने 1857 की क्रांति के पश्चात कहा था कि अब हमें स्वतंत्रता के लिए सौ वर्ष का संघर्ष करना पड़ सकता है, और 1947 में जब देश आजाद हुआ तो उस समय महर्षि दयानंद की भविष्यवाणी को 90 वर्ष पूर्ण हो चुके थे। इस प्रकार देश की आजादी की मशाल को 1947 में सौंपने वाले अदृश्य हाथ स्वामी दयानंद के ही थे। आज हमारा देश पुन: कई चुनौतियों से जूझ रहा है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, (हिंदुस्तान) आर्यभाषा, (हिंदी) आर्यसंस्कृति (हिंदू, हिंदुत्व) सभी को अभूतपूर्व संकट है। जिनके लिए आज पुन: महर्षि दयानन्द जैसे दिव्य पुरूष की हमें आवश्यकता है। उनके जन्मोत्सव के अवसर हमें उनके जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र के सम्मुख उपस्थित समस्याओं का समाधान करने की दिशा में ठोस कार्य करने की आवश्यकता है।
(लेखक ‘उगता भारत प्रबुद्घ जनमंच’ के प्रांतीय अध्यक्ष हैं)

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