स्वामी दयानन्द ने अपने लेखन में अनेक स्थलों पर इस आरोपण का खण्डन किया है कि वेद बहुदेववाद, एकाधिदेववाद अथवा देवतावाद का प्रतिपादन करते हैं। डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी उनसे सहमति जताते हुए लिखते हैं-”एक महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखनी चाहिए कि ‘देव’ शब्द एकार्थी नहीं, अनेकार्थी है। देव वह है जो मनुष्य को देता है। ईश्वर देव है क्योंकि वह सम्पूर्ण संसार को देता है। विद्वान देव है क्योंकि वह अन्यों को ज्ञान देता है। सूर्य, चन्द्रमा तथा आकाश विश्व को प्रकाश देने से देव है। पिता, माता, गुरू एवं अतिथि देव हैं।
स्वामी दयानन्द द्वारा विरचित ‘सत्यार्थप्रकाश’ (समुल्लास-7, प्रस्तर-3) में प्रश्नोत्तर शैली में दिये गये निम्नांकित अंश इस विषय पर प्रकाश डालते हैं-
प्रश्न-वेद में ईश्वर अनेक हैं, इस बात को तुम मानते हो वा नहीं?
उत्तर-नहीं मानते, क्योंकि चारों वेदों में ऐसा कहीं नहीं लिखा जिससे अनेक ईश्वर सिद्घ हों, किन्तु यह तो लिखा है कि ईश्वर एक है। 
प्रश्न-वेद में जो अनेक देवता लिखे हैं, उसका क्या अभिप्राय है?
उत्तर-देवता दिव्य गुणों के होने के कारण कहाते हैं जैसे कि पृथिवी, परन्तु इसको कहीं ईश्वर वा उपासनीय नहीं माना है। देखो! इसी मंत्र में कि जिसमें सब देवता स्थित हैं, वह जानने और उपासना करने योग्य ईश्वर है। यह उनकी भूल है जो देवता शब्द से ईश्वर का ग्रहण करते हैं। परमेश्वर देवों का देव होने से ‘महादेव’ इसलिए कहाता है कि वही सब जगत की उत्पत्ति स्थिति-प्रलयकत्र्ता, न्यायाधीश अधिष्ठाता है। जो ‘त्रयस्त्रिंशता’ इत्यादि वेद में प्रमाण हैं, इसकी व्याख्या शतपथ में की है कि तैंतीस देव अर्थात पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चंद्रमा, सूर्य और नक्षत्र सब सृष्टि के निवासस्थान होने से आठ वसु। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय और जीवात्मा ये ग्यारह ‘रूद्र’ इसलिए कहाते हैं कि जब शरीर को छोड़ते हैं-तब रोदन कराने वाले होते हैं। संवत्सर के बारह महीने ‘आदित्य’ इसलिए हैं कि ये सबकी आयु को लेते जाते हैं। बिजली का नाम ‘इन्द्र’ यह हेतु से है कि जो परम ऐश्वर्य का हेतु है। यज्ञ को ‘प्रजापति’ कहने का कारण यह है कि जिससे वायु, वृष्टि, जल, औषधि की शुद्घि, विद्वानों का सत्कार और नाना प्रकार की शिल्पविद्या से प्रजा का पालन होता है। ‘प्रजापति’ शब्द का अर्थ है-सृष्टि का स्वामी, यज्ञ सबका धारण करने वाला होने से प्रजापति है। ये तैंतीस पूर्वोक्त गुणों के योग से देव कहाते हैं। इनका स्वामी और सबसे बड़ा होने से परमात्मा चौंतीसवां उपास्यदेव शतपथ के चौदहवें काण्ड में स्पष्ट लिखा है।”
इस प्रकार दिव्य गुण युक्त होने से पूर्वोक्त तैंतीस पदार्थ देवता कहलाते हैं। इनका स्वामी और सबसे बड़ा होने से परमात्मा चौंतीसवां देवता है जो एकमात्र उपास्यदेव है। यही बात अन्य शास्त्रों में दी गयी है। यदि लोगों ने पढ़ा होता तो वे यह मानने के दोष से बच गये होते कि वेदों में एक से अधिक देवता कहे गये हैं।
यजुर्वेद का वचन है- ईशावास्यमिद सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। 
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्घनम्।।
अर्थात एक परमसत्ता से यह ब्रह्माण्ड और सृष्टि का प्रत्येक जगत व्याप्त है। वह सत्ता ईश्वर की है। हे मनुष्य तू उससे डर और किसी के धन का लालच मत कर।
वेद में ईश्वर के अन्य उपदेश हैं-
(1) अहं भुवं वसुन: पूव्र्यस्पतिरहं धनानि सं जयामि शश्वत:। मां हवन्ते पितरं न जन्तवोअहं दाशुषे वि भजामि भोजनम्।।
अर्थात हे मनुष्यो! मैं ब्रह्माण्ड के सृजन के पूर्व से हूं, सबका स्वामी और सृष्टि का शाश्वत कारण हूं, सम्पूर्ण धन का स्रोत एवं दाता हूं। सब पुत्रवत होकर मुझे ही पुकारें। मैंने ही सब प्राणियों के जीवन एवं सुख के लिए सब आहार नियत किये हैं।
(2) अहमिन्द्रो न परा जिग्य इद्घनं न मृत्यवेअव तस्थे कदा चन। सोममिन्मा सुन्वन्तो याचता वसु न मे पूरव: सख्ये रिषाथन।।
अर्थात मैं सर्वशक्तिमान और प्रकाश स्वरूप हूं। मुझे पराजय या मृत्यु नहीं दू सकती। मैं श्वि-नियंता, सबका कत्र्ता और शाश्वत सखा हूं। सब लोग धन-ऐश्वर्य के लिए कामना एवं पुरूषार्थ करें।
(3) हिरण्यगर्भ: समवत्र्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।
अर्थात ईश्वर सृष्टि के पूर्व से है। वही सूर्य एवं अन्य प्रकाशशील लोकों का स्रष्टा, सबका धारणकत्र्ता एवं पालन करने हारा है। वही भूतकालीन, वर्तमान एवं भावी सृष्टियों का स्वामी है। वही विश्व को रचता और थामता है। वह सुख स्वरूप है। हे मनुष्यो! तुम भी हमारी तरह उसी की स्तुति तथा उपासना करो।
(4) इन्द्रं मित्रं वरूणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गरूत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:।।
अर्थात ईश्वर एक है किंतु विद्वान लोग उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं, यथा-इन्द्र, मित्र, वरूण, अग्नि, दिव्य, सुपर्ण, गरूत्मान् यम एवं मातरिश्वा।
(5) तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वा युस्तदु चन्द्रमा:।
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्मा ताआप: स प्रजापति:।।
अर्थात वह ईश्वर ही अग्नि है, वही आदित्य है, वही वायु है, वहीं चन्द्रमा और वहीं शुक्र है। वहीं आप: और प्रजापति भी वही है।
स्वामी दयानन्द ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के प्रथम समुल्लास में बड़ी स्पष्ट व्याख्या दी है किकैसे प्रसंगानुसार शब्द-व्युत्पत्तिपूर्वक ईश्वर के सौ नाम हो सकते हैं। ऐसे नाम जो देवतार्थक प्रतीत होते हैं, वेदों में कहीं ईश्वर और कहीं भौतिक पदार्थों के लिए प्रयुक्त हुए हैं। वे कहते हैं-
”जहां जिसका प्रकरण है वहां उसी का ग्रहण करना योग्य है। ऐसा ही हम और आप सब लोगों को मानना और करना भी चाहिए।”

Comment:

betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
holiganbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel
holiganbet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
klasbahis giriş
klasbahis giriş
klasbahis
holiganbet güncel
imajbet güncel
bettilt giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
holiganbet güncel giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş