पंडित जवाहरलाल नेहरू और सोने की चिड़िया भारत

पंडित जवाहरलाल नेहरू और सोने की चिड़िया भारत

मृत्युंजय राय

प्रशांत चंद्र महालनोबिस ने इकॉनमी के लिए एक प्लान तैयार किया, जिस पर 1955 में देश के 20 जाने-माने अर्थशास्त्रियों की राय ली गई। महालनोबिस प्लान, सोवियत संघ की सेंट्रल प्लानिंग मॉडल पर आधारित था यानी इकॉनमी में सरकार और सरकारी कंपनियों की चलेगी। इस प्लान पर उन 20 में से 19 अर्थशास्त्रियों ने हामी भरी। सिर्फ एक शख्स ने विरोध किया। वह शख्स थे बी आर शेनॉय। शायद तब महालनोबिस और उनके प्लान का समर्थन करने वाले अर्थशास्त्रियों के लिए शेनॉय किसी खलनायक से कम नहीं रहे होंगे।

महालनोबिस देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के चहेते थे। वह कैंब्रिज से पढ़े थे, फिजिशिस्ट और स्टैटिशियन। संस्कृत और बांग्ला साहित्य के जानकार। लेकिन वह अर्थशास्त्र के जानकार नहीं थे। महालनोबिस ने खुद माना था कि ‘मेरे अंदर आर्थिक मामलों को लेकर हीनभावना थी।’

शेनॉय जाने-माने अर्थशास्त्री थे। बीएचयू से 1929 में उन्होंने मास्टर्स ऑफ इकॉनमिक्स की डिग्री ली, वह भी गोल्ड मेडल के साथ। फिर इंग्लैंड गए और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स में पढ़ाई की। इंग्लैंड में रहते उन्होंने और कुछ अन्य अर्थशास्त्रियों ने जॉन मेनार्ड कीन्स के कुछ सिद्धांतों को चुनौती दी, जिसे बाद में कीन्स ने सही माना।

लंदन स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स से पढ़ाई पूरी करने के बाद शेनॉय देश लौटे और यहां कई कॉलेजों में पढ़ाने के बाद 1945 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से जुड़े। करीब 9 साल बाद उन्होंने फिर से पढ़ाने का फैसला किया और इसके लिए गुजरात यूनिवर्सिटी को चुना। शेनॉय अपने क्षेत्र में योग्यता साबित कर चुके थे, फिर भी 1955 में महालनोबिस के प्लान पर उनके विरोध को अनसुना कर दिया गया। इस बीच, नेहरू की सोच से प्रभावित होकर बनाई गई महालनोबिस की आर्थिक योजना ने नब्बे का दशक खत्म होने से पहले देश को दिवालिया होने की कगार पर पहुंचा दिया।

इस आर्थिक दलदल से निकलने के लिए नरसिम्हा राव सरकार ने जिन आर्थिक सुधारों को मजबूरी में अपनाया और जिसे अभी तक सरकारें आगे बढ़ाती आई हैं, उसी की बदौलत भारत आज दुनिया की पांचवीं बड़ी इकॉनमी बन पाया है। और जिस मुक्त बाजार और विदेशी निवेश की नीतियों के दम पर इस दशक के आखिर तक भारत के दुनिया की तीसरी बड़ी इकॉनमी बनने के अनुमान लगाए जा रहे हैं, उसकी सिफारिश शेनॉय ने 1955 में ही कर दी थी।

उन्होंने चार दशक से भी अधिक पहले मुक्त व्यापार को अपनाने की सलाह दी थी। शेनॉय ने जो कहा, वह किस हद तक सही साबित हुआ, उसे समझने से पहले यह देखना चाहिए कि महालनोबिस और नेहरू के आर्थिक प्लान में क्या गड़बड़ियां थीं। इसकी शुरुआत कैसे हुई और क्या इसमें प्लानिंग कमिशन का भी कोई रोल था, जिसे नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद भंग करने का फैसला किया?

नेहरू मानते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता का मतलब आर्थिक आजादी है। ब्रिटिश राज के दौरान पूंजीवाद का जो रूप उन्होंने देखा था, उससे भी उनकी यह सोच बनी थी। उन्होंने देखा था कि भारत में पूंजीवाद कमजोर है। इस पर मुट्ठी भर लोगों का कंट्रोल है। इसलिए वह मानते थे कि आम लोगों के आर्थिक हितों की रक्षा का भार सरकार को उठाना होगा।

तब नेहरू जैसे राष्ट्रवादी नेताओं का बड़ा वर्ग सोवियत संघ की सेंट्रल प्लानिंग और उसकी कामयाबी का मुरीद था। कम्युनिस्टों के सत्ता में आने के दो दशक के अंदर सोवियत संघ दुनिया की बड़ी औद्योगिक ताकत बन चुका था। उसने भुखमरी कम करने में कामयाबी पाई थी। साइंस के क्षेत्र में बड़ा नाम कमाया था। दूसरे विश्वयुद्ध में मित्र देशों के साथ मिलकर हिटलर को हराने के बाद तो अमेरिका के साथ वह दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बन चुका था।

यह ऐसा दौर था, जब दुनिया के कई देशों में अर्थव्यवस्था और आर्थिक मामलों में सरकार का अच्छा-खासा दखल था और समाजवादी-वामपंथी सोच हावी थी। यहां तक कि 1929 की महामंदी के बाद अमेरिका और ब्रिटेन में भी इकॉनमी में सरकार की भूमिका बढ़ी थी। चीन में भी माओ त्से तुंग के राज में ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ नाम की नीति लाई गई, जिसका मकसद देश को बड़ी औद्योगिक ताकत बनाना था। यह बात और है कि इस गलत नीति की वजह से चीन में भुखमरी की स्थिति बनी और भारी संख्या में लोगों की जान गई।

ऐसे दौर में नेहरू ने समाजवादी आर्थिक नीतियां क्यों अपनाईं, इसे समझा जा सकता है। वही नहीं, कई राष्ट्रवादी नेता भी तब मानते थे कि आर्थिक मामलों में सरकार के दखल से देश को फायदा होता है। कांग्रेस के गरमपंथ के नेता लाला लाजपत राय भी इनमें शामिल थे। फर्क सिर्फ इतना है कि नेहरू को सोवियत मॉडल पसंद था तो लालाजी जापान के आर्थिक मॉडल के मुरीद थे।

पहले विश्व युद्ध के बाद लालाजी जापान की यात्रा पर गए तो वहां की औद्योगिक तरक्की देखकर बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि जापान ने विदेशी पूंजी और कंपनियों को रोककर देसी उद्योगों को पनपने का मौका दिया, जिससे ऐसा बदलाव आया। यहां तक कि भारतीय उद्योगपति भी अर्थव्यवस्था में सरकारी दखल और निवेश के हिमायती थे। 1944 में बॉम्बे के उद्योगपतियों ने जब अपना प्लान पेश किया तो उन्होंने भी माना कि इंफ्रास्ट्रक्चर और एग्रीकल्चर जैसे क्षेत्रों में प्राइवेट सेक्टर जरूरी निवेश नहीं कर पाएगा।

इन हालात में देश की पहली सरकार ने 1950 में प्लानिंग कमिशन बनाया। इसके दो साल बाद जब पहली पंचवर्षीय योजना बनी तो नेहरू ने कहा, ‘मुझे इसमें जरा भी संदेह नहीं है कि हमें भारत को जल्द से जल्द और जहां तक मुमकिन हो सके, औद्योगिक देश बनाना होगा।’ नेहरू की मंशा सही थी, लेकिन इसके लिए उन्होंने रास्ता गलत चुना। उन्होंने देश की इकॉनमी को सरकार, सरकारी कंपनियों और इस तरह से नौकरशाहों के जिम्मे सौंप दिया।

नेहरू यह रास्ता पकड़ेंगे, यह प्लानिंग कमिशन के बनने से पहले से ही तय हो चुका था। आजादी के एक साल बाद ही उनकी शह पर सरकार ने इंडस्ट्रियल पॉलिसी को लेकर एक प्रस्ताव पास किया। इसमें कई उद्योगों में सरकार को एकाधिकार दे दिया गया। वह भी तब, जब सरदार पटेल इसे लेकर आशंकित थे। फिर 1951 में सरकार ने इंडस्ट्रीज (डिवेलपमेंट एंड रेग्युलेशन) एक्ट बनाया। इसमें कई गलत नीतियों को जगह दी गई। सी राजागोपालाचारी ने भी इसका विरोध किया था। मुक्त बाजार के हिमायती और दिग्गज कांग्रेसी नेता ने तब कहा था कि इससे देश में लाइसेंस परमिट कोटा राज आ जाएगा।

इस लाइसेंस, परमिट और कोटा राज का खतरनाक रूप 1955 में महालनोबिस के बनाए प्लान पर दूसरी पंचवर्षीय योजना पर अमल के बाद सामने आना शुरू हुआ। सरकारी कंपनियों के पास ऐसी काबिलियत नहीं थी कि उनकी बदौलत औद्योगिक ग्रोथ तेज हो पाती और निजी क्षेत्र को उभरने का मौका नहीं दिया गया। इस वजह से लंबे समय तक भारत की जीडीपी ग्रोथ 3 फीसदी तक रही, जिसे मजाक में हिंदू ग्रोथ रेट का नाम दिया गया।

नेहरू-महालनोबिस की गलत नीतियों का असर सिर्फ औद्योगिक क्षेत्र पर ही नहीं पड़ा, इससे कृषि क्षेत्र भी बदहाल हो गया। देश लोगों का पेट भरने लायक अनाज पैदा नहीं कर पा रहा था। इसके लिए हम दूसरे देशों के रहमोकरम पर आश्रित होना पड़ा। इस संकट से देश साठ के दशक के आखिर में शुरू हुई हरित क्रांति की वजह से निकल पाया। इससे भी बुरी बात यह है कि जिस गरीबी को कम करने के मकसद से नेहरू और महालनोबिस ने सोवियत मॉडल देश को अपनाया था, वह भी हासिल नहीं हुआ।

इन नीतियों की आलोचना करना वाले शेनॉय सही साबित हुए। उन्होंने कहा था कि सरकार के आमदनी से अधिक कर्ज लेकर पब्लिक सेक्टर कंपनियों में लगाने से देश में महंगाई बढ़ेगी। शेनॉय का मानना था कि अधिक महंगाई दर के साथ तेज ग्रोथ हासिल नहीं की जा सकती। महंगाई की वजह से ही उन्होंने अनाज के समर्थन मूल्य पर खरीदारी का भी विरोध किया। शेनॉय ने कहा था कि सरकार भले ही इसे कम समय की योजना कहकर लागू कर रही है, लेकिन इसे बंद करना मुश्किल होगा। यह योजना आज तक चल रही है।

आर्थिक क्षेत्र में सरकारी कंपनियों के दबदबे पर भी शेनॉय का विरोध सही साबित हुआ। उदारीकरण के बाद कई उद्योगों से सरकार बाहर निकल चुकी है और कई और क्षेत्रों से निकलने की तैयारी कर रही है। केंद्र की सत्ता में बैठी बीजेपी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बीच इस मामले में आम सहमति है। इन कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने का विरोध हो भी रहा है तो सिर्फ मजदूर संगठनों की ओर से।

शेनॉय की इस बात के लिए भी तारीफ की जानी चाहिए कि 1979 में जब उनका निधन हुआ, तब तक वह नेहरूवादी आर्थिक नीतियों के विरोध पर अड़े रहे। उनके निधन के करीब एक दशक बाद सेंट्रल प्लानिंग की गलत नीति की वजह से सोवियत संघ बिखर गया। चीन ने समय रहते आर्थिक सुधारों को लागू किया और आज वह दुनिया की दूसरी बड़ी इकॉनमी है।

भारत में भी कुछ दशक से इस पर आम सहमति है कि नेहरू और महालनोबिस की आर्थिक नीतियां गलत थीं। कई आर्थिक जानकार इसी वजह से नेहरू-महालनोबिस को खलनायक बताते हैं, लेकिन अफसोस की बात यह है कि शेनॉय को नायक का दर्जा अभी तक नहीं मिल पाया है। अगर उनकी सुनी गई होती तो शायद भारत आज चीन से भी आगे होता।

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