गौरक्षा पर प्रश्न चिह्न क्यों ?

images (14)


गौरक्षा का प्रश्न उठते ही हिन्दू विरोधी दल सक्रिय हो उठते हैं। 1967 में गौरक्षा की मांग पर इंदिरा गांधी ने सैंकड़ों निरपराध हिन्दू स्त्री पुरुषों को गोली से मरवा दिया । कुछ साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो० डी. एन. झा ने “Holy Cow : Beef in Indian Dietary Traditions” नामक पुस्तक लिखी। उसमें यह बताया गया कि प्राचीन हिन्दू गाय खाते थे।
पिछले लगभग सौ वर्षों में अनेकों बार यह प्रयास किया गया है, आर्य हिन्दू मानसिकता को चोट पहुँचाई गई है । यह भी एक और सही । यह दल बड़ा प्रभावशाली है, सम्पन्न है, प्रचार कला में माहिर है । अगस्त ११, २००१ को कलकत्ता के प्रतिष्ठित पत्र दि स्टेट्समैन ने सम्पादकीय लिखने की आवश्यकता समझी और Unholy Cow : Blind Faith and Critical Rationality शीर्षक देकर सम्पादकीय टिप्पणी की । अगस्त १४, २००१ को प्रो० राम पुनियानी (एकता कमेटी, मुम्बई के सदस्य) ने चिन्नई के हिन्दू पत्र में थोड़ी विस्तृत टिप्पणी देकर के समर्थन में इतिहास के शुद्ध रूप के उद्धार आदि का वास्ता दिया और शीर्षक दिया Beef Eating : Strangulating History ये शीर्षक अपनी भावनाओं को स्वयं बता रहे हैं ।
संस्कृतियों का टकराव युग-युगान्तरों से चला आ रहा है । सतयुग में तो इस तरह के किसी टकराव का इतिहास नहीं मिलता, किन्तु त्रेता में महाराज रघु से श्री रामचन्द्र तक टकराव भरा पड़ा है । श्री रामचन्द्र के समय में राक्षस संस्कृति एक ओर और देव एवं आर्य एक ओर थे । राम रावण युद्ध के साथ उस सांस्कृतिक संघर्ष का निर्णायक इतिहास बन गया । और राक्षस संस्कृति दब गई । जब आसुरी विचारधारा के प्रचार प्रसार में अधिक कठिनाई का अनुभव करने लगा तो एक योजना बनायी
“तस्मात्सर्वात्मना राजन् ब्राह्मणान् ब्रह्मवादिनः । तपस्विनो यज्ञशीलान् गाश्च हन्मो हविर्दुधाः ॥”
श्री मदभा० १०-४-४०
अर्थात् – हे राजन् ! यदि वेद-ब्राह्मण गौ भक्तों को पराजित करना चाहते हो तो सर्वात्मना, पूरी शक्ति से ब्रह्मवादी, वेद प्रचारक, तपस्वी यज्ञशील ब्राह्मणों की और यज्ञ की हवि की सहायक गायों की हत्या कराओ । यह था गौ-ब्राह्मण वेद विरोधी आयोजन ।
भारतीय ऐतिहासिक परम्परा के विद्वानों का विचार है कि महाभारत युद्ध से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व ये स्वार्थी, अनार्य, असुर विचार पनपने लगे थे । और महाभारत काल में इनके समर्थक यत्र तत्र दिखायी देने लगे थे । महाभारत के शान्तिपर्व में आता है, यह एक घोषणा जैसा है
॥ । “सुरामत्स्याः पशोमा॑सम् आसवं कृशरौदनम् । धूर्तेः प्रवर्तितं यज्ञे, नैतद् वेदेषु विद्यते अव्यवस्थित मर्यादैः विमूढे स्तिकैनरैः संशयात्मभि रव्यक्तै हिंसा समनुवर्णिता ॥
शान्तिपर्व अ० २६३-९
इसका भावार्थ यह हुआ कि शराब, मत्स्यसेवन, पशुमांस, आसव इत्यादि का यज्ञा में प्रयोग धूर्तों ने किया है । यह सब वेदों में नहीं हैं । मर्यादा से भ्रष्ट, संशयात्मा, मूर्ख, नास्तिक लोगों ने पशु हिंसा का प्रचार किया । “न एतद् वेदेषु विद्यते” यह वेदों में नहीं है । यह धूतों की चेष्टा है।
इसका मतलब यह हुआ कि महाभारत काल में पशु हिंसा आदि का प्रचार होने लगा था । जनता, पण्डित, ब्राह्मण, याज्ञिक कर्मकाण्डी इस पर विश्वास करने लगे थे । अतः मान्य ग्रन्थों में धूर्तों ने प्रक्षेप करना आरम्भ कर दिया । यह प्रक्षेप-मिलावट वेदों में तो हो नहीं सकी क्योंकि उन्हें तो धर्म मानकर कण्ठस्थ किया जाता था । किन्तु ब्राह्मणआरण्यक-स्मृतियों में समय-समय पर अपने स्वार्थ का विधान मिलाया जाने लगा। “धूर्तेः प्रवर्तितं ह्येतद् ।’
यह प्रक्षेप का अन्याय-अन्धेर देखकर ऋषि बुद्धि से सम्पन्न महर्षि दयानन्द ने निर्द्वन्द्व घोषणा कर दी कि वेद संहिता स्वतः प्रमाण है, अन्य सारे ग्रन्थ यदि वेदों के अनुकूल हैं तभी प्रमाण है, अन्यथा नहीं । अतः वेद स्वतः प्रमाण और अन्य सारे ग्रन्थ परतः प्रमाण अर्थात् जो वेदों के विपरीत है, वह प्रमाण नहीं है ।
श्रीमध्वाचार्य आनन्दतीर्थजी ने ‘महाभारत तात्पर्य निर्णय’ में लिखा है
“क्वचिद् ग्रन्थान् प्रक्षिपन्ति, क्वचिदन्तरितानापि । कुर्युः क्वचिच्च व्यत्यासं, प्रमादा त्क्वचिदन्यथा ।। अनुत्सन्ना अपि ग्रन्थाः, व्याकुला इति सर्वशः ।।
कुम्भ घो० संस्क पृ. ९०७
अर्थात् सभ्यता संस्कृति के विघातक धूर्त लोग कही कही प्रक्षेप, ग्रन्थों में मिलावट करते हैं, कहीं बदल कर ग्रन्थो में पाठान्तर कर देते है और धूर्ततावश ग्रन्थको अन्यथा कर देते है । जो सद्ग्रन्थ नष्ट नहीं हुए हैं वे भी गड़बड़ी के कारण व्याकुल हो गये है ।
यह स्वामी दयानन्द या आर्य समाज के किसी विद्वान् की सम्मति नहीं है, यह तो श्रीमध्वाचार्य आनन्दतीर्थ जी की वेदना है । कोई भी निष्पक्ष सत्याग्रही विद्वान् इस प्रक्षेप काण्ड के इन्कार नहीं कर सकता ।
महाभारत के पश्चात् मध्यकाल की स्थिति
महाभारतकाल तक हिंसा का विधान अधिक नहीं हो सका था । किन्तु निर्णायक समझदारों को यह कहने की आवश्यकता प्रतीत हुई, “धूर्तेः प्रवर्तितमेतद्” यह धूर्तों का प्रचार है । महाभारत काल में इतने विनाशकारी युद्ध के पश्चात् सारी व्यवस्था अत्यन्त विकृत हो गयी । पठन-पाठन, गुरुकुल, ऋषियों के आश्रम सभी गड़बड़ा गये । ऋषि युग समाप्त हो गया । महर्षि व्यास और जैमिनि ऋषि परम्परा में अन्तिम ऋषि हुए । महामुनि पाणिनि, पतञ्जलि आदि के साथ मुनियुग भी समाप्त हो गया । ऋषिमुनि युग की समाप्ति के पश्चात् स्वार्थियों धूर्तो ने समाज को ठगना आरम्भ कर दिया । पशुहिंसा आदि का प्रचार होने लगा। किन्तु जनसाधारण में पशुहिंसा मद्यपान आदि की प्रवृत्ति घर न कर सकी । जनता सामान्य रूप से पशुहिंसामद्यपान-व्यभिचार आदि से दूर रही, और इनको कदाचार दुराचार समझती रही, आज तक समझती आ रही है । हज़ार चेष्टा करने पर भी जनगंगा के जीवन-चरित्र की अजस्रधारा आजतक अपनी पवित्रता की रक्षा करती आ रही है । इस युग में भी इन कदाचारों और कुत्सित विचार-व्यवहारों पर जन साधारण ने पवित्रता-सदाचार की मोहर नहीं लगायी है। जन साधारण ने तो न तब अपनाया था, न अब अपनाया है,
किन्तु स्वार्थियों ने पशुयाग, शराब, व्यभिचार का प्रचार आरम्भ किया -और वह भी वेदों का नाम लेकर, वेदों की मोहर लगाकर । वेटो के विद्वान् तो अब रह न गये थे जो डाँट कर गर्जकर कह सकते ‘धूर्तेः प्रवर्तितं यज्ञे, नैतद् वेदेषु विद्यते ।” ]
यह सब वेदों की नहीं है, यह धूर्तो की माया है । यह मांस, शराब, कदाचार वेदों के नाम पर देखकर चार्वाक, जैन, बौद्ध आदि वेदो का ही विरोध करने लगे ।
स्वामी शंकराचार्य का आगमन महाभारत के ढाई-तीन हजार वर्षों के पश्चात् जगद्गुरु स्वामी शंकराचार्य जी का जन्म हुआ । बाल ब्रह्मचारी, बाल संन्यासी, अद्भुत शास्त्रज्ञ विद्वान् धर्म के उद्धार में प्रवृत्त हुए । ३०-३२ वर्ष की अल्पायु में उनका देहान्त हो गया और वेदों का नाम लेकर जो कदाचार, पशुहिंसा, मद्यपान आदि चलता था वह चलता ही रहा ।
सायणाचार्य का आगमन सायणाचार्य का समय ईसा की १४वीं शताब्दी है, स्वामी शंकराचार्य से लगभग १६०० वर्ष पश्चात् । इस बीच साम्प्रदायिक यज्ञ याग चलता रहा वाममार्गी कर्मकाण्ड प्रचण्ड रूप से चलता रहा ।
सायणाचार्य बुक्क नरेशों के मंत्री थे । विजयनगर गोलकुण्डा के राजा हिन्दु संस्कारों के थे । उत्तर भारत में मुसलमानों का राज प्रबल प्रचण्ड हो रहा था । यहाँ हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहा था । बुक्क नरेश ने सायणाचार्य को हिन्दुओं की धार्मिक पुस्तकों का भाष्य करने के लिए नियुक्त किया । आज से लगभग ६०० वर्ष पूर्व साम्प्रदायिकता, पाखण्ड, धूर्तता और मुसलमानों से बचने के भाव बलवान् हो रहे थे। यही आचार्य सायण के काल की सामाजिक एवं साम्प्रदायिक तथा धार्मिक पृष्ठभूमि है । सो आचार्य सायण के भाष्यों को यथार्थवक्ता, आप्तपुरुष, ऋषियों की कोटि में भी रखा नहीं जा सकता । उनमें तात्कालिक त्रुटियाँ, साम्प्रदायिकता, ऋषि परम्परा से पृथक्ता, सुस्पष्ट है । योगी अरविन्द घोष की सम्मति ध्यान देने योग्य है ।
“यदि कोई विद्वत्तापूर्ण चातुर्य का कोष है, बड़ी भारी विद्वत्ता जो (जैसा कि प्रायः होता है) गम्भीर निर्णायक शक्ति, निश्चित रुचि और यथार्थ समालोचनात्मक, तुलनात्मक निरीक्षण, ऋषियों की साक्षात्
दृष्टि और प्रायः अत्यन्त साधारण बुद्धि से भी दूर और उससे रहित है, जिसमें पूर्व चिन्तितवाद के अनुसार वेदमंत्रों को तोड़मरोड़ कर लगाने का यत्न किया गया है तो यह सायणाचार्य भाष्य है जो बड़ा विशाल, शानदार, प्रथम अपरिष्कृत सामग्री के रूप में इतना उपयोगी और परिश्रम तथा वैदुष्यपूर्ण है ।’
योरूप के विद्वानों की संस्कृत भाषा आदि के सम्बन्ध में ऐसी योग्यता नहीं होती थी कि वे मूलवेदों को समझ सकें । वे प्रायः मध्यकाल के आचार्यों पर, सायणाचार्य, महीधराचार्य आदि के भाष्यों को ही आधार बनाकर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं । कभी-कभी वे इस बात को स्वीकार भी करते हैं । श्री क्लेटन (Claton) सायण को आधार बताते हैं । श्री ग्रीफिथ महीधराचार्य को अपना उपजीव्य बताते हैं ग्रीफिथ ने अपने यजुर्वेद के अनुवाद की भूमिका में स्वीकार किया है
“All that I have attempted to do is to give a faithful translation to the best of my ability, of the texts and sacrificial fromulas of the Vedas, with just sufficient commentary ; chiefly from Mahidhar, to make them intelligible.” ”
अर्थात्, हमने इतना मात्र प्रयत्न किया है कि अपनी पूरी योग्यता सामर्थ्य से यजुर्वेद के मंत्रों और यज्ञ की प्रक्रियाओं का अनुवाद महीधर के भाष्य के आधार पर समझ में आने योग्य कर दिया है ।
महीधराचार्य स्वयं तांत्रिक थे और उनके भाष्यों में पशुहिंसा अश्लीलता आदि को समर्थन देना प्राचीन ऋषियों की परम्परा के विरुद्ध किया गया है । यह सारा साहित्य हजार वर्ष पुराना भी नहीं है उससे वेदों के सिद्धान्त या प्राचीन आर्य परम्परा के सम्बन्ध में कोई सत्य वास्तविक विचार नहीं बन सकता । आर्य परम्परा के लिए उनको आधार बनाना अन्याय है । आज बड़े बड़े मठाधीश, अरबपति धर्मगुरु, सैंकड़ों करोड़ की सम्पत्ति के मन्दिर व धाम निर्माण करवाने वाले चुप हैं। स्वयं को हिंदुओं का हितैषी बताने वाले गौरक्षकों को अपराधी और गौहत्यारों को भाई बताने वाले भी गौरक्षा में बाधा हैं। ऐसे में धर्म की रक्षा कैसे होगी? गोरक्षा के बिना हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना निष्प्राण है।

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betlike giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betlike giriş
betparibu giriş
betebet giriş
norabahis giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betnano giriş
parmabet giriş
piabellacasino giriş
betovis giriş
casinomilyon giriş
casinomilyon giriş
casinomilyon giriş
milanobet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
betgaranti mobil giriş
parmabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
savoybetting giriş
parmabet giriş
jojobet giriş
betlike giriş
betcup giriş
hitbet giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
jojobet giriş
betcup giriş
betebet giriş
betnano giriş
betnano giriş