कित्थे गए सलतान सिकंदर मौत न छोड़े पीर पगंबर

गुरु नानक देव जी कहते हैं :-

रैण गवाई सोय के दिवस गंवाया खाय।
हीरे जैसा जन्म है , कोड़ी बदले जाए ।।
चिड़िया चहकी पहु फटी बगनी बहुत तरंग।
अचरज रूप संतन रचे नानक नाम ही रंग।।

सोते-सोते रात गंवा दी। दिन खाने पीने में गंवा दिया। हीरे जैसे जन्म को छोटी-छोटी बातों में फंसकर समाप्त कर दिया। कहने का अभिप्राय है कि संसार में इन सब छोटे कामों के लिए हम नहीं आए बल्कि बहुत बड़ा वचन देकर आए हैं और वह वचन है कि संसार में आकर परमपिता परमेश्वर के सानिध्य को पाने का। मोक्ष की प्राप्ति हमारे जीवन का उद्देश्य है।

यह तन दुर्लभ तुमने पाया
कोटि जन्म भटका जब खाया।
अब या को विरथा मत खोवो
चेतो छिन छिन भक्ति कमाओ।।

बात गहरी है कि बड़े दुर्लभ संयोग से मानव तन प्राप्त होता है। उसे भी यदि संसार की ऊलजलूल बातों में खो दिया तो फिर समझ लो कि कुछ भी हाथ नहीं आया।

सुरत धन धार री भोग निकाम।
दारा सुत धन मान बड़ाई,यह सब थोथा काम।
लोक प्रतिष्ठा जगत बड़ाई , इनमें नहीं आराम।।

संसार की निस्सारता की ओर संकेत करते हुए बुल्लेशाह जी कहते हैं कि :-

बुल्लया कनक कौड़ी कामिनी तीनों की तलवार।
आए थे नाम जपन को और विच्चे लीते मार ।।

उठ जाग घुराड़े मार नहीं रह सौन तेरे दरकार नहीं।
एक रोज जहानों जाना है जा कबरे विच समाना है।।

तेरा गोश्त कीडयां खाना है कर चेता मार्ग विसार नहीं।
उठ जाग घुराड़े मार नहीं है ऐ सोण तेरे दरकार नहीं।।

वेद कुराना पढ़ पढ़ थक्के,
सजदा कर दयां घस गए मत्थे।
न रब तीरथ न रब मक्के
जिस पाया तिस नूर अनवार ।
इश्क दी नवियो नवी बहार।

संसार की क्षणभंगुरता की ओर संकेत करते हुए बुल्लेशाह जी आगे कहते हैं :-

कित्थे गए सलतान सिकंदर मौत न छोड़े पीर पगंबर।
सब है छडड छडड गए अडंबर कोई रखे पायदार नहीं ।
उठ जाग घुराडे मार नहीं एह सोण तेरे दरकार नहीं।

गुरु रामदास जी का कहना है कि परमात्मा एक है और वह आनंद का स्रोत है। उसी के साथ हमको अपने आपको जोड़ना चाहिए और आनंद की अनुभूति करनी चाहिए।

का तू सोवे जाग दीवाना झूठी जीवन संत करि जाना।
जिन जन्म दिया सो रिजक उमड़ावे
घट घट भीतर रहट चलावे।।
(यहां पर रहट का अर्थ सांसो की पूंजी से है)
करी बंदगी छड़ी में मेरा हृदय करीम संभारी सवेरा।।

जो दिन आवह सो दिन जाही करना कूच रहन थिर नाही।
संग चलत है हम भी चलना दूर गवन सिर ऊपर मरना।।
क्या तू सोइया जाग इआना तै जीवन सच कर जाना।।

तुलसी जी कहते हैं :-

जग जग कहते जुग भये जगा न एको बार ।
जगा न एको बार सार कहो कैसे पावे।।
सोवत जुग-जुग भये संत बिना कौन जगावे।
पड़े भरम के मांहि बंद से कौन छुड़ावे ।।
तुलसी पंडित भेष से सब भूला संसार।
जग जग कहते जुग भया जगा न एको बार।।

नर का जन्म मिलता नहीं गाफिल जरूरी ना रखो।
दिन हो बसेरा वास है आखिर फना मरना सही।।

कुल मिलाकर प्रत्येक संत महापुरुष हमें समय रहते जगाने की ओर संकेत करता है। जो जाग गया उसकी प्रभु में लौ लग जाती है और जिसकी प्रभु में लौ लग जाती है वह जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। संसार के सभी महापुरुषों ने जन्म मरण के चक्र से छुटकारा पाकर परमपिता परमात्मा की अनंत ज्योति में लीन होने के लिए मानव को प्रेरित करने का कार्य किया है। हमें संतो की पवित्र वाणी को हृदय में धारण कर इसी बात पर विचार करना चाहिए कि हम संसार में जिस ‘कोहिनूर’ को पाने के लिए आए थे उसी के लिए समर्पित होकर काम करें। यदि इधर उधर भटक गए तो जीवन व्यर्थ हो जाएगा।

ऋषि राज नागर एडवोकेट

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