वयं राष्ट्रे जागृयामः पुरोहिता:

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वयं राष्ट्रे जागृयामः पुरोहिता:

हम पुरोहित हैं,, हम राष्ट्रदेव को जागृत रखते हैं,, कोई भी राष्ट्र जागृत रहता है उसमें रहने वाली प्रजा से,, वह सोई पड़ी है वह मूढ़ है वह स्वार्थों में घिरी है,,तो आज नहीं कल राष्ट्र भी विपत्तियों में घिर जाएगा,,

वेदमन्त्र है–संशितं म इदं ब्रह्म संशितं वीर्यम बलम l संशितं क्षत्रमजरमस्तु जिष्णुर्योंषामस्मि पुरोहित:–३-१९-१ अथर्ववेद,,–मेरा ज्ञान अत्यंत तीक्ष्ण है,, शत्रुदमन शक्ति और स्वरक्षणबल भी तीक्ष्ण है यानी offensive & defensive system,,, जिन लोगों का मुझ जैसा जयशील अगुआ है,, उन्हें मार्ग दिखाने वाला है,, उनका खुद का यानी मेरे यजमान का भी सामर्थ्य न दबने वाला यानी उग्र यानी आक्रामक यानी शीलयुक्त प्रतिकार करने का बल उनमें भी होगा ही होगा,,

पुरोहित का अर्थ होता है अगुआ,,मार्गदर्शक,, ऐसा मार्ग बताने वाला जो सिर्फ तुम्हारे हित की सोचता है हमेशा,, सदैव तुम्हारा हित चाहता है,,
वैदिक काल में ऐसे ही पुरोहित होते थे,, वेदमन्त्र में पुरोहित ललकार कर कह रहा है कि मेरे होते मेरे यजमानों का पराभव,, पराजय असम्भव है,, मेरे यजमान तलवारों और तीरों से भी ज्यादा तीक्ष्ण हैं,, मैं इन्हें शास्त्र और शस्त्र जुटाने की प्रेरणा देता हूँ,, मैं इनके राष्ट्र को वीरों से भर देता हूँ,, मेरे यजमान के वैरियों की दुर्दशा कर देता हूँ,, अपने यजमानों का प्रत्येक प्रकार से कल्याण करता हूँ,,

वेदमन्त्र तो यह कह रहा है–तीक्षणियांस: परशोरग्नेस्तीक्ष्णतरा उत l इन्द्रस्य वज्रातीक्षणियांसो येषामस्मि पुरोहित:–३-१९-४ अथर्ववेद–जिनका मैं पुरोहित होता हूँ वे परशु से भी अधिक धारदार होते हैं,, अग्नि से भी ज्यादा ताप तेज वाले होते हैं,, इंद्र के वज्र,,यानी आसमानी बिजली से भी ज्यादा तीक्ष्ण होते हैं,,
एक अन्य मंत्र देख लीजिए चाहें तो–एषामहमायुधा सं श्याम्येषाम राष्ट्रं सुवीरं वर्ध्यामि–अथर्ववेद,,
मैं इनके आयुधों को तीक्ष्ण करता हूँ,, इनके राष्ट्र में वीरों को बढ़ाता हूँ,,

नीचै: पद्यन्तामधरे भवन्तु ये न: सूरि मघवानं पृतन्यान,, क्षिणामी ब्रह्मणा मित्रानुन्नयामि स्वानहम–अथर्ववेद–जो विधर्मी कुधर्मी हमारे ज्ञानी धीर यजमान से फसाद करें झगड़ा करें,,वे नीचे उसके पैरों में गिरें,, तुच्छ होवें,, मैं पुरोहित हूँ,, ज्ञान द्वारा शत्रुओं को नष्ट करता हूँ और अपनों को ऊपर उठाता हूँ,,,

एक पुरोहित के ही इतने तेजस्वी वचन हो सकते हैं–समहमेषाम राष्ट्रं स्यामि समोजो वीर्यं बलम l वृश्चामी शत्रुणा बाहूननेन हविषाहम–अथर्ववेद,,–मैं इनके राष्ट्र को एकरूप देता हूँ,, जैसे आचार्य चाणक्य ने दिया,, वे थे असली वैदिक पुरोहित,, इनके ओज, तेज, बल को मैं एकता प्रदान करता हूँ,, जैसे #योगीजी कर रहे हैं,, एक सच्चे वैदिक पुरोहित की तरह,, मैं अपने हवन से,, राष्ट्रयज्ञ से शत्रु की भुजा काटता हूँ,,,

राष्ट्र के पतन में जहां अनेकों कारण विद्यमान होते हैं वहां मरे गिरे आत्महीन निर्वीय पुरोहित भी एक कारण हैं,, जिनमें खुद ही अग्नि नहीं बची वे दूसरों में कहां लपट भरेंगे,,,

इसलिए हे पुरोहितों,,दीपक घण्टी तक सीमित न रह जाना,, अगरबत्ती लगाने और मंत्र बड़बड़ाने मात्र को पौरोहित्य मत मान बैठना,,कुछ तेजस्विता,, कुछ प्राण समाज में भरने का कार्य करो,,जागो,, राष्ट्रदेव को जागृत करो,, इसके बल को,, इसके तेज को जगाओ,, इसकी संतानों के हृदयों की सुप्त पड़ी अग्नि को धधका दो,,, धमनियों में रक्त दौड़ा दो,,

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