‘मानव मस्तिष्क और भांग ‘

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*क्या आदियोगी भगवान शिव भांग का सेवन करते थे*?

भारतवर्ष में भांग के पौधे से अधिकांश जन परिचित है। पहाड़ हो या मैदान उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत भांग का पौधा खेतों की मेड, नदी -नालों’ जलीय स्रोतों के किनारे दिख ही जाता है। संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी में भांग के दर्जनों नाम है। अंग्रेजी मे कैनाबिस सटाइवा , कैनाबिस इंडिका, वीड ,हेम्प के नाम से पुकारते हैं तो संस्कृत में इसके विजया, जया ,हर्षनि ,मोहिनी जैसे नाम हैं। इसका पौधा नर व मादा पौधे के रूप में उगता है। जैसा कि इसके संस्कृत नाम हर्षनि ,मोहिनी से जाहिर है यह कोई आम पौधा नहीं है…. पौधों की बिरादरी में सबसे वैश्विक स्तर पर बदनाम पौधा है, भांग । भांग एक ‘साइकोएक्टिव’ पौधा है अर्थात इसकी पत्ती ,राल, पुष्पों में ऐसे रसायन पाए जाते हैं जो मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को प्रभावित, बाधित करते हैं। भांग की पत्तियों को हाथ से रगड़ने पर जो काला चिपचिपा पदार्थ प्राप्त होता है उसे हशीश (चरस)कहते हैं। मादा भांग के पौधे के पुष्पों को सुखाकर जो प्राप्त होता है उसे गांजा कहते हैं। हसीस और गांजा भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों में पूरी तरह प्रतिबंधित है इनकी तस्करी सार्वजनिक तौर पर इनका सेवन दंडनीय अपराध है । यूं तो भांग के पौधे में 300 से अधिक रसायन पाए जाते हैं लेकिन 1 रसायन है जो भांग को भांग बनाता हैं राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके प्रतिबंध का कारण है । वह रसायन है टेट्रा हाइड्रो कैनाबिनोल जिसे THCकहते हैं। न्यूरो साइंस की भाषा में विज्ञान की भाषा में इसे कैनाबीनोएड कहते हैं। यह भांग के पौधे से प्राप्त वनस्पतिक रसायन है जो मानव मस्तिष्क के साथ खिलवाड़ करता है। यह रसायन चरस की अपेक्षा गांजे में अधिक पाया जाता है नतीजा गांजा अधिक नशीला होता है। भांग के मस्तिष्क पर प्रभाव से पहले मानव शरीर मस्तिष्क को समझना होगा। मानव मस्तिष्क बेहद अनूठा जटिल अंग है। तंत्रिका वैज्ञानिकों ने इसे अध्ययन की सुविधा के लिए अनेक भागों में विभाजित कर रखा है। मस्तिष्क के ये हिस्से सीखने समझने, सुख की अनुभूति, वाद विवाद का कौशल ,स्मृति ,संतोष की अनुभूति, वातावरण का एहसास, सोने जागने, बैठने, उठने में नियंत्रण, ताप -दाब का अनुभव जैसे नैसर्गिक व्यवहार व्यवस्थाओं के लिए जिम्मेदार है। साथ हीभूख प्यास को नियंत्रित करते हैं। मस्तिष्क के इन हिस्सो को सेरेब्रल कॉर्टेक्स, एम्माइ गडेला, हिप्पोकेंपस, टेंपेरल लोब फ्रंटियर लोब आदि आदि कहते हैं। मानव मस्तिष्क खरबो कोशिकाओं से मिलकर बना है जिन्हें न्यूरॉन्स कहते हैं । मस्तिष्क की प्रत्येक कोशिका अपने आसपास की दूसरी कोशिका के लिए उपरोक्त उल्लेखित व्यवहारों व्यवस्थाओं को नियंत्रित संचालित करने के लिए विशेष रसायन ग्रहण करती हैं, छोड़ती हैं जिन्हें न्यूरोट्रांसमीटर कहते हैं। मस्तिष्क के प्रत्येक हिस्से में स्थित कोशिका के ऊपर कुछ विशेष रिसेप्टर होते हैं जो इन रसायनों को ग्रहण करते हैं उन रिसेप्टर्स को ‘कैनाबीनोएड रिसेप्टर’ कहते हैं ।वर्ष 1982 में इन्हें खोजा गया है यह रिसेप्टर ही आनंद सुख भूख प्यास तापमान की अनुभूति के लिए जिम्मेदार रसायनों को ग्रहण करते हैं। cb1 रिसेप्टर इन्हें कहते हैं। अब भांग पर लौटते हैं और भांग को भांग बनाने वाले उस रसायन ट्रैटराहाइड्रो कैनाबिनोल की बात करते हैं यह टेट्रा हाइड्रो कैनाबिनोल अर्थात THC ऐसा ही न्यूरोट्रांसमीटर है जो मानव शरीर से बाहर भांग के पौधे में पाया जाता है। जिसे वर्ष 1964 में खोजा गया था। कार्बन के 21 हाइड्रोजन के 30 ऑक्सीजन के 2 परमाणुओं से मिलकर यह THC कितना आश्चर्यजनक! है यह सब? परमात्मा ने प्रकृति विभिन्न तत्वों से कैसे कैसे अजीबोगरीब दिव्य पदार्थ रच डालें है। सांख्य दर्शन के रचयिता महर्षि कपिल हजारों वर्ष पूर्व कह चुके थे कि यह जगत के सूक्ष्म कण सत, रज, तम विज्ञान जिन्हे एलिमेंट कहता है.. क्रम से सुख-दुख, मोह, नशा उत्पन्न करने वाले हैं। जगत के इन 3 त्रिगुण तत्व में ही आधुनिक रसायन विज्ञान के सभी 100 से अधिक तत्व समाहित हैं । सचमुच ऋषि क्रांति दर्शी होते हैं, दर्शनों का विषय बहुत गूढ गंभीर होता है। हम और आप तो चर्चा भांग की ही करते हैं जब कोई भांग के सेवन का आदी व्यक्ति उसे आप भंगेडी कहे,गंजेडी या चरसी कहे भांग के उत्पाद चरस गांजा का सिगरेट बीड़ी आदि में तंबाकू के साथ मिलाकर धूम्रपान के रूप में सेवन करता है तो चंद सेकंडो में ही THC रसायन से मिश्रित धुआं फेफड़ों में पहुंचकर रक्त में मिश्रित होते हुए मस्तिष्क के ब्लड ब्रेन बैरियर को पार कर मस्तिष्क के cb1 जैसे रिसेप्टर से चिपक जाता है साथ ही THC रसायन खुशी, मानसिक, सजगता प्रसन्नता, वाक् चातुर्य ,भूख प्यास दर्द को नियंत्रित करने वाले हिस्से को को सजग उत्तेजित क्रियाशील कर देता है। कुछ घंटे के लिए उस व्यक्ति की चिंता अवसाद घबराहट मानसिक शारीरिक व्याधियों छूमंतर हो जाती है। ऐसा व्यक्ति सातवें आसमान की यात्रा करने लगता है। मानसिक तौर पर वह अधिक एकाग्र हो जाता है आंखें अधिक स्पष्ट विजन को देखने लगती हैं। शराब अन्य ड्रग्स सिगरेट के नशे से अलग होता है यह नशा। साइकेट्रिस्ट इसे ‘हाई’ कहते हैं। ऐसा व्यक्ति अपने आप को दुनिया में सर्वाधिक बुद्धिमान खुश सुखी तृप्त अनुभव करता है इसमें सच्चाई भी है लेकिन यह सुख ना होकर सुख का आभास है। भांग के नशेडीयो की मंडली को कभी देखिए आप खुद- ब- खुद समझ जाएंगे। कितने प्रेम से एक ही सिगरेट सुल्फे से कश लगाते हैं बिना कोई बखेड़ा किये उनके चेहरे पर कितना संतोष प्रतीत होता है ।ऐसा व्यक्ति पलायन वादी निष्क्रिय होता है हमारे आज कुछ धार्मिक स्थलों पर ऐसे ही कथित बाबाओं का जमघट होता है वर्चस्व होता है भांग के इस प्रसाद को बाटकर वह अपने समर्थक भी जुटा कर रखते हैं। कथित बाबा भांग के कारण बड़े हाजिर जवाब पहुंचे हुए नजर आते हैं जब कोई उनसे कहता है बाबा जी यह आप क्या कर रहे हैं? यह नुकसानदायक है तो कहते हैं बच्चा हमसे कुछ ना बोलो? हम जगत की मोह माया से अलग है यह भांग ही सारे करतब उसके दिमाग में दिखा रही होती है आम लोग समझते हैं भोले-भाले लोग बाबा बड़े पहुंचे हुए सिद्ध योगी है। शुरुआती अवस्था में भांग का आदी भांग का सेवन करने वाला कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी एक पहलवान जितनी खुराक खा लेता है क्योंकि भांग का यह THC रसायन भूख के लिए जिम्मेदार रिसेप्टर को भी प्रभावित करता है। धीरे-धीरे यह रसायन मस्तिष्क के रिसेप्टर को क्षतिग्रस्त कर देता है व्यक्ति का जीवन साक्षात नरक बन जाता है अब भांग भी उसे सुख नहीं देती या तो व्यक्ति मानसिक रोगी बनेगा या आत्महत्या कर लेगा या किसी अन्य शारीरिक विकार से ग्रसित हो जाएगा भांग के दुष्प्रभावों की सूची बहुत लंबी है फिर कभी उनका उल्लेख किया जाएगा। कुछ लोग कहेंगे क्यों जी जो लोग भांग का सेवन नहीं करते जैसे कि मैं और आप वह व्यक्ति भी दिन के कुछ हिस्से जीवन में सुखी संतोषी नजर आते हैं स्मृति विचार एकाग्रता उनमें भी होती है। भूख प्यास सर्दी गर्मी का एहसास उन्हे भी होता है फिर उनका मस्तिषक किस रसायन से काम कर रहा है? विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया के 50 करोड लोग भांग के नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं इनमें सर्वाधिक भारतवर्ष में है दूसरे दूसरे नंबर पर अमेरिका है जिसके 5 करोड लोग भांग का सेवन करते हैं वहां इसे मेरिजुआना कहते हैं। अमेरिका को विवश होकर उसके दो तिहाई राज्यों में भांग के नशे उत्पादों को लीगल करना पड़ा इसमें भी स्कूली छात्र अधिक है अब करोड़ों लोगों को कैद में तो नहीं डाल सकते’ मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ अपने यहा भी कथित वीवीआइपी की बात करें तो अभिनेता शाहरुख खान के सुपुत्र आर्यन खान को नींद नहीं आती थी क्रूज पर गांजा बरामद उसके पास से हुआ था। शेष 650 करोड की आबादी भांग का सेवन नहीं करती फिर उनका मस्तिष्क कैसे क्रियाशील होता है उनके लिए कौन सा रसायन जिम्मेदार है तो उनके लिए अवगत कराना चाहूंगा कि वर्ष 1992 में चेक गणराज्य के एनालिटिकल केमिस्ट लुमीर हानुस, अमेरिकन मौलिकूलर फार्माकोलोजिस्ट विलियम एंथनी इजराइल की हिब्रू यूनिवर्सिटी की प्रयोगशाला में अनूठे केनाबोनाइड रसायनिक मॉलिक्यूल की खोज की जो पूरी तरह प्राकृतिक है मानव शरीर में ही उत्पन्न होता है मानव शरीर में ही जिस का निपटारा होता है। वैदिक संस्कृति पर गर्व करने वाले व्यक्तियों को जानकर हर्ष की अनुभूति होगी बगैर भांग का सेवन किए इस अनूठे रसायन को नाम दिया गया मस्तिष्क पर इसके सुखद प्रभाव स्वरूप आनंदएमाइड (Anandamide)। इसका पहला अक्षर ही आनंद है अर्थात यह फीलिंग ऑफ जॉय ,प्लेजर को मस्तिष्क में उत्पन्न करता है। धैर्य स्मृति निर्णय क्षमता के लिए यही रसायन जिम्मेदार है। दर्शअसल जब THC को खोजा गया था तो वैज्ञानिकों ने तभी अनुमान लगा लिया था कि यह भांग में पाए जाने वाले रसायन जरूर ना जरूर मानव शरीर में बनने वाले किसी रसायन की नकल कर ही मानव मस्तिष्क को धोखा दे रहा है और सचमुच ऐसा सच साबित हुआ ‘आनंदएमाइड’ न्यूरोट्रांसमीटर कि सनरचना से मिलता-जुलता यह बहरूपिया THC रसायन मस्तिष्क में प्रवेश कर जाता है। मस्तिष्क को धोखा देकर शरीर के साथ खिलवाड़ करता है। यह सब कुछ कितना चौंकाने वाला है नकली को 1964 में ही खोज लिया गया और असली देवता स्वरूप रसायन को 1992 में खोजा गया। आज आनंदअमाइड जैसे दर्जनों रसायनो को खोज लिया गया है तो मस्तिष्क के संचालन के लिए जिम्मेदार है। इतना ही नहीं सेंट्रल नर्वस सिस्टम के अधीन एंडोकैन्नबीनोएड सिस्टम पूरा शरीर में खोजा जा चुका है।

भांग का सेवन करने वाले अधिकांश नशेड़ी व्यापक तर्क देते हैं भांग को भोले बाबा का प्रसाद बताते हैं उन से पूछे क्या उनके बाप दादा ने आदियोगी शिव को भांग पीते देखा था या सुल्फा बना कर दिया था दुष्टों का यह षड्यंत्र था कि अपने व्यसन को धार्मिक स्वीकारयीता प्रदान की जाए तो कोई उन पर उंगली नहीं उठाएगा हिंदूत्व को ऐसे नशेडी आलसी प्रमादीयो ने बहुत हानि पहुंचाई है विधर्मी मलेछ हमारे भगवान महापुरुषों की हंसी उड़ाते हैं। उल्लेखनीय होगा कि शैव मत के आधार ‘शिव महापुराण’ में उसकी सभी संहिता , खंडों 25000 के लगभग श्लोकों में कहीं भी यह उल्लेख नही है कि भगवान शिव भांग खाकर या धूम्रपान के रूप में भांग का सेवन करते थे। अपितु यह तो उल्लेख मिलता है शिव अस्त्रों शस्त्रों के अनुसंधानकर्ता थे महान योगी की पदवी मिली है । रामायण महाभारत जैसे ग्रंथों में भी इस का उल्लेख है। यह संभव हो सकता है भगवान शिव जी योग प्राणायाम की क्रियाओं द्वारा प्राकृतिक आनंदएमाइड जैसी ज्ञात अज्ञात रसायनों की मात्राओं को रक्त में उच्च स्तर तक ले जाते थे। जिनके कारण उनका चित्त एकाग्र प्रसन्न समाधि में सहायक रहता था । शिव ज्ञान के नशे में डूबे रहते थे ना कि भांग के नशे में। यह आज भी संभव है योग शरीर के रसायन न्यूरोट्रांसमीटर को इनके स्त्राव के लिए जिम्मेदार तंत्र को ठीक कर सक्रिय करता है। विभिन्न मेडिकल स्टडीज में यह सिद्ध हो रहा है
आर्य सागर खारी✍✍✍

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