तमिल सिनेमा और साहित्य में अतुलनीय योगदान रहा है एम करुणानिधि का

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रेनू तिवारी 

करुणानिधि का राजनीति प्रभाव केवल उनके राज्य तक ही सीमित नहीं था। उनकी ताकत की धमक राष्ट्रीय राजधानी नयी दिल्ली में सत्ता के गलियारों तक थी और इसी के बल पर उन्होंने कभी कांग्रेस के साथ तो कभी भाजपा के साथ गठबंधन करके उसे सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।

भारत के मशहूर लेखकों में से एक मुथुवेल करुणानिधि ने तमिलनाडु की राजनीति भी अपनी ही कलम से लिखी थी, और यह कलम ऐसी चली कि राज्य की राजनीति बदलती रही लेकिन लेखन की छाप आज भी तमिलनाडु की राजनीति में दिखाई देती हैं। दो दशकों तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करने वाले एम करुणानिधि ने गरीबों के लिए काफी काम किया था। राज्य में उनकी सरकार गरीबों के लिए मसीहा बनकर आयी थी। राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय रूप से उन्हें ‘कलैग्नर’ (कलाकार) और तमिल साहित्य में उनके योगदान के लिए ‘मुत्तमीज़ अरिग्नार’ (तमिल विद्वान) के रूप में जाना जाता था। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में उनका सबसे लंबा कार्यकाल 6,863 दिनों का था। वह द्रविड़ आंदोलन के लंबे समय से नेता और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम राजनीतिक दल के दस बार अध्यक्ष भी थे। 1957 में अपनी पहली जीत के बाद से 13 बार जीतकर करुणानिधि के पास तमिलनाडु विधानसभा का चुनाव कभी नहीं हारने का रिकॉर्ड है।

तमिल साहित्य और सिनेमा में अपने अतुल्य योगदान के लिए जाने जाते थे करुणानिधि 
राजनीति में आने से पहले उन्होंने तमिल फिल्म उद्योग में पटकथा लेखक के रूप में काम किया। उन्होंने तमिल साहित्य में भी योगदान दिया, जिसमें कहानियां, नाटक, उपन्यास, और एक बहु-खंड संस्मरण हैं। दक्षिण भारत की कम से कम 50 फिल्मों की कहानियां तथा संवाद लिखने वाले करुणानिधि की पहचान एक ऐसे राजनीतिज्ञ के तौर पर थी जिसने अपनी लेखनी से तमिलनाडु की तकदीर लिखी। तेज तर्रार, बेहद मुखर करुणानिधि ने जब द्रविड़ राज्य की कमान संभाली तो उन्होंने कई दशक तक रुपहले पर्दे पर अपने साथी रहे एम जी रामचंद्रन तथा जे जयललिता को राजनीति में पछाड़ दिया। उनके अंदर कला तथा राजनीति का यह मिश्रण शायद थलैवर (नेता) और कलैग्नार (कलाकार) जैसे उन संबोधनों से आया जिससे उनके प्रशंसक उन्हें पुकारते थे।
करुणानिधि के राजनीति प्रभाव ने बदली तमिलनाडु की राजनीति
करुणानिधि का राजनीति प्रभाव केवल उनके राज्य तक ही सीमित नहीं था। उनकी ताकत की धमक राष्ट्रीय राजधानी नयी दिल्ली में सत्ता के गलियारों तक थी और इसी के बल पर उन्होंने कभी कांग्रेस के साथ तो कभी भाजपा के साथ गठबंधन करके उसे सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि इसके लिए उन्हें कटु आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। आलोचकों ने उन्हें मौकापरस्त तक कह दिया।

करुणानिधि का राजनीतिक जीवन 
मुथुवेल करुणानिधि के राजनीतिक जीवन की शुरूआत 1938 में तिरूवरूर में हिन्दी विरोधी प्रदर्शन के साथ शुरू हुई। तब वह केवल 14 साल के थे। इसके बाद सफलता के सोपान चढ़ते हुए उन्होंने पांच बार राज्य की बागडोर संभाली। ई वी रामसामी ‘पेरियार’ तथा द्रमुक संस्थापक सी एन अन्नादुरई की समानाधिकारवादी विचारधारा से बेहद प्रभावित करुणानिधि द्रविड़ आंदोलन के सबसे भरोसेमंद चेहरा बन गये। इस आंदोलन का मकसद दबे कुचले वर्ग और महिलाओं को समान अधिकार दिलाना था, साथ ही यह आंदोलन ब्राह्मणवाद पर भी चोट करता था।
जब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनें थे करुणानिधि
फरवरी 1969 में अन्नादुरई के निधन के बाद वी आर नेदुनचेझिएन को मात देकर करुणानिधि पहली बार मुख्यमंत्री बने। उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में एम जी रामचंद्रन ने अहम भूमिका निभाई थी। वर्षों बाद हालांकि दोनों अलग हो गए और एमजीआर ने अलग पार्टी अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम (अन्नाद्रमुक) की स्थापना की। करुणानिधि 1957 से छह दशक तक लगातार विधायक रहे। इस सफर की शुरूआत कुलीतलाई विधानसभा सीट पर जीत के साथ शुरू हुई तथा 2016 में तिरूवरूर सीट से जीतने तक जारी रही। सत्ता संभालने के बाद ही करुणानिधि जुलाई 1969 में द्रमुक के अध्यक्ष बने और अंतिम सांस लेने तक वह इस पद पर बने रहे। 
भ्रष्टाचार के आरोपो को भी झेला
इसके बाद वह 1971, 1989, 1996 तथा 2006 में मुख्यमंत्री बने। उन्हें सबसे बड़ा राजनीतिक झटका उस वक्त लगा जब 1972 में एमजीआर ने उनके खिलाफ विद्रोह करते हुए उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया तथा उनसे पार्टी फंड का लेखा जोखा मांगा। इसके बाद उस साल एमजीआर को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। एमजीआर ने अलग पार्टी अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम (अन्नाद्रमुक) की स्थापना की और आज तक राज्य की राजनीति इन्हीं दो पार्टियों के इर्द गिर्द ही घूम रही है।
एमजीआर की अगुवाई में अन्नाद्रमुक को राज्य विधानसभा चुनावों में 1977, 1980 और 1985 में जीत मिली। एमजीआर का निधन 1987 में हुआ और तब तक वह मुख्यमंत्री रहे। इस दौरान करुणानिधि को धैर्य के साथ विपक्ष में बैठना पडा़। इसके बाद 1989 में उन्होंने सत्ता में वापसी की। राजनीति में न तो स्थाई दोस्त होते हैं और न ही दुश्मन, इस कहावत को चरितार्थ करते हुए करुणानिधि ने कई बार कांग्रेस को समर्थन दिया। केंद्र की संप्रग सरकार में द्रमुक के अनेक मंत्री रह चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने भाजपा की अगुवाई वाले राजग को भी समर्थन दिया तथा अटल बिहारी वाजपेई कैबिनेट में भी उनके कई मंत्री थे। 
उन्होंने अपनी पहली फिल्म राजकुमारी से लोकप्रियता हासिल की। उनके द्वारा लिखी गई पटकथाओं में राजकुमारी, अबिमन्यु, मंदिरी कुमारी, मरुद नाट्टू इलावरसी, मनामगन, देवकी, पराशक्ति, पनम, तिरुम्बिपार, नाम, मनोहरा आदि शामिल हैं।

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