भगवान राम की अप्रतिम महिमा के संदर्भ में :-

सत्य शील और सोम्यता,
से भूषित श्रीराम ।
जिसमें हों ये विभूतियाँ,
पावै मुक्ति-धाम॥1685॥

भावार्थ:- भगवान राम का व्यक्तित्व अप्रतिम है, मर्यादा से परिपूर्ण है, जीवन के हर क्षेत्र में उन्होंने मर्यादा का पालन करके उन्होंने उत्कृष्ट आदर्श उपस्थित किया है। चाहे गुरु के प्रति शिष्य – धर्म हो, पितृ – धर्म हो, पत्नीव्रता – धर्म हो, शरणागत की रक्षा का धर्म हो, मित्रता का धर्म हो, पतितों का उद्धार करने का धर्म हो, रघुकुल की उच्च परंपराओं को अक्षुण्ण रखने का धर्म हो, अथवा राज धर्म हो, शिव-धनुष को तोड़ने पर परशुराम के आक्रोश का भाजन बनने पर भी अपनी सौम्यता और शालीनता को कायम रखना। मेघनाथ का शव उसकी धर्मपत्नी सुलोचना को देकर उसे ससम्मान लौटाना, नारी सम्मान की रक्षा करना, अद्वितीय उदाहरण है। बचपन में पिता द्वारा महर्षि विश्वामित्र के आश्रम की रक्षार्थ आदेश पाकर तथा राज्याभिषेक के समय वन गमन का आदेश पाकर कोई प्रतिरोध न करना अथवा पुनर्विचार तक के लिए भी न कहना, चित्रकूट में भैया भरत के आग्रह और माता कैकेयी के पश्चाताप के बावजूद भी पिता को दिए वचनों पर अडिग रहना यह सत्य के प्रति समर्पण का दुर्लभ उदाहरण है। भगवान श्री राम के व्यक्तित्व में ऐसे एक नहीं अनेक दिव्य गुण हैं जो उन्हें विलक्षण बनाते हैं। यदि सामान्य मनुष्य सत्य, शील और सोम्यता के विलक्षण गुणों से अलंकृत हो जाये तो वह जीवन्मुक्त हो सकता है,ब्रह्य में अवगाहन कर सकता है अर्थात् मोक्ष-धाम को प्राप्त हो सकता है।
क्रमशः

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