अपने आप को विदेशी आक्रमणकारियों की औलाद कहने वालों का विरोध होना ही चाहिए

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सिद्धार्थ ताबिश की फेसबुक वॉल से

“मेरा संबोधन सारी कौम या समूची जाति के लिए नहीं होता। जो भी इस तरह के बयान से ‘सहमति’ रखते हैं, मेरे सवाल, घृणा या कटाक्ष सिर्फ उन्हीं के लिए होते हैं, न कि ‘मजहब’ को मानने वाले समूचे लोगों के लिए।”

मेरी पोस्ट किसी व्यक्ति द्वारा दिए गए विवादित बयान, टिप्पणी या पोस्ट पर आधारित होती है। मेरा संबोधन सारी कौम या समूची जाति के लिए नहीं होता। जो भी इस तरह के बयान से ‘सहमति’ रखते हैं, मेरे सवाल, घृणा या कटाक्ष सिर्फ उन्हीं के लिए होते हैं, न कि ‘मजहब’ को मानने वाले समूचे लोगों के लिए। लेकिन आतंकवाद, कट्टरता और हिंसा का बचाव करने वाले हमेशा से जानते हैं कि उन्हें क्या करना है?
उनका काम हर विरोध व हर बात को कौम से जोड़कर सच बोलने वालों के विरुद्ध सबको एकजुट करना और उसे एक खास ‘कौम’ या जाति का दुश्मन साबित करना होता है। जो भी यह कहे कि उसकी कौम ने 800 साल तक भारत पर राज किया और उसकी यह बात समूचे बहुसंख्यक समाज व देश के विरुद्ध हो, तो आप उसे क्या जवाब देंगे? यह बयान किसी भी तरह से देशहित में है? सोचकर देखिए, यदि आप हिंदू घर में जन्मे होते और कोई आपके सामने औरंगजेब को रहमतुल्लाह अलैह बोलता तो आपको कैसा लगता? कैसे कोई बहुसंख्यक औरंगजेब जैसों को अपना मान सकता है? थोड़ा सोचकर देखिए? उनके नजरिये से इसे देखने की कोशिश कीजिए।
इस्राएल यदि कुछ फिलिस्तीनियों को मार देता है तो आप यहां भारत में बैठकर छाती पीटते हैं, जबकि फिलिस्तीनियों से आपका कोई रिश्ता नहीं है, सिवाय मजहब के। रोहिंग्या जुल्म करें और अपने देश से भगा दिए जाएं तो आप छाती पीटते हैं। जिन हमलावरों की वजह से सारा अफगानिस्तान, ईरान, कश्मीर खाली हो गया और मूर्तिपूजकों की पीढ़ियां भगा दी गर्इं, उन्हीं हमलावरों ने भारत में भी उन पर खूब जुल्म किया। आप भारत में बैठकर उन हमलावरों का बचाव करते हैं और उन्हें अपना पूर्वज बताते हैं। उन्हें सेक्युलर साबित करने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं तो किस बहुसंख्यक के दिल में नफरत नहीं भरेगी? थोड़ा सोचकर देखिए।
जो भारत पर आक्रमण करने वालों को अपना पूर्वज बताए, उसका सख्त शब्दों में खुलकर विरोध कीजिए। यदि ढंग से विरोध होने लगेगा तो आने वाला समय आपकी पीढ़ियों के लिए आसान और मुहब्बत भरा होगा। हमको मत देखिए कि मैंने मौलाना का वीडियो डाल दिया और नफरत फैल गई, बल्कि यह देखिए कि उस समय मस्जिद में बैठे जितने लोग उस मौलाना के कहने पर नारे लगा रहे थे, उनकी पीढ़ियों की जिंदगी भ्रम, भय और नफरत में ही कटेगी।
कौम वालों ने यदि शुरू से आतंकवाद का विरोध किया होता, तो आज यह नौबत ही नहीं आती। आप न तो यहां जलील हो रहे होते और न ही विदेशों में। 1400 साल से आप यही करते आए हैं। जो आपके मजहब की कुरीतियों, हिंसा और अत्याचार के खिलाफ बोले, उसे या तो मार देंगे या चुप करा देंगे। अब यह चलन बदलिए, क्योंकि इंटरनेट ने आपकी ‘शांति’ की अवधारणा को ‘नंगा’ कर दिया है। बच्चा-बच्चा अब सब कुछ जानता व समझता है।
कश्मीर की समस्या राजनीतिक नहीं
कश्मीर की समस्या कभी भी राजनीतिक नहीं थी। यह हमेशा से ‘मजहबी’ थी और ‘मजहबी’ है। जो इसे राजनीतिक बताए, समझिये वह ‘आधा सच’ बताकर आपको भटका रहा है। कश्मीर में अलगाववाद की जड़ ‘मजहबी मानसिकता’ है। इस पर लीपा-पोती करना ‘सच’ से मुंह फेरना है। सैकड़ों मंदिरों के खंडहर, हजारों जुल्म की दास्तान… यह सब ‘राजनीतिक’ थी? नहीं, कभी नहीं। जिस ‘बुतशिकन’ वाली मानसिकता ने भव्य मंदिरों को खंडहरों में तब्दील किया, उसी मानसिकता ने ‘कश्मीरी पंडितों’ पर जुल्म किए और उन्हें बेघर किया।
सोचिये! कभी किसी अंसारी, खान, सय्यद इत्यादि
कश्मीर से क्यों नहीं भागे या भगाए गए? सिर्फ पंडित ही
क्यों? यह राजनीतिक वजह थी कि धर्म देखकर लोगों को भगाया गया?

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