सुभाषवादी सोच से ही देश को मिली थी आजादी

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इंजीनियर श्याम सुन्दर पोद्दार,महा मन्त्री, वीर सावरकर फ़ाउंडेशन                         ———————————————
गांधी की दोरंगी नीतियों से वैसे तो इतिहास भरा पड़ा है पर उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ जिस प्रकार का दुर्भाव पूर्ण बर्ताव किया था वह तो सिर्फ एक राष्ट्रवादी को आज तक अखरता है । उस समय कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस और गांधी के परम शिष्य सीतारमय्या आमने सामने खड़े थे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस कांग्रेसमें उस समय इतने अधिक लोकप्रिय थे कि उन्हें गांधी जी के शिष्य की अपेक्षा 205 मत अधिक मिले। जिससे वह शानदार ढंग से विजई घोषित कर दिए गए। गांधीजी इस जीत को पचा नहीं पाए और उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए इस प्रकार के हालात पैदा कर दिए कि उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा।
   अपनी मनमानी चलाने के लिए गांधी ने यह भी निर्णय कर लिया कि यदि नेताजी सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस में रहे तो उनके लिए संकट पैदा करते रहेंगे। इसलिए उन्होंने उन्हें कांग्रेस से ही निष्कासित करवा दिया ।
उस पराजित मानसिकता की हालत में सुभाष बाबु अद्वितीय क्रांतिकारी व उस समय के हिन्दु महासभा के अध्यक्ष वीर सावरकर से मिलने बम्बई गये। सावरकर जी ने पहले उनसे पूछा फ़ारवर्ड ब्लॉक नेता के रूप में आप क्या करना चाहते हैं ? सुभाष बाबु ने सावरकर जी को कहा- मै होलवेल की मूर्ति तोड़ूँगा।
   सावरकर जी ने सुभाष बाबु को जवाब दिया तब तो अंग्रेज सरकार आपको गिरफ़्तार कर जेल में डाल देगी। सुभाष बाबु ने हां में उत्तर दिया। तब सावरकर जी ने जवाब दिया इस तरह तो अंग्रेजों को कभी भी यहां से भगा नहीं जा सकेगा। मेरा मानना है कि अंग्रेजों को भगाने के लिए हमें उन पर प्रबल प्रहार करना चाहिए । तभी देश आज़ाद हो सकेगा। इसके साथ-साथ सावरकर जी ने सुभाष बाबू को यह भी सलाह दी कि तुम विदेश जाकर रासबिहारी बोस से मिलो। जिन्हें इस समय अपने संगठन के लिए एक नेता की आवश्यकता है।
   सावरकर जी के इस प्रकार के शब्दों में नेताजी पर चमत्कारिक प्रभाव किया । वह अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंक कर देश से निकल गए और सीधे जर्मनी जा पहुंचे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस जर्मनी से जापान पहुँचे व जापान हिन्दु महासभा के अध्यक्ष रासबिहारी बोस से भारतीय राष्ट्रीय सेना की कमान ली व देश को आज़ाद किया। उसी प्रकार आज का हिन्दु समाज मुस्लिम आक्रमणों से जर्जर है। हमें अपनी सोच को बदलना होगा । यदि हम हिन्दु समाज को बचाना चाहते हैं तो हमें चुपचाप मुसलमानो के अत्याचार सहने के बजाय आक्रामक होना पड़ेगा। इसी मार्ग का अनुसरण करके शिवाजी ने ने हिन्दु समाज पर मुग़लिया अत्याचारों को ख़त्म ही नही  किया बल्कि हिन्दु साम्राज्य भी बनाया।
    आज हमें प्रत्येक क्षेत्र में देश के सामने खड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए फिर सुभाष बनना पड़ेगा। क्योंकि हिंद अभी भी आजाद नहीं है। हिंदू को हम तभी हिंदू मानेंगे जब हिंदू राष्ट्र होगा। जिसके लिए अभी एक नई क्रांति की आवश्यकता है क्योंकि अभी देश पूर्णतया आजाद नहीं हुआ बस इतना परिवर्तन हुआ है कि गोरे अंग्रेज यहां से चले गए और काले अंग्रेजों ने देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है।

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