लाखों स्वतंत्रता सैनानियों की हत्या कर दी थी बलबन ने

गयासुद्दीन बलबन गुलाम वंश का सबसे प्रमुख सुल्तान था। नासिरूद्दीन के शासन काल में वह मुख्य सेनापति था और तब उसकी शक्ति में पर्याप्त वृद्घि हो गयी थी। बदायूंनी का कथन तो यह भी है कि सुल्तान नासिरूद्दीन ने राज्यसिंहासन पर बैठते ही उलुघ खां की उपाधि बलबन को दी थी और इस उपाधि को देते समय घोषणा कर दी थी-”मैंने शासन तंत्र तुम्हारे हाथों में दे दिया है। कोई ऐसा कार्य मत करना जिससे मुझे और तुमको ईश्वर के सम्मुख लज्जित होना पड़े।”
वास्तव में सुल्तान नासिरूद्दीन के इस कथन का अभिप्राय यह था कि ”उलुघ खां! तुम्हें मेरे प्रति निष्ठावान रहना होगा, किसी षडयंत्र में सम्मिलित होकर मेरी हत्या का कारण मत बन जाना, क्योंकि मैं पहले ही तुम्हें पर्याप्त शक्तियों से सुभूषित कर रहा हूं।” सुल्तान के इस कथन का बलबन पर प्रभाव पड़ा और यह बलबन जैसे कृतज्ञ सेनापति के रहते ही संभव हो पाया था कि नासिरूद्दीन जैसा दुर्बल सुल्तान भी बीस वर्षों तक दिल्ली पर शासन कर गया और जब मरा तो स्वाभाविक रूप से ही मरा। यदि बलबन के स्थान पर कोई अन्य व्यक्ति होता तो सुल्तान के साथ कुछ भी संभव था।
हिंदू से मुसलमान बने दरबारियों ने बना लिया था अपना अलग गुट
दिल्ली दरबार में सत्ता षडय़ंत्र गुलाम वंश की स्थापना के पहले दिन से ही आरंभ हो गये थे। रजिया को गद्दी पर बैठाना, फिर हटाना, उसके पश्चात अन्य दुर्बल सुल्तानों को बैठाने या हटाने में दरबार के इन सत्ता-षडय़ंत्रों की प्रमुख भूमिका होती थी। जब 1246 ई. में दिल्ली के सुल्तान की गद्दी पर बैठा तो उस समय तक दिल्ली दरबार की परिस्थितियों में पर्याप्त परिवत्र्तन आ चुका था। दरबार में ऐसे मुस्लिमों का अपना अलग गुट बन गया था, जो अपने जीवनकाल में पूर्व में मुसलमान थे। ये लोग दरबार के तुर्की सरदारों से ईष्र्या व घृणा करते थे। (संदर्भ : भारत में तुर्क एवं गुलाम वंश का इतिहास पृष्ठ 345)।
भारत में हिंदू से मुसलमान बने लोगों को स्वाभाविक रूप से अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएं देर तक अच्छी लगती रही होंगी, और वे स्वयं को मुसलमानों से श्रेष्ठ ही मानते रहे होंगे। अत: उन लोगों ने समय-समय पर मुस्लिम सुल्तानों का विरोध किया और दरबार के तुर्क सरदारों से स्वयं को कभी हीन नही माना।
रेहान बना नेता
इतिहास में इन भारतीय मुसलमानों के नेता के रूप में रेहान का नाम लिया जाता है। इस सरदार ने चाहे जिस मानसिकता से भी किया हो, पर बलबन का ही विरोध करना आरंभ कर दिया था। रेहान ने इस आंदोलन को या विद्रोह को अपना नेतृत्व प्रदान किया था। उसके इस कार्य में कुछ असंतुष्ट मुस्लिम तुर्क सरदारों ने भी सहयोग किया था।
दरबार की इस गुटबंदी का प्रभाव सुल्तान नासिरूद्दीन पर भी पड़ा और उसने बलबन को हांसी की जागीर देकर अपने आप से दूर कर दिया। यह घटना 1252-53ई. की है। पर 1254 ई. में ही सुल्तान को अपने निर्णय में दोष का अनुभव हो गया और उसने बलबन को पुन: दिल्ली बुला लिया।
गद्दी पर बैठते ही बलबन को हिंदुओं के विरोध का सामना करना पड़ा
बलबन दिल्ली के राज्य सिंहासन पर 1266 ई. में बैठा। उसके सामने उस समय यद्यपि कई प्रकार की समस्याएं थीं, परंतु सबसे प्रमुख समस्या थी हिंदुओं का स्वतंत्रता प्रेमी स्वभाव और दिल्ली के राज्यसिंहासन के प्रति उनका विद्रोही होना। यद्यपि बलबन ने दिल्ली सल्तनत के प्रमुख सेनापति के रूप में अब से पूर्व कई बार हिन्दुओं पर असीम अत्याचार ढ़हाये थे, पर उन सबके उपरांत भी वह ना तो उनका मान मर्दन कर सका था, ना ही उन्हें दिल्ली सल्तनत के प्रति निष्ठावान बना पाया और ना ही उनका हृदय जीत पाया था। बलबन के अत्याचारों का हिंदुओं पर विपरीत ्रही प्रभाव पड़ा। हिंदुओं को जैसे ही अवसर मिलता था वे सुल्तान के कर्मचारियों को पीड़ा पहुंचाने, राजकोष को लूटने और रसद छीनने में तनिक भी संकोच नही करते थे। (संदर्भ : भारत में तुर्क एवं गुलामवंश का इतिहास पृष्ठ 347)
इस साक्षी से स्पष्ट होता है कि भयानक अत्याचार भी हिंदुओं को अपने स्वतंत्रता आंदोलन से मोड़ नही पाये थे। उन्होंने लाखों बलिदान दे लिये थे और अभी लाखों बलिदानों के लिए ही तैयार खड़े थे। देशभक्ति का रंग उनके रोम-रोम में रच-बस एवं रम गया था। डा. शाहिद अहमद हमें बताते हैं कि उनमें (हिंदुओं में)  से कुछ तो इतने वीर और साहसी होते थे कि दिन में ही राजधानी में प्रवेश कर जाते थे और लूटमार किया करते थे। सामान्यत: ये लोग मुस्लिम स्त्रियों के आभूषण तथा वस्त्र उतरवा लिया करते थे और इस प्रकार सल्तनत की शक्ति तथा प्रतिष्ठा पर प्रहार किया करते थे।
हिंदू प्रजा की तो ये स्थिति थी ही, साथ ही हमारे राजपूत शासकों या उनके वंशजों की भी यही स्थिति थी कि वे भी सुल्तान की अधीनता को स्वीकार करने को उद्यत नही थे।
हमारे लिये धर्म राष्ट्रीयता का पर्याय है
भारत वर्ष की परंपराएं अदभुत हैं। यहां प्राचीन काल से ही धर्म को राष्ट्रीयता का पर्याय  माना गया है। इसीलिए वेदों में राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता पर बल दिया गया है। जिनका हम पूर्व में उल्लेख कर आये हैं। वेद से हमारा वैदिक धर्म बना और वैदिक धर्म से हम हिन्ंदू धर्मावलम्बी बन गये। इस सारी प्रक्रिया को पूर्ण होने में लाखों-करोड़ों वर्ष लग गये। कभी किसी एक शासक ने या किसी एक महान पुरूष ने एक स्थान पर या एक समय में खड़े होकर ये नही कहा कि आज से हम वेदधर्मी लोग वैदिक हो गये हैं, या आज से हम वैदिक धर्मी से हिंदूधर्मी हो गये हैं। हमने परंपराओं को काल प्रवाह पर निर्विघ्न बहने दिया और देश, काल, परिस्थिति के अनुसार उन्हें अंगीकार कर लिया।
स्वामी धर्म हमारा सर्वस्व रहा
पर हम चाहे जो रहे हमारे धर्म ने सदा ही हमें राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाया। हम वैदिक धर्मी रहते हुए भी राष्ट्रवादी थे और हिंदू धर्मी रहते हुए भी राष्ट्रवादी थे। यद्यपि कुछ न्यूनताएं समय के अनुसार देखी गयीं, परंतु मूल स्वर धर्म और राष्ट्रीयता का एक ही रहा। स्वामी विवेकानंद ने कहा था-”मैं भिन्न भिन्न देशों में बहुत सी जातियों से मिला हूं। प्रत्येक जाति का एक न एक आदर्श अवश्य होता है। यह कह सकते हैं कि वह आदर्श राष्ट्रीय जीवन की रीढ़ होता है, परंतु भारत का मेरूदण्ड राजनीति नही है, सैन्य शक्ति भी नही है, वरन धर्म, केवल धर्म ही हमारा सर्वस्व है और उसी को हमें अपना आदर्श रखना है।” (विवेका नंद साहित्य पंचम खण्ड पृष्ठ 35)।
उन्होंने मद्रास में दिये गये अपने एक भाषण में कहा था कि-”अन्य  देशों में भी एक प्रबल राष्ट्रीय शक्ति होती है, कहीं यह जबरदस्त के रूप में दिखाई देती है, तो कहीं यह सैन्यवाद के रूप में दिखाई देती है, अथवा वाणिज्यवाद के रूप में, उन्हीं क्षेत्रों में राष्ट्र का हृदय स्थित रहता है।
पर भारत में धर्म ही राष्ट्र के हृदय का मर्मस्थल है। इसी को राष्ट्र की रीढ़ कह लो, अथवा नींव समझो, जिसके ऊपर राष्ट्ररूपी इमारत खड़ी है।’
भारत की इस सनातन परंपरा में धर्म और राष्ट्र को अन्योन्याश्रित समझकर ही यहां हिन्दुत्व को एक जीवन प्रणाली माना गया है। इसे हमारी राष्ट्रीयता का बोधक शब्द माना गया है। विदेशी लेखकों ने भी विवेकानंद के चिंतन पर अपनी सहमति प्रदान की है और माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी हिन्दू और हिंदुत्व को हमारी राष्ट्रीयता का पर्याय माना है।
योगीराज अरविंद कहते हैं
योगीराज अरविंद ने भी एक बार अपने भाषण में कहा था-‘कारावास (एक क्रांतिकारी के रूप में उन्हें अंग्रेजों का कारावास झेलना पड़ा था) से बाहर आने के पश्चात मुझे आज कुछ भी बोलने की इच्छा नही है, तथापि मैं जो कुछ कह रहा हूं वह उस परमात्मा का संदेश है और वही मुझे बोलने को विवश कर रहा है।’
(उस महती शक्ति ने कहा) बाहर जाकर भारतवासियों से कहो कि जब भी भारत जागा है, संपूर्ण विश्व के लिए जागा है। जब भी यह कहा जाता है कि भारत महान है, तो इसका अर्थ है कि सनातन धर्म महान है। सनातन धर्म का प्रसार ही भारत का प्रसार है। भारत धर्म है और धर्म ही भारत है।’
सचमुच यह कथन सत्य है, और सोने के शब्दों में लिखने योग्य है कि-‘भारत धर्म है और धर्म ही भारत है।’
प्राण ही धर्म है और धर्म ही प्राण है
आज के परिप्रेक्ष्य में जब हम अपने कई ऐसे महापुरूषों के उद्घरण पढ़ते हैं, जिन्होंने देश में धर्म-जागरण के माध्यम से राष्ट्र जागरण का कार्य किया तो उनकी बुद्घि और ज्ञान-वैभव की प्रशंसा करने लगते हैं। परंतु हमें अपने देश के उन महान सपूतों के विषय में भी तो सोचना चाहिए जिन्होंने निज प्राण की ज्योति जलाकर धर्म के आलोक से सारे राष्ट्र को ही जगमग कर दिया था। इनके प्राणों का संबंध राष्ट्र और धर्म से ही हो गया था। इनके प्राणों का अभिप्राय था-प्राण ही धर्म है और धर्म ही प्राण हैं। प्राण और धर्म के संयोग से राष्ट्र को लाभ मिल रहा था। इसलिए बलबन ने हिंदू के प्राणों की होली जला दी, चमड़ी खिंचवा ली, खाल में भूसा भर दिया, पर प्राण एक ज्योति के रूप में परिवर्तित हो गये-एक अखण्ड ज्योति राष्ट्र में प्रज्ज्वलित हो उठी और सैकड़ों वर्ष तक यूं ही जलती रही।
योगी अरविंद ने अपने भाषण को जारी रखते हुए आगे कहा था-”इतने ही जोरों से एक बार पहले भी मैंने कहा था कि यह आंदोलन केवल राजनीतिक मात्र नही है। यह भी कहा कि राष्ट्रीयता केवल राजनीति नही है, अपितु यह एक विश्वास है, एक आस्था है, एक धर्म है। आज मैं केवल इतना ही नही कहना चाहता हूं, अपितु यह भी कि सनातन धर्म ही हमारी राष्ट्रीयता है। इस हिन्दू राष्ट्र की उत्पत्ति ही सनातन धर्म के साथ हुई है।
सनातन धर्म के साथ ही यह राष्ट्र आंदोलित होता है और उसके साथ ही बढ़ता है। यदि सनातन धर्म की अवन्न्नति होती है तो हिंदू राष्ट्र की अवन्न्नति होती है और यदि सनातन धर्म कभी नष्ट हो सकता है, तो उसके साथ ही ंिहन्दू राष्ट्र भी नष्ट हो जाएगा।’
हमारा धर्म सनातन है तो इसका संदेश उपदेश, आदेश, निर्देश आदि भी सनातन है। इसका स्वरूप सत्य है, इसके नियम, इसके उपदेश इत्यादि सत्य हैं। क्योंकि सत्य के जिस सनातन (परमपिता परमात्मा) से यह ऊर्जान्वित होता है या प्राण-शक्ति से संचरित होता है, वह स्वयं परम सनातन और परम सत्य है। यह उसी परम सनातन और परम सत्य के सनातन सत्य स्वरूप को संसार में प्रचारित और प्रसारित कर मानव धर्म को ही सत्य और सनातन  बना देना चाहता है। यह भारत का प्राचीन आदर्श रहा है, और इसी आदर्श की प्राप्ति के लिए और इसी की स्थापना के लिए हमारे अनन्य देशभक्त स्वतंत्रता सैनानियों ने मध्य कालीन भारत में अपने बलिदानों की झड़ी लगा दी थी। बलबन की क्रूर तलवार भी उनका प्रवाह मोडऩे में सर्वथा असफल रही थी।
बलबन ने किया स्वतंत्रता आंदोलनों का क्रूरता पूर्वक दमन
बलबन इतिहास में अपनी क्रूरता के लिए प्रसिद्घ है। हिंदुओं ने उसे नासिरूद्दीन के समय से ही नाकों चने चबा दिये थे और उसे बहुत छकाया भी था। अत: वह हिन्दुओं के प्रति पूर्णत: आक्रोश से भरा हुआ था। इसलिए राज्यसिंहासनारूढ़ होते ही उसने हिंदुओं के स्वतंत्रता आंदोलनों को क्रूरता से दमन करने का निर्णय लिया।
मेवातियों का किया सफाया
सबसे प्रथम उसने मेवातियों का सुनियोजित ढंग से सफाया करने की योजना बनायी। जिस जंगल में मेवाती जाकर छिपते थे, उसने उसे चारों ओर से अपनी सेना से घिरवाकर एक ओर से कटवाना आरंभ कर दिया। पूरे जंगल में जहां कहीं भी कोई मेवाती देशभक्त यदुवंशी हिन्दू मिलता, उसे वहीं चूहे की भांति मार दिया जाता। एक ओर से लगातार दूसरी ओर तक इसी प्रकार पूरा जंगल काट दिया गया। बहुत से मेवातियों को हिंदू से मुसलमान बना दिया गया, और जो नही बने उन्हें गाजर मूली की भांति काट दिया गया। पूरे मेवात में आज जितने भर भी मुसलमान हैं वे सभी यदुवंशी हिंदू हैं, जो उस समय नितांत राष्ट्रभक्त थे और उनकी अनन्य राष्ट्रभक्ति का पुरस्कार ही उन्हें ये मिला था कि उनका धर्मांतरण कर दिया गया। अपने इतिहास और इतिहास पुरूषों के प्रति श्रद्घा आवश्यक होती है। यदि ऐसा नही होता है तो व्यक्ति राष्ट्र के प्रति निष्ठावान नही रह पाता है। देश में जहां-जहां भी मध्यकालीन इतिहास में इस धर्मांतरण की प्रक्रिया को अपनाया गया, वहीं वहीं के परिणाम ये आये हैं कि लोगों की अपने धर्म, अपने राष्ट्र अपनी भाषा और अपनी संस्कृति  के प्रति अलगाव की भावना में वृद्घि हुई है।
क्रूरता का चित्रण
कहा जाता है कि बलबन ने मेवातियों के ग्यारह वर्ष से अधिक आयु वाले पुरूषों को तलवार की भेंट चढ़ा दिया था। हिंदू मेवातियों की स्त्रियों को दासी बनाकर उनको विक्रय की वस्तु बना दिया गया। डा. शाहिद अहमद लिखते हैं कि लगभग एक लाख मेवातियों का संहार कर दिया गया। मेवातियों का इस प्रकार दमन करने से ही बलबन को संतोष नही हुआ। उसने उनके भावी विद्रोहों को रोकने के लिए भी व्यवस्था की। इसके लिए उसने गोपालगिरी में एक दुर्ग का निर्माण करवाया और उसमें अफगान सैनिकों को रखवा दिया।
मेवातियों के विरूद्घ बलबन ने इतनी क्रूरता का व्यवहार किया कि वे फिर कभी भविष्य में सिर न उठा सकें।
दोआब में वही इतिहास दोहराया गया
दोआब के लोग अपनी स्वतंत्रता के लिए किस प्रकार सक्रिय थे- इस पर हमने पूर्व में भी प्रकाश डाला है। दोआब की इस राजनीतिक स्वातंत्रय की भावना पर अंकुश लगाने के लिए भी बलबन ने वही इतिहास दोहराया जो कुछ उसने मेवात में किया था। उस समय इस क्षेत्र में भी वनखण्ड था, जिसके मध्य रहकर लोग अपने स्वतंत्रता आंदोलन को चलाते थे और सरकारी कर्मचारियों को या खजाने को लूटकर इसी वनखण्ड में जाकर छिप जाया करते थे। बलबन की दृष्टि में ये लोग लुटेरे थे और देशभक्त न होकर राजद्रोही थे। इसलिए इनका विनाश करना उसके लिए आवश्यक था। फलस्वरूप उसने वहां भी वन खण्ड का विनाश कर लोगों को भयानक रक्तपात के माध्यम से आतंक उत्पन्न किया। उसके अमानवीय क्रूर कृत्यों से लोग इतने भयभीत हो गये थे कि बरनी नामक लेखक ने बलबन की मृत्यु के साठ वर्ष पश्चात लिखा था कि ‘गत साठ वर्षों से सड़कें नितांत सुरक्षित थीं।’
लगा भारी झटका
इस प्रकार मेवात और दोआब में बलबन के अभूतपूर्व क्रूर कृत्यों के कारण भारतीयों के स्वतंत्रता संग्राम को भारी झटका लगा। बलबन के काल से ही तुर्कों की सल्तनत को भारतवर्ष में स्थायित्व मिला। हम इसके उपरांत भी यह कहना चाहेंगे कि चाहे मेवात और दोआब में बलबन स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने में सफल हो गया, परंतु उसकी चिंगारी दहकती रही। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अपने स्वतंत्रता सैनानी पूर्वजों को लुटेरा या राजद्रोही मानना उनके साथ अन्याय करना है। उनका लक्ष्य हमारी स्वाधीनता का मार्ग प्रशस्त करना था, इसलिए जितने लोगों को भी मौत के घाट उतारा गया, या किसी भी प्रकार की यातनाएं दी गयीं वे सभी हुतात्मा थे।
रूहेलखण्ड स्वतंत्रता आंदोलन का भी किया गया दलन
जब बलबन दोआब में अपनी क्रूरता का नग्न प्रदर्शन कर रहा था तभी उसे सूचना मिली कि रूहेलखण्ड में भी हिन्दुओं का स्वतंत्रता आंदोलन भड़क गया है, और वहां के वीर हिन्दू राजपूतों ने अमरोहा तथा बदायूं के हाकिमों को परास्त कर दिया है। इस पर बलबन ने वहां नौ वर्ष से ऊपर के सभी लोगों का नृशंसतापूर्वक वध करा दिया। विद्रोहियों के आवासीय स्थलों में आग लगवा दी। डा. शाहिद लिखते हैं कि विद्रोहियों का ऐसा रक्तपात किया गया कि रक्त की सरिता बहने लगी, जिससे गंगाजी का जल दुर्गंधपूर्ण हो गया। मृतकों के शवों के सड़ जाने से महामारी का रोग फेेल गया, जिससे लाखों व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो गये।
बलबन के विषय में प्रो. निजामी का कहना है कि जब किसी विषय में व्यक्ति तथा राज्य के बीच झगड़ा होता था अथवा उसका अपना हित निहित होता था, तब वह न्याय के सभी सिद्घांतों को तिलांजलि दे देता था और बड़ी बेईमानी कर जाता था।
बलबन जातिवादी था
प्रो. हबीबुल्ला का कहना है कि सुल्तान में प्रजातिवाद भयंकर स्तर का था, जिससे उसे तुर्कों का ही शुभचिंतक बना दिया। उसे निम्न वंश के लोगों से घोर घृणा थी और देशी मुसलमानों को तो वह फूटी आंखों से नही देख सकता था। कैसा दुर्भाग्य है इस देश का कि इसे अपात्रों का पूजन और पात्रों का उत्पीडऩ झेलना पड़ रहा है?

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