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भारत अपने गणतंत्र के 73 वर्ष पूर्ण कर रहा है। हमारे गणतंत्र मजबूती का आधार केवल वही तत्व नहीं है जो हमारे संविधान में दिए गए हैं अपितु उससे अलग भी हमारे राष्ट्र के वे मौलिक संस्कार इस गणतंत्र के मूलाधार हैं जो वैदिक सत्य सनातन धर्म की भांति शाश्वत और अमिट हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि भारत इसलिए प्रगतिशील या उन्नतिशील नहीं है कि उसे हमारे वर्तमान संविधान ने इस और आगे बढ़ने की कुछ विशेष प्रेरणा दी है। हमारा मानना है कि भारत इसलिए प्रगतिशील और उन्नतिशील है कि भारत ने संसार को उन्नतिशील और प्रगतिशील बनने की प्राचीन काल से शिक्षा और प्रेरणा दी है। चरैवेति – चरैवेति का उद्घोष करने वाला भारत ही समझ सकता है कि प्रगति और उन्नति है किस चिड़िया का नाम ? जो लोग हमको आज शिक्षा देते हुए  यह पढ़ाने का प्रयास करते हैं कि तुम तो जड़ बुद्धि रहे हो या पीछे देखने के अभ्यासी हो – उन मूर्खों को यह समझना चाहिए कि ‘चलते रहो – चलते रहो’ का उद्घोष वही राष्ट्र कर सकता है जो पीछे ना देखकर आगे देखने वाला होता है, जिसकी किसी लक्ष्य पर दृष्टि गड़ी होती है और जो किसी उद्देश्य को लेकर उसके प्रति समर्पित होकर काम करने का अभ्यासी होता है।
    हमारे बारे में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हम सनातन धर्म में विश्वास रखने वाले वे लोग हैं जो शाश्वत मूल्यों को अंगीकार करने में आनंद का अनुभव करते हैं। प्रगतिशील और उन्नतिशील जैसे शब्द भी आज के तथाकथित भौतिकवादी पश्चिमी जगत के विचारकों ने रचे व गढ़े हैं। हमारे सनातन और शाश्वत मूल्यों के सामने यह शब्द भी छोटे पड़ जाते हैं। जो सनातन है वह पुरातन होकर भी अधुनातन रहता है। वह सदा नवीन रहता है। भौतिकवाद में कोई चीज आज बनती है, आज से विकास करना आरंभ करती है फिर अपनी उन्नति की चरमावस्था को प्राप्त करती है। उसके बाद उसका विनाश हो जाता है । हम अपनी बात को एक उदाहरण से स्पष्ट कर सकते हैं कि जैसे रेलगाड़ी का पहला इंजन बना आज वह समाप्त हो चुका है, आज उसकी जगह आधुनिकतम इंजनों ने ले ली है। इसी प्रकार भौतिकवादी अन्य वस्तुओं के बारे में भी विचार किया जा सकता है। उनकी आरंभिक अवस्था होकर भी आज नहीं रही है। जबकि सनातन जैसा सृष्टि के प्रारंभ में था वैसा ही आज है और वैसा ही सृष्टि के अंतिम दिन रहेगा। यही कारण है कि ‘हम भारत के लोग’ अनेक उतार-चढ़ावों को देखकर भी सनातन की समावस्था में जीने की अभ्यासी हैं।
भारत के संविधान में आए शब्द ‘हम भारत के लोग’ बहुत महत्वपूर्ण हैं। हमने इन शब्दों का अर्थ 1950 से नहीं बल्कि सृष्टि के प्रारंभ से जाना – समझा है। क्योंकि हम ही वे लोग हैं जिन्होंने राष्ट्र की सही परिभाषा को गढ़ा है। हमारे लिए राष्ट्र मिट्टी का ढेला नहीं है, ना ही खरीदने, बेचने व जीतने की वस्तु है। हमारे लिए यह ईश्वर प्रदत्त वह अनमोल धरोहर है जिसके प्रति हम निष्ठावान रहने को अपना परम कर्तव्य मानते हैं। इसे शाश्वत सनातन और अमर बनाए रखना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है धर्म है । हमने इससे मां का संबंध स्थापित किया है और अपने आपको इसका पुत्र बनाकर इसकी सेवा के लिए प्रस्तुत किया है। वेदों में और अन्य आर्ष ग्रंथों में हमारा और राष्ट्र का यही संबंध स्थापित किया गया है। जब हम कहते हैं कि ‘हम भारत के लोग’ तो इसका अभिप्राय यही होता है कि हम सब देशवासी अपने इस राष्ट्र के प्रति कर्तव्यशील और निष्ठावान बने रहने के लिए जन्म जन्मांतर से संकल्पित हैं।
  भीष्म पितामह ने कहा था कि हस्तिनापुर के राज्यसिंहासन पर जो बैठेगा मैं उसमें अपने पिता का स्वरूप देखूंगा । भीष्म पितामह एक ही संकल्प से हम सभी परिचित हैं परंतु क्या कभी हमने इस बात पर विचार किया है कि उनके इस संकल्प को हमने अपना राष्ट्रीय संकल्प बनाकर सृष्टि के प्रारंभ से हृदयंगम किया हुआ है। भीष्म पितामह से पहले भी और उसके बाद आज तक हमने अपने राजा या शासक में पिता का स्वरूप देखा है। हमारे राजा ने राष्ट्रवासियों का पुत्र के समान पालन पोषण किया है । जिसने राजधर्म के इस नियम का पालन नहीं किया उसको जनता ने खदेड़कर राज्यसिंहासन से उतारने में भी देर नहीं की है। जिन लोगों ने राज्य सिंहासन को पाकर देश के साथ घात किया या देश के मूल्यों के साथ खिलवाड़ किया उनके प्रति किसी प्रकार का कोई सद्भाव प्रकट न करना हमारा राष्ट्रीय संस्कार है। ‘हम भारत के लोग’ इस बात को भली प्रकार जानते हैं कि राजधर्म क्या है और प्रजा धर्म क्या है ? हम अधिकार पसंद नहीं हैं, इसके विपरीत हमारा कर्त्तव्यों के निर्वाह में विश्वास रहा है । हमारी शिक्षा अधिकारों से प्रेम कराने वाली नहीं रही बल्कि कर्तव्यों के प्रति निष्ठा व्यक्त कराने वाली रही है ।
राज धर्म और प्रजा धर्म के अन्योन्याश्रित संबंध से ही हिंदुत्व का वह प्रबल आधार तैयार होता है जो हमारे भारतवर्ष का प्राण तत्व है। यह प्राण तत्व हमें प्रत्येक राष्ट्र विरोधी समाज विरोधी का विरोध सामूहिक रूप से करने की शक्ति देता है और हमें इस बात के लिए भी प्रेरित करता है कि हम केवल उस शासक को ही चुनें  जो राष्ट्र विरोधी और समाज विरोधी लोगों का संहार करने को अपना राजधर्म घोषित करे। आतंकवादियों को बिरयानी खिलाने वाले लोग हमारे शासक नहीं हो सकते – यह भी हमारे देश का मौलिक संस्कार है। ‘हम भारत के लोग’-  इस मौलिक संस्कार को भली प्रकार जानते हैं।
    हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जब पिता का देहांत हो जाता है और उसके स्थान पर परिवार के जिस व्यक्ति को पगड़ी बांधी जाती है तो उसके प्रति सारा परिवार समर्पित होकर काम करता है और वह भी परिवार के सभी सदस्यों का पिता के समान पालन पोषण करता है। हमारे यहां यह परंपरा संयुक्त परिवारों में आज भी गांव देहात में देखी जा सकती है। जहां पर पिता के स्थान पर पगड़ी बंधवाने वाला बेटा अपने सभी भाई-बहनों के बच्चों को भी अपने बच्चों जैसा ही प्यार देता है। वह विष्णु सहिष्णु होता है। हमारे गणतंत्र का आधार विष्णु सहिष्णु शासक है । जिसका सही स्वरूप गांव देहात में आज भी देखा जा सकता है। जहां लोग अपने परिवार और गांव समाज के लोगों से  समान प्रेमपूर्ण व्यवहार करते देखे जाते हैं। परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र बनाने की हमारी इस अनोखी परंपरा और विरासत को समझने की आवश्यकता है। निश्चय ही भारत के इस महान संस्कार को वे लोग नहीं समझ सकते हैं जिन्होंने इस राष्ट्र का कोई पिता कोई चाचा कोई ताऊ बना लिया है या जिन्होंने इस देश की विरासत को अपनी बपौती मान लिया है।
       यह राष्ट्र ही हमारा पिता है। अपने पिता के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार करना हमारे गणतंत्र की महान विरासत है। जो हमारे संस्कारों में रची बसी है।
  हमारा गणतंत्र जन गण के द्वारा स्थापित किया गया तंत्र है। व्यवस्था है । जिसके प्रति हम सामूहिक रूप से निष्ठावान रहे हैं और रहेंगे। हमारी इस निष्ठा को कोई नहीं हिला सकता। सदियों से नहीं , सृष्टि प्रारंभ से भारत के जन गण में समाए इस गणतंत्र के पवित्र भाव को स्वीकार करें और साथ ही इसका अभिनंदन भी करें।
आप सभी को भारत के गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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