केंद्र सरकार द्वारा भारत में लागू की गई वित्तीय समावेशन योजना के लाभ दिखने लगे हैं

किसी भी देश में वित्तीय समावेशन के सम्बंध में ठोस नीतियों को लागू कर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाया जा सकता है, गरीबी एवं आर्थिक असमानता को कम किया जा सकता है एवं वित्तीय स्थिरिता की स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है। भारत में भी केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री जनधन योजना को लागू कर वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में नए नए कीर्तिमान स्थापित कर पूरे विश्व के सामने एक उदाहरण पेश किया है। देश में डिजिटल बैंकिंग के लिए आधारभूत संरचना का विकास करते हुए, बैंकों की शाखाओं को ग्रामीण स्तर तक ले जाने की योजना पर काम किया गया है एवं बैंकिंग संवाददाता (बैंकिंग करेसपोंडेंट) मॉडल को योजनाबद्ध तरीके से देश के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में सफलतापूर्वक लागू किया गया है।

केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए उक्त कदमों का परिणाम यह हुआ है कि भारत में प्रति 1000 वयस्क लोगों की जनसंख्या पर इंटरनेट बैंकिंग के लेनदेन जो वर्ष 2015 में 183 थे वह 2019 में बढ़कर 13,615 हो गए हैं। साथ ही, प्रति 100,000 की जनसंख्या पर वर्ष 2015 में बैंक शाखाओं की संख्या 13.5 थी जो वर्ष 2020 में बढ़कर 14.7 हो गई है, इस प्रकार भारत ने चीन, जर्मनी एवं दक्षिणी अफ्रीका को वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में पीछे छोड़ दिया है।

देश के दूर दराज इलाकों में बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से भारत में बैंकिंग करेसपोंडेंट मॉडल को बहुत ही सफल तरीके से लागू किया गया है। देश के ग्रामीण इलाकों में बैंकिंग करेसपोंडेंटस की संख्या मार्च 2010 में 34,174 से बढ़कर दिसम्बर 2020 में 12.4 लाख तक पहुंच गई है। इन बैंकिंग करेसपोंडेंटस के माध्यम से स्थानीय निवासियों को सप्ताह में कम से कम 5 दिनों तक, प्रतिदिन कम से कम 4 घंटे तक बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके साथ ही, देश के ग्रामीण इलाकों में विभिन्न बैंकों के शाखाओं की संख्या भी मार्च 2010 के 33,378 से बढ़कर दिसम्बर 2020 में 55,073 हो गई है।

वर्ष 2014 में लागू की गई प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत पिछले 7 वर्षों के दौरान अभी तक 43.7 करोड़ खाते देश के विभिन्न बैंकों में खोले गए हैं, दिनांक 20 अक्टोबर 2021 को इन खातों में 1.46 करोड़ रुपए की राशि जमा थी। उक्त वर्णित खातों में से दो तिहाई खाते देश के ग्रामीण एवं अर्द्धशहरी क्षेत्रों में चालू थे। 78 प्रतिशत से अधिक खाते देश के सरकारी क्षेत्र की बैंकों में खोले गए हैं, 18.2 प्रतिशत खाते देश की क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में खोले गए हैं एवं शेष 3 प्रतिशत खाते अन्य वित्तीय संस्थाओं में खोले गए हैं।

सामान्य तौर पर वित्तीय समावेशन की सफलता का आंकलन इस बात से हो सकता है कि सरकार द्वारा इस सम्बंध में बनायी जा रही नीतियों का लाभ समाज के हर तबके, मुख्य रूप से अंतिम पायदान पर खड़े लोगों तक, पहुंच रहा है। भारत में वर्ष 1947 में 70 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे थे। जबकि अब वर्ष 2020 में देश की कुल आबादी का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहा है। 1947 में देश की आबादी 35 करोड़ थी जो आज बढ़कर 136 करोड़ हो गई है। देश में वित्तीय समावेशन को सफलतापूर्वक लागू किए जाने के कारण ही गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या में भारी कमी देखने में आई है। केंद्र में वर्तमान मोदी सरकार के कार्यभार ग्रहण करने के बाद से तो वित्तीय समावेशन के कार्यान्वयन में बहुत अधिक सुधार देखने में आया है। उसके पीछे मुख्य कारण देश में विभिन्न वित्तीय योजनाओं को डिजिटल प्लैट्फार्म पर ले जाना है। केंद्र सरकार द्वारा प्रारम्भ की गई प्रधानमंत्री जनधन योजना ने इस संदर्भ में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। जब यह योजना प्रारम्भ की जा रही थी तब कई लोगों द्वारा यह सवाल उठाए गए थे कि देश में पहिले से ही इस तरह की कई योजनाएं मौजूद हैं, फिर इस एक और नई योजना को शुरू करने की क्या जरूरत है? अब उक्त योजना की महत्ता समझ में आती है जब जनधन योजना के अंतर्गत करोड़ों देशवासियों के खाते विभिन्न बैंकों में खोले गए हैं एवं इन खातों में आज सीधे ही सब्सिडी का पैसा केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा हस्तांतरित किया जा रहा है। मनरेगा योजना की बात हो अथवा केंद्र सरकार की अन्य योजनाओं की बात हो, पहिले ऐसा कहा जाता था कि केंद्र से चले 100 रुपए में से शायद केवल 8 रुपए से 16 रुपए तक ही अंतिम हितग्राही तक पहुंच पाते हैं, परंत आज हितग्राहियों के खातों में सीधे ही सहायता राशि के जमा हो जाने के कारण बिचोलियों की भूमिका एकदम समाप्त हो गई है एवं हितग्राहियों को पूरा का पूरा 100 प्रतिशत पैसा उनके खातों में सीधे ही जमा हो रहा है। यह वित्तीय समावेशन की दृष्टि से एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध हुआ है। वित्तीय समावेशन के कुछ अन्य लाभ भी देश में देखने में आए हैं जैसे हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक द्वारा जारी एक प्रतिवेदन के अनुसार, जिन राज्यों में प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत अधिक खाते खोले गए हैं तथा वित्तीय समावेशन की स्थिति में सुधार हुआ है, उन राज्यों में अपराध की दर में कमी आई है तथा इन राज्यों में अल्कोहल एवं तंबाखु के सेवन में भी कमी आई है।

वित्तीय समावेशन में एक दूसरा पहलू भी है। वह यह कि देश के नागरिकों के बीच वित्तीय साक्षरता को कितना अधिक से अधिक फैलाया जा रहा है। वितीय सक्षरता के मामले में अभी हमारा देश बहुत पीछे हैं। देश का आम नागरिक अभी भी बैंक खातों एवं बीमा योजनाओं का सही सही मतलब नहीं समझ पाता है। शेयर बाजार के बारे में उनको कोई जानकारी नहीं है। यह गलती, दरअसल आम नागरिकों की नहीं है। इसके लिए हम सभी जिम्मेदार हैं क्योंकि इस ओर अभी तक हमने बहुत गम्भीरता से ध्यान ही नहीं दिया है। वितीय समावेशन का अधिक फायदा तभी हो सकता है जब वित्तीय साक्षरता भी हो। केंद्र सरकार द्वारा की गई पहल के कारण वित्तीय समावेशन का पहिला भाग तो देश में सफलतापूर्वक लागू किया जा चुका है तथा इसे और मजबूत किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं परंतु अब दूसरे भाग की ओर भी उसी गम्भीरता से हम सभी को मिलकर ध्यान देना होगा। तब जाकर वित्तीय व्यवस्था में अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जा सकेगी।

प्रहलाद सबनानी

लेखक भारतीय स्टेट बैंक से सेवा निवर्त उप-महाप्रबंधक हैं।

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