राज्य, समाज, व्यक्ति और निन्यानबे का फेर

images (55)

रवि शंकर

बाप बड़ा न भैय्या, सबसे बड़ा रुपैय्या। यह कहावत जिसने भी बनाई होगी, उसने सोचा नहीं होगा कि कभी एक समय पूरा देश उसकी कहावत के पीछे ही चलेगा। रुपैय्या यानी कि धन औप धन अर्थात् अर्थतंत्र। अर्थतंत्र यानी धन कमाना, धन व्यय करना, धन संग्रह करना, धन का वितरण करना। भारतीय शास्त्रों ने अर्थतंत्र और उसके संचालक वैश्यों को समाज में वह स्थान दिया जो शरीर में पेट का है। पेट में सारा भोजन जाता है और पेट उसका पाचन करके पूरे शरीर में सात धातुओं के रूप में भेज देता है। इससे शरीर ताकतवर और बलिष्ठ बनता है। परंतु यदि कोई मनुष्य सारे काम छोड़ कर केवल पेट को पूजने यानी कि खाने-पीने में ही जुटा रहे तो उसे किसी भी रूप में अच्छा नहीं कहा जा सकता। अत्यधिक भोजन मोटापे को निमंत्रित करता है और अत्यधिक मोटापा शिथिलता और मृत्यु को। यहाँ हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भोजन यदि सही नहीं हुआ यानी आज की भाँति जंकफूड का प्रचलन बढ़ा तो मोटापा और कुपोषण दोनों ही आते हैं। कुछ यही बात हम आज के अर्थतंत्र के बारे में भी समझ सकते हैं।

आर्थिक मोटापा और कुपोषण
समस्या यह है कि आज पेट को ही सबकुछ मान लिया गया है। इसलिए समाज दो प्रकार की व्याधियों से ग्रस्त होने लगा है। आर्थिक मोटापा और आर्थिक कुपोषण। आर्थिक मोटापे का अर्थ धनी होना नहीं है। आर्थिक मोटापे का अर्थ है सर्वत्र आर्थिक तंत्र का बोलबाला होना। भारत के इतिहास में कृषि-उद्योग, व्यापार और कूसीद, जिसे आधुनिक भाषा में बैंकिंग कहते हैं, के अलावा जीवन के शेष आयामों में कभी भी अर्थतंत्र हावी नहीं रहा है। कृषि भी उद्योगों के कारण ही अर्थतंत्र से जुड़ी थी, अन्यथा वह स्वयं पूर्णत: इससे मुक्त थी। अनाज बेचना अपने देश में कभी भी सम्मानजनक कार्य नहीं था। परंतु आज केवल कृषि, उद्योग, व्यापार और कूसीद ही नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवाएं, शासन और यहाँ तक कि  आध्यात्मिक कर्मकांड और दान-पुण्य भी अर्थतंत्र का शिकार हो गया है। इसे ही अर्थतंत्र का मोटापा कहा जा सकता है। शारीरिक मोटापे की भाँति ही यह मोटापा भी समाज के लिए प्राणघातक होने की सीमा तक हानिकारक है। समस्या केवल एक है कि शरीर का कष्ट अनुभव करना सरल होता है, इसलिए वह मोटापा शीघ्र ही अभिशाप प्रतीत होने लगता है, परंतु समाज का कष्ट अनुभव करना कठिन होता है और इसिलए इस मोटापे को समझना भी कठिन हो जाता है।
भारत की लगभग सारी सरकारी नीतियां इसी आर्थिक मोटापे की शिकार हैं। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू रहे हों या फिर आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों, पूरे शासन तंत्र पर आर्थिक नीतियां ही हावी दिखती हैं। शासन के आर्थिक सिद्धांतों की बात की जाए तो आज हमें दो सिद्धांतों के बारे में बताया जाता है। पहला सिद्धांत है पूजीवाद और उसे एक समस्या बताया और समझा जाता है। पूंजीवाद के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जाता है समाजवाद को। दुनिया के समस्त आर्थिक व्यवहार को इन्हीं दो सिद्धांतों में समझने और समझाने की कोशिश की जाती है। हालांकि इन दोनों के विकल्प तलाशने के भी प्रयास हुए हैं, परंतु वे अधिक प्रचलित नहीं हैं।

आर्थिक हिंसा
पहला आर्थिक सिद्धांत है पूंजीवाद। यह समझना कठिन है कि इसे पूंजीवाद क्यों कहा गया? पूंजी तो ऐसी वस्तु है, जिसकी आवश्यकता सभी आर्थिक व्यवहारों में पड़ती ही है। आखिर बिना पूंजी के कोई भी आर्थिक गतिविधि कैसे की जा सकेगी? पूंजीवाद का अर्थ बताया जाता है कि इस व्यवस्था में संपत्ति, व्यापार, उद्योग आदि निजी हाथों में होते हैं और इनसे अधिकतम लाभ पाने की कोशिश की जाती है। समझा और बताया जाता है कि यह एक शोषणकारी व्यवस्था है जिसमें अधिक से अधिक लाभ कमाने के लिए गरीब लोगों का शोषण किया जाता है। इस व्यवस्था के दुष्परिणामों को कार्ल माक्र्स ने यूरोप में देखा और उसके समाधान के लिए उसने साम्यवाद तथा समाजवाद का सिद्धांत प्रस्तुत किया। हैरानी की बात यह है कि अपनी पुस्तक का नाम उसने पूंजी ही रखा। इस प्रकार उसने एक मिथ्या समस्या का निर्माण करके उसका एक समाधान प्रस्तुत कर दिया जो कि स्वयं में भी एक समस्या ही है।
यह सही है कि यूरोप में जब व्यापारिक और औद्योगिक गतिविधियां बढ़ीं तो वहाँ बड़े पैमाने पर शोषण भी बढ़ा। इस शोषण का माक्र्स ने अपनी पुस्तक में विस्तार से और बड़ा ही रोमांचकारी वर्णन किया है। परंतु यह सोचना गलत हो जाएगा कि यूरोप में शोषण सोलहवीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति के साथ प्रारंभ हुआ। वास्तव में यूरोप में शोषण उसके इतिहास के प्रारंभ से ही चल रहा था। इसका एक घृणित स्वरूप दास प्रथा के रुप में देखा जा सकता है। लंबे समय से दास व्यवस्था यूरोप के आर्थिक व्यवहारों का अनिवार्य हिस्सा रहा है। हिंसा दास व्यवस्था से गहराई से जुड़ी रही है। इसलिए आर्थिक हिंसा यूरोप में सामान्य व्यवहार मानी जाती रही है। समस्या तब आई जब उन्होंने यही काम दुनिया के साथ करना प्रारंभ कर दिया। सोलहवीं शताब्दी में यूरोप का शेष दुनिया से व्यवहार करने लायक संपर्क हुआ। तब उन्होंने मानवीय व्यवहार करना सीखा। हालांकि उनके इस सीखने में दुनिया को काफी कुछ भुगतना पड़ा। अकेले अमेरिका में तीन करोड़ लोग मारे गए। भारत में भी उनके हिंसक आर्थिक अत्याचारों के कारण लगभग तीन से चार करोड़ लोग मारे गए। पूरी दुनिया का हिसाब लगाया जाए तो यदि हम विश्वयुद्धों को अगर छोड़ भी दें, तो भी यूरोपीय आर्थिक हिंसा के कारण लगभग 10 से 12 करोड़ लोग मारे गए। यूरोप में हुआ पहला और दूसरा विश्वयुद्ध भी वास्तव में आर्थिक प्रगति और संसाधनों पर एकाधिकार की लड़ाई ही थी।
कुल मिला कर समझा जा सकता है कि यूरोप की व्यवस्थाएं स्वाभाविक आर्थिक व्यवस्थाएं नहीं कही जा सकती। यह देखना रोचक हो सकता है कि जिस काल में यूरोप में इतनी आर्थिक हिंसा हो रही थी, ठीक उसी काल में या फिर उससे पहले भारत में क्या हो रहा था। चंद्रगुप्त मौर्य का काल आधुनिक इतिहासकार 325 ईसा पूर्व में मानते हैं। इस काल में आचार्य चाणक्य अपना सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ कौटिलीय अर्थशास्त्र लिख रहे हैं। कौटिलीय अर्थशास्त्र को अगर हम पढ़ें तो हमें अभी तक के ज्ञात मानव इतिहास की श्रेष्ठतम व्यवस्था मिलती है। कोई आर्थिक हिंसा नहीं, कोई सामाजिक शोषण नहीं, प्रत्येक वर्ग को उसके अनुकूल व्यवहार तथा सम्मान। यही तो अभीष्ट है आज के मनुष्यों का भी। आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय। इस प्रकार गुप्तकाल भारत का स्वार्णिय काल बताया जाता है, जबकि उस समय यूरोप में अंधकार युग चल रहा है।
अज्ञानतावश आर्थिक समानता शब्द का सबसे अधिक दुरुपयोग किया जाता है। आर्थिक समानता का अर्थ केवल और केवल अवसर मिलने की समानता ही हो सकती है। हरेक व्यक्ति को आगे बढऩे का समान रूप से अवसर मिले। परंतु उसकी आर्थिक प्रगति उसको उपलब्ध संसाधनों, उसकी बुद्धि और उसके परिश्रम पर ही निर्भर करेगी। संसाधनों की कमी को पूरा करने का कुछ उपाय अवश्य राज्य अथवा सरकारें कर सकती हैं, परंतु बुद्धि और परिश्रम तो उसका अपना ही होगा। इस मूलभूत बात को समझे बिना आज के आर्थिक विचारकों ने एकदम से सभी को आर्थिक रूप से समान बनाने का मूर्खतापूर्ण तथा असंभव अभियान छेड़ दिया है।

आर्थिक अराजकता बनाम तानाशाही
कुल मिलाकर आज जिसे पूंजीवाद कहा जा रहा है, वह वास्तव में एक प्रकार की आर्थिक अराजकता है। कोई व्यक्ति किसी से काम करवा कर यदि उसके श्रम का उचित मूल्य नहीं देता है, तो यह राज्य द्वारा दंड दिए जाने का विषय है। यह कोई आर्थिक नियम नहीं है। लाभ कमाने के लिए किसी भी प्रकार का उपाय करना उद्योगपतियों तथा व्यापारियों का विशेषाधिकार है, परंतु उनके इस अधिकार से किसी के मानवाधिकार का हनन न हो यह देखना राज्य का काम है। यदि यह नियमन राज्य द्वारा नहीं किया जा रहा हो तो इसे पूंजीवाद नहीं कहेंगे, इसे अराजकता ही कहेंगे। इसे ही देसी कहावतों में कहा गया है – अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी, टके सेर खाजा। टके सेर भाजी और टके सेर खाजा होगा तो निश्चय ही मानवीय श्रम का शोषण हो रहा होगा, परंतु इस शोषण को पूंजीवाद नहीं कहेंगे, इसे अंधेर नगरी और चौपट राजा कहेंगे। यह सामान्य सी समझ भारतीय जनमानस को थी, जो कि कार्ल माक्र्स जैसे अर्थशास्त्री को नहीं थी।
इसलिए इस अंधेरगर्दी को पूंजीवाद का नाम देकर कार्ल माक्र्स ने जो साम्यवाद या समाजवाद का समाधान प्रस्तुत किया वह तो गलत होना ही था। कार्ल माक्र्स ने देखा कि लोगों का शोषण हो रहा है तो उसने राज्य द्वारा इस शोषण को समाप्त करने की बात नहीं की, उसने पूरी आर्थिक व्यवस्था को ही राज्य के अंतर्गत करने की बात कह दी। यह आर्थिक अराजकता का ठीक उलटा था – आर्थिक तानाशाही। उसने समस्त आर्थिक निजता को समाप्त करने की बात कही। संपत्ति के अधिकार को समाप्त करके उसे राज्य के हस्तगत करने का समाधान दिया। इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता समाप्त हो जाती और व्यक्तिगत स्तर पर जो शोषण हो रहा था, वह भी समाप्त हो जाता। परंतु इससे जो राज्य द्वारा शोषण होता, उसकी उसने उपेक्षा कर दी। व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले शोषण को उससे अधिक शक्तिशाली राज्य द्वारा रोका तथा समाप्त किया जा सकता था, परंतु राज्य से अधिक शक्तिशाली तो कोई और है ही नहीं, ऐसे में राज्य द्वारा किए जाने वाले शोषण को रोकने वाला कोई होगा ही नहीं। इस आर्थिक तानाशाही से केवल और केवल आर्थिक शोषण ही संभव था। यही हमने साम्यवादी व्यवस्था अपनाने वाले देशों रूस और चीन में देखा भी।
साम्यवादी व्यवस्था को इसलिए तानाशाही व्यवस्था कहा जाना चाहिए। साम्यवादी शब्द भ्रम उत्पन्न करता है। इससे तानाशाही और समानता के उच्च आदर्श में घालमेल पैदा होता है। इस प्रकार दोनों ही पारिभाषिक शब्द वास्तव में गलत शब्द हैं और वे एक संभ्रम का निर्माण करते हैं। इससे न केवल नकली समस्याएं पैदा होती हैं, बल्कि नकली समस्याओं के जो समाधान प्रस्तुत किए जाते हैं, वे स्वयं में एक समस्या होती हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि राज्य का काम आर्थिक कार्यों का निष्पादन नहीं है, उसका काम केवल उनका नियमन करना है। समाजवाद ने राज्य को ही समस्त आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बना दिया। इससे घोर आर्थिक विषमता और भ्रष्टाचार का जन्म हुआ। उदाहरण के लिए अकाल की आपात् स्थिति में भूखों को भोजन देना राज्य का काम है। परंतु आपात् स्थिति को सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता। भारत में जनवितरण प्रणाली ऐसा ही आर्थिक रुप से विसंगत काम था जिसे समाजवादी व्यवस्था के नाम पर सरकार कर रही है। इसका एक और विकृत रूप मिड डे मील के रूप में देखा जा सकता है।
इसकी विसंगति को इस प्रकार समझें। सरकार तो चावल दाल आदि राशन पैदा करती नहीं। वह उपलब्ध कैसे कराएगी? इसके लिए सरकार किसानों से राशन खरीदेगी। सरकार अधिक मूल्य पर राशन खरीद कर कम मूल्य में राशन कैसे उपलब्ध कराएगी? इसके लिए सरकार लोगों से कर वसूलेगी। लोग दूसरों को कम मूल्य पर राशन उपलब्ध कराने के लिए कर क्यों देंगे? इससे कर की चोरी प्रारंभ होगी। कर चोरी बढऩे पर सरकार का राजस्व घाटा बढ़ेगा। राजस्व घाटे की पूर्ती के लिए सरकार अप्रत्यक्ष कर बढ़ाएगी। अप्रत्यक्ष कर उन गरीब लोगों को भी देना पड़ता है जिन्हें हम गरीब होने के कारण कम मूल्य में राशन उपलब्ध कराना चाहते हैं। यह कहना कि विलासिता की वस्तुओं पर अप्रत्यक्ष कर अधिक होंगे और इस प्रकार गरीब लोग उससे बच जाएंगे, एक महान मूर्खता का लक्षण है। विलासिता मनुष्य का स्वभाव है, इसका अमीर और गरीब से कोई लेना देना नहीं है। गरीब से गरीब व्यक्ति भी विलासिता की वस्तुएं प्राप्त करना चाहता है। वह प्राप्त नहीं होने पर समाज में अपराध बढ़ते हैं। अपराधों को नियंत्रण करना सरकार का काम है, पंरतु सरकार तो कम मूल्य पर राशन वितरित करने की अंतहीन समस्या से जूझ रही है, वह अपराध नियंत्रण करने में अक्षम साबित होती है। इस प्रकार एक गलत समाधान भ्रष्टाचार, गरीबी और अपराध तीनों को बढ़ाने में सहायक हो जाता है। यही भारत के आज के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक अवस्था का सही चित्र है।
सबसे पहली बात तो यह समझने की है कि राज्य को सभी गतिविधियों का नियमन करना है संचालन नहीं। आर्थिक गतिविधियां हों, या शैक्षणिक या फिर स्वास्थ्य संबंधी, राज्य यानी सरकारों का काम इन गतिविधियों का संचालन नहीं है। उसे इनका नियमन भर करना है। वह यदि स्वयं संचालन में व्यस्त हो जाएगी तो इससे दो समस्याएं पैदा होंगी। पहला तो यह कि वह अपने मूल काम न्याय तथा प्रशासन पर पूरा ध्यान नहीं दे पाएगी। दूसरा यह कि सरकारी संचालनों में तंत्र के विस्तृत और बोझिल होने के कारण गैरजिम्मेदारी और भ्रष्टाचार फैलेंगे ही। इस मूलभूत सिद्धांत को ध्यान में रखकर अब देश की आर्थिक नीतियों की समीक्षा और उनके समाधान पर विचार करेंगे।

भोग नहीं, संतुष्टि हो लक्ष्य
आर्थिक अराजकतावाद (तथाकथित पूंजीवाद) हो या फिर आर्थिक तानाशाहवाद (तथाकथित साम्यवाद), दोनों ही व्यवस्थाओं में मनुष्य को एक आर्थिक प्राणी मानकर व्यवस्थाएं और नीतियां बनाई जाती हैं। इस विचार में समस्या यह है कि मनुष्य बिल्कुल भी आर्थिक प्राणी नहीं है। यदि वह आर्थिक प्राणी होता तो एक पिता अपने पुत्र की शिक्षा और अच्छे भविष्य के लिए अपनी इच्छाएं नहीं छोड़ रहा होता। एक पुत्र अपने बीमार माता-पिता की चिकित्सा के लिए अपना समस्त धन व्यय नहीं करता। कोई परिवार अपने किसी एक सदस्य के जीवन की रक्षा के लिए अपनी संपत्ति दांव पर नहीं लगा देता। मनुष्य के आर्थिक प्राणी होने का मौलिक सिद्धांत की मिथ्या है। इसलिए आर्थिक आधार पर जो भी विभाजन किए जाते हैं, वे भी मिथ्या हैं। आर्थिक आधार पर समाज-रचना और उसमें किसी संघर्ष की कल्पना भी मिथ्या है। समस्या यह है कि यूरोप की एक कठिन, विषम और जीवन के लिए अत्यंत कष्टप्रद परिस्थिति में मनुष्यों का जो आपात्कालीन व्यवहार विकसित हुआ, उसे ही सामान्य मानवीय व्यवहार मान लिया गया। इससे मनुष्य के विकास का लक्ष्य ही गलत सुनिश्चित कर लिया गया। भोजन, वस्त्र और आवास की बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे यूरोप में इन्हें पाना ही विकास का लक्षण मान लिया गया। इसलिए अधिक से अधिक भौतिक, शारीरिक सुविधाएं पाना ही आर्थिक प्रगति का मापदंड माना गया। यह भारत के सनातन आर्थिक चिंतन के विरूद्ध बात थी।
अधिक से अधिक शारीरिक सुख या भौतिक समृद्धि पाने की लालसा को हमारे यहाँ अनेक कथाओं और रूपकों से अंतहीन और अप्राप्य बताया गया। एक प्रसिद्ध कथा ययाति की आती है जो और अधिक सुखभोग करने की लालसा में बेटे का योवन ले लेता है। अंत में वह कहता है, भोगा न भुक्ता, वयमेव भुक्ता। यानी हम भोगों को नहीं, भोगते, भोग ही हमें भोगते हैं। उपनिषदों में इंद्र और विरोचन की कथा आती है। विरोचन अपने शरीर को ही सबकुछ मान लेता है और उसे सजाने, संवारने तथा सुखी बनाने को ही अपना परम लक्ष्य मान लेता है। इंद्र को इसमें शंका हो जाती है और वह निरंतर जिज्ञासा करता हुआ इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि वह शरीर नहीं, वरन् आत्मा है। इसलिए शरीर को सुरक्षित रखने के उपाय करते हुए आत्म तत्व तक पहुँचने का अपना लक्ष्य वह निर्धारित करता है।
यह सैद्धांतिक अंतर ही दोनों आर्थिक चिंतनों के लक्ष्य को ही बदल देता है। यूरोपीय आर्थिक चिंतन केवल मनुष्य के भौतिक सुखों की चिंता करता है, जबकि भारतीय आर्थिक चिंतन मनुष्य के आत्मिक सुख को लक्ष्य मानता है। लक्ष्य की यह भिन्नता ही दोनों आर्थिक चिंतनों के तंत्र, प्रक्रियाओं तथा नीतियों को बदल देती है। मनुष्य के भौतिक सुख जब लक्ष्य बनते हैं, तो प्रकृति उसके लिए भोग्या मात्र होती है। फिर वह प्राकृतिक संसाधनों का अपरिमित शोषण करता है। फिर उसे फर्क नहीं पड़ता कि जंगल बच रहे हैं या नहीं, नदियां निर्मल और अविरल बच रही हैं कि नहीं या फिर जमीन उपजाऊ बच पा रही है या नहीं। उसे यह भी चिंता नहीं रहती कि लोहे और कोयले के खदानों से वहाँ का पूरा जन-जीवन नष्ट हो रहा है, बड़े-बड़े कारखानों से वहाँ से सभी कर्मचारियों का स्वास्थ्य और आयु क्षीण हो रहे हैं, शहरों की भागमभाग से लोगों का जीवन अवसाद, मधुमेह, रक्तचाप, हृदयरोग जैसे जीवनशैलीजन्य बीमारियों से ग्रस्त हो रहा है। उसे तो केवल इतना पता है कि गर्मी और उमस बढऩे से वह एसी चलाकर आराम कर सकता है, बारिश होने पर वह शीशे की खिड़कियों से नजारा देख सकता है, ठंड में वह हीटर की गर्म हवाओं का आनंद उठा सकता है। गरमी में उसे पसीना बहाने की आवश्यकता नहीं लगती और ठंड में उसे धूप सेंकना व्यर्थ लगता है।
लक्ष्य का यह अंतर तंत्र को भी बदलता है। भौतिक सुखों की अंतहीन खोज उसे शहरों के विकास की ओर प्रेरित करती हैं। चिकनी सड़कें, तेज वाहन, चौबीस घंटे बिजली और बड़े-बड़े पुल, फ्लाईओवर, कारखाने, मॉल, बाजार और सिनेमाघर। शहरों की आवश्यकताओँ की पूर्ति के लिए गाँवों को कस्बों में बदलना होता है। इनक्लोजर्स अधिनियम द्वारा किसानों को मजदूरों में बदलने, विस्थापित तैयार करके उन्हें शहरों के लिए कर्मचारियों में बदलने की वही यूरोपीय प्रक्रिया इस तंत्र का अविभाज्य हिस्सा है। यह हम भारत में तेजी से घटित होता देख सकते हैं। पुरानी परिभाषा में चकबंदी और वर्तमान परिभाषा में कांट्रैक्ट फार्मिंग वही बदनाम यूरोपीय इनक्लोजर नीति का संवर्धित स्वरूप है। किसानों को बाजार पर आश्रित करना ताकि छोटे और मंझोले किसान प्रतियोगिता में टिक न सकें, दम तोड़ दें और खेतीहर या कारखाने का मजदूर बनने पर विवश हो जाएं, इसका स्वाभाविक परिणाम है। भारत में हो रही किसान आत्महत्याओं से इस प्रक्रिया की भीषणता को समझा जा सकता है।

समाधान है आर्थिक त्रैतवाद
जिस प्रकार भारतीय अध्यात्म चिंतन जीवात्मा, परमात्मा और प्रकृति के त्रैतवाद पर आधारित है, ठीक उसी प्रकार भारतीय अर्थचिंतन भी मनुष्य, समाज और प्रकृति के त्रैतवाद पर आधारित है। भारतीय अर्थचिंतन में व्यक्ति, समाज और प्रकृति तीनों के ही हितों और उनके समन्वय की चिंता की जाती है। इसलिए यह अर्थचिंतन कभी भी किसी का विरोधी नहीं रहा। व्यक्ति, समाज और प्रकृति का पोषण करता है। इसी प्रकार समाज, व्यक्ति और प्रकृति के हितों का संरक्षण तथा संवर्धन करता है और प्रकृति तो व्यक्ति और समाज का पालन करती ही है। इस प्रकार एक चक्र का निर्माण होता है जिसमें तीनों एक-दूसरे पर आश्रित दिखते हैं।
अर्थ तंत्र में सामान्यत: दो गतिविधियां होती हैं उत्पादन और विनिमय जिन्हें मोटे तौर पर चार भागों में बाँटा जा सकता है। कृषि और उद्योग उत्पादन के भाग हैं तथा व्यापार और कुसीद जिसे आज की भाषा में बैंकिंग कहते हैं, विनिमय के भाग हैं। भारत में हमेशा से कृषि और उद्योगों को श्रेष्ठ माना गया। एक पुरानी लोक कहावत है उत्तम खेती, मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान। यह कहावत भी इसी बात को पुष्ट करती है। खेती भारत के लिए केवल आर्थिक गतिविधि नहीं थी। यह जीवन का हिस्सा थी। इसलिए समस्त त्यौहार, उत्सव और अन्यान्य सामाजिक गतिविधियां इससे जुड़ी हुई थीं। अनाज का बेचा जाना पाप माना जाता था। इसलिए कृषि आर्थिक व्यवहारों का आधार तो थी, परंतु वह स्वयं आर्थिक गतिविधि नहीं मानी जाती थी।
इन चारों आर्थिक गतिविधियों में राज्य का नियमन होता था। राज्य कभी भी स्वयं इन गतिविधियों में लिप्त नहीं होता था। उदाहरण के लिए कौटिलीय अर्थशास्त्र में कृषियोग्य भूमि की व्यवस्था करने के लिए राजा को अधिकार दिए गए हैं। परंतु जब तक किसान उस पर खेती करता है, वह भूमि उस किसान की ही मानी जाती है। राजा उससे केवल राजस्व कर लेने भर का ही अधिकारी होता है। उस पर खेती कैसे की जाएगी, यह तय करने का अधिकार भी किसान के पास ही होता था, राज्य के पास नहीं। राज्य केवल इतना निश्चित करता था कि कृषियोग्य भूमि परती न पड़ी रहे। इसी प्रकार चाणक्य ने वस्त्र उद्योग के लिए भी सूत्राध्यक्ष की व्यवस्था दी है, परंतु उसका कार्य भी केवल इतना देखना है कि कहीं किसी भी व्यक्ति का उत्पीडऩ न हो रहा हो और राज्य को कर ठीक से मिल रहा हो। सूत्राध्यक्ष का कार्य कारखानों को संचालन और उनके आर्थिक लाभ-हानि की चिंता करना नहीं है। यदि हम मनुस्मृति को देखें तो उसमें भी आर्थिक गतिविधियों में राज्य की भूमिका केवल नियमक की ही बताई गई है। राज्य न्यायकर्ता है, उसे यह सुनिश्चित करना है कि ग्राहक या व्यापारी या फिर उत्पादक किसी भी व्यक्ति के साथ कोई अन्याय न हो। कोई कर की चोरी न करे। इन आर्थिक गतिविधियों में राज्य की दूसरी भूमिका उन्हें आंतरिक और बाह्य सुरक्षा प्रदान करने की भी होती थी। इसलिए भारत के अभी तक के इतिहास में राज्य या शासन कभी भी आर्थिक गतिविधियों में संलिप्त नहीं रहा है। इसका ही परिणाम था कि अ_ारहवीं शताब्दी तक भारत आर्थिक दुनिया सिरमौर बना रहा।
आर्थिक गतिविधियों में व्यक्ति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहती रही है। व्यक्ति ही उपरोक्त सभी आर्थिक गतिविधियों का निष्पादन करता है। इसलिए वह इसका केंद्र है। परंतु आर्थिक गतिविधियां केवल अधिकाधिक अर्थसंचय के लिए नहीं होती थीं। व्यक्ति कृषि करता था, क्योंकि भोजन के लिए अन्नादि की आवश्यकता होती है, परंतु वह समस्त उत्पादन अपने लिए संरक्षित नहीं रखता था। उसे समाज और प्रकृति दोनों की भी चिंता करनी होती थी। अपने शास्त्रों ने इसके लिए अनेक प्रेरणादायी विधान दिए हैं। उदाहरण के लिए वेदों में कहा है शतहस्त समाहर, सहस्रहस्त संकिर: यानी सौ हाथों से कमाओ और हजार हाथों से बाँट दो। वेदों में ही यह भी कहा कि तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा यानी कि त्यागते हुए भोगो। पुराणों में कहा गया केवलाघो भवति केवलादि यानी अकेला खाने वाला पाप ही खाता है। वैदिक पंचमहायज्ञों में बलिवैश्वदेव और अतिथि यज्ञ इसीलिए रखे गए थे कि व्यक्ति अपने आर्थिक व्यवहारों को केवल अपने भोग-विलास के लिए न मान ले। उसे पशु-पक्षियों के लिए बलिवैश्वदेव करना होता था और समाज में कोई भूखा न रहे इसलिए अतिथि यज्ञ करना होता था।
ये बातें केवल कही नहीं गईं, वरन् जीवन का हिस्सा बना दी गई थीं। बाँटना, समाज के कमजोर वर्गों का पालन करना और चेतन प्रकृति यानी पशु-पक्षियों का पालन तथा जड़ प्रकृति यानी भूमि, जल, जंगल आदि का संरक्षण करना भी उसका स्वभाव बना दिया गया था। यह सारे कार्य राज्य द्वारा डंडे के जोर से नहीं करवाए जाते थे। ये कार्य करवाए जाते थे समाज के अनुशासन से। यदि कोई कंजूस प्रवृत्ति दिखाता था तो समाज में उसकी प्रतिष्ठा नहीं होती थी। यदि कोई कृपण व्यक्ति किसी विद्वान का सत्कार नहीं करता था अथवा प्रकृति के संसाधनों का दुरुपयोग करता था तो समाज उसे बहिष्कार जैसे दंड देता था।
इस प्रकार व्यक्ति केवल राज्य को कर दे कर कुछ भी आर्थिक गतिविधि चलाने के लिए स्वतंत्र नहीं था। उस पर समाज का भी अनुशासन लागू होता था। सबसे बड़ी बात यह थी कि यह सारे कार्य केवल प्रेरणा से होते थे शासन के बल से नहीं। प्राचीन काल से यह परंपरा रही है कि देशाटन करने वालों के नि:शुल्क या नाममात्र के शुल्क पर ठहरने की व्यवस्था करने के लिए देश का वैश्य वर्ग धर्मशालाएं और प्याऊ बनवाता था। समझने की बात यह है कि यह सब करने के लिए आज की भांति उसे शासन द्वारा किसी भी प्रकार के सीएसआर (कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी) चलाने का दबाव नहीं डाला जाता था। ये सारे कार्य वह स्वेच्छा से करता था। धन कमाने वाला व्यक्ति समाज और प्रकृति के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए अपना दायित्व समझ कर किया करता था। यह इसलिए संभव होता था क्योंकि आर्थिक गतिविधियों का उद्देश्य आर्थिक लाभ कमाना नहीं, वरन् सभी का भरण-पोषण तथा धर्म का पालन करना होता था।
आर्थिक अनुशासन
इसलिए एक और कहावत बनी कि कमाने वाला खिलाएगा। परिवार में सभी नहीं कमाते थे। कमाते कोई 2-3 लोग ही थे, परंतु परिवार के 8-10 लोगों का वे पालन करते थे। शेष लोग अन्य सामाजिक कामों में लगते थे। साथ ही गाँव के न कमाने वाले वर्गों जिनमें शिक्षक, कलाकार आदि होते थे, का भी वे पालन बड़ी ही प्रसन्नता के साथ करते थे। यह समृद्धि केवल आर्थिक नहीं थी, आर्थिक समृद्धि होने के साथ-साथ यह मानसिक और आत्मिक समृद्धि भी थी। इसलिए समृद्धि के साथ संतोष और शांति भी थी। प्रतियोगिता की बजाय सहयोग और सहकार का भाव था। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि सेवा को कभी भी आर्थिक गतिविधि नहीं माना गया। अपने देश में सेवा तो हमेशा नि:शुल्क ही की जाती रही है। परंतु सेवा करवाने वाले लोग सेवा करने वाले लोगों का काफी सम्मान करते रहे हैं। उनके भरण-पोषण की चिंता भी वे करते थे। शिक्षा देना एक सेवा कार्य था। यह कभी भी आर्थिक गतिविधि नहीं थी। इसीप्रकार लोगों को स्वस्थ करना कभी भी व्यवसाय नहीं था। वैद्य लोगों की नि:शुल्क सेवा ही करते थे। मनोरंजन करना भी व्यवसाय नहीं था। कलाकार लोगों का नि:शुल्क मनोरंजन करते थे। परंतु समाज उनका पालन करना सुनिश्चित करता था। इसकी व्यवस्थाएं बनाई गईं थीं जिनकी चर्चा यहाँ विस्तारभय से नहीं कर रहा हूँ। सेवा को व्यवसाय मानने का विरोध महात्मा गाँधी ने भी किया है। उन्होंने इस आधार पर ही अपनी पुस्तक हिंद स्वराज में वकीलों और डाक्टरों को भारत के लिए अनावश्यक बताया है। समाज की भूमिका की चर्चा ऊपर आ गई है। समाज केवल व्यक्ति, प्रकृति और आर्थिक गतिविधियों के बीच समन्वय का कार्य करता रहा है।
एक अंतिम महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत में कभी भी विशाल स्तर पर योजनाएं बनाने का कार्य नहीं हुआ। भारतीय मनीषि यह जानते थे कि समाज में देश-काल की विविधता के कारण योजनाएं हमेशा स्थानीय स्तर पर ही बननी चाहिएं। इसलिए विकास की समस्त योजनाएं छोटे स्तर पर ही बनती रहीं। इसका लाभ यह होता था कि हरेक स्थान का विकास वहाँ के संसाधनों के आधार पर किया जाता था। इसलिए देश में हजारों प्रकार की भोजन-परंपराएं विकसित हुईं। इसका कारण था कि झारखंड या उड़ीसा के लोगों को पंजाब से गेंहूं खाने के लिए नहीं भेजा जाता था। वहाँ के भोजन के लिए वहाँ की जलवायु और मिट्टी के अनुसार वहीं पैदा किया जाता था। इसलिए पूरे देश में अलग-अलग अनाजों का प्रचलन था। इसलिए हरेक गाँव या पंचायत अपने जल स्रोतों की चिंता करती थी। उन्हें पता होता था कि कोई दूसरे राज्य से उन्हें पानी नहीं मिलने वाला।
आर्थिक अनुशासन का एक और महत्वपूर्ण भाग है उपभोग पर संयम। दुर्भाग्यवश आज की सरकारें ही अंतहीन उपभोग बढ़ाने में लगी हैं। चौबीस घंटे बिजली, अपना समाप्त हो जाए तो दूसरी नदी का पानी, भूजल नीचे चला जाए तो और भारी यंत्र लगाकर और भी अधिक नीचे से पानी निकालना, स्मार्ट सिटी के नाम पर अंतहीन इंटरनेट, चाहे हर वर्ष तोडऩी पड़ें परंतु 10-15-20 वर्ष तक चलने योग्य मजबूत सड़कें आदि के वादे जनता को अबाधित उपभोग की ओर प्रेरित करते हैं। सरकार का काम निर्बाध उपयोग को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि सीमित और आवश्यकताभर उपयोग की समझ बढ़ाना होना चाहिए। इससे अधिक की मांग को हतोत्साहित किए जाने का कार्य किया जाना चाहिए। चूंकि आज सरकार ही आपूर्तिकर्ता बनी हुई है, इसलिए यह बात कहनी पड़ रही है, अन्यथा निजी हाथों में आर्थिक व्यवहार रहने पर उपभोग पर सीमा स्वाभाविक रूप से बंध ही जाती है। उपभोग पर सीमा बंधी नहीं होने के कारण ही वर्तमान समय में सारी विकास-योजनाएं असफल हो रही हैं। एक व्यवस्था की जाती है, परंतु वह कुछ ही दिनों में अपर्याप्त लगने लगती है।
इस अनुशासन का ही एक और हिस्सा है गाँवकेंद्रित विकास योजनाएं। गाँव और शहर का मौलिक अंतर उत्पादक और उपभोक्ता का है। गाँव उत्पादक हैं, शहर उपभोक्ता। शहरकेंद्रित विकास उपभोग को बढ़ावा देता है, जबकि गाँवकेंद्रित विकास का अर्थ उत्पादन को बढ़ावा देना है। शहर असीमित उपभोग की लालसा रखता है, क्योंकि उसे स्वयं कुछ पैदा नहीं करना होता। गाँव मर्यादित उपभोग की बात करते हैं, क्योंकि उन्हें स्वयं अपनी आवश्यकता की चीजें पैदा करनी होती हैं। शहर यांत्रिक होते हैं, गाँव जीवंत और मानवीय। इसलिए सभी भारतीय मनीषी गाँवकेंद्रित विकास की बात ही करते हैं, बल्कि भारतीय ऋषि तो वनों में रहने का आदेश देते हैं। हरेक व्यक्ति को जीवन का एक हिस्सा वनों में व्यतीत करने का विधान किया गया था। इसे वानप्रस्थ कहते थे। समझने की बात यह है कि गाँव और वन ही मनुष्य के लिए उपयुक्त माने गए, शहर नहीं।
इसलिए स्मार्ट शहरों की बजाय स्वावलंबी गाँव तैयार करने पर जोर होना चाहिए। दुर्भाग्यवश आज की स्थिति कम से कम यही है कि देश की विकास-योजनाएँ कतिपय वैश्विक संगठनों द्वारा बनाई या निर्देशित की जाती हैं। इसलिए वे देश की मिट्टी से जुड़ी नहीं होतीं। इतना ही नहीं, इन वैश्विक कहे जाने वाले संगठनों की नीतियां सामान्यत: यूरोप की अल्पदृष्टि से प्रभावित रहती हैं। उनसे निर्देशित होने के कारण अपने देश की अधिकांश विकास-योजनाएं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के नाम पर केवल और केवल नकल योजनाएं भर ही होती हैं। इसका एक बड़ा उदाहरण स्वच्छता अभियान है। स्वच्छता जिन्हें हमने सिखाई, आज उनसे स्वच्छता सीखी जा रही है और वह भी केवल नकल करके। शहरों के शौचालयों के मल का निपटान तो कर नहीं पा रहे हैं, पूरे देश में गाँव-गाँव में जो मल एकत्र कर रहे हैं, उनका निपटान कैसे करेंगे, यह किसी को ज्ञात नहीं। इतना ही नहीं, उन शौचालयों में जो पानी लगने वाला है, उसकी व्यवस्था कहाँ से की जाएगी, यह भी कोई नहीं जानता। संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों को स्वच्छता अभियान का नाम देना एक बड़ी प्रवंचना है। क्या हम इससे पहले अस्वच्छ थे?
क्या हो वैकल्पिक नीति
आज के समय में यदि हम विचार करें तो हमें कुछेक आर्थिक सुधार अविलम्ब करने चाहिए।
1. पूरे देश के विकास की योजनाएं दिल्ली में बनाई जानी बंद की जानी चाहिएं। योजनाएं हमेशा पंचायतों या फिर जिलों में बने।
2. रक्षा और न्याय के लिए आवश्यक धन के लिए ही केंद्रीय कर लिया जाए। विकास कार्यों के लिए जाने वाले कर जिलों से ऊपर नहीं जाने चाहिएं।
3. तत्काल प्रभाव से समस्त सरकारी आर्थिक गतिविधियां (सरकारी होटल, कारखाने, बैंक, कंपनियां आदि) बंद की जानी चाहिएं। इसके लिए विनिवेश की नीति बहुत ही अच्छी थी। सरकारी संस्थान लाभ में हो या घाटे में, उन्हें निजी हाथों में सौंप देना चाहिए। सरकार केवल उनका नियमन करे, संचालन नहीं। केवल रक्षा सबंधी निर्माण ही सरकार द्वारा किए जाएं।
4. सेवाओं को करमुक्त किया जाना चाहिए। सेवाकर राज्य द्वारा किया जाने वाला एक आर्थिक अपराध है। इसे अविलंब समाप्त किया जाना चाहिए। सेवाओं को व्यवसाय की श्रेणी से बाहर किया जाना चाहिए। सेवा शब्द का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता यदि उसमें व्यवसाय शामिल हो जाए। इस विरोधाभास को समाप्त करने के लिए आवश्यक है सबसे पहले इसे करमुक्त किया जाए। फिर इसमें लाभ कमाने के सभी रास्तों को बंद किया जाना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, देशाटन आदि सभी सेवाएं अव्यावसायिक घोषित की जाएं और उनका संचालन समाज को सौंप दिया जाए। सेवा की गतिविधि को आर्थिक गतिविधि मानना बंद किया जाना चाहिए।
5. मानव श्रम और पशु-ऊर्जा के आधार पर ही अधिकांश विकास-योजनाएं बनाई जाएं। यंत्रों का उपयोग और प्रयोग अत्यंत सीमित और सार्वजनिक स्थलों पर ही हो। उदाहरण के लिए घर-घर में नलके का होना पानी के दुरुपयोग को ही बढ़ावा देता है। व्यक्ति जब अपने हाथों से पानी निकालता है, तो स्वाभाविक रूप से उसका उपयोग सीमित हो जाता है। कम्प्यूटर और इंटरनेट व्यक्ति-व्यक्ति तक पहुँचाने की बजाय केवल पुस्तकालय, सामुदायिक केंद्र जैसे सार्वजनिक स्थानों पर ही उपलब्ध हों। आमजन को इनके उपयोग से लाभ कम और हानि ही अधिक है।
6. बड़े कारखानों की स्थापना को हतोत्साहित किया जाए। स्थानीय निर्माणों को बढ़ावा दिया जाए। यदि भारी मात्रा में उत्पादन न किया जाए, तो बड़े कारखाने घाटे का सौदा हैं। उनके उत्पाद काफी मंहगे हैं, वे सस्ते केवल दिखते हैं। यदि उनके कारण पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को होने वाली हानि को राशि में गणना की जाए तो उनके समस्त उत्पाद कम से कम सौ गुणा मंहगे साबित होंगे। इसलिए इस्पात बनाने के भी प्राचीन तरीकों को ही बढ़ावा दिया जाए। बड़े कारखानों और भारी मात्रा में उत्पादन को हतोत्साहित किया जाए।
देश की आर्थिक नीति की दिशा और दशा को सुधारने के लिए ये कुछ बिंदुभर हैं जिनका विस्तार एक पुस्तक की मांग करता है। एक लेख में इसके लिए केवल कुछेक बिंदु भर ही सुझाए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य कुल मिलाकर उस निन्यानबे के फेर से राज्य, समाज और व्यक्ति तीनों को बाहर निकालना है जिसमें फंस कर तीनों ही न केवल अपने उद्देश्यों से भटक गए हैं, बल्कि तीनों में ही अशांति, असंतोष और भ्रष्टाचारण का बोलबाला हो गया है।
संदर्भ ग्रंथ : 1. अहिंसक समृद्धि : प्रो. कुसुमलता केडिया, प्रो. रामेश्वर प्रसाद मिश्र पंकज
2. धर्म तथा समाजवाद : गुरुदत्त
3. हिंद स्वराज : महात्मा गाँधी
4. वैदिक संपत्ति : पं. रघुनंदन शर्मा
5. अथर्ववेद, 6. यजुर्वेद
7. छांदोग्योपनिषद्, 8. कौटिलीय अर्थशास्त्र

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betpark giriş
klasbahis giriş
klasbahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
matbet giriş
matbet giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
matbet giriş
matbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betgaranti mobil giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betwoon giriş
betwoon giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betwoon giriş
betwoon giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
holiganbet giriş
grandpashabet giriş